क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत आदम (अलै.) / Adam (PBUH)
[बाइबल और क़ुरआन के मुताबिक़ आदम (अलै.) सबसे पहले आदमी माने जाते हैं। हदीसों से पता चलता है कि बाद में उनकी 'पसली’ से उनकी महिला साथी के तौर पर "हव्वा” [Eve] को पैदा किया गया था। अल्लाह ने आदम को मिट्टी से बनाया और फिर उसमें अपनी रूह फूंक दी थी। आदम को पैदा करने से पहले ही फ़रिश्तों को "नूर (रौशनी)" से और जिन्नों को "आग" से पैदा किया जा चुका था। पहले वे जन्नत में रहते थे जहाँ उन्हें एक ख़ास पेड़ के नज़दीक जाने से मना किया गया था, मगर शैतान के बहकावे में आकर वे ग़लती कर बैठे, और नतीजे में अल्लाह के ग़ुस्से का शिकार हुए। बहरहाल, जन्नत से निकाले जाने के बाद उनके गुनाह माफ़ कर दिए गए और उन्हें ज़मीन पर "ख़लीफ़ा" बनाकर भेजा गया। बताया जाता है कि आदम (अलै) दुनिया में क़रीब 930 वर्ष रहे। इस्लाम के अनुसार आदम (अलै) पहले "मुस्लिम" (अल्लाह की मर्ज़ी के आगे झुकनेवाले) और घरती पर पहले ‘पैग़म्बर' थे। ज़मीन पर उनकी संतानों की ज़िंदगी कोई सज़ा नहीं है (क्योंकि उनकी ग़लती माफ़ कर दी गई थी), बल्कि एक आज़माइश है कि वह अपनी ज़िंदगी कैसे गुज़ारते हैं।]
[ऐ रसूल] जब ऐसा हुआ कि आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा था, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ। (15: 28)
तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे झुक जाना," (15: 29)
(ऐ रसूल), जब ऐसा हुआ था कि आपके रब ने फरिश्तों से कहा, "मैं ज़मीन पर (आदमी को) खलीफ़ा (उत्तराधिकारी/Successor) बनानेवाला हूँ," फ़रिश्तों ने कहा, "तू किसी ऐसे को ज़मीन पर किस तरह (ख़लीफा बनाकर) रख सकता है जो वहां बर्बादी फैलाएगा और ख़ूनख़राबा करेगा, जबकि हम तेरा गुणगान करते हैं और तेरी पवित्रता का ज़िक्र करते रहते हैं?" मगर अल्लाह ने कहा, "मैं वह चीज़ें जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।" (2: 30)
अल्लाह ने आदम [Adam] को सभी (चीज़ों के) नाम सिखा दिए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, "अगर तुम सचमुच यह समझते हो (कि तुम बता सकते हो, तो) इन चीज़ों के मुझे नाम बताओ।" (2: 31)
फ़रिश्तों ने कहा, "महिमावान है तू! हमें केवल उतनी ही जानकारी है जितना कुछ तूने हमें सिखाया है। तू ही हर चीज़ का जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है।" (2: 32)
तब अल्लाह ने कहा, "ऐ आदम! तुम उन्हें इन चीज़ों के नाम बताओ।" फिर जब आदम ने उन्हें उन (चीज़ों) के नाम बता दिए, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मैं जानता हूं जो कुछ आसमानों और ज़मीन में छिपा हुआ है, और यह कि मैं यह भी जानता हूँ जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो?" (2: 33)
फिर जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम के आगे (झुकते हुए) सज्दा करो" तो, वे सब (आदम के सामने) झुक गए, मगर इबलीस ने अपनी गर्दन नहीं झुकायी। उसने (हुक्म मानने से) इंकार कर दिया और वह था भी बड़ा घमंडी : वह विश्वास न करनेवालों में शामिल हो गया। (2: 34)
[ऐ इंसानो!], हमने तुम्हें पैदा किया; तुम्हारी शक्ल सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान), आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए. मगर इबलीस न झुका : वह झुकनेवालों में शामिल न था। (7: 11)
अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तुम दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) क्यों नहीं झुके?" (15: 32)
और उसने जवाब दिया, "मैं ऐसे मामूली आदमी के आगे नहीं झुक सकता जिसको तू ने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया है।" (15: 33)
अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ : तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (7: 12)
अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड करने की जगह नहीं है. निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (7: 13)
अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तुझे ज़ात-बाहर [Outcast] किया जाता है, (15: 34)
और फ़ैसले के दिन तक तुझ पर फिटकार रहेगी।" (15: 35)
ऐ लोगो! अपने रब से डरो, जिसने तुम्हें एक अकेली जान [आदम/Adam] से पैदा किया, और उसी (के सत/essence) से उसका जोड़ीदार [हव्वा/Eve] पैदा किया, और फिर उन दोनों की नस्ल से अनगिनत मर्दों और औरतों को पैदा कर दूर-दूर तक फैला दिया;....(4:1)
इस पर हमने कहा, "ऐ आदम! (देख लो), इबलीस तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का दुश्मन : कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। (20: 117)
तुम्हारे लिए अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम न कभी भूखे रहोगे, और न ही नंगापन महसूस करोगे, (20: 118)
न प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (20: 119)
(फिर ऐसा हुआ कि) हमने कहा, "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों इस जन्नत [बाग़] में रहो। तुम दोनों जिस तरह चाहो खाओ-पियो, मगर (देखो) इस पेड़ के नज़दीक भी मत जाना, अन्यथा तुम दोनों (मर्यादा तोड़नेवाले) ज़ालिम ठहराए जाओगे।" (2: 35)
लेकिन फिर शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए, और ऐसी शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं?" (20: 120)
फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए : उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा न हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी न हासिल हो जाए।" (7: 20)
और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (7: 21)
असल में हमने आदम को पहले से ही बताकर शपथ ले ली थी, फिर वह भूल गया और हमने उसमें इरादे की मज़बूती न पाई। (20: 115)
उसने झूठी बातें बोल कर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका
था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (7: 22)
उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं : अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर दया न की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (7: 23)
और (फिर आदम और उसकी पत्नी) दोनों ने उस (पेड़) में से कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे। आदम अपने रब के कहने पर न चला और वह (जन्नत की ज़िंदगी से) भटक गया----- (20: 121)
मगर शैतान (के प्रलोभन) ने उन्हें फिसलने पर मजबूर कर दिया, और फिर वे जिस (आराम व आनंद की) हालत में वहां थे, उससे उन दोनों को निकलना पड़ा। हमने कहा, “तुम सब यहां से निकल जाओ! (शैतान और आदमी) तुम दोनों एक-दूसरे के दुश्मन होगे। अब ज़मीन पर तुम्हारे लिए रहने की जगह होगी, और एक निर्धारित समय तक जीने के लिए रोज़ी होगी।" (2: 36)
अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और जीवन-यापन के सामान होंगे---- मगर एक ख़ास अवधि तक।" (7: 24)
और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा निकाला जाएगा।" (7: 25)
फिर आदम को अपने रब से (तौबा करने के लिए दुआ के) कुछ शब्द मिल गए और (उसके द्वारा) अल्लाह ने उसकी तौबा (repentance) क़बूल कर ली : वह तौबा क़बूल करने वाला, अत्यन्त दयावान है। (2: 37)
लेकिन बाद में, उसका रब उसे फिर अपने नज़दीक ले आया, उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली, और उसका मार्गदर्शन किया ---- (20: 122)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों इस जन्नत से चले जाओ!, (आदम और शैतान) तुम दोनों एक दूसरे के दुश्मन होगे।
(अब धरती पर) अगर मेरी ओर से तुम (लोगों) को कोई मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन को अपनाया, वह न तो गुमराह होगा और न किसी तकलीफ़ में पड़ेगा। (20: 123)
(आदम को माफ़ करने के बाद) हमने कहा, "तुम सब यहाँ से (ज़मीन पर) चले जाओ! (और नयी ज़िन्दगी शुरू करो)। मगर (याद रहे) जब मेरी तरफ़ से कोई मार्गदर्शन (guidance) आ जाए, जो कि ज़रूर आएगा, तो जो लोग मेरे दिखाए हुए रास्ते पर चलेंगे, उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे ------ (2: 38)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और हमारे संदेशों को झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, वे आग में रहने वाले हैं, जहां वे हमेशा के लिए रहेंगे।” (2: 39)
क़िस्सा हाबील [Abel] और क़ाबील [Cain] का :
[ऐ रसूल!], आप उन्हें आदम के दो बेटों की कहानी की सच्चाई के बारे में बता दें : दोनों ने (अल्लाह के सामने) अपनी-अपनी क़ुर्बानी पेश की, उनमें से एक [हाबील/ Abel] की क़ुर्बानी क़बूल हो गई और दूसरे [क़ाबील/ Cain] की क़बूल नहीं हुई। इस पर (क़ाबील ने जलते हुए हाबील से) कहा, "मै तुझे अवश्य मार डालूँगा।" मगर हाबील ने कहा, "अल्लाह तो उन्हीं की क़ुर्बानी क़बूल करता है, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं। (5: 27)
अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए हाथ उठाएगा, तो मैं तुझे मारने के लिए अपना हाथ नहीं उठाउँगा। मैं डरता हूँ अल्लाह से, जो सारे संसार का रब है, (5: 28)
"मैं तो चाहता हूँ कि तू मेरे गुनाह और साथ में अपने गुनाहों का बोझ अपने ही सिर ले ले, और (जहन्नम) की आग में बसनेवालों में से हो जा : शैतानियाँ करनेवालों का बदला ऐसा ही होता है।" (5: 29)
मगर उसकी आत्मा ने उसे अपने भाई की हत्या के लिए उकसाया : उसने अपने भाई (हाबील) की हत्या कर डाली और हारे हुए लोगों में शामिल हो गया। (5: 30)
तब अल्लाह ने एक कौआ भेजा जो ज़मीन कुरेदने लगा, ताकि उसे दिखा दे कि वह अपने भाई की लाश को कैसे छिपाए। यह देख कर (क़ाबील) कहने लगा, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! क्या मैं इस कौए जैसा भी न हो सका कि अपने भाई की लाश (ज़मीन खोद कर) छिपा देता?" (अपनी हालत पर) बाद में वह बहुत शर्मिंदा हुआ। (5: 31)
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