Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: क़ुरआन के क़िस्से: याक़ूब (इसराईल) अलै [Jacob[] :
क़ुरआन के क़िस्से:
याक़ूब (इसराईल) अलै [Jacob[] :
ऐ रसूल) आप कहें, "हम [मुस्लिम] अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गयी है, और उस पर भी जो इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael], इसहाक़ [Isaac], याकूब़ [Jacob] और उनकी सन्तान पर उतारी गयी। हम उस पर भी ईमान रखते हैं जो मूसा [Moses], ईसा Jesus], और दूसरे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया। हम उन (नबियों) के बीच (दर्जे के हिसाब से) कोई अंतर नहीं करते। वह अल्लाह है, जिसके आगे हम ख़ुद को पूरी भक्ति से झुकाते हैं।" (3: 84)
तौरात [Torah] के उतारे जाने के पहले इसराईल की संतान के लिए खाने की सारी चीज़ें हलाल [वैध/ lawful] थीं, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें इसराईल [याक़ूब अलै.] ने ख़ुद अपने लिए हराम [forbidden] कर लिया था। आप (यहूदियों से) कह दें, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो तौरात ले आओ और (उसकी प्रासंगिक बातें) पढ़कर सुनाओ। (3: 93)
[ऐ रसूल], हमने आपके पास 'वही' [revelation] भेजी है, जैसा कि हमने नूह [Noah] और उनके बाद आने वाले नबियों के पास भी ('वही') भेजी थी, इबराहीम [Abraham] को, इसमाईल [Ishmael] को, इसहाक़ [Isaac] को, याक़ूब [Jacob] और उसकी सन्तान को, ईसा [Jesus] को, अय्यूब [Job] को, यूनुस [Jonah] को, हारून [Aaron] को, और सुलैमान [Solomen] को भी भेजी ----- दाउद [David] को हमने किताब [ज़बूर / Psalm] दी ------ (4: 163)
और हमने उसे [इबराहीम को] इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] दिए, उनमें से हर एक को सीधा मार्ग दिखाया, जैसे इससे पहले हमने नूह [Noah] को सीधा रास्ता दिखाया था, और उसके वंशजों में दाऊद [David], सुलैमान [Solomon], अय्यूब [Job], यूसुफ़ [Joseph], मूसा [Moses] और हारून [Aaron] थे------- इसी तरह अच्छा कर्म करने वालों को हम बदले में इनाम दिया करते हैं----- (6: 84)
(और देखो!) जब ऐसा हुआ कि यूसुफ़ [Joseph] ने अपने बाप [याक़ूब/Jacob] से कहा, "बाबा! मैंने ख़्वाब में ग्यारह सितारे, सूरज और चाँद को देखा: मैंने उन सबको देखा कि वे मेरे आगे झुके हुए हैं।" (12: 4)
याक़ूब [Jacob] ने जवाब दिया, "ऐ मेरे बेटे! अपने इस ख़्वाब के बारे में अपने भाइयों को मत बताना, वरना हो सकता है कि वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए तुम्हारे विरुद्ध कोई चाल चलें-----(याद रहे!) शैतान तो आदमी का खुला हुआ दुश्मन है। (12: 5)
(ऐ मेरे बेटे!) यह बात इस बारे में है कि किस तरह तेरा रब तुझे (नबी बनाने के लिए) चुन लेगा, तुझे (बातों और) ख़्वाबों का सही मतलब निकालना सिखाएगा और अपनी नेमतें [blessings] तुझ पर और याकूब के घरवालों पर उसी तरह पूरी करेगा, जिस तरह इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम [Abraham] और इसहाक़ [Isaac] पर पूरी कर चुका है: तेरा रब सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।" (12: 6)
(फिर सब मिलकर अपने बाप के पास गए), उन भाइयों ने कहा, "बाबा! यह आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हम पर भरोसा नहीं करते? हालाँकि हम तो उसका भला ही चाहते हैं, (12:
11)
हमारे साथ कल उसे जाने दीजिए ताकि वह कुछ मौज-मस्ती कर सके और खेले-कूदे -— हम लोग अच्छी तरह उसकी देखभाल करेंगे।" (12: 12)
बाप ने जवाब दिया, “तुम उसको साथ ले जाना चाहते हो, इस ख़्याल से मुझे चिंता हो रही है: मुझे डर है कि कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका ध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।" (12: 13)
वे बोले, "हम गिनती में इतने सारे हैं, फिर भी अगर उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो हम सचमुच ही सब कुछ गँवा बैठनेवाले (निकम्मे) होंगे!" (12: 14)
और कुछ रात गए वे रोते हुए अपने बाप के पास वापस आए। (12: 16)
कहने लगे, "बाबा! हम आपस में दौड़ का मुक़ाबला करते हुए दूर निकल गए थे, यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ वहीं छोड़ दिया था, कि इतने में भेड़िया ने उसे खा लिया। आप तो हम पर विश्वास करेंगे नहीं, हालाँकि हम सच बोल रहे हैं!" (12: 17)
और (सबूत के तौर पर) उन्होंने यूसुफ़ की क़मीज़ दिखायी, जिस पर चकमा देने के लिए (किसी भेड़िए के) ख़ून के धब्बे लगा दिए गए थे। उनके बाप याक़ूब ने (रोते हुए) कहा, "नहीं, (यह सच नहीं!), बल्कि तुम्हारे जी ने तुम्हें ग़लत काम करने को उकसाया है! अब मेरे लिए सबसे बेहतर यही है कि मैं सब्र करूं: जो बात तुम बता रहे हो, उसे बर्दाश्त करने के लिए बस अल्लाह ही की मदद चाहता हूँ।" (12: 18)
फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर पहुँचे, तो कहा, "बाबा! हमें अब और अनाज देने से मना कर दिया गया है, लेकिन अगर आप हमारे भाई [बेंयमैन] को हमारे साथ (मिस्र) भेज दें, तो फिर से पैमाना भरके अनाज मिल जाएगा। हम (यक़ीन दिलाते हैं कि) पूरे ध्यान से उसकी हिफ़ाज़त करेंगे।" (12: 63)
उनके (बाप याक़ूब) ने कहा, "क्या मैं उसके बारे में तुम पर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा कि पहले उसके भाई (यूसुफ़) के मामले में तुम पर कर चुका हूँ? अल्लाह ही सबसे बढ़कर हिफ़ाज़त करनेवाला, और सबसे बढ़कर दयावान है।" (12: 64)
जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो देखा कि (अनाज के बदले) जो सामान वहाँ दिया था, वह उन्हें वापस दे दिया गया है। वे बोले, "बाबा, हमें अब (अनाज के लिए बदले में) और सामान जुटाने की ज़रूरत नहीं है: यह देखिए, हमारा सामान भी हमें लौटा दिया गया है। (बस हमें बेंयमैन के साथ वापस जाने दीजिए) अब हम अपने घरवालों के लिए और अनाज ले आएंगे; हम अपने भाई को भी सुरक्षित रखेंगे; हम फिर से एक ऊँट-भर अनाज के हक़दार होंगे। कितनी आसानी से (अनाज का) एक अतिरिक्त हिस्सा मिल गया!" (12: 65)
उनके बाप ने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ भेजने वाला नहीं जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दे दो कि तुम उसे मेरे पास हर हालत में वापस लेकर आओगे, सिवाए इसके कि तुम (सचमुच) घेर लिए जाओ और बेबस हो जाओ।" फिर जब उन्होंने अपने बाप को पक्का वचन दे दिया, तो बाप ने कहा, "हमारे बीच जो बात तय हुई है, उस पर अल्लाह गवाह है।" (12: 66)
(जाने के समय) उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! (जब मिस्र शहर में दाख़िल होना तो) तुम सब एक ही दरवाज़े से अंदर मत चले जाना ----- बल्कि अलग अलग दरवाज़े से प्रवेश करना (कि अपनी तरफ़ से सचेत रहना चाहिए), वैसे कोई चीज़ अगर अल्लाह की मर्ज़ी से होने वाली हो, तो मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता: तमाम शक्ति तो अल्लाह के ही हाथ में है। उसी पर मैंने भरोसा किया है; और हर एक आदमी को उसी पर भरोसा करना चाहिए।" (12: 67)
(सारी बातें सुनने के बाद) उनके बाप ने कहा, "नहीं, बल्कि (यह चोरीवाली बात) ऐसी है कि ख़ुद तुम्हारे दिलों ने एक झूठी बात बना ली है! ख़ैर! अब सबसे बेहतर यही है कि मैं धीरज से काम लूँ: बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सब (भाइयों) को मेरे पास ले आए----वही तो है जो सब जानता है, सारा ज्ञान रखता है।" (12: 83)
और उनके बाप ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया, (पुराना दर्द फिर से जाग उठा) और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!” दुःख के मारे (रोते-रोते) उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गयीं और वह ग़म में डूबा हुआ था। (12: 84)
बेटों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! अगर आपने अब भी यूसुफ़ के बारे में सोचना बंद न किया तो आपकी सेहत ख़राब हो जाएगी, या आपकी जान चली जाएगी।" (12: 85)
बाप ने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और दुःख दर्द की फ़रियाद अल्लाह ही से करता हूँ। और अल्लाह की तरफ़ से मैं वह बात जानता हूँ जो तुम (लोगों) को मालूम नहीं। (12: 86)
ऐ मेरे बेटो! (फिर से मिस्र) जाओ और जाकर यूसुफ़ और उसके भाई का पता लगाओ और अल्लाह की रहमत से निराश न हो--- अल्लाह की रहमत से तो केवल वही निराश होते हैं, जो विश्वास नहीं रखते।" (12: 87)
यूसुफ़ ने कहा, "आज के दिन तुम (मेरी तरफ़ से) कोई बुरी बात नहीं सुनोगे (कि जो होना था, हो गया)। अल्लाह तुम्हें माफ़ करे: वह सब रहम करने वालों से बढ़कर रहम करनेवाला है। (12: 92)
मेरा यह कुर्ता अपने साथ ले जाओ और इसे मेरे बाबा के चेहरे पर डाल दो: उनकी आँखों की रौशनी लौट आएगी। फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।" (12: 93)
इधर जब (मिस्र से) कारवाँ चल दिया, तो (दूर कनान में) उनके बाप ने कहा, "तुम भले ही ऐसा समझो कि मैं बुढ़ापे में बहकी-बहकी बातें करता हूं, मगर मुझे साफ़ यूसुफ़ की महक आ रही है," (12: 94)
लेकिन लोगों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपने उसी पुराने धोखे में पड़े हुए हैं!" (12: 95)
फिर जब (कारवाँ कनान पहुँच गया और) अच्छी ख़बर सुनानेवाला आया तो उसने यूसुफ़ के कुर्ते को उसके बाप [याक़ूब] के मुँह पर डाल दिया, तुरंत ही उनकी आंखों की रौशनी लौट आयी और याक़ूब ने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की तरफ़ से जिस चीज़ की जानकारी मुझे है, वह तुम नहीं जानते।" (12: 96)
फिर (भाइयों ने) कहा, "ऐ हमारे बाबा! आप हमारे गुनाहों की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करें--- सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (12: 97)
उन्होंने जवाब दिया, "मैं अपने रब से तुम लोगों की माफ़ी के लिए (ज़रूर) दुआ करूँगा: वह बहुत क्षमा करनेवाला, बड़ा ही दयावान है।" (12: 98)
फिर जब (यूसुफ़ के माँ-बाप और भाई कनान से मिस्र पहुँचे, और) वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो उसने अपने माँ-बाप को (सम्मान के साथ) अपने पास जगह दी--- औऱ कहा: "आप सबका मिस्र में स्वागत है: अल्लाह ने चाहा तो आप सब यहाँ अमन-चैन से रहेंगे"--- (12: 99)
और वह अपने माँ-बाप को (अपने) सिंहासन तक ले गया। वहाँ मौजूद (उसके ग्यारह भाई, माँ और बाप) सब (मिस्र के रिवाज के अनुसार) उसके आगे झुक गए और तब उसने कहा, "बाबा! बरसों पहले मैंने जो ख़्वाब देखा था, वह आज पूरा हो गया। मेरे रब ने इसे सच्चा कर दिखाया और वह मुझ पर बहुत मेहरबान रहा है--- उसने मुझे क़ैदख़ाने से छुटकारा दिलाया और आप लोगों को रेगिस्तान से निकाल कर यहां पहुंचा दिया---जबकि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच झगड़े का बीज बोया था। निस्संदेह मेरा रब जो करना चाहता है उसके लिए बड़ा महीन उपाय करता है; वास्तव में वह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने सारे कामों में) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (12: 100)
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