Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: क़ानूनी विषय: बदला लेना (क़ानूनी तरीक़े से):

 क़ानूनी विषय:


बदला लेना (क़ानूनी तरीक़े से):


ईमानवालो! (जान बूझकर बिना कारण) हत्या के मामले में तुम्हारे लिए मारे गए आदमी की जान के बदले जान की सज़ा [क़िसास/retribution] देना अनिवार्य कर दिया गया है: आज़ाद आदमी के बदले आज़ाद आदमी (की जान)ग़़ुलाम के बदले ग़ुलामऔरत के बदले औरत। लेकिन अगर मरने वाले का भाई (या वारिस)क़ातिल (की जान) को माफ़ कर दे, (और “ख़ून-बहा” लेने के लिए तैयार हो जाए) तो इसका सही तरीक़े से पालन करना चाहिएऔर क़ातिल को भले तरीक़े से उतना (ख़ून-बहा/retribution) अदा करना चाहिए जितना देना उचित हो। यह तुम्हारे रब की तरफ़ से एक आसानी पैदा की गयी है और यह उसकी दयालुता है। फिर इसके बाद भी जो कोई इस सीमा को लांघता हैउसके लिए दर्दनाक यातना होगी।  (2: 178)


बुद्धि और समझवालो! "जान के बदले जान की सज़ा" [क़िसास] असल में तुम्हारी जान बचाने के लिए हैताकि तुम अपने आपको बुराइयों से बचा सको।  (2: 179)

 

हमने तौरात में यहूदियों के लिए (हुक्म) निर्धारित कर दिया था कि जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत, ज़ख्म के बदले वैसा ही ज़ख़्म होगा: अगर कोई भलाई की नीयत से अपना बदला लेना माफ़ कर दे, तो यह उसके लिए (बुरे कर्मों का) प्रायश्चित होगा। जो लोग अल्लाह के उतारे गए विधान के अनुसार फ़ैसला नहीं करते, वे लोग बड़े ज़ालिम हैं।  (5: 45)


( ईमान वालो) अगर तुम अपने ऊपर किए गए किसी हमले का बदला लो, तो बदला उतना ही होना चाहिए जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, लेकिन अगर तुम सब्र कर लो और (बदला लो) तो निश्चय ही यह ज़्यादा अच्छा होगा। (16: 126)


किसी जीव की हत्या करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है, सिवाय इसके कि जब (क़ानून ने हत्या करने का) अधिकार दिया हो: अगर किसी बेगुनाह की अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, तो उसके वारिस को हमने अधिकार दे दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), मगर उसे जान लेते समय ज़्यादती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि (अल्लाह ने) पहले ही उसकी मदद कर दी है। (17: 33)


जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों [indecencies] से बचते हैजब उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; (42: 37)

अपने रब का हुक्म मानते हैंनमाज़ क़ायम करते हैंकाम-काज के मामलों में एक दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैंऔर जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (42: 38)

और जब उन पर ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा करते हैं।  (42: 39)

 बुराई (नुक़सान) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई (हानि) की जा सकती हैहालाँकि जो कोई माफ़ कर देता है और (मामले में) सुधार करता हैतो उसका इनाम उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा --- वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता।  (42: 40)

अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के बादअगर कोई आदमी अपनी रक्षा करता हैतो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का कोई कारण नहीं है, (42: 41)

मगर उनके ख़िलाफ़ ज़रूर क़दम उठाना चाहिए जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42: 42)

किन्तु जो आदमी धीरज से काम लेता है और क्षमा कर देता हैतो यह बहुत हिम्मत (और महानता) का काम है। (42: 43)

 

 

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