Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत दाउद [David] (अलै.)
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत दाउद [David] (अलै.)
हमारे बन्दे दाऊद [David] को याद करें, जो बड़ा ताक़तवर आदमी था और बेशक वह हमेशा (तौबा के लिए) हमारी ओर भक्ति-भाव से झुकता था। (38: 17)
और इस तरह, अल्लाह की अनुमति से उन्होंने जालूत [Goliath] की सेना को हरा दिया। दाऊद [David] ने जालूत को मार डाला, और अल्लाह ने उसे बादशाही और समझ-बूझ [हिकमत] प्रदान की, और जो कुछ सिखाना था, दाऊद को सिखा दिया। अगर अल्लाह एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता, तो धरती पर पूरी तरह से बिगाड़ पैदा हो जाता, मगर, अल्लाह सब के लिए बड़ा फ़ज़ल करनेवाला है। (2: 251)
आसमानों और ज़मीन में हर एक के बारे में तुम्हारा रब ख़ूब अच्छी तरह से जानता है। हमने कुछ पैग़म्बरों [Prophets] को दूसरे पैग़म्बरों से ज़्यादा दिया : हम ने दाऊद [David] को किताब [ज़बूर/ Psalms] दी थी। (17: 55)
हमने पर्वतों को इस तरह उसके वश में कर दिया था कि सूरज के निकलते वक़्त और डूबते वक़्त (पर्वत भी) उसके साथ मिलकर हमारा गुणगान करते थे; (38: 18)
और चिड़ियाँ भी, जो झुंड की झुंड होती थीं, सब मिलकर (अल्लाह की) बड़ाई में आवाज़ से आवाज़ मिलाते थे। (38: 19)
हमने दाऊद [David] को अपनी तरफ से कुछ ख़ास ख़ूबियाँ दी थीं. हमने कहा, “जब वह [दाऊद] हमारी बड़ाई बयान करें तो ऐ पर्वतो! तुम भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाया करो, और पक्षियों तुम भी!" हमने उसके लिए लोहे को नर्म कर दिया था, (34: 10)
हमने ही तुम (लोगों) के फ़ायदे के लिए उन्हें [दाऊद को] धातुओं के कवच बनाने की कला सिखायी थी, ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा कर सके, पर क्या तुम इसके लिए मेरा आभार मानते हो? (21: 80)
और हुक्म दिया कि "लोहे की कवचें [Chainmail] बनाओ और कड़ियों को ठीक अंदाज़े से जोड़ो," “और तुम सब अच्छे कर्म करो, निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, मैं उसे देखता हूँ।” (34: 11)
हमने उसकी सल्तनत को मज़बूती प्रदान की थी, उसे ज्ञान व समझ-बूझ दिया था और बात कहने का ऐसा अंदाज़ दिया था कि उनकी बातें निर्णायक होती थी। (38: 20)
और क्या आपने उन दो विवाद करनेवालों की कहानी सुनी है जब वे दीवार पर चढ़कर उस [दाऊद] के एकान्त कक्ष मे घुस आए थे? (38: 21)
जब वे दाऊद के पास पहुँचे, तो वह (अचानक उन्हें देखकर) घबरा गया, वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर ज़्यादती की है : तो अब आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए--- ना-इंसाफ़ी मत कीजिए--- और हमें सही मार्ग दिखा दीजिए। (38: 22)
यह मेरा भाई है। इसके पास निन्यानवे भेड़ें हैं और मेरे पास एक ही भेड़ है। अब इसका कहना है कि ‘इसे भी मुझे सौंप दो’ और बातचीत में (यह इतना तेज़ है कि) इसने मुझे दबा लिया है।" (38: 23)
दाऊद ने कहा, "इसने अपनी भेड़ों के झुंड में तेरी भेड़ को मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझ पर ज़ुल्म किया है। साथ मिलकर काम करनेवाले बहुत सारे लोग एक-दूसरे पर ज़्यादती करते हैं। हाँ, जो लोग ईमान के पक्के हैं और अच्छे कर्म करते हैं, वे ऐसा नहीं करते, मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं।"
[तब ही] दाऊद को बात समझ में आ गयी कि असल में हम उसकी परीक्षा ले रहे थे। अतः उसने अपने रब से माफ़ी माँगी, घुटनों के बल गिर पड़ा और (गुनाहों से) तौबा की : (38: 24)
तो हमने उसका (क़सूर) माफ़ कर दिया। इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है। (38: 25)
"ऐ दाऊद! हमने धरती पर तुम्हें मालिक [ख़लीफ़ा, उत्तराधिकारी] बनाया है। अतः लोगों के बीच तुम इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना। अपनी इच्छाओं के पीछे मत भागते चलना, कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें अल्लाह के मार्ग से भटका दे : याद रखो, जो लोग उसके मार्ग से भटक जाते हैं, निश्चय ही उनके लिए दर्दनाक यातना होगी क्योंकि वे हिसाब के दिन [क़यामत] को भुला बैठते हैं ।” (26)
और हमने दाऊद को सुलैमान [Solomon] (जैसा बेटा) दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता था। (38: 30)
हमने दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को बहुत ज्ञान दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने कहा था, "सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बंदों में हम पर ख़ास तौर से मेहरबानी [favour] की।" (27: 15)
औऱ दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को भी याद करें जब उन्होंने एक ऐसे खेत के झगड़े का फ़ैसला किया था जिस खेत में रात को लोगों की कुछ भेड़- बकरियाँ घुस कर उसे चर गई थीं। हम इस मामले पर होनेवाले फ़ैसले को देख रहे थे (21: 78)
और तब हमने सुलैमान को इस मामले में फ़ैसला करने की बेहतर समझ दे दी, हालाँकि हम ने दोनों को ही सही फ़ैसला करने की गहरी समझ और ज्ञान दिया था। हमने पहाड़ों और पक्षियों को भी दाऊद के वश में लगा दिया था और वे सब (दाऊद के साथ) मिल कर हमारी बड़ाई के गीत गाते थे---- हम ने ही ये तमाम चीज़ें की थीं--- (21: 79)
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