Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत सालेह (अलै.) और समूद की क़ौम
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत सालेह (अलै.) और समूद की क़ौम
समूद के लोगों के पास उनके भाई सालेह को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसा दिया, अतः उससे (अपने गुनाहों की) माफ़ी माँगो; और उसकी ओर (गुनाहों की तौबा करते हुए) पलट आओ : मेरा रब (हर एक के) नज़दीक है, और वह दुआओं को सुनने के लिए तैयार रहता है।" (11: 61)
लोगों ने कहा, "ऐ सालेह! हम लोगों ने तो पहले तुम से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। क्या तुम हमें उनकी पूजा करने से रोकते हो, जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं? तुम हमें जिस चीज़ को करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे तो हमें गहरा संदेह है, यह बात हमारे दिल में उतरती ही नहीं।" (11: 62)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो : अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की तरफ़ से पक्का प्रमाण है, और अगर उसने ख़ास अपनी रहमत से मुझे (रसूल) बनाया है, और अगर तब भी मैं उसकी आज्ञा न मानूँ, तो अल्लाह से मुझे कौन बचा सकता है? तुम तो (मेरी बात न मान कर) लगता है कि नुक़सान को और बढा दोगे। (11: 63)
समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई, सालेह, को (पैग़म्बर बनाया, और) यह कहते हुए भेजा कि "केवल अल्लाह की बन्दगी करो, "मगर वे लोग दो विरोधी गुटों में बँट गए। (27: 45)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, तुम अच्छाई के बदले बुराई को ले आने की जल्दी क्यों मचा रहे हो? तुम अल्लाह से (अपनी ग़लतियों की) माफ़ी क्यों नहीं मांगते, ताकि तुम पर दया की जा सके।" (27: 46)
वे कहने लगे, "हम तुम्हें और तुम्हारे माननेवालों को ‘बुरा शगुन’ [evil omen] समझते हैं।" सालेह ने जवाब दिया, "कोई भी शगुन जो तुम देखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह ही करेगा : असल में तुम लोगों की परीक्षा ली जा रही है।" (27: 47)
याद करो कि किस तरह अल्लाह ने आद के बाद तुम्हें उनका उत्तराधिकारी बनाया और उस ज़मीन पर तुम्हें बसा दिया, जिस ज़मीन पर तुम अपने लिए महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-काट कर मकान बना लेते हो : अल्लाह की बरकतों (blessings) को याद करो और धरती पर फ़साद फैलाते न फिरो।" (7: 74)
मगर उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने ईमान रखनेवाले लोगों को, जिसे वे बिल्कुल ही गया गुज़रा समझते थे, कहा, "क्या तुम सचमुच ऐसा सोचते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ पैग़म्बर [Messenger] है?" उन लोगों ने कहा, "हाँ, हम उस संदेश पर विश्वास करते हैं, जो उनके माध्यम से भेजा जाता है।" (7: 75)
मगर उन घमंडी सरदारों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम विश्वास करते हो, उसे हम तो मानने से इंकार करते हैं", (7: 76)
समूद के लोगों ने भी रसूलों को झुठा कहा। (26: 141)
उनके भाई सालेह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (26: 142)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (26: 143)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (26: 144)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (26: 145)
(क्या तुम सोचते हो कि) यहाँ जो कुछ है, उनके बीच तुम हमेशा के लिए सुरक्षित छोड़ दिए जाओगे--- (26: 146)
इन बाग़ों और पानी के सोतों, (26: 147)
खेतों और फलों से लदे हुए खजूर के पेड़ों के बीच--- (26: 148)
और पहाड़ों को काट-काटकर नफ़ासत से बनाए हुए घरों के बीच (क्या सदा के लिए रहोगे)? (26: 149)
अतः अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो : (26: 150)
और उन मर्यादा को तोड़नेवालों का कहना बिल्कुल न मानो, (26: 151)
जो धरती में गड़बड़ी फैलाते रहते हैं, बजाए इसके कि चीज़ों को सुधारते व सही काम करते।" (26: 152)
उन्होंने कहा, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (26: 153)
समूद की क़ौम ने भी (हमारे पैग़म्बर सालेह द्वारा दी गयी) चेतावनियों को ठुकरा दिया : (54: 23)
वे कहने लगे, "क्या? (हमारे जैसा) एक आदमी? क्या हम उस अकेले आदमी के पीछे चलेंगे, जो हम में से ही है? यह तो भारी गुमराही होगी; एकदम पागलपन होगा!” (54: 24)
"क्या हमारे बीच बस वही एक आदमी बचा था जिसे (अल्लाह की तरफ़ से) संदेश दे कर भेजा गया है? नहीं, वह तो बड़ा झूठा और घमंडी है! " (54: 25)
वह [रसूल] तो बस एक आदमी है जिसने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं। हम उसकी बातों में कभी भी विश्वास करनेवाले नहीं हैं।"(23: 38)
इस पर उस रसूल ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर, वे लोग तो मुझे झुठा कहते हैं, " (23: 39)
(हम ने सालिह से कहा), "कल ही उन्हें पता चल जाएगा कि कौन बड़ा झूठा, और घमंडी है, (54: 26)
और तब अल्लाह ने कहा, "बहुत जल्द ही वे अपने किए पर पछताएंगे।"(23: 40)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। अगर तुम सच बोल रहे हो तो कोई निशानी दिखाओ।" (26: 154)
सालेह ने कहा, "(ठीक है, लो) यह ऊँटनी है, पानी पीने की बारी इसकी अलग होगी, और तुम्हारी बारी अलग होगी, और हर एक के लिए पीने का एक नियत दिन होगा। (26: 155)
सो देखना, उस (ऊँटनी) को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए, अन्यथा एक बड़े भयानक दिन की यातना तुम्हें आ पकड़ेगी।" (26: 156)
क्योंकि हम उनकी परीक्षा लेने के लिए एक ऊँटनी को उनके पास भेज रहे हैं : अतः आप उन्हें देखते जाएं और धीरज से काम लें। (54: 27)
उन्हें बता दें कि उनके (और ऊँटनी के) बीच पानी का बँटवारा होगा : हर एक हिस्सेदार को उसकी बारी आने पर ही पानी मिलेगा।" (54: 28)
(इसी तरह) समूद के लोगों की तरफ़ हम उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके अलावा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तुम्हारे रब की तरफ़ से अब एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: यह अल्लाह के नाम पर छोड़ी हुई ऊँटनी है----यह तुम्हारे लिए एक निशानी है---- सो इसे अल्लाह की धरती पर खाने-चरने के लिए खुला छोड़ दो और देखो! उसे किसी तरह का कोई नुक़सान मत पहुँचाना, वरना एक दर्दनाक यातना तुम्हें आ लगेगी। (7: 73)
"समूद" [Thamud] (की क़ौम) के लोगों ने अपने घमंड और क्रूरता में आकर अपने (रसूल सालेह अलै. को) झूठा कहा, [91: 11]
जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ। [91: 12]
अल्लाह के रसूल [सालेह] ने उनलोगों से कहा: “(देखो!) अल्लाह की (इस) ऊँटनी को (हाथ न लगाना और इसको) पानी पीने के लिए खुला छोड़ दो,” [91: 13]
मगर (अन्ततः) उन्होंने (क़दार नामक) अपने साथी को बुलाया, उसने हाथ (में तलवार को) उठाया और ऊँटनी के पाँव की कूचें [Hamstrung] काट कर उसे मार डाला।" (54: 29)
उसके बाद, उन लोगों ने उस ऊँटनी का अगला पाँव काट कर [hamstrung] मार डाला। फिर अपने रब के आदेश को मानने से साफ़ इंकार कर दिया और बोले, "ऐ सालेह! अगर तुम सचमुच के रसूल हो, तो हमें जिस यातना की धमकी देते रहते हो, उसे हम पर अब ले आओ!" (7: 77)
मगर उन लोगों ने उसके अगले पाँव की कूचें [hamstring] काट डालीं। सुबह में वे (अपनी ग़लती पर) पछताते रह गए : (26: 157)
मगर उन लोगों ने उस (ऊँटनी) को (उसके पाँव काट कर) मार डाला, इस पर सालेह ने कहा, "अपने घरों में (ज़िंदगी के) तीन दिन और मज़े ले लो : यह चेतावनी झूठी साबित नहीं होगी।" (11: 65)
उस शहर में नौ (9) लोग ऐसे थे जो ज़मीन पर गड़बड़ी [corruption] फैलाते रहते थे, और ग़लत चीज़ों को सुधारते न थे। (27: 48)
वे बोले, “क़सम अल्लाह की : हम सालेह और उसके घरवालों पर रात के समय हमला करेंगे, फिर उसके वारिस (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के समय वहाँ मौजूद ही नहीं थे, और यह कि हम सच बोल रहे हैं।" (27: 49)
इस तरह उन्होंने एक शैतानी योजना बनायी थी, मगर एक योजना तो हमने भी बनायी थी जिसकी उन्हें कोई ख़बर तक न थी. (27: 50)
अब देखो कि उनकी चालों का कैसा अंजाम हुआ : हमने उन्हें और उनके सभी लोगों को पूरी तरह से तबाह-बर्बाद करके रख दिया. (27: 51)
यह उनके कुकर्मों का नतीजा है कि आज भी उनके घर उजाड़ खंडहर के रूप में पड़े हुए हैं--- सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है, जो जानते हैं---- (27: 52)
अन्त में, एक ज़बरदस्त भूचाल ने उन्हें दबोच लिया : सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े रह गए। (7: 78)
फिर सालेह ने यह कहते हुए उन लोगों से मुँह फेर लिया, "ऐ मेरे लोगो! मैंने तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा दिया और हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए सलाह देता रहा, मगर (अफ़सोस!) तुम नेक सलाह देनेवालों को पसंद नहीं करते।" (7: 79)
हमने उनपर केवल एक ही इतने ज़ोर का धमाका किया, और वे ऐसे हो गए जैसे किसी बाड़वाले [fence-maker] की सूखी लकड़ियाँ हों। (54: 31)
(तो सोचो!) कैसी थी मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (54: 30)
और शैतानियाँ करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ दबोचा और (जब सुबह हुई तो) वे अपने घरों में मुर्दा पड़े थे, (11: 67)
मानो वे वहाँ न कभी बसते थे, न फले फूले थे। "हाँ! समूद ने अपने रब को मानने से इंकार किया-----तो ऐ समूद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी।" (11: 68)
और जब हमारी (ठहरायी हुई) बात के पूरे हो जाने का समय आ गया, तो हमने अपनी दयालुता दिखाते हुए सालेह और उसके साथ ईमान रखनेवालों को सुरक्षित रखते हुए उस दिन के अपमान से बचा लिया। [ऐ रसूल!] तुम्हारा रब बहुत मज़बूत, ज़बरदस्त ताक़तवाला है। (11: 66)
अल-हिज्र [पत्थर का शहर] में (समूद की क़ौम के) लोगों ने भी हमारे रसूलों को मानने से इंकार किया था : (15: 80)
हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दी थीं, मगर वे उनसे मुँह मोड़े रहे। (15: 81)
वे पहाड़ों को काट-काटकर अपने घर बनाते थे ताकि उसमें सुरक्षित रह सकें---- (15: 82)
मगर एक दिन सुबह सवेरे उठे तो उन्हें एक ज़ोरदार धमाके ने धर दबोचा। (15: 83)
फिर जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह उनके कुछ काम न आ सका। (15: 84)
मगर हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान रखते थे और हर तरह की बुराइयों से बचते थे। (27: 53)
और रहे समूद (के लोग), तो हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था, मगर सही मार्ग अपनाने के बजाए उन्होंने अंधा रहना ही ज़्यादा पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ (बुरे कर्मों की) कमायी वे करते रहे थे, उसके बदले में एक कड़कदार धमाके ने उन्हें जकड़ लिया जो बेइज्ज़त कर देनेवाला दंड था। (41: 17)
और हमने उन लोगों को बचा लिया जो (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखते थे और बुरे कामों से बचते थे। (41: 18)
हम अगर चाहें तो चमत्कारिक निशानियाँ (देकर) भेजने से हमें कोई नहीं रोक सकता, मगर हमें इस बात ने रोक रखा है कि पहले गुज़र चुके लोगों ने भी इन (निशानियों) को मानने से इंकार कर दिया था। हमने समूद के लोगों को स्पष्ट निशानी के रूप में एक ऊँटनी दी थी, इसके बावजूद उन लोगों ने (क़त्ल कर के) उसके साथ कितना बुरा सलूक किया। हम निशानियाँ तो केवल इसलिए भेजते हैं ताकि लोग उसके नतीजे से डरें। (17: 59)
और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है) : जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!" [न सुधरे, तो तबाही आएगी] (51: 43)
मगर उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए : (51: 44)
हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए। (51: 45)
Comments
Post a Comment