Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: आर्थिक विषय: क़र्ज़ [ऋण]:
आर्थिक विषय:
क़र्ज़ [ऋण]:
अगर क़र्ज़दार तंगी की हालत में है, तो उसकी (आर्थिक) हालत ठीक
होने तक उसे मुहलत देनी चाहिए; इसके बावजूद, अगर तुम समझ रखते हो, तो तुम्हारे लिए बेहतर तो यह
होगा कि दान-पुण्य का काम समझकर, (ऐसी तंगी में डूबे हुए आदमी
का) पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दो। (2: 280)
ऐ ईमानवालो! तुम जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में क़र्ज़ के लेन-देन का क़रार
[Contract] करो, तो उसे लिख लिया करो: तुम्हारे बीच एक लिखनेवाला [Scribe] हो जो ईमानदारी से दस्तावेज़ लिख दे। किसी लिखनेवाले को लिखने से इंकार नहीं
करना चाहिए: उसे लिख देना चाहिए जैसा कि अल्लाह ने उसे सिखाया है। जिस पर क़र्ज़ अदा करने का भार है [यानी क़र्ज़दार], वह बोल-बोलकर लिखाए [dictation], और उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए, और उस (क़र्ज़ की राशि) को कम करके नहीं बताना चाहिए। अगर क़र्ज़दार मंद बुद्धि हो, कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो, तो ऐसी हालत में उसके अभिभावक [Guardian] को चाहिए कि वह ईमानदारी से बोलकर लिखा दे। (अब दस्तावेज़ पर) अपने आदमियों में
से दो को गवाह बना लो, अगर वहाँ दो आदमी न हों, तो जिन्हें तुम गवाह बनाना पसंद करो, उनमें से एक मर्द और दो औरतों
को गवाह बना लो, (दो औरतें इसलिए) ताकि दोनों में से एक अगर भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे।
गवाहों को जब बुलाया जाए, तो उन्हें आने से इंकार नहीं करना चाहिए। क़र्ज़ के मामले को लिख लिया करो और
साथ में क़र्ज़ की निर्धारित अवधि भी, और लिखने में सुस्ती न करो, चाहे मामला छोटा हो या बड़ा: यह तरीक़ा अल्लाह की नज़र में ज़्यादा न्यायसंगत, गवाही में अधिक भरोसेमंद, और इसमें तुम्हारे बीच पैदा होने वाले संदेह को रोकने की अधिक संभावना है।
लेकिन अगर कोई सामान बिक्री करने का हो और उसका लेन-देन तुम नक़द में हाथों-हाथ
करते हो, तो तुम पर कोई दोष न होगा, अगर तुम इसकी लिखा-पढ़ी नहीं करते। जब कभी तुम एक-दूसरे के साथ कारोबार करो, तो गवाहों को वहाँ ज़रूर रखा करो। और (देखो!), चाहे लिखनेवाला हो या गवाह हो, उसे किसी क़िस्म का नुक़सान न पहुँचाया जाए, क्योंकि अगर तुमने किसी एक को भी कोई नुक़सान पहुँचाया, तो तुम्हारी तरफ़ से यह एक अपराध होगा। अल्लाह का डर रखो, और वह तुम्हें सिखाएगा: अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (2: 282)
अगर तुम सफ़र में हो, और कोई लिखनेवाला न मिल पाए, तो ज़मानत [security] के रूप में कोई
चीज़ गिरवी रख देना चाहिए। लेकिन अगर तुम एक-दूसरे पर भरोसा करने का फ़ैसला करो, तो फिर जिस पर भरोसा किया गया है उसे चाहिए कि वह उस भरोसे को बनाए रखे; उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए। और (देखो!) गवाही को न छिपाओ: जो कोई ऐसा
करता है, उसका दिल गुनाहगार है, और (याद रखो!) तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (2: 283)
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