Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: क़ुरआन के क़िस्से: फिरऔन के लोगों में एक ईमानवाला:
क़ुरआन के क़िस्से:
फिरऔन के लोगों में एक ईमानवाला:
फ़िरऔन के ख़ानदान में से (अल्लाह पर) विश्वास रखने वाले एक आदमी ने, जिसने अपने ईमान को अभी तक छिपा रखा था, बोल उठा, ‘क्या तुम एक आदमी को केवल इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि “मेरा रब अल्लाह है?” और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुली निशानियाँ भी लेकर आया है --- अगर वह झूठा है, तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा--- लेकिन अगर वह सच्चा है, तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुम पर पड़कर रहेगा। अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादा (की सीमा) लांघनेवाला और बड़ा झूठा हो। (28)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी हुकूमत है, (मिस्र की) धरती पर तुम्हारा राज है, किन्तु अल्लाह की यातना अगर आ जाए, तो कौन है जो उसके मुक़ाबले में हमारी सहायता कर सके?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं जो ठीक समझता हूँ वह मैंने तुम्हें बता दिया है; और मैं तुम्हारा मार्गदर्शन सही रास्ते की तरफ़ कर रहा हूँ।" (29)
उस आदमी ने, जो ईमान रखता था, (आगे) कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे डर है कि तुम पर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा उन सभी समुदायों पर आ पड़ा था (जिन्होंने अपने रसूलों का विरोध किया था): (30)
जैसे नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद के लोगों का हाल हुआ था---- अल्लाह तो अपने बन्दों पर कभी नाइंसाफ़ी नहीं करना चाहता। (31)
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे लिए उस दिन का डर है जिस [क़यामत के] दिन लोग एक दूसरे को चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रहे होंगे, (32)
जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे, और तुम्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा! जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, उसे मार्ग दिखाने वाला कोई न होगा। (33)
सच्चाई यह है कि इससे पहले तुम्हारे [मिस्र के लोगों के] पास यूसुफ़ [Joseph] साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे, तब भी जो संदेश लेकर वे आए थे, उसके बारे में तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, फिर जब उनकी मृत्यु हो गई, तो तुम कहने लगे, "उनके बाद अल्लाह अब कोई रसूल नहीं भेजेगा।"
इसी तरह अल्लाह संदेह में डूबे हुए बाग़ियों को भटकता छोड़ देता है--- (34)
जो लोग (बिना किसी स्पष्ट प्रमाण के) अल्लाह की आयतों में झगड़े निकाला करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार [authority] नहीं दिया गया है, तो यह (काम) अल्लाह की नज़र में अत्यन्त अप्रिय है, और उन लोगों की नज़र में भी, जो उस पर विश्वास रखते हैं। इस तरह अल्लाह हर अहंकारी और अत्याचारी आदमी के दिल पर ठप्पा लगा (कर उसे बंद कर) देता है।" (35)
फ़िरऔन ने (व्यंग्य करते हुए अपने वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन [tower] बना दो, ताकि मैं (उस पर चढ़कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (36)
जो आसमानों तक चली जाती है, फिर मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहावनी बना दी गयीं और उसे सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं| (37)
उस ईमान रखने वाले आदमी ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, मेरी बात मानो! मैं तुम्हे भलाई का सही रास्ता दिखाऊँगा (38)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो बस थोड़े समय के लिए मज़ा लेने की जगह है; यक़ीन करो, कि स्थायी रूप से रहने-बसने का घर तो आख़िरत [परलोक] ही है। (39)
जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा; किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह में) विश्वास रखता हो, तो वह मर्द हो या औरत, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और वहाँ उसे बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी। (40)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुला रहा हूँ जबकि तुम मुझे (जहन्नम की) आग की ओर बुला रहे हो? (41)
तुम मुझसे चाहते हो कि मैं अल्लाह में विश्वास करने से इंकार कर दूँ और उसके साथ ऐसी चीज़ों को उसका साझेदार [Partner] मान लूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं; जबकि मैं तुम्हें उसकी ओर बुला रहा हूँ जो प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करने वाला है। (42)
इसमें कोई शक नहीं कि तुम मुझे जिसकी ओर बुला रहे हो, वह न तो इस दुनिया में पुकारे जाने के क़ाबिल हैं और न आने वाली दुनिया [परलोक] में: सच तो यह है कि हमें लौटना तो अल्लाह ही की ओर है, और असल में जो लोग मर्यादा (की सीमा) लाँघने वाले हैं, वही (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं। (43)
[एक दिन] तुम मुझे याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे अभी कह रहा हूँ, अत: मैं अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ: अल्लाह अपने बंदों को अच्छी तरह से जानता है।" (44)
अन्ततः अल्लाह ने उस (ईमानवाले) को उन लोगों की बुरी योजनाओं से बचा लिया।
और फ़िरऔन के लोगों को भयानक यातना ने आ घेरा; (45)
उन्हें सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; जिस दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!" (46)
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