Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत मरयम [mother Mary] अलै.
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत मरयम [Mother Mary] अलै.
अल्लाह ने आदम [Adam], नूह [Noah], इबराहीम [Abraham] के ख़ानदान, और इमरान के ख़ानदान को तमाम दूसरे लोगों के मुक़ाबले में चुन लिया था, (3: 33)
एक नस्ल के रूप में, जिसमें से एक पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी से पैदा हुई ----- अल्लाह सब (दुआएं) सुननेवाला, सब जाननेवाला है। (3: 34)
(जब ऐसा हुआ था कि) इमरान की बीवी ने दुआ की, "मेरे रब! जो बच्चा मेरे पेट में पल रहा है उसे मैं (दुनिया के कामों से अलग कर के) पूरी तरह से तुझे अर्पित करती हूं; अतः तू उसे मेरी तरफ़ से स्वीकार कर। तू ही है जो सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाला है।" (3: 35)
मगर जब उसके यहाँ बच्ची ने जन्म लिया, तो कहने लगीं, "मेरे रब! मैंने तो एक लड़की को जन्म दिया है" ----- अल्लाह तो जानता ही था कि उसके यहाँ क्या पैदा हुआ था : और लड़का लडकी के जैसा नहीं होता ---- "मैंने उसका नाम मरयम [Mary] रखा है और मैं उसे और उसकी नस्ल को तेरी शरण में देती हूँ, ताकि ठुकराए हुए शैतान से सुरक्षित रहे।" (3: 36)
उसके रब ने बड़ी ख़ुशी से उसे स्वीकार कर लिया और बड़े अच्छे माहौल में उसे परवान चढ़ाया; और ज़करिया [Zachariah] को उसके देखभाल की ज़िम्मेदारी दे दी। जब कभी ज़करिया उससे मिलने के लिए उसके हुजरे में जाता (जहाँ वह इबादत करती थी), तो उसके पास खाने-पीने की चीज़ें पाता। उसने पूछा, "ऐ मरयम! ये चीज़ें तुझे कहाँ से मिलती हैं?" उसने जवाब दिया, "यह अल्लाह की तरफ़ से है : अल्लाह जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है।” (3: 37)
[ऐ रसूल], हम ने आपको जो यह हाल सुनाया, वह आपकी जानकारी में नहीं था जिसे हम ने 'वही' [Revelation] द्वारा आपको बताया : आप उस वक़्त उन लोगों के बीच मौजूद न थे जब उन (पुजारियों) ने इस बात को तय करने के लिए कि कौन मरयम की देखभाल करेगा, पाँसे [lots] फेंके थे, और आप उस वक़्त भी नहीं थे जब वे (मरयम के बारे में) आपस में झगड़ रहे थे। (3: 44)
और याद करें उस नारी [मरयम, Mary] को जिसने अपनी इज़्ज़त सँभाल कर रखी थी. हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए (सच्चाई की) एक निशानी बना दिया. (21: 91)
और इमरान की बेटी मरयम [Mary] का उदाहरण भी है, जिसने अपनी इज़्ज़त बचा कर रखी थी, तो फिर हमने उसके अंदर अपनी रूह [Spirit] फूँक दी, उसने अपने रब की बातों और उसकी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि की : वह सचमुच पूरी भक्ति से (अल्लाह की) आज्ञा माननेवालों में शामिल थी। (66: 12)
मरयम का बेटा, मसीह तो केवल एक रसूल था; उससे पहले भी बहुत-से रसूल आए और चले गए; उसकी माँ सच्ची व बड़ी नैतिकता वाली औरत थी; दोनों ही (मर-खप जानेवाले लोगों की तरह) खाते-पीते थे। देखो, किस तरह से हम इन निशानियों को उनके लिए स्पष्ट कर देते हैं; फिर भी देखो, ये कैसे धोखे में पड़े हुए है! (5: 75)
(उस समय का हाल सुनें) जब फ़रिश्तों ने मरयम से कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह ने तुम्हें चुन लिया है और तुम्हें (बुराइयों से) पवित्र कर दिया है : उसने सचमुच तुम्हें दुनिया की सारी औरतों के मुक़ाबले में चुनकर तुम्हारा दर्जा बढ़ाया है। (3: 42)
"ऐ मरयम! पूरी निष्ठा के साथ अपने रब की भक्ति में लगी रहो, इबादत में अपने आपको (रुकू में) झुकाओ, और नमाज़ में झुकनेवालों के साथ तुम भी (सजदे में) झुकती रहो।" (3: 43)
[ऐ रसूल] इस क़ुरआन में मरयम [Mary] की कहानी को बयान करें. ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब की तरफ़ थी (19: 16)
और वहाँ वह एकांत में सबसे अलग थलग हो गयीं; तब हमने उसके पास अपनी रूह [फ़रिश्ते] को भेजा जो उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ. (19: 17)
(मरयम उसे देख कर घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब [रहमान] के नाम से तुझ से अपनी हिफ़ाज़त माँगती हूँ : अगर तुझे (अल्लाह का) कुछ भी डर है (तो मुझ से दूर हट जा)!" (19: 18)
मगर फ़रिश्ते ने कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ, ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे सकूँ।" (19: 19)
मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं बदचलन हूँ", (19: 20)
फरिश्ते ने कहा, "मगर होगा ऐसा ही! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से एक रहमत [blessing] होगी।" और यह ऐसी बात थी जिसका होना पहले से ही तय हो चुका था : (19: 21)
फिर उसे उस (होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया. वह लोगों से अलग हटकर एक दूर के स्थान पर चली गई (19: 22)
और, फिर प्रसव के दर्द [Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़ के नीचे ले आई. (जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) और वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (19: 23)
उस समय (पहाड़ी के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी, "चिंता न करो : तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी का एक सोता [Stream] बहा दिया है (19: 24)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (19: 25)
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना, “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के) रोज़े [मौन व्रत] की मन्नत मान रखी है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर सकती।" (19: 26)
फिर (ऐसा हुआ कि) वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई। (लड़के को गोद में देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या कर डाला! (19: 27)
ऐ हारून की बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (19: 28)
इस पर मरयम ने लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा). वे कहने लगे, "भला हम एक बच्चे से कैसे बात कर सकते हैं?" (19: 29)
(मगर लड़का) बोल उठा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब [Scripture] प्रदान की; मुझे नबी [Prophet] बनाया; (19: 30)
मुझे बरकतवाला [blessed] बनाया, चाहे मैं जहाँ भी रहूँ. और जब तक मैं ज़िंदा रहूँ, मुझे हुक्म दिया नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने का, (19: (31)
और अपनी माँ की (प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया. (19: 32)
(अल्लाह की ओर से) सलामती थी मुझ पर, जिस दिन मैं पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस दिन मैं मरूँगा, और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाऊँगा!" (19: 33)
ऐसा था मरयम का बेटा, ईसा [Jesus]!
यह है असल में सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं : (19: 34)
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