Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत शुऐब (अलै.)

क़ुरआन के क़िस्से

हज़रत शुऐब (अलै.)

और मदयन [Midian] की तरफ़ हम ने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की इबादत [उपासना] करो, और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] के बारे में सोचो। शैतानियाँ न करो और धरती में बिगाड़ मत फैलाओ।" (29: 36)

अल-ऐका [जंगल में रहनेवालों] ने भी रसूलों को झुठा कहा। (26: 176)
शुऐब  ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (26: 177)

निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (26: 178)

अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (26: 179)

मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम तो नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (26: 180)

नाप-तौल के मुताबिक़ पूरा दिया करो : दूसरों को बेचते समय (नाप से) कम न दो। (26: 181)
सही व ठीक तराज़ू से तौलो: (26: 182)
लोगों को उनकी चीज़ों में कमी कर के न दो। धरती पर गड़बड़ी व लूटमार [corruption] न मचाओ। (26: 183)

अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और पिछली नस्लों को पैदा किया",  (26: 184)

मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (26: 185)

तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। असल में तो हम तुम्हें झूठा समझते हैं। (26: 186)

और मदयन [Midian] (के क़बीले) में उनके भाई शुऐब को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत करो, उसको छोड़ कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। (और देखो!) किसी को देते समय नाप और तौल में कमी न किया करो। मैं तो तुम्हें ख़ुशहाली की हालत में देख रहा हूँ, मगर मुझे डर है कि कहीं तुम पर एक ऐसे दिन की यातना न आ जाए, जो तुम सबको चारों तरफ़ से घेर ले। (11: 84)

ऐ मेरे लोगो! देते समय, नाप और तौल में इंसाफ़ के साथ, पूरा पूरा दिया करो। और लोगों को उनकी चीज़ें (उनके हक़ से) कम मत दो, और ज़मीन पर भ्रष्ट तरीक़ों से फ़साद (corruption) मत फैलाओ। (11: 85)

अगर तुम ईमानवाले हो, तो जो (काम-काज के बाद) अल्लाह का दिया बाक़ी बच जाए, वही तुम्हारे लिए सबसे बेहतर है : मैं तुम्हारे ऊपर कोई रखवाली करनेवाला तो हूँ नहीं।" (11: 86)

वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी इबादत तुझे यही सिखाती है कि हम उन्हें छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए हैं, और यह कि हम अपनी ही संपत्ति को मनमाने ढंग से उपभोग [consume] भी न करें? बस तुम्हीं एक बड़े सहनशील, और नेक-चलन आदमी रह गए हो!" (11: 87)

मदयन [Midian] के लोगों के पास हमने उनके भाई, शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक स्पष्ट निशानी आ चुकी है। (जब सामान दो) तो नाप और तौल में पूरा पूरा दिया करो, और लोगों की चीज़ों को कम कर के मत नापा करो; और ज़मीन में सारी व्यवस्था ठीक कर देने के बाद उसमें गड़बड़ी पैदा न करो : यह तुम्हारे लिए ज़्यादा अच्छा है, अगर तुम ईमानवाले हो।  (7: 85)

"(देखो!) हर एक रास्ते पर न बैठ जाओ, कि (आते-जाते) लोगों को धमकियाँ देने लगो, और उन लोगों को अल्लाह के मार्ग (पर चलने) से रोकने लगो, जो उसपर ईमान रखते हों, और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, तुम गिनती में कितने थोड़े हुआ करते थे, फिर उसने तुम्हें बढा कर कई गुना कर दिया। ज़रा उनके अंजाम के बारे में सोचो, जो फ़साद फैलाया करते थे। (7: 86

"अगर तुम में से कुछ लोग (अल्लाह के) उस संदेश में विश्वास रखते हों जो मैं ले कर आया हूँ, और कुछ दूसरे लोग (इस पर) विश्वास नहीं करते, तो उस समय तक धीरज से काम लो, जब तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला न कर दे। और वह फ़ैसला करनेवालों में सबसे अच्छा फ़ैसला करता है।" (7: 87)

शुऐब ने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम देखते नहीं? क्या होना चाहिए अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक पक्के प्रमाण के हिसाब से काम कर रहा हूँ? और उसने खुद मुझे अच्छी रोज़ी दे रखी है : जिस चीज़ को करने से मैं तुम्हें रोक रहा हूँ, ख़ुद मैं वह नहीं कर सकता, बल्कि जहां तक मुझ से हो सके,  मैं तो बस चीज़ों में सुधार लाना चाहता हूँ। मगर अल्लाह की मदद के बिना मैं कामयाब नहीं हो सकता : उसी पर मैं भरोसा करता हूं, और उसी के सामने (तौबा के लिए) झुकता हूँ। (11: 88)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे लिए तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अंजाम तक न पहुंचा दे कि तुम पर भी वही बीते जो नूह या हूद या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है; और लूत की क़ौम (जिस जगह रहती थी, वह मक्का से) कोई ज़्यादा दूर नहीं है। (11: 89)
अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगोऔर फिर तौबा कर के उसकी ओर झुक जाओ :  मेरा रब तो बड़ा रहम करनेवाला, और (अपने बंदों से) बहुत प्यार करनेवाला है।" (11: 90)

उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने कहा, "ऐ शुऐब! अगर तुम हमारे दीन [Religion] में नहीं लौटे, तो हम तुम्हें और तुम्हारे साथ सारे ईमान रखनेवालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे।" शुऐब ने कहा, "क्या! अगर यह (तुम्हारा धर्म) हमें बिल्कुल भी पसंद न हो, तब भी? (7: 88

"अगर हमें तुम्हारे दीन में वापस जाना पड़े, जबकि अल्लाह हमें उससे बचा चुका है, तो यह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा होगा : उस (दीन) में अब वापस जाने का तो कोई सवाल नहीं है---- हाँ, अगर हमारे रब, अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और हो तो बात अलग है। हर चीज़ को उसने अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। हम तो अल्लाह पर भरोसा करते हैं। हमारे रब, तू हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई को उजागर कर दे (और हमारे बीच) फ़ैसला कर दे, कि सचमुच तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।" (7: 89)

उनकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "अगर तुम शुऐब के बताए हुए रास्ते पर चले, तो सचमुच तुम घाटे में पड़ जाओगे"----  (7: 90)

उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तुम्हारी बहुत-सी बातें हमारी समझ में नहीं आती हैं, और हम देखते हैं कि तुम हमलोगों में बहुत कमज़ोर आदमी हो। अगर तुम्हारे साथ तुम्हारा घर-परिवार न होता, तो हम तुझे पत्थर से मार डालते, क्योंकि हमारे सामने तुम्हारी कोई औक़ात नहीं है।" (11: 91)

उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे अंदाज़े के मुताबिक़ मेरा परिवार  अल्लाह से भी ज़्यादा मज़बूत है? और क्या तुमने अल्लाह को बिल्कुल ही पीछे डाल दिया है? तुम जो कुछ भी करते हो, मेरे रब ने उसे अपने (ज्ञान के) घेरे में ले रखा है। (11: 92)

ऐ लोगो! जो तुम्हारा मन चाहेअपनी जगह काम करते रहो, मैं भी उसी तरह अपने काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि किस पर अपमान भरी यातना आती हैऔर कौन है जो झूठा है! प्रतीक्षा करो, और मैं भी तुम्हारी तरह प्रतीक्षा कर रहा हूँ।" (11: 93)

अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हम पर आसमान का कोई टुकड़ा ही गिरा के दिखा दो।" (26: 187)
शुऐब ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह से जानता है जो कुछ तुम करते हो।" (26: 188)

फिर जब वह (ठहरायी हुई) बात का समय आ पहुँचातो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान रखनेवालों को बचा लिया, मगर अत्याचार करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ पकड़ा। सुबह होने तक वे अपने अपने घरों में मरे पड़े थे, (11: 94)
मानो वे वहाँ न कभी  बसे और न कभी फले-फूले थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई थी!"(11: 95)

उन लोगों ने उसे झुठा कहा, और इस तरह छायावाले दिन की यातना ने उन्हें आ दबोचा---  वह एक बड़े भयानक दिन की यातना थी! (26: 189)
एक ज़बदस्त भूचाल ने उन्हें धर दबोचा : अगली सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े थे; (7: 91)


शुऐब की बातों को झूठ मानने वालों का ऐसा हाल हुआ, मानो वे कभी वहाँ बसे ही नहीं थे; जिन लोगों ने शुऐब को मानने से इंकार किया था, असल में वही लोग घाटे में रहे---- (7: 92)

तब शुऐब ने उन लोगों से यह कहते हुए मुँह मोड़ लिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देशों को तुम तक पहुँचा दिया और तुम्हारा हित देखते हुए मैंने तुम्हें सही सलाह दी, तो जिन लोगों ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, ऐसे लोगों (की तबाही) पर दुखी होने का क्या फ़ायदा है?" (7: 93)

(इसी तरह) जंगलों में रहनेवाले [ऐका यानी मदयन के क़बीले के लोग] भी अत्याचारी थे, (15: 78)

उन्हें भी हम ने (उनके अत्याचार की) सज़ा दी थी; और ये (लूत व मदयन के लोगों की) दोनों बस्तियाँ मुख्य मार्ग पर अब भी स्थित हैं जिसे देखा जा सकता है। (15: 79)
फिर जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह उनके कुछ काम न आ सका। (15: 84)

सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (26: 190)

तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है।  (26: 191)













Comments

Popular posts from this blog

Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत सुलैमान (अ‍लै.)/ Solomen (PBUH)

Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत दाउद [David] (अलै.)