Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: आर्थिक विषय: व्यापार करने के दिशा-निर्देश:
आर्थिक विषय:
व्यापार करने के दिशा-निर्देश:
और (देखो!) तुम एक-दूसरे के माल को अवैध रूप से न खाओ, और न गुनाह के इरादे से इस माल का उपयोग हाकिमों को घूस देने में करो, कि (हक़ मारकर) लोगों के कुछ माल जानते-बूझते हड़प सको। (2: 188)
मगर जो लोग (क़र्ज़ देकर) ब्याज [usury] लेते हैं, वे क़यामत के दिन इस तरह उठेंगे जैसे (मिर्गी का रोगी हो, या) किसी को शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो, और यह इसलिए होगा कि वे कहते हैं,
"व्यापार [Trade] और ब्याज दोनों एक ही चीज़ है," मगर अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज लेने को अवैध [forbidden] ठहराया है। अतः अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी मिलने के बाद, जो कोई ब्याज लेने से रुक गया, तो जो कुछ उसने (ब्याज से) पहले कमाया था, वह उसे रख सकता है ------अल्लाह ही उसका फ़ैसला करेगा ---- मगर जिस किसी ने फिर से ब्याज लेना शुरू किया, तो ऐसे ही लोग (जहन्नम की) आग में पड़ने वाले हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। (2: 275)
ऐ ईमानवालो! तुम जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में क़र्ज़ के लेन-देन का क़रार [Contract] करो, तो उसे लिख लिया करो: तुम्हारे बीच एक लिखनेवाला [Scribe] हो जो ईमानदारी से दस्तावेज़ लिख दे। किसी लिखनेवाले को लिखने से इंकार नहीं करना चाहिए: उसे लिख देना चाहिए जैसा कि अल्लाह ने उसे सिखाया है। जिस पर क़र्ज़ अदा करने का भार है [यानी क़र्ज़दार], वह बोल-बोलकर लिखाए [dictation], और उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए, और उस (क़र्ज़ की राशि) को कम करके नहीं बताना चाहिए। अगर क़र्ज़दार मंद बुद्धि हो, कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो, तो ऐसी हालत में उसके अभिभावक [Guardian] को चाहिए कि वह ईमानदारी से बोलकर लिखा दे। (अब दस्तावेज़ पर) अपने आदमियों में से दो को गवाह बना लो, अगर वहाँ दो आदमी न हों, तो जिन्हें तुम गवाह बनाना पसंद करो, उनमें से एक मर्द और दो औरतों को गवाह बना लो, (दो औरतें इसलिए) ताकि दोनों में से एक अगर भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे। गवाहों को जब बुलाया जाए, तो उन्हें आने से इंकार नहीं करना चाहिए। क़र्ज़ के मामले को लिख लिया करो और साथ में क़र्ज़ की निर्धारित अवधि भी, और लिखने में सुस्ती न करो, चाहे मामला छोटा हो या बड़ा: यह तरीक़ा अल्लाह की नज़र में ज़्यादा न्यायसंगत, गवाही में अधिक भरोसेमंद, और इसमें तुम्हारे बीच पैदा होने वाले संदेह को रोकने की अधिक संभावना है। लेकिन अगर कोई सामान बिक्री करने का हो और उसका लेन-देन तुम नक़द में हाथों-हाथ करते हो, तो तुम पर कोई दोष न होगा, अगर तुम इसकी लिखा-पढ़ी नहीं करते। जब कभी तुम एक-दूसरे के साथ कारोबार करो, तो गवाहों को वहाँ ज़रूर रखा करो। और (देखो!), चाहे लिखनेवाला हो या गवाह हो, उसे किसी क़िस्म का नुक़सान न पहुँचाया जाए, क्योंकि अगर तुमने किसी एक को भी कोई नुक़सान पहुँचाया, तो तुम्हारी तरफ़ से यह एक अपराध होगा। अल्लाह का डर रखो, और वह तुम्हें सिखाएगा: अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (2: 282)
अगर तुम सफ़र में हो, और कोई लिखनेवाला न मिल पाए, तो ज़मानत [security] के रूप में कोई चीज़ गिरवी रख देना चाहिए। लेकिन अगर तुम एक-दूसरे पर भरोसा करने का फ़ैसला करो, तो फिर जिस पर भरोसा किया गया है उसे चाहिए कि वह उस भरोसे को बनाए रखे; उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए। और (देखो!) गवाही को न छिपाओ: जो कोई ऐसा करता है, उसका दिल गुनाहगार है, और (याद रखो!) तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (2: 283)
ऐ ईमानवालो! तुम एक-दूसरे का माल ग़लत तरीक़े से न खा जाओ, हाँ, अगर व्यापार आपसी सहमति से मिल-जुलकर किया जाए, (तो अपना हिस्सा ले सकते हो)। और (देखो!) अपने आपको (यानी एक दूसरे को) क़त्ल न करो, कि अल्लाह तो तुम पर बहुत दयावान है। (4: 29)
अल्लाह तुम (लोगों) को आदेश देता है कि तुम्हारे पास अगर किसी की अमानतें [Deposits] हों, तो उसे उसके सही हक़दारों को वापस कर दो, और, जब लोगों के बीच फ़ैसला करो, तो इंसाफ़ करो: अल्लाह ने तुम्हें जो नसीहतें दी हैं, सब कितनी अच्छी हैं, क्योंकि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब देखता है। (4: 58)
(इसी तरह) अनाथों के माल से दूर ही रहो, सिवाय (उनको फ़ायदा पहुँचाने की) अच्छी नीयत के, मगर यह भी उसी वक़्त तक जब तक कि वह अपनी युवावस्था को न पहुँच जाएं; जब (सामान) दो, तो इंसाफ़ के मुताबिक़, नाप और तौल में पूरा-पूरा दो----- हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना कि वह उठा सकने की ताक़त रखता हो------जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो; और अल्लाह के नाम से जो प्रतिज्ञा करो, उसे पूरी करो। ये वह बातें हैं, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है, ताकि तुम ध्यान दे सको"----- (6: 152)
और (ख़र्च करने के इरादे से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाय उसकी भलाई के इरादे से, जब तक कि वह अपनी जवानी को न पहुँच जाएं (और तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो)। और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुमसे अवश्य ही पूछा जाएगा। (17: 34)
जब किसी पैमाने से नापकर दो, तो (कमी न करो और) पूरा नापा करो, और तौलते समय सटीक तराज़ू से सही तौलो: यह बेहतर और ईमानदार तरीक़ा है और इसका नतीजा भी अच्छा होगा। (17: 35)
(उसकी रौशनी) उन इबादत करने की जगहों में चमकती रहती है। अल्लाह ने हुक्म दिया है कि उन (इबादतगाहों) को ऊँचा बनाया जाए और यह कि उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए, साथ में उनमें ऐसे लोग हों जो सुबह-शाम उसकी महानता का गुणगान करते रहते हों: (24: 36)
ऐसे लोग जिनका मन (अल्लाह से) कभी नहीं भटकता---- न सामान की ख़रीद-बिक्री से, न मुनाफ़े से, न अल्लाह की याद से, और न पाबंदी से नमाज पढ़ने से, और न ही तयशुदा ज़कात देने से। वे (आने वाले) उस दिन से डरते रहते हैं जिस दिन (लोगों के) दिल (डर से) उलट जाएंगे और आँखें पत्थरा जाएँगी! (24: 37)
सही व ठीक तराज़ू से तौलो: (26: 182)
जो कुछ क़र्ज़ तुम ब्याज पर देते हो, ताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाए, तो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़ती; मगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे। (30: 39)
उसने आसमान को ऊँचा किया। उसने संतुलन [balance] स्थापित किया (55: 7)
ताकि तुम उस संतुलन में बिगाड़ न पैदा कर सको: (55: 8)
न्याय के साथ वज़न करो और तौलने में कमी न करो। (55: 9)
ऐ ईमानवालो, जब जुमे के दिन [Friday] नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो ख़रीदने-बेचने का काम बंद कर दो, और अल्लाह के ज़िक्र [नमाज़] की तरफ़ तेज़ी से चल पड़ो--- यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो”---- (62: 9)
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