Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत नूह (अलै.)/ Noah

क़ुरआन के क़िस्से

हज़रत नूह (अलै.) [Noah]

हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास इस संदेश के साथ भेजा, "मैं तुम्हारे पास (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ : (11: 25)
अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मुझे डर है कि कहीं एक दुख भरे दिन में तुम्हारे ऊपर कोई दर्दनाक यातना न आ जाए।" (11: 26)

(चुनांचे) उन्होंने कहा, “ए मेरी क़ौम के लोगो! [My people], मैं तुम लोगों को साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ।  (71: 2)
तुम अल्लाह की इबादत करो, उसी से डरो और मेरा कहना मानो। (71: 3)
अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक (ज़िंदा) बाक़ी रखेगा --- जब अल्लाह का (निर्धारित) समय आ जाता है, तो वो टाला नहीं जा सकता। काश! तुम (यह बात) समझ पाते!” (71: 4)

हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास (मार्गदर्शन के लिए) भेजा था, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा है, तो क्या तुम (बुरे कामों के नतीजे से) डरते नहीं?" (23: 23) 

मगर विश्वास न करनेवाले लोगों के सरदार ने कहा, "हम देखते हैं कि तुम कुछ और नहीं, बल्कि हमारे ही जैसे (मर-खप जानेवाले) मामूली आदमी हो, हम यह भी साफ तौर से देखते हैं कि तुम्हारे पीछे बस वही लोग चल रहे हैं जो हम लोगों में  सबसे छोटे व तुच्छ लोग हैं। हमें यह नहीं समझ में आ रहा है कि आख़िर तुम किस मामले में हमलोगों से बेहतर हो? सच तो यह है कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।" (11: 27)

नूह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो : अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की स्पष्ट निशानी है, और उसने मुझे (नबी बनाकर) अपनी ख़ास रहमत [grace] प्रदान की हो, मगर वह तुम्हें दिखायी न दे (तो मैं क्या कर सकता हूँ?), क्या हम तुम्हें तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ इसे मान लेने पर मजबूर कर सकते हैं? (11: 28)

और मेरे लोगो! मैं इस काम के बदले तुम से कोई इनाम तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं विश्वास रखनेवालों को दूर नहीं भगाउंगा : उन्हें तो अपने रब से मिलने का यक़ीन है। (तुमलोग तो समझने को ही तैयार नहीं हो) मुझे लगता है कि तुम (लोग) ही नासमझ हो। (11: 29)

ऐ लोगो! अगर मैं विश्वास रखनेवालों को दूर भगा दूँ, तो अल्लाह के ख़िलाफ़ कौन है जो मेरी सहायता करेगा? तो क्या तुम इस पर ध्यान नहीं दोगे? (11: 30)

और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, या मुझे ऐसी चीज़ की कोई जानकारी है जो हम से छिपी हुई है, या यह कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। और न मैं यह कहता हूँ कि जो लोग तुम्हारी नज़र में छोटे व तुच्छ हैं, अल्लाह  उनके लिए कोई भलाई न देगा : जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे ख़ुद बहुत अच्छी तरह जानता है। अगर मैं ऐसा कहूँ, तब तो मैं ज़ालिमों में से हो जाउँगा।" (11: 31)

[ऐ रसूल!] आप उन्हें नूह [Noah] की कहानी सुनाएं। जब उसने अपनी क़ौम से कहा था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम लोगों के बीच (मार्गदर्शन के लिए) मेरा मौजूद होना और अल्लाह की निशानियों को तुम्हें याद दिलाना, अगर तुम्हें भारी पड़ता है, तो फिर मेरा भरोसा केवल अल्लाह पर है। तुम और तुम्हारे ठहराए हुए ख़ुदा के साझेदारों! [Partner-gods!], मेरे ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करना चाहते हो उसे आपस में तय कर लो ----- और इस बात में सकुचाने या छिपाने की ज़रूरत नहीं है ---- फिर मेरे ख़िलाफ़ जो कुछ करने का फ़ैसला किया हो, कर डालो और मुझे कोई मुहलत न दो।" (10: 71)

(फिर) नूह ने (अल्लाह से) कहा, “ऐ मेरे रब! मैं अपनी क़ौम को रात दिन (सच्चाई की बातों की तरफ) बुलाता रहा,  (71: 5)
लेकिन मैं जितना ही उनको (सच्चाई की तरफ़) बुलाता हूँ, उतना ही वे और ज़्यादा (सच्चाई से) दूर भागते हैं : (71: 6)
जब (भी) मैं उन्हें (ईमान की तरफ) बुलाता हूँ, ताकि तू उन्हें माफ़ कर सके, तो वे  अपनी अंगुलियाँ कानों में ठूंस लेते हैं और अपने ऊपर अपने कपड़े तान लेते हैं, अपनी (गलत) बातों पर अड़े रहते हैं, और उनका घमंड और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। (71: 7)
मैं उन्हें खुलकर (सच्चाई की तरफ़) बुलाने की कोशिश कर चुका हूँ.  (71: 8)
मैंने उन्हें सब के सामने भी उपदेश देने की कोशिश की है और उन्हें अकेले में भी  समझाने की कोशिश की है। (71: 9)
मैंने कहा, "तुम अपने रब से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो : वह बड़ा माफ़ करनेवाला है। (71: 10)
वह तुम्हारे लिए आसमान से ख़ूब पानी बरसाएगा;   (71: 11) 
वह तुम्हें धन-दौलत और बेटे देगा; वह तुम्हारे लिए बाग़ उगा देगा और नहरें बहा देगा। (71: 12)
तुम्हें क्या हो गया है? अल्लाह की महिमा से तुम डरते क्यों नहीं,  (71: 13)
जबकि उसने तुम्हें एक-के-बाद एक चरण [stage by stage] में पैदा किया है? (71: 14)
क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया कि किस तरह अल्लाह ने सात (या कई) आसमानों को तल्ले ऊपर पैदा किया,  (71: 15)
उनमें चाँद को रौशनी और सूरज को दीपक [प्रकाश और ताप के स्रोत] के रूप में स्थापित किया, (71: 16)
और किस तरह अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन से पौधे की तरह उगाया है* (71: 17)
पौधों की तरह मानव जीवन का आरंभ और विकास भी रासायनिक और जैविक चरणों से गुजरते हुए धीरे धीरे हुआ है.

किस तरह वह तुम्हें उसी (भूमि) में लौटा देगा और फिर तुमको (वहीं से दोबारा) बाहर ला खड़ा करेगा,  (71: 18)
और किस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श की तरह बिछा दिया है, (71: 19)
ताकि तुम उसके खुले हुए रास्तों में चलो फिरो।"  (71: 20)

फिर भी तुम ने अगर मुँह मोड़े रखा, तो मैं (मार्गदर्शन देने के लिए) तुम से कोई मज़दूरी (इनाम) तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के पास है, और मुझे यह आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में शामिल रहूँ जो अल्लाह पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (10: 72)

मगर उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हमें तो ऐसा लगता है कि तुम गुमराही में काफ़ी दूर जा पड़े हो।" (7: 60)
उन्होंने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मेरे बारे में किसी गुमराही का कोई सवाल नहीं है! उल्टा मैं तो सारे संसारों के रब का भेजा हुआ एक रसूल हूँ। (7: 61)
मैं तो अपने रब के संदेशों को तुम तक पहुँचा रहा हूँ और तुम्हारे हित में सलाह दे रहा हूँ। मैं अल्लाह की तरफ़ से उन चीज़ों को जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते। (7: 62)
क्या तुम्हें यह बड़ा अजीब लगता है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है--- एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो----जो तुम्हें चेतावनी दे सके और तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बच सको, ताकि तुम पर दया की जा सके?"  (7: 63)
उनके भाई नूह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (26: 106)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ : (26: 107)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (26: 108)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है:  (26: 109)
उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास कर लें, जबकि तुम्हारे पीछे चलनेवाले तो बिल्कुल ही नीच क़िस्म के लोग हैं?" (26: 111)
नूह ने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या करते थे? (26: 112)
उनका हिसाब लेने का काम तो बस मेरे रब के हाथ में है---काश तुम समझ पाते--- (26: 113)
और जिन लोगों ने (मेरी बात पर) विश्वास कर लिया, मैं उन्हें दुतकारनेवाला तो हूँ नहीं। (26: 114)
मैं तो बस यहाँ इसीलिए हूँ कि लोगों को साफ़ साफ़ चेतावनी दे दूँ।" (26: 115)
इस पर उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! अगर तुम ने अपनी हरकतें बंद नहीं की, तो तुम्हें ज़रूर पत्थरों से मार डाला जाएगा।" (26: 116)

मगर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने (नूह की बातों को मानने से) इंकार किया था, (एक दूसरे से) कहने लगे, "यह तो तुम्हारे ही जैसा एक (मामूली) आदमी है, जो तुम पर अपनी बड़ाई की धाक जमाना चाहता है। अगर अल्लाह चाहता तो उसने (मामूली आदमी के बदले) फ़रिश्तों को भेजा होता; और तो और, ऐसी कोई बात हमने अपने बाप-दादा से कभी सुनी ही नहीं. (23: 24)

यह तो बस एक ऐसा आदमी है जिस पर पागलपन सवार है, अतः (इसकी बात मत सुनो और) कुछ समय तक प्रतीक्षा कर के देख लो कि इसके साथ क्या होता है।" (23: 25)

उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे बहुत लम्बे समय से बहस करते रहे हो। अब अगर तुम सच बोल रहे हो, तो जिस यातना की तुम हमें धमकी देते रहते हो, उसे हम पर ले ही आओ।" (11: 32)

नूह ने कहा, "यह तो अल्लाह (के हाथ में) है, अगर वह चाहेगा, तो तुम पर यातना ले आएगा, और तब तुम (उसकी पकड़ से) भाग नहीं पाओगे। (11: 33)

अगर अल्लाह तुम्हें तुम्हारे भ्रम के साथ भटकता छोड़ देना चाहे, तो मेरी नसीहत तुम्हारे कोई काम नहीं आएगी : वही तुम्हारा रब है और उसी के पास तुम्हें लौट कर जाना होगा।" (11: 34)

हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा। वह पचास कम एक हजार साल [950 साल] उनके बीच रहे, मगर जब तूफ़ानी बाढ ने उन्हें घेर लिया, तब तक वे शैतानियों में ही लगे हुए थे।   (29: 14)

पहले नूह [Noah] की क़ौम ने भी सच को मानने से इंकार किया था : उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और उन्हें बुरी तरह झिड़का गया, (54: 9)
अन्त में उसने अपने रब को पुकारा कि "मैं बेबस हो चुका हूँ, अब आप ही बदला लीजिए!" (54: 10)

नूह ने कहा, “ऐ मेरे रब! हक़ीक़त यह है कि उनलोगों ने मेरा कहना नहीं माना, और उन (सरदारों) के पीछे चल पड़े जिनके धन दौलत और संतानों ने उन्हें सिवाए नुक़सान पहुँचाने के और कुछ नहीं दिया;  (71: 21)
और (जनता को गुमराही में रखने के लिए) वे बड़ी बड़ी चालें चलते रहे, (71: 22)
और (उनलोगों ने अपने आदमियों से) कहा,  "तुमलोग अपने देवताओं [gods] को कभी मत छोड़ना! और “वद्द”, “सुवा”, “यग़ूस”, “यऊक़” या “नस्र” (नाम के देवताओं) को (भी) कभी नहीं छोड़ना!” (71: 23)
उन्होंने बहुत लोगों को गुमराह [पथभ्रष्ट] किया है. सो (ऐ मेरे रब!), तू इन  ज़ालिमों को सिवाए बर्बादी के और कुछ न ला।" (71: 24)

और नूह ने यह भी कहा, “ऐ मेरे रब! (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िरों] में से किसी को भी इस धरती पर ज़िंदा न छोड़ ----- ---- (71: 26)
अगर तूने उन्हें (जीवित) छोड़ा, तो वे तेरे बन्दों को गुमराह करते रहेंगे, और उनसे जो औलाद पैदा होगी, वह केवल पाप करनेवाली (और) विश्वास न करनेवाली पैदा होगी ---- (71: 27)
“ऐ मेरे रब! मुझे भी माफ कर दे और मेरे माँ-बाप को भी, और हर उस आदमी को जो ईमान की हालत में मेरे घर में दाख़िल हुआ। (सभी) ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को भी माफ़ कर दे, मगर ज़ालिमों के लिए बर्बादी के सिवाए कोई और चीज़ न ला।” (71: 28)

इसलिए अब मेरे और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे ईमानवाले साथियों को बचा ले!" (26: 118)

‘वही’ [Revelation] के द्वारा नूह को बता दिया गया कि "जो लोग पहले ईमान ला चुके हैं, उनके अलावा अब तुम्हारी क़ौम में कोई आदमी विश्वास करनेवाला नहीं है, अतः जो कुछ वे कर रहे हैं, उसपर तुम दुखी न हो। (11: 36)

अब तुम हमारी देखरेख में और हमारी ओर से भेजी गयी ‘वही’ के अनुसार एक नाव [Ark] बनाओ। और जिन लोगों ने शैतानियाँ की हैं, उनके लिए मुझ से पैरवी मत करो---- वे अब पानी में डुबा दिए जाएंगे।" (11: 37)

इस तरह, उसने नाव बनाना शुरू कर दिया, उसकी क़ौम के सरदार जब कभी उसके पास से गुज़रते तो (उसको नाव बनाते देख) उसकी हँसी उड़ाया करते थे। उसने कहा, "अभी तुम मेरी जितनी हँसी उड़ाना चाहो उड़ा लो, लेकिन (एक दिन) हम भी तुम्हारी (मूर्खता पर) हँसेंगे : (11: 38)

तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि किसे ऐसी सज़ा मिलेगी जो उसे अपमानित कर देगी, और किस पर हमेशा रहनेवाली यातना का क़हर टूट पड़ेगा।” (11: 39)

और तब हमने नूह के पास वही [revelation] भेजी : "हमारी देखरेख में और हमारी 'वही' के मुताबिक़ एक नौका बनाओ. फिर जब हमारा आदेश मिल जाए, और ज़मीन का पानी उबल कर बाहर आने लगे, तो (हर तरह के जीव-जंतुओं की) प्रत्येक प्रजाति में से दो-दो, जोड़े में, उस (नौका) में साथ रख लो और अपने परिवार के लोगों को भी (इसमें सवार कर लो), मगर घर के ऐसे आदमी को नहीं जिनके विरुद्ध पहले ही फ़ैसला हो चुका है--- शैतानियाँ करनेवालों के पक्ष में मुझसे सिफारिश मत करना : वे तो डूबकर रहेंगे---- (23: 27)

तब हमने मूसलाधार बरसते हुए पानी के साथ आसमान के दरवाज़े खोल दिए, (54: 11)
और ज़मीन के भीतर से पानी के सोते [gushing springs] बहा दिए : इस तरह (आसमान और ज़मीन का) सारा पानी उस काम के लिए एक साथ मिल गया जो (उनकी नियति में) तय हो चुका था।  (54: 12)

जब (यातना के लिए) हमारा आदेश आ पहुँचा, और धरती से तेज़ धार के साथ पानी फूट पड़ा, तो हम ने (नूह से) कहा, "(धरती के) हर प्रजाति में से एक-एक  जोड़ा नाव पर चढ़ा लो और साथ में अपने घरवालों को भी-----सिवाए उन लोगों के, जिनके बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका है ------और उन्हें भी (बैठा लो) जो ईमान रखते हैं", हालाँकि उसके साथ ईमान रखनेवाले बहुत थोड़े ही थे। (11: 40)
नूह ने (साथियों से) कहा, "इस नाव पर सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से यह पानी में तैरती हुई चलेगी, और (सुरक्षित) लंगर डाल कर ठहर जाएगी। निस्संदेह मेरा रब बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (11: 41)

फिर जब तुम और तुम्हारे साथी नौका पर अच्छी तरह सवार हो जाओ, तो अपनी ज़बान से कहना,  “शुक्र है अल्लाह का, जिसने हमें शैतान लोगों से छुटकारा दिया”, (23: 28) 
और यह भी कहना, ऐ मेरे रब! मुझे अपनी बरकत के साथ किनारे उतार दे: और तू ही नौका को सबसे बेहतर किनारे लगानेवाला है।" (23: 29)

और हमने उन्हें [नूह व उनके साथियों को] एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार कर दिया, (54: 13)
जो हमारी देख-रेख में (सुरक्षित) चल रही थी, यह भरपाई [compensation] थी उस [नूह] के लिए जिसको मानने से इंकार कर दिया गया था। (54: 14)

फिर वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहरों के बीच चलने लगी, और नूह ने अपने बेटे को पुकारा जो पीछे रह गया था, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इंकार करनेवालों के साथ न रह जा।" (11: 42)

मगर उसने जवाब दिया, "मैं पानी से बचने के लिए किसी पहाड़ में पनाह ले लूँगा।" नूह ने कहा, "आज अल्लाह के हुक्म (फ़ैसले) से कोई बचने की जगह नहीं है, सिवाए उसके कि जिस पर वह दया कर दे।" (इतने में) दोनों के बीच एक ज़ोर की लहर आ गयी और वह भी डूबनेवालों के साथ डूब गया। (11: 43)

अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का उदाहरण पेश किया है : नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके : (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (66: 10

फिर हुक्म हुआ, "ऐ धरती! अपना पानी पी ले और ऐ आसमान! तू थम जा," और पानी उतर गया, आदेश का पालन कर दिया गया। वह नाव जूदी पहाड़ पर ठहर गयी, औऱ कहा गया, "गए वे लोग जो शैतानी करते थे!" (11: 44)

नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से था, हालांकि (मेरे परिवार को बचा लेने का) तेरा वादा सच्चा है, और तू फ़ैसला करने वालों में सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करने वाला है।" (11: 45)

अल्लाह ने कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह सही नहीं था। मुझ से उन चीज़ों के बारे में मत पूछो जिनके बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूं कि तुम बेवक़ूफ़ों में शामिल न हो जाओ।" (11: 46)

उसने कहा, "मेरे रब! मैं ऐसी चीज़ों के बारे में पूछने से तेरी पनाह माँगता हूँ कि जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। अगर तू ने मुझे माफ़ न किया, और मुझ पर दया न दिखायी, तो मैं घाटा उठानेवालों में हो रहूँगा।" (11: 47)

और उनसे कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सकून व सलामती के साथ (नाव से) उतर जा, शुभकामनाएं व बरकतें (blessings) हों तुझ पर, और कुछ उन समुदायों पर जो उन से फले-फूलेंगी, जो तेरे साथ आए हैं। बाद में आनेवाले कुछ और लोग भी होंगे जिन्हें हम थोड़े समय के लिए जीवन का मज़ा उठाने का मौक़ा देंगे, मगर उसके बाद (उनके कर्मों के नतीजे में) हमारी ओर से एक दर्दनाक यातना उन्हे पकड़ लेगी।" (11: 48)

इस तरह, हमने उसे और उसके माननेवाले जो भरी हुई नौका में थे, बचा लिया, (26: 119)
और बाक़ी बचे लोगों को डुबा दिया। (26: 120)

(अंत में) वे अपने पापों के कारण ही (ज़बरदस्त बाढ में) डुबा दिए गए, और (जहन्नम की) आग में डाल दिए गए : अल्लाह के मुक़ाबले में उन्हें कोई मददगार नहीं मिल सका।  (71: 25)

नूह [Noah] ने (जब मुसीबत में) हमें पुकारा था, तो कितनी ज़बरदस्त रही हमारी जवाबी कार्रवाई!  (37: 75)
हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को बड़े दुख-दर्द और बेचैनी से छुटकारा दिया,  (37: 76)
और हमने उनकी ही नस्ल को धरती पर बाक़ी बचाए रखा, (37: 77)

तो अब सोचो कि कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ!  (54: 16)
हमने इस [घटना या नौका] को एक निशानी के रूप में (यादगार बना कर) छोड़ दिया : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (54: 15)

और हमने ऐसा किया कि बाद में आनेवाली पीढियों में भी उन्हें हमेशा अच्छे नामों से याद किया जाता रहा :   (37: 78)
"सलाम हो नूह पर सारे संसारवालों में!" (37: 79)
अच्छे काम करनेवालों को हम ऐसा ही इनाम देते हैं :   (37: 80)


















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