Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत मूसा (अलै.)

क़ुरआन के क़िस्से 

हज़रत मूसा (अलै.)

[ऐ रसूल] हम आपको सच्चाई से जुड़ी हुई, मूसा [Moses] और फ़िरऔन [Pharaoh] की कहानी का कुछ हिस्सा सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। (28: 3)
सचमुच फ़िरऔन ने धरती पर अपने आपको बहुत ही ऊँचा और ताक़तवर बना लिया था और वहाँ के लोगों को अलग अलग गिरोहों में बाँट रखा था : उनमें से एक गिरोह [इसरायल की संतानों] को उसने एकदम दबा कर रखा था, उनके बेटों को मार डालता और उनकी औरतों को ज़िंदा रहने देता--- सचमुच ही वह (समाज में) फ़साद व बिगाड़ [corruption] पैदा करनेवालों में से था ----(28: 4)
मगर हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें जिन्हें ज़मीन पर इतना दबा कर रखा गया था, उन्हें नायक बनाएँ, और उन्हें (उस धरती का) वारिस बनाएं,  (28: 5)
और ज़मीन पर उनके क़दम मज़बूती से जमा दें, और उनके द्वारा फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वही चीज़ दिखा दें, जिसका उन्हें डर था।  (28: 6)
हमने यह कहते हुए मूसा की माँ के दिल में यह बात डाल दी कि, "उसे दूध पिलाओ, फिर जब तुम्हें उसकी सुरक्षा ख़तरे में लगे, तो उसे दरिया में डाल देना : (देखो!) डरो नहीं, और न ही दुखी हो, कि हम उसे ज़रूर तुम्हारे पास वापस भेज देंगे और उसे (एक दिन अपने) रसूलों में से एक बनाएँगे।" (28: 7)
जब हमने तेरी माँ के दिल में यह बात डालते हुए कहा था, (20: 38)
“तुम अपने बच्चे को बक्से में रख दो, फिर उसे (नील) नदी में डाल दो। नदी उस बक्से को बहाते हुए स्वंय किनारे पर लगा देगी, और फिर वह उस (बच्चे) को उठा लेगा जो मेरा दुश्मन है, और उस बच्चे का भी दुश्मन है.” मैंने तुझ पर अपना ख़ास प्यार बरसाया था (कि जो देखता तुम से प्यार कर बैठता), और ऐसी योजना बनायी थी, ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी ख़ास निगरानी में हो सके। (20: 39)
इस तरह, फ़िरऔन के लोगों ने उस बच्चे को (दरिया से) उठा लिया---- जो बाद में, इनका दुश्मन, और उनके लिए दुख व परेशानी का कारण बननेवाला था : सचमुच फ़िरऔन, हामान और उनकी सेनाओं में जो लोग थे वे ग़लती पर थे---- (28: 8)
फ़िरऔन की पत्नी ने कहा, "इस (बच्चे को) देखकर मेरे और तुम्हारे मन में कितनी ख़ुशी हो रही है! (सचमुच यह हमारी आँखों की ठंढक है),  इसकी हत्या न करो, शायद हमें इससे कुछ फ़ायदा पहुँचे, या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" (मगर उस समय) उन्हें मालूम न था कि वे क्या (भूल) कर बैठे थे। (28: 9)
अगले दिन, मूसा की माँ ने अपने दिल में एक अजीब ख़ालीपन व बेक़रारी महसूस की---- अगर हम ने (उस वक़्त) उनके दिल को मज़बूत करके उन्हें हमारी बातों में विश्वास रखने वाला न बनाया होता, तो मुमकिन था कि वह (बच्चे के बारे में) सब राज़ की बातें उगल देतीं---- (28: 10)
मूसा की माँ ने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" सो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही, इस तरह कि उन्हें पता न चले  (28: 11)
और हम यह तय कर चुके थे कि वह [मूसा] किसी भी दूध पिलानेवालियों का दूध पीने को तैयार नहीं होंगे। फिर मूसा की बहन ने उनके पास जाकर कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इस (बच्चे) की परवरिश करें और इसकी ख़ूब अच्छी तरह देखभाल करें?" (28: 12)
इस तरह हम ने बच्चे को उसकी माँ के पास वापस पहुँचा दिया, ताकि उसका मन शांत हो सके, वह दुखी न रहे और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा होता है, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते।  (28: 13)
तेरी बहन (घर से) बाहर निकली, और (फ़िरऔन की लड़की से) कहने लगी, “क्या मैं तुम्हें उस (औरत) का पता बता दूँ जो इस (बच्चे) को दूध पिला सकती है”, इस तरह, हमने तुझे फिर तेरी माँ के पास (सुरक्षित) पहुँचा दिया, ताकि खुशी में उसकी आँख ठंडी रहें और वह दुखी न रहे। कुछ समय बाद तुम ने (मिस्र में) एक आदमी को मार डाला था, लेकिन हमने तुझे उस चिंता व परेशानी से मुक्ति दी थी, और फिर तुझे और भी कई तरीक़े से परखा। फिर तुम कई सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच रहे, और उसके बाद मेरे तय किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे। (20: 40)
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान की : और हम अच्छा कर्म करनेवालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (28: 14)
(एक दिन) मूसा जब शहर [मिस्र] में दाख़िल हुए, उस समय किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते हुए पाया : एक तो उनकी बिरादरी के लोगों में से था और दूसरा उनके दुश्मन क़ौम का था। जो उनकी बिरादरी में से था, उसने अपने दुश्मन के मुक़ाबले में, उन्हें मदद के लिए पुकारा। इस पर मूसा ने उस (दुश्मन) को ऐसा घूँसा मारा कि वह मर ही गया। (मूसा अपने किए पर पछताने लगे) उन्होंने कहा, "यह ज़रूर किसी शैतान का काम है : सचमुच ही वह ऐसा दुश्मन है जो (आदमी को) बहका देता है।" (28: 15)
उन्होंने कहा, "ऐ मेरे रब, मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गयी। तू मुझे क्षमा कर दे,” सो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया; सचमुच वह बेहद क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (28: 16)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! जिस तरह तूने मुझपर अपनी ख़ास मेहरबानी [blessings] की है, अब मैं भी कभी शैतानी करनेवालों का मददगार नहीं बनूँगा।" (28: 17)
अगले दिन, वह डरते हुए और चौकन्ना होकर शहर में चले जा रहे थे, कि अचानक क्या देखते हैं कि कल जिसकी मदद की थी, वही आदमी फिर उन्हें मदद के लिए पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "अरे तुम तो सचमुच बड़े बदमाश आदमी हो।” (28: 18)
फिर जैसे ही मूसा ने इरादा किया कि वह उस आदमी पर हमला करे, जो उन दोनों का शत्रु था, तो वह आदमी कहने लगा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे भी मार डाले, जिस तरह तूने कल एक आदमी को मार डाला? धरती में सचमुच तू एक निर्दय अत्याचारी बनकर रहना चाहता है; तू उनलोगों जैसा नहीं जो चीज़ों में सुधार लाते हैं।" (28: 19)
फिर ऐसा हुआ कि शहर के दूरवाले इलाक़े से एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा, "ऐ मूसा, कुछ सरदार तेरे बारे में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें, अतः तू यहाँ से निकल जा--- मेरी सलाह मान कि मैं तेरा भला चाहता हूँ।" (28: 20)
सो मूसा डरते हुए और ख़तरा भाँपते हुए वहाँ से निकल खड़े हुए, और दुआ की, "ऐ मेरे रब! मुझे शैतान लोगों से बचा ले।"(28: 21)
जब मूसा मदयन [Midian] जानेवाले रास्ते पर चल पड़े, तो उन्होंने कहा था, "आशा है, मेरा रब मार्गदर्शन करते हुए मुझे सही रास्ते पर डाल देगा।" (28: 22)
और जब वह मदयन के कुंएँ पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने लोगों के एक गिरोह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे, और उनके अलावा वहाँ दो औरतों को भी देखा, जो अपने जानवरों को रोके खड़ी थीं। मूसा ने उनसे कहा, "तुम दोनों का क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने भेड़ों को लेकर चले नहीं जाते : हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।" (28: 23)
तब मूसा ने उनकी ख़ातिर उनके जानवरों को पानी पिला दिया, और वहाँ से छायादार जगह के पास चले गए और दुआ की, "ऐ मेरे रब, जो कुछ भी अच्छी चीज़ हो सके, तू मेरी तरफ़ भेज दे, मैं उसका बहुत ज़रूरतमंद हूँ।" (28: 24)
थोड़ी देर बाद, उन दो औरतों में से एक ज़रा शर्मायी हुई चाल से चलती हुई उनके पास आयी, और कहने लगी, "मेरे बाबा आपको बुला रहे हैं : आपने हमारे लिए जानवरों को जो पानी पिलाया है, उसके लिए वह आपको कुछ इनाम देना चाहते हैं।"
फिर जब मूसा उनके (बाबा के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनायी, तो उस बूढे आदमी ने कहा, "अब डरो नहीं, ग़लत काम करनेवालों से बचकर तुम सुरक्षित जगह आ गए हो।" (28: 25)
उनमें से एक औरत ने कहा, " बाबा! इनको मज़दूरी पर रख लीजिए : मज़दूरी पर रखने के लिए सबसे सही आदमी वही होता है, जो मज़बूत और भरोसेमंद हो।" (28: 26)
उसके बाप ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो: और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी अपनी इच्छा होगी। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता : अगर अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे सही व नेक आदमी पाओगे।" (28: 27)
मूसा ने कहा, "तो मेरे और आपके बीच यह बात तय रही --- इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा ---- और जो कुछ हम कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है।" (28: 28)
.......... फिर तुम कई सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच रहे, और उसके बाद मेरे तय किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे। (20: 40)
एक बार जब मूसा तय की हुई अवधि पूरी कर चुके थे और अपने परिवारवालों को लेकर जा रहे थे, कि अचानक उन्हें तूर नामक पहाड़ के किनारे एक आग-सी दिखायी दी। उन्होंने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो (यहाँ), मैंने एक आग देखी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई ख़बर ले आऊँ या तुम्हारे लिए एक जलती हुई लकड़ी मिल जाए जिससे तुम अपने आपको गर्मा सको।" (28: 29)
[ऐ रसूल] क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी? (20: 9
जब उसने (दूर से) आग देखी तो अपने घरवालों से कहा, "तुम लोग यहीं ठहरो! मुझे (दूर में) आग दिखायी दी है। शायद तुम्हारे (आग तापने के) लिए उसमें से एक अंगारा ले आऊँ या उस अलाव पर सही मार्ग का पता चल जाए।" (20: 10)
मगर जब वह वहाँ पहुँचे तो घाटी के दाहिनी तरफ़, एक पवित्र ज़मीन पर (लगे हुए) पेड़ से उन्हें पुकारती हुई आवाज़ आयी : मूसा! मैं अल्लाह हूँ, सारे जहाँनों का पालनेवाला (रब!). (28: 30)
जब उनके रब ने (सीना/Sinai के रेगिस्तान में) तुवा [Tuwa] की पवित्र घाटी में उन्हें पुकारा था :   (79: 16)
फिर जब वह आग के पास पहुँचा, तो (एक आवाज़ ने) उसे पुकारा, "ऐ मूसा! (20: 11)
मैं तेरा रब हूँ। अपने जूते उतार दे : तू इस वक़्त ‘तुवा’ की पवित्र घाटी में खड़ा है। (20: 12)
मैंने (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) तुझे चुन लिया है। अतः जो बात ‘वही’[revelation] के द्वारा कही जा रही है, उसे ध्यान लगा कर सुनो। (20: 13)
निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ; मेरे सिवा कोई भी पूजने के लायक़ नहीं। अतः तू मेरी ही बन्दगी कर और (पाबंदी से) नमाज़ अदा कर ताकि तू मुझे याद करता रहे। (20: 14)
वह (नियत) घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना चाहता हूँ ---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके। (20: 15)
देखो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें इससे बहका दे, और तुम्हारी बर्बादी का कारण बन जाए।” (20: 16)
फिर जब वह आग के नज़दीक पहुँचे, तो एक आवाज़ ने उन्हें पुकारा,  "बरकतवाला [Blessed] है वह, जो इस आग के नज़दीक है, और वह भी [फ़रिश्ते] जो इसको घेरे हुए हैं; महान है अल्लाह, सारे संसार का रब! (27: 8)
ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, बेहद प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझवाला! (27: 9)
“ऐ मूसा! यह तेरे दाहिने हाथ में क्या है?" (20: 17)
उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इसपर टेक लगाता हूँ; इससे अपनी बकरियों के लिए पेड़ों के पत्ते झाड़ता हूँ; और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।" (20: 18)
अल्लाह ने कहा, "मूसा! इसे नीचे फेंक दे!" (20: 19)
उसने (लाठी) नीचे फेंक दी, और सहसा क्या देखता है कि वह एक तेज़ दौड़ता हुआ साँप बन गयी! (20: 20)
अल्लाह ने कहा, "इसे पकड़ लो और डरो मत : हम इसे फिर इसकी असली  हालत पर लौटा देते हैं।  (20: 21
(फिर आदेश हुआ) : अब अपने हाथ को अपनी बग़ल [armpit] के नीचे रखो और बाहर निकालो, वह बिना किसी ख़राबी के, सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा : (लाठी के अलावा) यह दूसरी निशानी होगी।  (20: 22
(यह दोनों निशानियाँ इसलिए दीं कि) आनेवाले समय में हम तुझे अपनी निशानियों में से कुछ बड़ी निशानियाँ दिखा सकें। (20: 23
[आदेश हुआ] : ऐ मूसा! फ़िरऔन [मिस्र का राजा, Pharaoh] के पास जाओ, कि सचमुच वह बहुत ज़ालिम हो गया है।" (20: 24)
(और आदेश दिया कि) फ़िरऔन [Pharaoh] के पास जाओ कि उसने लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार करने की हर सीमा पार कर दी है,  (79: 17) 
और (उससे) पूछो, “क्या तू चाहता है कि तू (गुनाहों से) पाक-साफ़ हो जाए?  (79: 18)
और क्या तू चाहता है कि मैं तेरे रब की तरफ तेरा मार्गदर्शन करूँ, ताकि तू (उसके सामने झुके और उससे) डरने लगे?” (79: 19)
ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, बेहद प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझवाला! (27: 9)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" जब मूसा ने देखा कि वह (लाठी) हिल-डुल रही है जैसे कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर न देखा। (फिर आवाज़ आयी) "ऐ मूसा, डरो नहीं! मेरी मौजूदगी में रसूलों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं, (27: 10)
मैं सचमुच बड़ा माफ़ करनेवाला, और उन लोगों पर बहुत दया करनेवाला हूँ, जो ग़लती करते हैं, और फिर की गयी बुराई को अच्छाई में बदल देते हैं.   (27: 11)
अपना हाथ गिरेबान में डालो, और फिर (बाहर निकालो) तो वह बिना किसी ख़राबी के सफ़ेद चमकता हुआ बाहर निकलेगा। यह (दो निशानियाँ) उन नौ (9)निशानियों में से हैं जिन्हें फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सामने जाकर तुम्हें  दिखाना होगा; वे सचमुच (मर्यादा की) हद से आगे बढ़े हुए हैं। " (27: 12)
अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो और फिर बाहर निकालो तो वह सफ़ेद चमकता हुआ हो जाएगा, और वह भी बिना किसी ख़राबी (या नुक़सान) के--- और डर भगाना हो तो अपने बाजू को अपने बदन से सटा लेना। ये तेरे रब की ओर से दो निशानियाँ [लाठी व चमकता हाथ] होंगी फ़िरऔन और उसके दरबारियों के लिए; सचमुच वे बड़े शैतान लोग हैं।" (28: 32)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने उनके एक आदमी को मार डाला था, और मुझे डर है कि वे कहीं मुझे मार न डालें। (28: 33)
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मेरे दिल में उम्मीद व जोश जगा दे (ताकि बड़े से बड़ा बोझ उठा सकूँ) (20: 25
और मेरे काम को मेरे लिए आसान बना दे। (20: 26)  
मेरी ज़बान की लड़खड़ाहट ठीक कर दे,  (20: 27
ताकि मेरी बात लोगों की समझ में आ जाए, (20: 28
और मेरे घरवालों में से मेरे लिए एक सहायक दे दे,  (20: 29
हारून [Aaron] के रूप में, जो मेरा भाई है --- (20: 30)
उसके द्वारा मेरी ताक़त बढ़ा दे।  (20: 31
और उसे मेरे काम में हाथ बँटानेवाला बना दे, (20: 32)
ताकि हम अधिक से अधिक तेरी बड़ाई का बखान कर सकें (20: 33)
और अक्सर तेरी याद में लगे रहें :  (20: 34
तू तो हमेशा ही हम पर नज़र रखनेवाला है।" (20: 35)
अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तू ने माँगा है, मैंने मंज़ूर कर लिया। (20: 36)
(उस समय का हाल सुनो) जबकि तुम्हारे रब ने मूसा [Moses] को पुकार कर कहा था, "ग़लत काम करनेवाले [ज़ालिम] लोगों के पास जाओ, (26: 10)
यानी फ़िरऔन [Pharaoh] की क़ौम के पास --- क्या वे (अल्लाह की बातों पर) ध्यान नहीं देंगे?" (26: 11)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे डर है कि वे मुझे झूठा कहेंगे, (26: 12)
और मैं दुखी हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (26: 13)
इसके अलावा, मेरे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक (क़त्ल का) इल्ज़ाम भी लगा रखा है। इसलिए मैं डरता हूँ कि कहीं वे मुझे मार ही न डालें।" (26: 14)
अल्लाह  ने कहा, "नहीं [वे ऐसा नहीं कर सकते]! तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ--- यक़ीन रखो, हम तुम्हारे साथ रहेंगे, और सब सुनते रहेंगे। (26: 15)
अतः तुम दोनो फ़िरऔन को पास जाओ और कहो, “हम सारे संसार के रब की तरफ़ से संदेश ले कर आए हैं : (26: 16)
इसराईल की सन्तानों को हमारे साथ जाने दो।" (26: 17)
मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं : उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे मुझे झुठा कहेंगे।"(28: 34)
अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (28: 35)
फिर इनके बाद हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसका समर्थन करनेवाले बड़े सरदारों के पास भेजा, मगर उन लोगों ने उसे मानने से इंकार कर दिया, और देखो! उनका अंजाम क्या हुआ जो फ़साद फैलाया करते थे! (7: 103
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसारों के रब का (भेजा हुआ) रसूल हूँ, (7: 104)
"मेरा यह फ़र्ज़ बनता है कि मैं अल्लाह के बारे में सिवाए सच कहने के और कुछ न कहूँ, और मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से (सच्चाई की) स्पष्ट निशानी लेकर आया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तानों को मेरे साथ जाने दो।" (7: 105)

फिर उनके बाद हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके दरबारियों के पास भेजा, मगर वे बड़े घमंड से पेश आए---- वे शैतान लोग थे। (10: 75)
हमारी तरफ़ से जब सच्चाई उनके सामने आ गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादू है।" (10: 76)
मूसा ने कहा, "क्या यही तुम्हारे विचार हैं सच्चाई के बारे में, जबकि सच्चाई अब तुम्हारे सामने आ चुकी है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (10: 77)
उन लोगों ने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस दीन [Faith] से हटा दे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को चलते हुए पाया है, और इस सरज़मीन पर तुम दोनों भाइयों की महानता स्थापित हो जाए? हम तो कभी भी तुम में विश्वास करनेवाले नहीं हैं।" (10: 78)

इसी तरह, हमने मूसा को भी अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ(11: 96)
फ़िरऔन और उसके माननेवालों  के पास भेजा था, मगर वे (लोग) फ़िरऔन के आदेश पर ही चले, हालाँकि फ़िरऔन के आदेश मार्ग से भटका देने वाले थे। (11: 97)

और (देखो!) हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था : "अपनी क़ौम के लोगों को गहरे अँधेरों से रौशनी की तरफ़ निकाल लाओ. और उन्हें अल्लाह के उन दिनों की याद दिलाओ (जब अल्लाह ने उन पर अपनी ख़ास कृपा की थी या जब उन्हें परेशानी में डाल कर आज़माया था) : सचमुच इन बातों में हर उस आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परेशानी में) धैर्य से काम लेता है और (अच्छे समय में) शुक्र अदा करता है. (14: 5)

(बहुत पहले) हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दी थीं---  इसराईल की सन्तान से पूछ लो. जब मूसा [Moses] (मिस्र के लोगों के पास) आया, तो फ़िरऔन [Pharaoh] ने उससे कहा, "ऐ मूसा! मुझे लगता है कि किसी ने तुम पर जादू कर दिया है।" (17: 101)
मूसा ने कहा, "तुम अच्छी तरह से जानते हो कि स्पष्ट सबूत के तौर पर ऐसी निशानियाँ तो केवल आसमानों और ज़मीन का रब ही भेज सकता है। और ऐ फ़िरऔन! मुझे लगता है कि तुम्हारी बर्बादी बस आने ही वाली है।" (17: 102)

(अल्लाह ने कहा), अब तुम और तुम्हारा भाई, दोनों मेरी निशानियो के साथ जाओ, और देखो! इस बात का ध्यान रहे कि मुझे याद करते रहना। (20: 42)
दोनों मिलकर फ़िरऔन के पास जाओ, कि उसने (मर्यादा की) तमाम हदें तोड़ डाली हैं। (20: 43)
मगर देखो, उससे नर्मी से बात करना, शायद कि वह उस पर ध्यान दे या कुछ आदर दिखलाए।" (20: 44)
दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें डर है कि कहीं वह हमें कोई बड़ा नुक़सान न पहुँचाए या मर्यादा की सीमाएं न तोड़ डाले।" (20: 45)
अल्लाह ने कहा, "डरो नहीं, मै तुम दोनों के साथ हूँ। मैं सब सुनता भी हूँ और देखता भी हूँ। (20: 46)
जाओ और जा कर उससे कहो, “हम तेरे रब के भेजे हुए रसूल [Messengers] हैं, अत: इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे, और उनके साथ ज़ुल्म न करे। हम तेरे पास तेरे रब की निशानी लेकर आए हैं, और जो कोई भी सीधे रास्ते पर चले, उसके लिए सलामती है; (20: 47)
हमने मूसा को किताब [तोरैत] दी थी और उनके भाई हारून को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था।  (25: 35)
हम ने कहा था, "तुम दोनों उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया है।" बाद में हमने उन लोगों को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया। (25: 36)

और हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण [Clear authority] के साथ भेजा (40: 23)
फ़िरऔन [Pharaoh], हामान [फ़िरऔन का दरबारी] और क़ारून [Korah] के पास, किन्तु उन्होंने कहा, "यह तो जादूगर है, बड़ा झूठा है!" (40: 24)
फिर जब वह [मूसा] उनके सामने हमारी तरफ़ से सच्चाई का संदेश लेकर आए, तो उस [फ़िरऔन] ने कहा, "जो लोग उन [मूसा अलै.] के साथ (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, उनके बेटों को मार डालो औऱ उनकी औरतों को ज़िंदा छोड़ दो"---  किन्तु सच्चाई से इंकार करनेवालों की चाल तो (ग़लत ही पड़ती है और) भटकने के लिए ही होती है ----- (40: 25)
और (देखो!), हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, तो उसने जाकर कहा, "मैं सचमुच सारे संसार के रब का रसूल हूँ।" (43: 46
लेकिन जब उसने हमारी निशानियाँ उनके सामने पेश कीं, तो वे लगे उन (निशानियों) की हँसी उड़ाने,  (43: 47)
हालाँकि हम ने उन्हें जो भी निशानी दिखायी, उसमें हर एक निशानी पिछली वाली से बढ़-चढ़कर थी। हमने उन्हें कड़ी यातना में भी डाला, ताकि वे सीधे रास्ते पर लौट सकें।  (43: 48)

उनसे पहले हम ने फ़िरऔन की क़ौम के लोगों की परीक्षा ली थी : उनके पास एक बहुत ही इज़्ज़त व गरिमा वाले रसूल [मूसा] को भेजा,   (44: 17)
यह कहते हुए कि "तुम अल्लाह के बन्दों [इसराईल की संतानों] को मेरे हवाले कर दो! मैं विश्वास करने योग्य रसूल हूँ जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। (44: 18)
अपने आपको अल्लाह से ऊँचा न समझो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ। (44: 19)
और मैं इस बात से अपने रब और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ कि तुम मुझे बेइज़्ज़त करो या मुझ पर पत्थर बरसाओ,  (44: 20)
किन्तु अगर तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करते, तो (कम से कम) मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो!" 44: (21)

मूसा [Moses] (की घटना) में भी ऐसी ही निशानियाँ हैं : हमने उन्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के पास स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (51: 38) 
किन्तु उस [फ़िरऔन] ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा) "जादूगर है या कोई दीवाना," (51: 39)
हमें ‘वही’ [Revelation] द्वारा (अल्लाह की तरफ़ से) यह बात बतायी गयी है   कि जो कोई भी सच्चाई को मानने से इंकार करेगा और उससे मुँह फेरेगा, तो उसके ऊपर यातना आ पड़ेगी।" (48)
फ़िरऔन ने पूछा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?" (20: 49)
मूसा ने कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी सही आकृति [Form] दी, फिर उसके (विकास के) लिए ज़रूरी रास्ता भी बता दिया।" (20: 50) 
फ़िरऔन ने कहा, "अच्छा तो उन पीढ़ियों का क्या होगा, जो पहले गुज़र चुकी हैं?" (20: 51)
मूसा ने कहा, "इन सब का ज्ञान तो केवल मेरे रब के पास ही है, जो एक किताब में लिखा हुआ है; मेरा रब न चूकता है और न भूलता है।" (20: 52)
फिर हमने मूसा [Moses] और उसके भाई हारून [Aaron] को अपनी निशानियों और स्पष्ट  प्रमाण के साथ, (23: 45)
फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, मगर वे बड़े अहंकार से पेश आए : वे थे भी घमंडी लोग.  (23: 46)
सो वे कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो (मामूली) आदमियों में विश्वास कर लें? और जबकि उनकी क़ौम के लोग तो हमारे सेवक हैं?" (23: 47) 
और इस तरह, उन लोगों ने दोनों को झूठा बताया : और बर्बाद हो जानेवालों में शामिल हो गए. (23: 48)
फ़िरऔन ने कहा, "क्या हमने तुम्हें अपने यहाँ रख कर पाला नहीं था जब तुम  बच्चे थे? क्या तुम ने हमारे साथ रहते हुए अपनी उम्र के कई साल नहीं गुज़ारे थे? (26: 18)
और फिर तुम ने अपने हाथ से वह अपराध कर डाला था : तुम बड़े एहसान फ़रामोश [ungrateful] हो।" (26: 19)
मूसा ने जवाब दिया, “जब मैंने वह (घूँसा मारने का) काम किया, उस वक़्त मुझे धोखा हुआ था, (26: 20)
और मैं तुम्हारे डर से यहाँ से भाग़ खड़ा हुआ था; बाद में, मेरे रब ने मुझे सही ज्ञान दिया और मुझे अपने रसूलों में शामिल कर लिया। (26: 21)
और क्या यही बड़ा काम किया है तुम ने --- कि इसराईल की सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है--- जो तुम मुझ पर अपना एहसान जता रहे हो?" (26: 22)

फिर फ़िरऔन ने पूछा, "और यह सारे संसार का रब क्या होता है?" (26: 23)
मूसा ने जवाब दिया, "वह सारे आसमानों का, ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उन सबका रब है, अगर तुम सचमुच विश्वास कर सको!" (26: 24)
फ़िरऔन ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा, "क्या तुम ने सुना, जो कुछ इस ने कहा?" (26: 25
मूसा ने कहा, "वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है।" (26: 26)
फ़िरऔन ने कहा, "यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, सचमुच ही पागल है।" (26: 27)
मूसा ने आगे कहा, "वह पूरब और पश्चिम का भी रब है और जो कुछ उनके बीच है उसका भी रब है, (समझ जाओगे) अगर तुम अपनी बुद्धि से काम लो!" (26: 28)
मगर फिरऔन ने (मूसा से) कहा, "अगर तूने मेरे सिवा किसी और को पूजने के क़ाबिल माना, तो मैं तुझे ज़रूर बन्दी बना लूँगा", (26: 29)

फिर जब मूसा उनके पास हमारी साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ लेकर पहुँचे, तो उन्होंने कहा, "यह तो बस बनावटी जादू के करतब हैं; हमने तो यह बात अपने बाप-दादा से कभी नहीं सुनी।" (28: 36)
मूसा ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आता है, और किसके पास (परलोक में) रहने का अंतिम ठिकाना [Final Home] होगा : ग़लत काम करनेवाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (28: 37)
फ़िरऔन ने कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवा कर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़ कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ : मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (28: 38)
फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा-----  (28: 39)
फ़िरऔन ने (अपने वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन [tower] बना दो, ताकि मैं (उस पर चढ कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (40: 36)
जो आसमानों तक चली जाती है, फिर मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहानी बना दी गयीं और उसे सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं.  (40: 37)
फ़िरऔन ने कहा, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो उस निशानी को पेश करो, जो तुम ले कर आए हो।" (7: 106)

इस पर मूसा ने पूछा, "क्या तब भी, अगर मैं तुम्हें कोई ऐसी चीज़ दिखा दूँ जिसे (देख कर) तुम मान जाओ?" (26: 30)
“अच्छा ठीक है, दिखाओ, अगर तुम सच बोल रहे हो", फ़िरऔन ने कहा। (26: 31)
अ‍त: मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, देखते ही देखते वह अजगर साँप बन गयी। (26: 32)
फिर उसने अपना हाथ (बग़ल से) खींच कर निकाला, तो वह पल भर में  देखनेवालों के सामने सफ़ेद हो कर चमकने लगा।  (26: 33)

फिर मूसा ने उसे बड़ी ज़बरदस्त निशानी दिखाई (जब लाठी साँप में बदल गयी और उनका हाथ चमकने लगा),  (79: 20)

मगर फ़िरऔन ने इन (निशानियों) को ठुकरा दिया, और विश्वास करने से इंकार कर दिया।  (79: 21) 
मगर मूसा की बात में किसी ने भी विश्वास न किया, सिवाए उसकी क़ौम के थोड़े से लोगों के, क्योंकि उन्हें डर था कि फ़िरऔन और उनके सरदार उन पर जुल्म ढाएंगे: फ़िरऔन था भी बड़ा दबंग, उसने धरती पर बहुत सिर उठा रखा था, औऱ वह बेहद ज़्यादती करनेवाला था। (10: 83)

फ़िरऔन की क़ौम के सरदार (आपस में) कहने लगे, "अरे, यह तो बडा माहिर जादूगर लगता है! (7: 109)
"वह तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करना चाहता है!" फ़िरऔन ने कहा, "तो अब तुम्हारी क्या सलाह है?" (7: 110)
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को थोड़े समय के लिए टाल दो और इस बीच सभी शहरों में हरकारे भेज दो, (7: 111
"कि वे हर माहिर जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।" (7: 112)

हक़ीक़त यह है कि हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखायीं, मगर उसने उन्हें झुठलाया और मानने से इंकार कर दिया। (20: 56
उसने कहा, "ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि अपने जादू से हमको अपनी ज़मीन से निकाल बाहर कर दे? (20: 57)
अच्छा, हम भी तेरे जादू का मुक़ाबला जादू से ही करेंगे : एक (मुनासिब) जगह ठहरा लो जिस पर दोनों पक्ष राज़ी हों, और (मुक़ाबले का) एक समय तय कर लो, जिसे हम दोनों में से कोई भी तोड़ न पाए।" (20: 58)
मूसा ने कहा, "ठीक है, हमारे बीच वह दिन तय रहा, जिस दिन उत्सव मनाया जाता है, और यह कि लोग दिन चढ़े वहाँ इकट्ठे हो जाएँ।" (20: 59)
फ़िरऔन (वहाँ से) चला गया, फिर उसने अपने सारे (शैतानी) हथकंडे जुटाए, और (नियत समय पर) आ गया। (20: 60)
मूसा ने उन लोगों से कहा, "ख़बरदार! अल्लाह के बारे में झूठी बातें न गढ़ो, वरना वह [अल्लाह] तुम्हें ऐसी सज़ा देगा कि तुम बर्बाद हो जाओगे। याद रहे, जिस किसी ने भी झूठ गढ़ा, वह असफल रहेगा।" (20: 61)
इस पर वे आपस में अपनी योजना के बारे में विचार-विमर्श करने लगे, और चुपके-चुपके कानाफूसी करते हुए, (20: 62)
कहने लगे, "ये दोनों जादूगर हैं, इनका मक़सद है कि अपने जादू से तुम्हें अपनी ज़मीनों से निकाल बाहर कर दें, और तुम्हारी उत्तम संस्कृति को बर्बाद कर डालें।" (20: 63)
अतः अपने सभी हथकंडों [resources] को जुटा लो, फिर मुक़ाबले के लिए पंक्तिबद्ध हो जाओ। आज जो भी जीतेगा, असल कामयाबी उसी की होगी।" (20: 64)
सो जादूगर फ़िरऔन के पास पहुंच गए, और कहने लगे, "अगर हम जीत गए तो क्या हमें इनाम मिलेगा?" (7: 113
उसने जवाब दिया, "हाँ, ज़रूर मिलेगा, और तुम (मेरे) ख़ास नज़दीकी लोगों में शामिल हो जाओगे।" (7: 114
फिर जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! तुम पहले (दांव) फेंकोगे या फिर हम फेंकें?" (7: 115
मूसा ने कहा, "तुम ही पहले फेंको।" फिर उन्होंने (लाठी व रस्सियाँ) फेंकी, बस देखनेवालों की आँखों पर जादू कर दिया, (करतब से) उनमें डर पैदा कर दिया, और (सचमुच) उन्होंने ज़बरदस्त जादूगरी दिखायी। (7: 116
फिर हमने मूसा को 'वही' [Inspiration] भेजी, "तुम भी अपनी लाठी (नीचे) फेंक दो!"-- फिर देखते ही देखते-- वह लाठी उनके रचे हुए स्वांग को निगल गयी।  (7: 117)
इस तरह, सच्चाई साबित हो गयी और जो कुछ उन्होंने (जादू के असर से) पैदा किया था, वह बेकार हो कर रह गए थे : (7: 118
(फ़िरऔन के) जादूगरों की हार हो गयी, और वे बुरी तरह अपमानित हो गए।  (7: 119)
फिर ऐसा हुआ कि सभी जादूगर घुटनों के बल गिर पड़े (7: 120)
और बोले, "हम सारे संसारों के रब पर ईमान लाते हैं,  (7: 121)
"मूसा और हारून के रब पर!" (7: 122)
मगर फ़िरऔन बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि बिना मेरी अनुमति के, तुमने उस (रब) पर विश्वास कर लिया! यह तो एक बड़ी साज़िश है, जो तुम लोगों ने रची है, ताकि इस शहर से लोगों को निकाल बाहर कर दो! अच्छा, तो तुम्हें जल्द ही (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा : (7: 123
"मैं (तुम लोगों का) एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ़ का पाँव कटवा दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (7: 124)
जादूगरों ने (बिना डरे) कहा, "और इस तरह हम अपने रब के पास लौट जाएंगे----- (7: 125)
"हमारे ख़िलाफ़ तेरी शिकायत बस यही तो है कि जब हमारे रब की निशानियाँ हमारे पास आ गयीं, तो हम ने उनपर विश्वास कर लिया। हमारे रब! हम पर धीरज के साथ जमे रहने की ताक़त डाल दे, और हमें इस दशा में मौत दे कि हम पूरी भक्ति के साथ तेरी आज्ञा मानने वाले रहें।" (7: 126)

और फ़िरऔन ने कहा, "हर क़ाबिल जादूगर को मेरे पास ले आओ।" (10: 79)
फिर जब जादूगर आ गए, (और मुक़ाबला शुरू हुआ) तो मूसा ने उनसे कहा, "(अपने दाँव में) जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो, फेंको।" (10: 80)
फिर जब जादूगरों ने (अपना दाँव) फेंका, तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ भी ले कर आए हो, वह तो जादू है। अल्लाह अभी दिखा देगा कि यह सब बनावटी है।  अल्लाह शरारत करनेवालों के काम को कभी कामयाब नहीं होने देता; (10: 81)
"अल्लाह सच्चाई को अपने हुक्म से सच कर दिखाता है, चाहे शैतानी करनेवाले उससे कितनी ही नफ़रत करें।" (10: 82)

जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! पहला दांव तुम चलोगे या फिर हम चलें?” (20: 65
मूसा ने कहा, "तुम्हीं पहले चलो।" फिर (जादूगरों ने अपने दांव फेंके), अचानक जादू के असर से उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ (साँप की तरह) दौड़ती हुई महसूस होने लगीं! (20: 66)
मूसा अपने जी में थोड़ा डरा, (20: 67)
मगर हमने कहा, "डरो मत! निस्संदेह तुम ही (मुक़ाबले में) भारी पड़ोगे। (20: 68)
तुम्हारे दाहिने हाथ में जो (लाठी) है, उसे नीचे फेंक दो : जो कुछ (जादू से) उन्होंने रचा है, वह उसे निगल जाएगी। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर के करतब हैं, और जादूगर चाहे किसी रास्ते से आए, उसे कभी कामयाबी नहीं मिलती।" (20: 69)
[ऐसा ही हुआ, और] सारे जादूगर घुटनों के बल (सजदे में) गिरा दिए गए. वे  बोले, "हम ने विश्वास कर लिया, हारून और मूसा के रब पर।" (20: 70)
फ़िरऔन ने (जादूगरों से) कहा, "मेरी इजाज़त लेने से पहले ही तुम्हारी यह मजाल कि तुम ने इनके रब पर विश्वास कर लिया? यह ज़रूर तुम्हारा उस्ताद होगा, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अब अवश्य ही मैं तुम्हारा एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ का पाँव कटवा दूँगा, और खजूर के तनों पर तुम्हें सूली चढ़ा दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और लम्बे समय तक रहनेवाली है!" (20: 71)
जादूगरों ने कहा, "हम यह कभी नहीं कर सकते कि जो (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ (अल्लाह की तरफ़ से) हमारे सामने आ चुकी हैं, उन्हें छोड़ कर तेरा आदेश मान लें, और न ही जिस अल्लाह ने हमें पैदा किया है, उससे मुँह फेर कर तेरा हुक्म मान लें : अत: तू जो चाहे, फ़ैसला कर ले : वैसे भी तू तो बस इसी सांसारिक जीवन के मामलों का ही फ़ैसला कर सकता है----- (20: 72)
हम ने तो अपने रब पर विश्वास कर लिया, (इस आशा में) कि शायद वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे औऱ इस जादूगरी को भी जिसे दिखाने के लिए तू ने हमें मजबूर किया---- अल्लाह ही सबसे अच्छा और हमेशा बाक़ी रहनेवाला है।" (20: 73)
जादूगरों को एक ख़ास दिन में एक नियत समय पर जमा होना था, (26: 38)
और लोगों से पूछा गया था, (26: 39)
"क्या तुम सब लोग (देखने) आ रहे हो? अगर जादूगरों की जीत होती है, तो हम उनके बताए हुए रास्ते पर चल सकते हैं।" (26: 40)

फिर जादूगरों ने वहाँ पहुँच कर फ़िरऔन से कहा, "अगर हम जीत जाएंगे, तो क्या हमें कोई इनाम दिया जाएगा?" (26: 41)
उसने कहा, "हाँ, हाँ, तुम हमारे क़रीबी दरबारियों में शामिल कर लिए जाओगे।" (26: 42)
मूसा ने उनसे कहा, "फेंको, जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो।" (26: 43)
तब जादूगरों ने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकी और बोले, "फ़िरऔन की इज़्ज़त व ताक़त की क़सम! हम ही विजयी रहेंगे।" (26: 44)
मगर मूसा ने अपनी लाठी जैसे ही ज़मीन पर फेंकी, तो क्या देखते हैं कि वह (अजगर बन कर) उस स्वांग से रची गयी चीज़ों को निगल गया, (26: 45)
और इस पर जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा दिए गए, (26: 46)
और बोल उठे, "हम ने सारे संसार के रब पर विश्वास कर लिया,  (26: 47)
जो मूसा और हारून का रब है!" (26: 48)

फ़िरऔन ने कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि मेरी अनुमति लिए बिना ही, तुम ने इस पर विश्वास भी कर लिया? यह ज़रूर तुम सबका उस्ताद है, जिसने तुमको जादू सिखाया है! अच्छा, तो अभी तुम्हें मालूम हुआ जाता है: मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव कटवा दूँगा, और तुम सब को सूली पर चढ़ा दूँगा!" (26: 49)
जादूगरों ने कहा, "हमारा तो इससे कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि यह बात पक्की है कि हम को अपने रब के पास लौट कर जाना है। (26: 50)
उम्मीद है कि हमारा रब हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, क्योंकि सबसे पहले हमने विश्वास कर लिया था।" (26: 51)

फिर जब वह [मूसा] उनके सामने हमारी तरफ़ से सच्चाई का संदेश लेकर आए, तो उस [फ़िरऔन] ने कहा, "जो लोग उन [मूसा अलै.] के साथ (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, उनके बेटों को मार डालो औऱ उनकी औरतों को ज़िंदा छोड़ दो"---  किन्तु सच्चाई से इंकार करनेवालों की चाल तो (ग़लत ही पड़ती है और) भटकने के लिए ही होती है ----- (40: 25)
और फ़िरऔन ने कहा, "छोड़ दो मुझे, ताकि मैं मूसा को मार डालूँ! ---- और वह भी अपने रब को (अपनी सहायता के लिए) बुला ले ---- मुझे डर है कि ऐसा न हो कि वह तुम्हारे धर्म को बदल डाले या यह कि वह [मिस्र] देश में बिगाड़ [disorder] पैदा कर दे।" (40: 26)
मूसा ने कहा, "मैं अपने और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ, हर उस ज़ालिम आदमी से, जो हिसाब-किताब के दिन [क़यामत] पर विश्वास नहीं रखता।" (40: 27)
फ़िरऔन के ख़ानदान में से (अल्लाह पर) विश्वास रखने वाले एक आदमी ने, जिसने अपने ईमान को अभी तक छिपा रखा था, बोल उठा, ‘क्या तुम एक आदमी को केवल इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि “मेरा रब अल्लाह है?” और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुली निशानियाँ भी लेकर आया है --- अगर वह झूठा है, तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा--- लेकिन अगर वह सच्चा है, तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुम पर पड़कर रहेगा। अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादा (की सीमा) लांघनेवाला और बड़ा झूठा हो. (40: 28)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी हुकूमत है, (मिस्र की) धरती पर तुम्हारा राज है, किन्तु अल्लाह की यातना अगर आ जाए, तो कौन है जो उसके मुक़ाबले में हमारी सहायता कर सके?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं जो ठीक समझता हूँ वह मैंने तुम्हें बता दिया है; और मैं तुम्हारा मार्गदर्शन सही रास्ते की तरफ़ कर रहा हूँ।" (40: 29)
उस आदमी ने, जो ईमान रखता था, (आगे) कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे डर है कि तुम पर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा उन सभी समुदायों पर आ पड़ा था (जिन्होंने अपने रसूलों का विरोध किया था) :  (40: 30)
जैसे नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद के लोगों का हाल हुआ था----  अल्लाह तो अपने बन्दों पर कभी नाइंसाफ़ी नहीं करना चाहता. (40: 31)
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे लिए उस दिन का डर है जिस [क़यामत के] दिन लोग एक दूसरे को चिल्ला-चिल्ला कर पुकार रहे होंगे, (40: 32)
जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे, और तुम्हें अल्लाह से बचानेवाला कोई न होगा! जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, उसे मार्ग दिखानेवाला कोई न होगा।  (40: 33)
सच्चाई यह है कि इससे पहले तुम्हारे [मिस्र के लोग] पास यूसुफ़ [Joseph] साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे, तब भी जो संदेश लेकर वे आए थे, उसके बारे में तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, फिर जब उनकी मृत्यु हो गई, तो तुम कहने लगे, "उनके बाद अल्लाह अब कोई रसूल नहीं भेजेगा।"
इसी तरह अल्लाह शक में डूबे हुए बाग़ियों को भटकता छोड़ देता है---  (40: 34)
जो लोग अल्लाह की आयतों में झगड़े निकाला करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार [authority] नहीं दिया गया है, तो यह (काम) अल्लाह की नज़र में अत्यन्त अप्रिय है, और उन लोगों की नज़र में भी जो उस पर विश्वास रखते हैं। इस तरह अल्लाह हर अहंकारी और अत्याचारी आदमी के दिल पर ठप्पा लगा (कर उसे बंद कर) देता है।“  (40: 35)
फ़िरऔन ने (अपने वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन [tower] बना दो, ताकि मैं (उस पर चढ कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (40: 36)
जो आसमानों तक चली जाती है, फिर मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहानी बना दी गयीं और उसे सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं.  (40: 37)
उस ईमान रखनेवाले आदमी ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, मेरी बात मानो! मैं तुम्हे भलाई का सही रास्ता दिखाऊँगा (40: 38)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो बस थोड़े समय के लिए मज़ा लेने की जगह है; यक़ीन करो, कि स्थायी रूप से रहने बसने का घर तो आख़िरत [परलोक] ही है.  (40: 39)
जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा; किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह में) विश्वास रखता हो, तो वह मर्द हो या औरत, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और वहाँ उसे बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी.  (40: 40)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुला रहा हूँ जबकि तुम मुझे (जहन्नम की) आग की ओर बुला रहे हो? (40: 41)
तुम मुझसे चाहते हो कि मैं अल्लाह में विश्वास करने से इंकार कर दूँ और उसके साथ ऐसी चीज़ों को उसका साझीदार [Partner] मान लूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं; जबकि मैं तुम्हें उसकी ओर बुला रहा हूँ जो प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करनेवाला है. (40: 42)
इसमें कोई शक नहीं कि तुम मुझे जिसकी ओर बुला रहे हो, वह न तो इस दुनिया में पुकारे जाने के क़ाबिल है और न आनेवाली दुनिया [परलोक] मे : सच तो यह है कि हमें लौटना तो अल्लाह ही की ओर है, और असल में जो लोग मर्यादा (की सीमा) लाँघनेवाले हैं, वही (जहन्नम की) आग में रहनेवाले हैं.  (40: 43)
[एक दिन] तुम मुझे याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे अभी कह रहा हूँ, अत: मैं अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ : अल्लाह अपने बंदों को अच्छी तरह से जानता है."  (40: 44)
अन्ततः अल्लाह ने उस (ईमानवाले) को उन लोगों की बुरी योजनाओं से बचा लिया.
और फ़िरऔन के लोगों को भयानक यातना ने आ घेरा; (40: 45)
हमने फ़िरऔन के लोगों को वर्षों तक अकाल और फ़सल की ख़राबी जैसी मुसीबतों में डाला, ताकि शायद वे चेत जाएं व ध्यान दें, (7: 130)

(मगर) फिर, जब उन पर कभी ख़ुशहाली आ जाती, तो वे कहते, "इस पर तो हमारा हक़ बनता था!". और जब उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती, तो वे उसे मूसा और उसके साथियों का 'अपशगुन' [evil omen] बताते थे, मगर असल में, उनका 'अपशगुन' अल्लाह की तरफ़ से था, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाए।  (7: 131)

और वे (मूसा से) बोले, "हम पर अपना जादू चलाने के लिए चाहे तू कैसी भी निशानियाँ हमारे सामने ले आए, हम तुझ पर विश्वास करनेवाले नहीं हैं," (7: 132)
मगर जब आँखें खोल देनेवाली हमारी निशानियाँ उनके पास आयीं, तो उन्होंने कहा, "यह तो साफ़ तौर से जादू मात्र है!" (27: 13)
हालाँकि उन्होंने दिल में इन (निशानियों) को सच जाना था, मगर उनलोगों ने शैतानी और घमंड के कारण उसे मानने से इंकार कर दिया। अब देख लो इन गड़बड़ी [corruption] फैलानेवालों का परिणाम क्या हुआ? (27: 14)
और इसलिए, हमने उन पर (एक के बाद एक मुसीबतें) छोड़ दीं---- बाढ़, टिड्डियों (के दल), छोटे (घुन के) कीड़े [जुएं], मेंढक और ख़ून-----ये सभी साफ़-साफ़ निशानियाँ थीं. (मगर) वे बड़े घमंडी, और मुजरिम लोग थे। (7: 133)

जब कभी उनपर (प्लेग के रूप में) यातना आ पड़ती, तो वे कहते थे, "ऐ मूसा, जो वादा तेरे रब ने तेरे साथ कर रखा है, उस आधार पर तू अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दे : अगर तू ने हमें इस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दिला दिया, तो हम तुझ पर विश्वास कर लेंगे, और इसराईल की सन्तान को तेरे साथ जाने देंगे," (7: 134)
मगर जब हम ने उन्हें उस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दे दिया और उन्हें एक तय किया हुआ समय भी दिया (ताकि वे विश्वास करने का वादा पूरा कर सकें)-----तो क्या देखते हैं कि उन्होंने अपना वादा तोड़ डाला। (7: 135

वे (यातना देख कर मूसा से) कहने लगते, "ऐ जादूगर! तेरे रब ने तुझ से जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उस आधार पर अपने रब से हमारे लिए प्रार्थना कर दो : निश्चय ही हम (तुम्हारे मार्गदर्शन में) सीधे मार्ग पर आ जायेंगे, " (43: 49)

फिर जैसे ही हम उनपर से यातना हटा देते, पल भर में वे प्रतिज्ञा तोड़ डालते थे।  (43: 50

फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र की सल्तनत मेरी नहीं? और ये नदियाँ जो मेरे (महलों के) नीचे बहती हैं, क्या यह मेरी नहीं? तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?  (43: 51)
क्या मैं इस तुच्छ व गिरे हुए आदमी [मूसा] से बेहतर नहीं हूँ जो अपनी बात साफ़-साफ़ बोल भी नहीं पाता? (43: 52
(यदि यह अल्लाह का भेजा हुआ रसूल है, तो) फिर उसके लिए सोने के कंगन क्यों नहीं दिए गए (जिसे यह पहन कर आता)? या फ़रिश्तों का दल उसकी अगुवाई में यहाँ साथ क्यों नहीं आया?" (43: 53)

फ़िरऔन ने कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवा कर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़ कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ : मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (28: 38)
उस (फ़िरऔन) ने (लोगों को) जमा किया और पुकार कर कहने लगा,  (79: 23)  
“मैं तुम्हारा सबसे बड़ा स्वामी हूँ,”  (79: 24)

फ़िरऔन ने सचमुच अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; और उन्हें सही मार्ग न दिखाया।  (20: 79)
इस तरह, उसने अपनी क़ौम के लोगों को (अपनी बातों से) मोह लिया, औऱ उन्होंने उसकी बात मान ली ---  सचमुच वे भ्रष्ट [perverse] लोग थे। (43: 54)

मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा अलै.] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा।  (73: 16)

मूसा ने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अगर तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो और उसकी आज्ञा मानते हुए उसी के सामने झुकते हो, तो तुम्हें उसी पर अपना भरोसा रखना चाहिए।" (10: 84)
इस पर वे बोले, "हमने अल्लाह पर ही भरोसा किया है। ऐ हमारे रब! तू हमें ज़ालिम लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल (कि हम उस ज़ुल्म के मुक़ाबले में कोई कमज़ोरी दिखाएं) (10: 85)
"हमें अपनी रहमत [दयालुता] से उन लोगों से बचा ले, जो (तेरे संदेशों को) मानने से इंकार करते हैं।" (10: 86)

(परेशान हो कर मूसा ने) अपने रब को पुकारा, "ये बड़े शैतान लोग हैं!" (44: 22)

(अल्लाह ने जवाब दिया), "तुम रातों रात मेरे बन्दों को लेकर निकल भागो, निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा। (44: 23)
अपने पीछे समुद्र के बीच से बने रास्ते को (पार करके) वैसा ही छोड़ जाना, (वहीं) उस [फ़िरऔन] के पूरे दल-बल को डुबा दिया जाएगा‌।" (44: 24)

और हमने इसराईल की सन्तानों पर चली आ रही अपमानजनक यातना से छुटकारा दे दिया, (44: 30)
जो फ़िरऔन के हाथों हो रही थी : वह बड़ा ही ज़ालिम था जिसने मर्यादा की सभी हदें पार कर ली थीं। (44: 31)

और मूसा ने (दुआ में) कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को दुनिया की ज़िंदगी में बड़ी चमक-दमक की चीज़ें और धन-दौलत दिए हैं, तो ऐ रब! क्या यह इसीलिए है कि वे लोगों को तेरे मार्ग से भटकाएँ? ऐ हमारे रब! उनकी दौलत को मिटा दे, और उनके दिल को ऐसा कठोर कर दे कि वे उस समय तक विश्वास न करें जब तक कि दर्दनाक यातना को सामने देख न लें।" (10: 88)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों की दुआ क़बूल हो चुकी, अतः सही मार्ग पर डटे रहो, और उन लोगों के रास्ते पर न चलना, जो (सच्चाई को) नहीं जानते।" (10: 89)

हमने मूसा को ‘वही’ [Revelation] भेजी, "रातों रात मेरे बन्दों [इसराईल की संतान] को लेकर (मिस्र से) निकल पड़ो, और उनके लिए दरिया में सूखा मार्ग निकाल लो। और देखो, तुम्हें न तो (फ़िरऔन द्वारा) पीछा किए जाने व पकड़े जाने का डर हो, और न कोई चिंता व दुख तुम्हें सताए।" (20: 77)
फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः समंदर की लहरें उन पर इस तरह छा गयीं कि पूरी तरह से डुबा कर रख दिया।  (20: 78)

फ़िरऔन ने सचमुच अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; और उन्हें सही मार्ग न दिखाया।  (20: 79)

हमने मूसा को वही [revelation] भेज कर अपनी बात बतायी, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जाओ, अवश्य ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा!" (26: 52)
इस बीच फ़िरऔन ने शहरों में संदेशा देनेवालों को यह कहते हुए भेजा, (26: 53)
"यह (इसराईल की संतानें) कमज़ोर और थोड़े से लोगों की एक टोली है--- (26: 54)
उन लोगों ने हमें ताव दिलाया है--- (26: 55)
और हम एक बड़ी सेना हैं, हमेशा तैयार रहने वाली।" (26: 56)
अंत में, ऐसा हुआ कि उन (फिरऔन के लोगों) को --- अपने बाग़ों और पानी के सोतों को, (26: 57)
अपने ख़जानों, और रहने के बेहतरीन मकानों को--- छोड़कर निकलना पड़ा। (26: 58)
हम ने ऐसी चीज़ें (बाद में) इसराईल की सन्तानों को दे दी। (26: 59)
सुबह-तड़के ही फ़िरऔन और उसके लोगों ने उनका पीछा किया, (26: 60)
फिर जैसे ही दोनों तरफ़ के लोग (नज़दीक पहुंचे) और एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, तो मूसा के माननेवालों ने कहा, "अब हम ज़रूर पकड़े जाएंगे!" (26: 61)
मूसा ने कहा, "नहीं, मेरा रब मेरे साथ है: वह अवश्य रास्ता दिखाएगा", (26: 62)
और हमने मूसा को 'वही' भेजी, "अपनी लाठी समंदर पर मारो।" समंदर दो हिस्सों में फट गया ----- हर एक हिस्सा ऊँचे पहाड़ की तरह खड़ा हो गया (और रास्ता बन गया) ---- (26: 63)
और हम दूसरों [फ़िरऔन व उसके साथियों] को भी उसी जगह ले आए : (26: 64)
और हमने मूसा को और उनके सभी साथियों को बचा लिया, (26: 65)
और बाक़ी बचे (फ़िरऔन के) लोगों को डुबा दिया। (26: 66)
सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है, मगर अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (26: 67)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे ताक़तवाला, सब पर दयावान है।  (26: 68)

हमने इसराईल की संतानों को (सुरक्षित) समंदर पार करा दिया। फ़िरऔन और उसकी सेना  ने घमंड और आक्रामकता के साथ उनका पीछा किया। मगर जब वह समंदर में डूबने लगा तो उस वक़्त पुकार उठा, "मुझे विश्वास हो गया है कि उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान रखती है। मैं भी (अब) उसकी आज्ञा मानते हुए झुकता हूँ।" (10: 90)

(हम ने जवाब दिया), "अब ईमान लाओगे? तुम तो हमेशा से विद्रोही रहे हो, एक फ़साद मचाने वाले! (10: 91)

"आज हम (केवल) तेरे शरीर को (डूबने से) बचा लेगें, ताकि तू बाद में आने वालों के लिए एक निशानी बन कर रह जाए। हालाँकि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो हमारी निशानियों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं देते।" (10: 92)

क़यामत के दिन वह [फ़िरऔन] अपनी क़ौम के लोगों में आगे आगे होगा, वह उन्हें रास्ता दिखाते हुए आग में ला उतारेगा, और क्या ही बुरा घाट है वह उतरने का! (11: 98)

और फ़िरऔन के लोगों को भयानक यातना ने आ घेरा; (40: 45)
उन्हें सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; और जिस दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!" (40: 46)
वे आग के भीतर एक-दूसरे से झगड़ रहे होंगे : तो कमज़ोर लोग उन (घमंडी) लोगों से, जो बड़े बनते थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलनेवाले थे, तो क्या अब तुम हमपर से आग का कुछ भाग हटा सकते हो?" (40: 47)
मगर वे लोग (जो बड़े बनते थे) कहेंगे, "हम सब ही इसी (आग) में पड़े हैं। निश्चय ही अल्लाह बंदों के बीच फ़ैसला कर चुका है।" (40: 48)
यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह, जो किसी को दिया जाए! (11: 99)

फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा-----  (28: 39)
अन्त में हमने उसे औऱ उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया. अब देख लो कि ग़लत काम करनेवालों का क्या नतीजा हुआ! (28: 40)
और हमने उन्हें (दूसरों को जहन्नम की) आग की ओर बुलानेवालों का नेता बना दिया : क़यामत के दिन उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी।  (28: 41)
और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत [श्राप] लगा दी और क़यामत के दिन वे घृणित लोगों में शामिल होंगे। (28: 42)
और ईमान रखनेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन [Pharaoh] की बीवी की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्मों से छुटकारा दे दे, और मुझे शैतानियाँ करने वालों से बचा ले।" (66: 11)

और इस तरह, चूँकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, और उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, तो फिर हमने उनसे बदला लिया : हम ने उन्हें समंदर में डुबा दिया,  (7: 136

और जिन (इसराइली) लोगों पर (बरसों से) ज़ुल्म हुआ था, हमने उन्हें उस भू-भाग के पूरब और पश्चिम के हिस्सों [सीरिया व फ़िलिस्तीन] का वारिस बना दिया, जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी। (इस तरह) तुम्हारे रब ने इसराईल की सन्तान के साथ जो भलाई का वादा कर रखा था, वह पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धीरज [सब्र] से काम लिया, और हम ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ तहस-नहस कर दिया, जिसे वे (ख़ूबसूरती से) बनाते थे और जिन (ऊँचे भवनों) का निर्माण किया करते थे। (7: 137)

मूसा ने कहा, "तुम अच्छी तरह से जानते हो कि स्पष्ट सबूत के तौर पर ऐसी निशानियाँ तो केवल आसमानों और ज़मीन का रब ही भेज सकता है। और ऐ फ़िरऔन! मुझे लगता है कि तुम्हारी बर्बादी बस आने ही वाली है।" (17: 102)

अत: फ़िरऔन यह चाहता था कि उन (इसराईल की संतानों) को उस ज़मीन से उखाड़ फेंके, मगर हमने उसे और जो उसके साथ थे, सभी को (समंदर में) डुबा दिया,  (17: 103)

फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः समंदर की लहरें उन पर इस तरह छा गयीं कि पूरी तरह से डुबा कर रख दिया।  (20: 78)
अन्त में हमने उसे औऱ उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया. अब देख लो कि ग़लत काम करनेवालों का क्या नतीजा हुआ! (28: 40)
और (याद करें) क़ारून [Korah] और फ़िरऔन [Pharaoh] और हामान को : मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, किन्तु उन्होंने धरती पर बड़े घमंड से काम लिया। मगर वे हमसे बच कर नहीं निकल सकते थे। (29: 39)

और अन्ततः हमने हर एक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया : उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर बरसानेवाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया। अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते थे। (29: 40)

अन्ततः जब उन्होंने (मूसा की बात न मानकर) हमें अप्रसन्न कर दिया, तो हमने उन्हें सज़ा दी और उन सबको दरिया में डूबो दिया : (43: 55)

इस तरह, हमने उन्हें एक गुज़री हुई चीज़ बना डाला और आगे आनेवाली पीढियों के लिए एक उदाहरण [Example] बना दिया।  (43: 56)

नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने उसे दोहरी सज़ा में पकड़ लिया, आनेवाली ज़िन्दगी में भी और इस ज़िंदगी में भी :   (79: 25)  
सचमुच इस (घटना) में हर उस आदमी के लिए बड़ी शिक्षा है जो अल्लाह का डर रखता हो। (79: 26)

और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरों वाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देने वाला) था?  (10)
यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,  (89: 11)
और उनमें बड़े फसाद मचा रखे थे :  (89: 12)
तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया.  (89: 13)

बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है।  (89: 14)


मूसा अलै. और इसराईल की सन्तान 

मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो सच्चाई का रास्ता दिखाते थे, और उसी के मुताबिक़ इंसाफ़ के साथ काम करते थे। (7: 159)

हमने उन्हें बारह क़बीलों में, अलग-अलग समुदाय के रूप में बाँट दिया था, और, जब मूसा के लोगों ने उससे पीने का पानी माँगा, तो हमने मूसा को 'वही' [Revelation] द्वारा बता दिया कि अपनी लाठी से (एक ख़ास) चट्टान पर मारो, ताकि उससे पानी के बारह सोते फूट निकले। हर गिरोह को अपने पीने के घाट मालूम थे; हमने उनपर बादलों से छाया कर दी थी, और उनके (खाने के) लिए 'मन्न' और 'सलवा' [बटेर] उतारा था, [और कहा,] "हमनें तुम्हें जो चीज़े दे रखी हैं, उनमें से अच्छी चीज़ें खाओ।" उन्होंने (हुक्म न मान कर) हमारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे। (7: 160)

(जब तुम सीना [Sinai] के रेगिस्तान में धूप की गर्मी और भूख से बेहाल थे तब) हमने बादलों के ढेर से तुम्हें छाया दी, और तुम पर 'मन्न' और 'सलवा' [Quails] उतारा, और कहा था, "जी भर के खाओ उन अच्छी चीज़ों को, जो हमने तुम्हें दे रखी हैं।" (शुक्र न अदा करके) हमारा तो वे कुछ भी बिगाड़ न सके; उन्होंने अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया।  (2: 57)

(उस घटना को भी) याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों के लिए पानी की प्रार्थना को तो हमने उससे कहा था, "पहाड़ की चट्टान पर अपनी लाठी मारो," नतीजे में उससे पानी के बारह सोते फूट निकले, और हर गिरोह ने अपना-अपना पानी लेने का घाट पता कर लिया। [तुम से कहा गया], जो रोज़ी अल्लाह ने दे रखी है, उसे खाओ और पियो, और ज़मीन पर झगड़ा-फ़साद पैदा न करते फिरो।" (2: 60)

याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम एक ही तरह के खाने पर संतोष नहीं कर सकते, अतः अपने रब से दुआ करो कि हमारे लिए ज़मीन से उगनेवाली कुछ चीज़ें पैदा कर दे, इसकी साग-सब्ज़ियाँ और ककड़ियाँ, लहसुन, दालें और प्याज़।" मूसा ने कहा, "क्या तुम (खाने की) बढ़िया चीज़ को घटिया चीज़ों से बदलना चाहते हो? (अब फिर से) तुम मिस्र चले जाओ,  जो कुछ तुमने माँगा है, तुम्हें वहाँ मिल जाएगा।" उन (यहूदियों) पर अपमान और बदहाली की मार पड़ी, और उन्हें अल्लाह का प्रकोप झेलना पड़ा क्योंकि वे अल्लाह की आयतों [संदेशों] को मानने से लगातार इंकार करते रहे और हर सच्चाई का विरोध करते हुए नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह सब इसलिए हुआ कि उन्होंने आज्ञा मानने से इंकार किया और वे नियमों को तोड़ने में बेलगाम हो गए थे।  (2: 61)

और इसराईल की सन्तान को हम (सुरक्षित) समंदर पार करा लाए, फिर जब वे ऐसे लोगों को पास से गुज़रे जो मूर्तियों की पूजा करते थे, तो वे बोले, "ऐ मूसा! उन लोगों के देवताओं जैसा हमारे लिए भी एक देवता बना दो।" मूसा ने कहा, "तुम सचमुच बड़े ही बेवक़ूफ़ [व जाहिल] लोग हो : (7: 138)

ये लोग जिन (देवताओं) की पूजा में लगे हुए हैं, वह तो बर्बाद होकर रहेगा, और जो कुछ ये करते आ रहे हैं, वह व्यर्थ व किसी काम का नहीं है। (7: 139)

मैं तुम्हारे लिए अल्लाह को छोड़कर किसी और देवता को क्यों ढूढूँ, जबकि उसने दूसरे तमाम लोगों पर तुम्हें श्रेष्ठता दी है?" (7: 140)

और (वह घटना भी) याद करो जब हमने मूसा [Moses] से (सीना के पहाड़ पर) चालीस रातों का वादा ठहराया था, और फिर जब वह तुम से दूर गया हुआ था, तो उसके जाते ही तुम एक बछड़े की पूजा करने लग गए ---- जो बड़ा भारी गुनाह था।  (2: 51)

हमने मूसा के लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया : उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई। मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून से कहा था, "मेरी (अनुपस्थिति में) तुम मेरी क़ौम के लोगों को संभाल लेना : हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उन लोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद फैलाते हैं।" (7: 142)

जब मूसा तय किए हुए समय पर (सीना के पहाड़ पर) पहुँचा, और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मैं तुझे देखना चाहता हूँ : मुझे देख लेने दे!" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे कभी नहीं देख सकोगे, मगर उस पहाड़ [तूर] को ध्यान से देखो : अगर वह पहाड़ अपनी जगह मज़बूती से खड़ा रह गया, तो फिर तुम मुझे देख लोगे", और जब उसके रब ने अपने आपको उस पहाड़ पर प्रकट किया, तो उसे चकनाचूर कर दिया : मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया, तो कहा, "महिमावान है तू! मैं (गुनाहों की) तौबा के लिए तेरी ही ओर झुकता हूँ! और इस बात पर (कि दुनिया में अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है) मै सबसे पहले विश्वास करता हूँ!" (7: 143)

और बहुत से दूसरे रसूल हैं जिनके बारे में हम तुम्हें (क़ुरआन में) पहले बता चुके हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जिनके बारे में हम ने तुम्हें नहीं बताया है। (इसी तरह) मूसा [Moses] के साथ अल्लाह की सीधी बातचीत होती थी।  (4: 164)

अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा! मैंने तुम्हें अपने संदेश [तोरात/Torah] दे कर, और तुम से सीधे बात कर के (तुम्हें चुन लिया है, और) तुम्हारा दर्जा दूसरे लोगों के मुक़ाबले में ऊँचा कर दिया है : जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है, उसे सँभाल कर रखो; और शुक्र अदा करनेवालों में से हो जाओ।" (7: 144)

हमने उनके लिए तख़्तियों [Tablets] पर (उपदेश की) हर चीज़ लिख दी थी, जो हर चीज़ को सिखाती और विस्तार से समझाती भी थी, और कहा, "उनको मज़बूती से थामे रहो, और अपने लोगों को आज्ञा दो कि वे उनकी बेहतरीन शिक्षाओं को अपनाएँ। मैं तुम्हें ऐसे लोगों का (आख़िरत में) अंत दिखा दूँगा, जो लोग आज्ञा नहीं मानते और उसके ख़िलाफ़ काम करते हैं। (7: 145)

याद करो जब हमने तुम से (इस हाल में) प्रतिज्ञा ली थी, (कि तुम उस वक़्त नीचे खड़े थे) और तूर पहाड़ की चोटी तुम्हारे ऊपर उठा दी गयी थी, और कहा था, "जो चीज़ [किताब] तुम्हें दी गयी है उस पर मजबूती के साथ जमे रहो,  और उसमें बतायी गयी बातों को याद रखो, ताकि तुम (गुनाहों से) बच सको।" (2: 63)

(फिर देखो!), मूसा [Moses] तुम्हारे पास सच्चाई की स्पष्ट निशानियाँ लेकर आया था,  मगर उसके बाद, जबकि वह (चालीस दिन के लिए) तुम से दूर गया हुआ था, तुम ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी ---- ऐसा करते हुए सचमुच तुम ने बड़ा ज़ुल्म किया।"  (2: 92)

याद करो जब पहाड़ की चोटियों को तुम्हारे ऊपर उठाकर, हमने तुम से प्रतिज्ञा ली थी, और कहा था, "जो किताब तुम को दी गयी है, उस पर मज़बूती से जमे रहो, और (जो कुछ हम कहते हैं उसे) ध्यान से सुनो." वे बोले, " हम ने सुना, और हम (दिल से हुक्म) नहीं मानते!" और उनके द्वारा विश्वास करने से इंकार के कारण उनके दिलों में बछड़े की पूजा रच-बस गयी. आप उनसे कह दें, "अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो तुम्हारा ईमान तुम्हें कैसी शैतानी चीज़ें करने का हुक्म देता है!"  (2: 93) 

जब हमने पहाड़ को ऊँचा उठा कर परछाईं की तरह उन लोगों के ऊपर कर दिया, और उन्हें लगने लगा कि वह उनके दम पर गिरनेवाला है, तो हम ने कहा, "जो कुछ हम ने तुम्हें दे रखा है, उसे मज़बूती से थामे रहो, और याद रखो जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, ताकि तुम बुराइयों से बचते रहो।" (7: 171)

याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम तुम पर तब तक विश्वास नहीं करेंगे जब तक अल्लाह को अपने सामने न देख लें।" इस बात पर, बिजली की एक कड़क ने तुम्हें आ पकड़ा था जबकि तुम देखते रह गए थे।  (2: 55)

फिर तुम्हारे मुर्दा हो जाने के बाद हमने तुम्हें फिर से ज़िंदा किया, ताकि तुम मेरे प्रति शुक्र अदा करनेवाले बन सको। (2: 56)

मूसा ने अपने लोगों में से सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय (पर तूर पहाड़ जाने) के लिए चुना, फिर जब उन लोगों को एक थरथराहट ने आ पकड़ा, तो उसने दुआ की, "मेरे रब! अगर तू ने यही करने के लिए इन्हें चुना था, तो तू बहुत पहले ही इनको, और मुझ को, भी मिटा चुका होता। तो क्या अब तू हमें इसलिए बर्बाद कर देगा कि हम में से कुछ बेवक़ूफ़ आदमियों ने ऐसा किया था? यह तो तेरी ओर से एक परीक्षा मात्र है---- इसके द्वारा तू जिसको चाहे भटकता छोड़ दे और जिसे चाहे सही रास्ता दिखा दे----- और तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, सो हमें माफ़ कर दे और हम पर दया कर, और तू ही माफ़ करनेवालों में सबसे बेहतर है। (7: 155)

"[या ख़ुदा!] हमारे लिए इस संसार में भी अच्छाई लिख दे, और आने वाली दुनिया में भी। हम सच्चे दिल से तेरी ही तरफ़ लौटते हैं।" अल्लाह ने कहा, "मैं जिस किसी पर चाहता हूं, अपनी यातना ले आता हूं, लेकिन मेरी दयालुता व रहमत का हाल यह है कि उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।
“मैं अपनी रहमत उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैं, और उचित ज़कात देते है; और जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं; (7: 156)

[मूसा अपनी क़ौम को हारून की निगरानी में छोड़ कर तूर पहाड़ पर ध्यान लगाने आए थे, तब अल्लाह ने कहा], "ऐ मूसा! अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर तुझे इतनी जल्दी यहाँ आने पर किस चीज़ ने उभारा?" (20: 83)

उसने कहा, "वे मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, ऐ रब! मैं तेरे पास लपक कर आ गया, ताकि तू ख़ुश हो जाए।" (20: 84

लेकिन अल्लाह ने कहा, "तेरी अनुपस्थिति में हमने तेरी क़ौम के लोगों की परीक्षा ली : सामरी ने उन्हें बहका दिया है।" (20: 85)

और जबकि मूसा वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी क़ौम के लोगों ने एक बछड़े के आकार की चीज़ की पूजा करना शुरू कर दिया जिसमें से गाय की सी आवाज़ निकलती थी-----यह बछड़ा उनके ज़ेवरों (को गलाने) से बनाया गया था। क्या वे इतना भी नहीं देख पाए कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई रास्ता ही दिखाता है? तब भी वे उसकी पूजा करने लगे : वे शैतानी करनेवाले लोग थे। (7: 148)

फिर जब ऐसा हुआ कि वे (शर्म से) हाथ मलने लगे, और उन्हें अपने किए पर पछ्तावा हुआ और उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि वे ग़लत काम कर रहे थे, तो कहने लगे, "अगर हमारे रब ने हम पर दया न की और उसने हमें माफ़ न किया, तो हम बर्बाद हो जाएँगे!" (7: 149)

जब मूसा ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू पा लिया था! और क़रीब क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (7: 150)

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले : तू तो दया करनेवालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (7: 151

जिन लोगों ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी, उनपर उनके रब का क़हर टूटेगा, और इस जीवन में वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे." उन लोगों को हम ऐसा ही बदला देते हैं जो ऐसा झूठ गढ़ते रहते हैं, (7: 152)

जब मूसा का ग़ुस्सा ठंढा हुआ, तो उसने तख़्तियों को उठाया, जिसमें लोगों के मार्गदर्शन की बातें लिखी हुई थीं, और यह उन लोगों के लिए रहमत थीं जो अपने रब का डर रखते हैं। (7: 154)

तब मूसा बेहद ग़ुस्सा और दुखी मन से अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस गया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे रब ने तुम से अच्छा वादा नहीं किया था? क्या इस बात को हुए बहुत लम्बा समय गुज़र गया था या तुम यही चाहते ही थे कि तुम पर तुम्हारे रब का प्रकोप टूट पड़े? इसीलिए तुमने मुझ से किए हुए वादे को तोड़ डाला?" (20: 86)

उन लोगों ने कहा, "हमने आपसे किए हुए वादे को जान-बूझ कर नहीं तोड़ा, बल्कि असल में (मिस्र से निकलते समय) लोगों के पास भारी भारी ज़ेवर थे जिसके बोझ तले हम दबे हुए थे, (और फिर सफ़र की मुसीबतों से बचने व ईमान की सफ़ाई के लिए ज़ेवरों को फेंक देना तय हुआ), अत: हमने उनको फेंक दिया था, और सामरी ने (उन्हें जमा कर के आग में) डाल दिया था।" (20: 87)

फिर सामरी ने उस (पिघले हुए ज़ेवरों) से एक बछड़े की मूर्ति बना दी, जिसमें से गाय के पुकारने जैसी आवाज़ आती थी, और लोग देखकर कहने लगे, "यही तुम्हारा ख़ुदा है और मूसा का भी ख़ुदा यही है, मगर वह [मूसा] भूल गए हैं।" (20: 88)

क्या उन्होंने नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को कोई नुक़सान पहुँचाने की ताक़त थी और न फ़ायदा? (20: 89)

हारून ने हालाँकि उन्हें बता दिया था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बछड़ा तुम लोगों के लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल रब तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (20: 90)
मगर उन्होंने जवाब दिया, "जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (20: 91)

मूसा ने कहा, "ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो चुके हैं, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोके रखा था,  (20: 92)
मेरे पीछे पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (20: 93)
हारून ने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर न नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तू ने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (20: 94)
(मूसा ने) कहा, "और ऐ सामरी! तेरा क्या मामला था?" (20: 95
उसने जवाब दिया, "मैंने कुछ ऐसा देखा था, जो इन लोगों ने नहीं देखा; मैंने रसूल की कुछ शिक्षाएं तो ली थीं, मगर फिर उन्हें (अपने मन से) निकाल कर एक तरफ़ डाल दिया : मेरे जी ने ही मुझे ऐसा करने के लिए उकसाया था।" (20: 96)
मूसा ने कहा, "चला जा यहाँ से! अब इस जीवन में तेरे लिए यही है कि तू कहता रहे, “मत छूओ मुझे!” मगर हाँ, तेरे लिए (अल्लाह के सामने हाज़िर होने का) एक निश्चित समय तय किया हुआ है, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। देख अपने इस प्रभु को जिसकी भक्ति में तू जमा बैठा था----  हम इसे चूर चूर करके दरिया में बिखेर देंगे।" (20: 97
“[लोगो] तुम्हारा असल ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है, जिसके अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं----- उसके ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है।" (20: 98)
मूसा (जब चालीस रातों के बाद अल्लाह से किताब लेकर आया, तो उसने लोगों को बछड़े की पूजा करते हुए देखा), उसने कहा, "ऐ मेरी कौम के लोगो! तुम ने बछड़े की पूजा कर के अपने आपको बड़े गुनाह में डाल लिया है, अतः अपने बनानेवाले से (अपने गुनाह की) तौबा करो, और अपने लोगों (में दोषियों) को क़त्ल करो। तुम्हारे पैदा करनेवाले की नज़र में तुम्हारे लिए यही सबसे उचित होगा।” इस तरह अल्लाह ने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली : वह (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है।"  (2: 54)   
मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "ऐ लोगो! तुम पर की गयी अल्लाह की नेमतों को याद करो : कैसे उसने तुम्हारे बीच से नबियों [Prophets] को खड़ा किया और तुम्हें बादशाह बनाया और (उस ज़माने में) तुम को कुछ ऐसी चीज़ें दीं, जो किसी और क़ौम के लोगों को नहीं मिली थीं। (5: 20)
"ऐ मेरे लोगो! इस पवित्र सरज़मीन [सीरिया व फ़िलिस्तीन क्षेत्र] में (हिम्मत कर के) दाख़िल हो जाओ, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए पहले से तय कर रखा है------  (देखो!) उल्टे पाँव न लौट आओ, वर्ना नुक़सान उठानेवालों में हो जाओगे।" (5: 21
लोगों ने (जवाब में) कहा, "ऐ मूसा! इस सरज़मीन पर तो बड़े ताक़तवर (और डरावने) लोग रहते हैं। जब तक वे लोग वहाँ से चले नहीं जाते, हम तो वहाँ क़दम रखनेवाले नहीं. हाँ, अगर वे वहाँ से निकल जाएँ, तो हम ज़रूर दाख़िल हो जाएँगे।" (5: 22)
तब भी, उन डरनेवाले लोगों में से दो आदमियों ने जिन्हें अल्लाह ने (ईमान की) नेमत दी थी, बोल उठे, "तुम हिम्मत करके उन पर चढ़ाई कर दो और (शहर के) दरवाज़े से जा घुसो और एक बार तुम अंदर घुस गए, तो जीत तुम्हारी ही होगी। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो अल्लाह पर भरोसा रखो।" (5: 23)
उन लोगों ने कहा, "ऐ मूसा! जब तक वे लोग वहाँ हैं, हम तो वहाँ कभी दाख़िल नहीं होंगे। अगर लड़ना ही है तो तुम और तुम्हारा रब, दोनों वहाँ जाकर उनसे लड़ते रहना, हम तो यहीं बैठे रहेंगे।" (5: 24
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे अपने और अपने भाई के अलावा किसी और पर कोई अधिकार नहीं है : हम दोनों और इन आज्ञा न माननेवालों के बीच अब तू ही फ़ैसला कर।" (5: 25
अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तो अब उनके लिए चालीस साल तक इस ज़मीन पर जाने से रोक लगा दी गयी है : (इस दौरान) ये धरती पर मारे-मारे फिरेंगे, सो (ऐ मूसा!) जो लोग आज्ञा नहीं मानते, उनकी हालत पर शोक न करो" (5: 26)

याद करो जब इसराईल की सन्तान से हमने वचन लिया था :"अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो; माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ, अनाथों और ग़रीबों के साथ अच्छा व्यवहार करो; सभी लोगों से भली बात कहो; पाबंदी से नमाज़ क़ायम करो और निर्धारित ज़कात [alms] दो।" तो फिर तुम में से थोड़े लोगों को छोड़ कर सब ने मुंह फेर लिया, और इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।  (2: 83)
याद करो जब हम ने तुमसे यह भी वचन लिया था, "एक-दूसरे का ख़ून न बहाओ, और न अपने लोगों को अपनी सरज़मीन से बाहर निकालो।" तुम ने उस समय (इन वचनों को) स्वीकार किया था, और तुम स्वयं इसकी गवाही दे सकते हो।  (2: 84)
अल्लाह ने इसराईल की सन्तान से वचन लिया था. हम ने (उनके बारह क़बीले के लिए) उनके बीच से बारह सरदार खड़ा किए, और अल्लाह ने कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ : अगर तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ो, निर्धारित ज़कात दो, मेरे रसूलों पर विश्वास करो और उनका साथ दो, और (मेरे रास्ते में ख़र्च कर बाद में कई गुना ज़्यादा पाने के लिए) अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो मैं तुम्हारे गुनाहों को मिटा दूँगा, और तुम्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, तुम में से कोई भी अगर अब भी इस (वचन) को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ेगा।" (5: 12)
हमने इसराईल की सन्तान से दृढ़ वचन लिया, और उनकी तरफ़ रसूल भेजे। जब कभी उनके पास कोई रसूल ऐसा संदेश ले कर आया जो उन्हें पसन्द न आया, तो उनमें से कुछ पर तो उन्होंने झूठ बोलने का इल्ज़ाम लगा दिया और कुछ दूसरों को जान से मार डाला;  (5: 70)
याद करो जब मूसा ने अपने लोगों से कहा था, "अल्लाह का आदेश है कि तुम एक गाय को ज़बह करो।" वे (तरह-तरह के बहाने बनाने लगे, और) कहने लगे, "क्या तुम हमारी हँसी उड़ा रहे हो?" मूसा ने जवाब दिया, "अल्लाह बचाए मुझे, कि मैं जाहिलों की सी बात करुं।" (2: 67)
वे बोले, "हमारे लिए ज़रा अपने रब से पूछ कर बताओ कि वह गाय किस तरह की होनी चाहिए?" उसने जवाब दिया, “अल्लाह कहता है कि वह गाय न तो बूढ़ी होनी चाहिए और न ही बछिया, बल्कि दोनों के बीच की हो, सो जैसा तुम्हें हुक्म दिया जाता है, उसे कर डालो।" (2: 68)
वे कहने लगे, "हमारे लिए अपने रब से पूछ कर बताओ कि उसका रंग कैसा होना चाहिए?" मूसा ने कहा, “अल्लाह कहता है कि वह गाय सुनहरी पीले रंग की होनी चाहिए, कि देखनेवालों को भली लगे।" (2: 69)
वे बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि असल में वह कौन-सी है : हमारी नज़र में सभी गाय लगभग एक जैसी ही है। अगर अल्लाह की मर्ज़ी रही, तो हम ज़रूर उस तक पहुंचने का रास्ता पा लेंगे।"(2: 70)
मूसा ने जवाब दिया, "वह एक बेहतरीन गाय है जिसमें कोई दाग़-धब्बा नहीं है, वह सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, या खेतों को पानी देती हो।" वे बोले, "अब तुमने असली बात बताई है," और इस तरह उन्होंने उसे ज़बह किया, हालांकि वे ऐसा करने में लगभग असफल हो चुके थे।  (2: 71)
फिर जब [ऐ इसराइलियो!] तुमने किसी की हत्या कर दी थी और एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाना शुरू कर दिया था ------ हालांकि जो कुछ तुम ने छिपाया था, अल्लाह उसे उजागर कर देनेवाला था ------ (2: 72)
हमने कहा, "(मरनेवाले के) शरीर पर उस (गाय) के एक हिस्से से मारो”: इस तरह अल्लाह मुर्दे को ज़िंदा करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझ सको। (2: 73)

क़ारून का क़िस्सा
क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था.  हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतरा मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नही करता।  (28: 76)
और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ न करो. दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है. और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करनेवालों को पसन्द नहीं करता", (28: 77)
लेकिन उसने जवाब दिया, " मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)।  (28: 78)
फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं : सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (28: 79)
मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं : मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (28: 80)
अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया : उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका।  (28: 81)
अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है : अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करनेवाले कभी कामयाब नहीं होंगे।"(28: 82)
यह वो आख़िरत [परलोक, Hereafter] का घर है जिसे हम उनलोगों को देना मंज़ूर करेंगे, जो ज़मीन पर अपनी बड़ाई नहीं चाहते, और न ही गड़बड़ी [corruption] फैलाते हैं : अच्छा अंत तो उन्हें ही मिलेगा, जो अपने दिल में अल्लाह का डर रखता हो और बुराइयों से बचता हो।  (28: 83)
और (याद करें) क़ारून [Korah] और फ़िरऔन [Pharaoh] और हामान को : मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, किन्तु उन्होंने धरती पर बड़े घमंड से काम लिया। मगर वे हमसे बच कर नहीं निकल सकते थे। (29: 39)

और अन्ततः हमने हर एक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया : उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर बरसानेवाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया। अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते थे। (29: 40)

मूसा और ख़िज़्र (अलै). का क़िस्सा

(उस समय की घटना सुनिए कि) जब मूसा ने अपने (जवान) सेवक से कहा था, "मैं अपनी यात्रा तब तक नहीं रोकूँगा, जब तक कि मैं उस जगह न पहुँच जाऊँ जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, चाहे मुझे वहाँ पहुँचने में बरसों लग जाए!”  (18: 60)
मगर जब वे दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ दो समंदर मिलते थे, तो उस मछ्ली का उन्हें ध्यान न रहा (जो उन्होंने रख ली थी), और वह (मछली) समंदर में सुरंग जैसा रास्ता बनाती हुई भाग निकली। (18: 61)
जब वे आगे बढ़े तो (एक जगह) मूसा ने अपने सेवक से कहा,  "लाओ! खाना खा लें! हमारी यह यात्रा बड़ी थका देनेवाली है",  (18: 62)
और उस (सेवक) ने कहा, "याद है आपको, जब हम (समंदर के किनारे) उस चट्टान के पास आराम कर रहे थे? मैं तो आपको मछली के बारे में बताना ही भूल गया--- उसने अजीब तरीक़े से समंदर में अपना रास्ता बना लिया था--- और यह शैतान ही काम है कि मैं इसके बारे में आपको बताना भूल गया।" (18: 63)
(मूसा ने) कहा,  "कितनी अजीब बात है! तब तो हो न हो, यह वही जगह थी  जिसे हम तलाश कर रहे थे।" अत: दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए वापस (उसी जगह को) चल दिए, (18: 64)
(जब उस चट्टान के पास पहुँचे तो) वहाँ उनको हमारे ख़ास बंदों में से एक बंदा  [ख़िज़्र अलै.] मिला ----  एक ऐसा आदमी जिस पर हम ने अपनी विशेष दया की थी और उसे अपने पास से एक विशेष ज्ञान दिया था। (18: 65)
मूसा ने उनसे कहा, "क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ ताकि आपको जो कुछ ज्ञान दिया गया है, उसमें से सही मार्गदर्शन की कुछ बातें मैं भी सीख सकूँ?" (18: 66)
उस आदमी ने कहा, "हाँ, मगर तुम मेरे साथ रह कर धीरज नहीं रख पाओगे, (18: 67)
जो चीज़ तुम्हारी जानकारी की सीमा से बाहर हो, उस पर तुम धीरज रख भी कैसे सकते हो?" (18: 68)
(मूसा ने) कहा, "अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वाला पाएँगे। मैं आपके किसी भी आदेश को नहीं तोड़ूंगा।" (18: 69)
उन्होंने कहा, "अच्छा, अगर तुम मेरे साथ चलोगे तो मैं चाहे कुछ भी करूं, तुम मुझसे कोई भी सवाल मत पूछना, जब तक कि  मैं ख़ुद ही तुम्हें वह बात बता न दूं।" (18: 70)

इस तरह, वे दोनों चल पड़े, फिर  जब वे नौका में सवार हुए तो उस आदमी ने नौका में एक जगह छेद कर दिया, (यह देखते ही) मूसा ने कहा, "आप ऐसा कैसे  कर सकते हैं कि (आप ने) इस नौका में छेद  कर दिया? क्या आप इसमें बैठे हुए मुसाफिरो़ को डुबा देना चाहते हैं? आपने तो एक ख़तरनाक हरकत कर डाली!" (18: 71)
उन्होंने कहा, "क्या मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धीरज न रख सकोगे?" (18: 72)
मूसा ने कहा, "आप मुझे माफ़ कर दें, यह बात तो मैं भूल ही गया था। कृपया इस मामले को मेरे लिए इतना कठिन न बनाएं कि आपके साथ रहना मुश्किल हो जाए।" (18: 73)
और इस तरह वे दोनों फिर चल पड़े। फिर जब (एक बस्ती के पास पहुँचे तो) ऐसा हुआ कि उन्हें एक नौजवान लड़का मिला, तो उस आदमी ने उसे मार डाला, मूसा ने कहा, "आप एक बेगुनाह आदमी का क़त्ल कैसे कर सकते हैं? उसने तो किसी की हत्या नहीं की थी!, यह तो आपने बहुत ही बुरा किया!" (18: 74)
उन्होंने जवाब दिया, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम धीरज रखते हुए कभी भी मुझे सहन नहीं कर पाओगे?" (18: 75)
मूसा ने कहा, "अब इसके बाद, अगर मैं आपसे कुछ भी पूछूं, तो आप मुझे साथ न रखें---  पहले ही आप मुझे काफ़ी हद तक बर्दाश्त कर चुके हैं।" (18: 76)
फिर से वे दोनों आगे चल दिए। उसके बादजब वे एक बस्ती के पास पहुँचे, तो वहां के निवासियों से खाना  माँगा, किन्तु  उन लोगों ने खाना खिलाने से इंकार कर दिया, इसी बीच  वहाँ उन्हें एक (पुरानी) दीवार दिखाई दी जो बस गिरने ही वाली थी, तो उस आदमी ने उस (दीवार) की मरम्मत कर के उसे मज़बूत कर दिया। (मूसा ने) कहा, "लेकिन अगर आप चाहते तो इस काम के लिए कुछ मज़दूरी ले सकते थे।" (18: 77)
उसने कहा, "अब मेरे और तुम्हारे अलग होने का समय आ गया है। अब मैं तुमको उन चीजों के मतलब बता देता हूँ, जिन पर तुम धीरज न धर सके" : (18: 78)
वह जो नौका थी, कुछ ग़रीब लोगों की थी जिनकी रोज़ी-रोटी समंदर से ही होती थी और मैंने उनकी नौका इसलिए ख़राब कर दी क्योंकि मुझे मालूम था कि वे जिधर बढ रहे थे वहाँ एक राजा था जो हर एक (अच्छी) नौका को ज़बरदस्ती छीन लेता था। (18: 79)
और रहा वह जवान लड़का, तो उसके माँ-बाप तो ईमानवाले थेमगर यह आशंका थी कि वह अपनी शैतानी और ईमान न रखने के चलते उन्हें तकलीफ़ पहुँचाएगा, (18: 80)
इसलिए मैं ने चाहा कि उनका रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे---जिसका दिल अधिक साफ़ हो और जिसमें ज़्यादा दया का भाव हो। (18: 81)
और रही वह दीवार, तो वह उस बस्ती में रहने वाले दो अनाथ लड़कों की थी और उस दीवार के नीचे उनका ख़जाना गड़ा हुआ था, (दीवार गिरने से भेद खुल जाता, सो दीवार खड़ी कर दी)। उनका बाप एक सच्चा व अच्छा आदमी था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि जब वे अपनी जवानी को पहुँच जाएं, तो अपने रब की दया से अपना ख़जाना सुरक्षित निकाल लें। असल में, मैंने अपनी मर्ज़ी से ये सब  नहीं किया : यह है वास्तविकता उन चीजों की, जिन पर तुम धीरज न रख सके।" (18: 82)

मूसा (अलै.) का स्थान 

याद करो जब हमने मूसा [Moses] को किताब [तोरैत/Torah], और सही और ग़लत के बीच अंतर करने की कसौटी दी थी, ताकि तुम्हें सही रास्ता दिखाया जा सके।  (2: 53)

एक बार फिर, हमने मूसा को किताब [तौरात] दी, ताकि नेक कर्म करनेवालों पर हम अपनी नेमतें पूरी कर दें, और (किताब में) हर चीज़ को स्पष्ट‍ रूप से समझा दें, जो लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] हो, ताकि वे लोग (मरने के बाद) अपने रब से होनेवाली मुलाक़ात पर विश्वास कर सकें। (6: 154)

(इससे पहले) हमने मूसा [Moses] को भी किताब [तोरात,Torah] दी थी, और उसे इसराईल की सन्तानों के लिए रास्ता दिखाने का ज़रिया बनाया था (और कहा था) कि "तुम मेरे सिवा किसी और को अपना रखवाला न बना लेना, (17: 2)

और इस किताब [क़ुरआन] में मूसा [Moses] की कहानी भी बयान कर दें। निस्संदेह वह ख़ास चुना हुआ बंदा था, जो एक रसूल [Messenger] और नबी [Prophet] था : (19: 51)  

हमने उसे 'तूर' पहाड़ के दाहिनी ओर से पुकारा और (‘वही’ द्वारा) रहस्य की बातें करने के लिए उसे अपने से नज़दीक किया; (19: 52)

हम ने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को सही और ग़लत में फ़र्क़ बतानेवाली (एक किताब) दी थी, जो (मार्ग दिखाने के लिए) एक रौशनी थी, और परहेज़गार लोगों के लिए नसीहत देनेवाली [Reminder] थी, (21: 48)

(उन परहेज़गारों के लिए) जो अपने रब से बिना उसे देखे हुए, डरते रहते हैं,  और आनेवाली (क़यामत की) घड़ी के भय  से सहमे रहते हैं .(21: 49)
पिछली नस्लों को बर्बाद कर देने के बाद हमने मूसा को एक किताब [तोरैत/ Torah] दी थी, जिसमें लोगों के लिए समझदारी की बातें, मार्गदर्शन और दयालुता [रहमत/Mercy] थी, ताकि वे उस पर ध्यान दें और इससे नसीहत ले सकें।  (28: 43)
हमने मूसा को (आसमानी) किताब [तोरैत/Torah] दी थी --- अतः [ऐ मुहम्मद] आपको इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि आपको भी (आसमानी) किताब दी जा रही है---- और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को सही रास्ता दिखानेवाली बनाया था।  (32: 23)

मूसा को हमने (किताब द्वारा) मार्ग दिखाया, और उस किताब को इसराईल की सन्तान तक पहुँचाकर उन्हें उस (किताब) का वारिस बनाया, (40: 53)
जो बुद्धि और समझवालों के लिए रास्ता दिखानेवाली और नसीहत [Reminder] की चीज़ थी. (40: 54)
हमने मूसा [Moses] को भी किताब दी थी, पर उसमें भी झगड़े निकाले गए--- अगर पहले ही उस (फ़ैसले के समय) पर तुम्हारे रब की ओर से फ़रमान जारी न हो गया होता, तो उनके बीच अब तक फ़ैसला हो चुका होता —--- और हक़ीक़त यह है कि वे अभी तक उस (क़ुरआन) के बारे में ऐसे सन्देह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देनेवाला है।  (41: 45)

और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान किया : और हम अच्छा कर्म करनेवालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (28: 14)
(फिर देखो!), मूसा [Moses] तुम्हारे पास सच्चाई की स्पष्ट निशानियाँ लेकर आया था,  मगर उसके बाद, जबकि वह (चालीस दिन के लिए) तुम से दूर गया हुआ था, तुम ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी ---- ऐसा करते हुए सचमुच तुम ने बड़ा ज़ुल्म किया।"  (2: 92)
ऐ ईमानवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा [Moses] को अपमानित किया था---- अल्लाह ने उन लोगों द्वारा लगाए गए इल्ज़ाम से उन्हें  बरी कर दिया, और अल्लाह की नज़र में मूसा ऊंचे रुतबे वाले थे। (33: 69)
हमने मूसा और हारून [Moses & Aaron] पर भी ख़ास उपकार किया था:  (37: 114)
हमने उन्हें और उनकी क़ौम के लोगों को बड़ी घुटन व बेचैनी से छुटकारा दिया था,  (37: 115)
हमने उनकी मदद की, जिसके नतीजे में वे ही कामयाब रहे;  (37: 116)
हमने उनको ऐसी किताब [तोरात, Torah] दी थी जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट करनेवाली थी;   (37: 117)
और हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया;  (37: 118)
और ऐसी परम्परा बनाई कि बाद में आनेवाली पीढियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा,  (37: 119)
"सलाम हो मूसा और हारून पर!"(37: 120)
निस्संदेह जो अच्छा काम करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं :  (37: 121)
सचमुच ही वे दोनों हमारे आज्ञाकारी बंदों में से थे।  (37: 122)





हज़रत हारून (अलै.) 

(मूसा ने दुआ की), और मेरे काम को मेरे लिए आसान बना दे। (20: 26)  
 मेरी ज़बान की लड़खड़ाहट ठीक कर दे,  (20: 27
 ताकि मेरी बात लोगों की समझ में आ जाए, (20: 28)
और मेरे घरवालों में से मेरे लिए एक सहायक दे दे,  (20: 29
 हारून [Aaron] के रूप में, जो मेरा भाई है --- (20: 30)
  उसके द्वारा मेरी ताक़त बढ़ा दे।  (20: 31
 और उसे मेरे काम में हाथ बँटानेवाला बना दे, (20: 32)
 ताकि हम अधिक से अधिक तेरी बड़ाई का बखान कर सकें (20: 33)
 और अक्सर तेरी याद में लगे रहें :  (20: 34
 तू तो हमेशा ही हम पर नज़र रखनेवाला है।" (20: 35)
अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तूने माँगा है, मैंने मंज़ूर कर लिया। (20: 36)

और मैं दुखी हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (26: 13)

मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं : उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे मुझे झुठा कहेंगे।"(28: 34)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों की दुआ क़बूल हो चुकी, अतः सही मार्ग पर डटे रहो, और उन लोगों के रास्ते पर न चलना, जो (सच्चाई को) नहीं जानते।" (10: 89)

अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (28: 35)
हमने मूसा को किताब [तोरैत] दी थी और उनके भाई हारून को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था।  (25: 35)

हमने मूसा और उसके भाई को 'वही' द्वारा यह बताया : "अपने लोगों को मिस्र के कुछ घरों में बसाओ, और उन घरों को इबादत करने की जगह बना लो; (उनमें) नमाज़ पाबंदी से पढ़ने की व्यवस्था करो; और ईमान रखनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दो!" (10: 87)

हमने मूसा के लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया : उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई। मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून से कहा था, "मेरी (अनुपस्थिति में) तुम मेरी क़ौम के लोगों को संभाल लेना : हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उन लोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद फैलाते हैं।" (7: 142)

और हमने उसे [इबराहीम को] इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] दिए, उनमें से  हर एक को सीधा मार्ग दिखाया, जैसे इससे पहले हम ने नूह [Noah] को सीधा रास्ता दिखाया था, और उसके वंशजों में दाऊद [David],  सुलैमान [Solomon],  अय्यूब [Job],  यूसुफ़ [Joseph],  मूसा [Moses] और हारून [Aaron] थे------- इसी तरह अच्छा कर्म करनेवालों को हम बदले में इनाम दिया करते हैं----- (6: 84)
उनके नबी ने उनसे कहा, "उसकी बादशाही की निशानी यह है कि (बरसों पहले खोया हुआ) एक ताबूत [Ark of the Covenant] तुम्हारे पास आ जाएगा। उसके अंदर तुम्हारे रब की तरफ़ से (तोहफ़े में) लड़ाई की घबराहट दूर करनेवाला ‘सुकून’ [Tranquillity] और मूसा [Moses] व हारून [Aaron] के माननेवालों की छोड़ी हुई यादगारें होंगी, जिसको फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।"  (2: 248)

फिर उनके बाद हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके दरबारियों के पास भेजा, मगर वे बड़े घमंड से पेश आए---- वे शैतान लोग थे। (10: 75)

क्या उन्होंने नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को कोई नुक़सान पहुँचाने की ताक़त थी और न फ़ायदा? (20: 89)

हारून ने हालाँकि उन्हें बता दिया था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बछड़ा तुम लोगों के लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल रब तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (20: 90)

मगर उन्होंने जवाब दिया, "जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (20: 91)

मूसा ने कहा, "ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो चुके हैं, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोके रखा था,  (20: 92)
मेरे पीछे पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (20: 93)

हारून ने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर न नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तू ने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (20: 94)
जब मूसा ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू पा लिया था! और क़रीब क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (7: 150)

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले : तू तो दया करनेवालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (7: 151)

हमने मूसा और हारून [Moses & Aaron] पर भी ख़ास उपकार किया था:  (37: 114)
हमने उन्हें और उनकी क़ौम के लोगों को बड़ी घुटन व बेचैनी से छुटकारा दिया था,  (37: 115)
हमने उनकी मदद की, जिसके नतीजे में वे ही कामयाब रहे;  (37: 116)
हमने उनको ऐसी किताब [तोरात, Torah] दी थी जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट करनेवाली थी;   (37: 117)
और हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया;  (37: 118)
और ऐसी परम्परा बनाई कि बाद में आनेवाली पीढियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा,  (37: 119)
"सलाम हो मूसा और हारून पर!"(37: 120)
निस्संदेह जो अच्छा काम करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं :  (37: 121)

तालूत का क़िस्सा 

[ऐ रसूल], आप उस घटना पर विचार करें जो मूसा के बाद इसराईल की सन्तान के सरदारों के साथ घटी, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा, "हमारे लिए एक राजा नियुक्त कर दें और हम (उसके झंडे तले) अल्लाह के रास्ते में युद्ध करेंगे." नबी ने कहा, "लेकिन अगर तुम्हें लड़ाई का आदेश दिया जाए, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि तुम लड़ने से मना कर दो?" वे कहने लगे, "हम अल्लाह के रास्ते में आख़िर क्यों न लड़ेंगे, जबकि हम और हमारे बाल-बच्चे अपने घरों से निकाल बाहर किए गए हैं?" इसके बावजूद जब उन्हें जंग करने का हुक्म दे दिया गया, तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा सब पीठ फेर कर चल दिए : अल्लाह हुक्म न माननेवालों की पूरी जानकारी रखता है।  (2: 246)

उनके नबी ने उनसे कहा, "अल्लाह ने तुम्हारे लिए तालूत [Saul] को राजा नियुक्त किया है," मगर वे बोले, "उसकी बादशाही हम पर कैसे हो सकती है, जबकि उसके मुक़ाबले में हम राजा बनने के ज़्यादा हक़दार हैं, उसके पास तो ज़्यादा धन-दौलत भी नहीं है?" नबी ने कहा, "अल्लाह ने उसी को तुम्हारे ऊपर चुना है, और उसे ज़बरदस्त ज्ञान भी दिया है और शारीरिक ताक़त भी। अल्लाह जिसे चाहता है, ज़मीन की बादशाही प्रदान कर देता है : अल्लाह (की क़ुदरत) ने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है, वह सब कुछ जाननेवाला है।"  (2: 247)

उनके नबी ने उनसे कहा, "उसकी बादशाही की निशानी यह है कि (बरसों पहले खोया हुआ) एक ताबूत [Ark of the Covenant] तुम्हारे पास आ जाएगा। उसके अंदर तुम्हारे रब की तरफ़ से (तोहफ़े में) लड़ाई की घबराहट दूर करनेवाला ‘सुकून’ [Tranquillity] और मूसा [Moses] व हारून [Aaron] के माननेवालों की छोड़ी हुई यादगारें होंगी, जिसको फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।"  (2: 248)

फिर तब तालूत [Saul] अपनी सेना लेकर चला, तो उसने (अपनी सेना से) कहा, "अल्लाह एक नदी द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेनेवाला है। जो कोई इस नदी का पानी पियेगा, वह मेरा आदमी नहीं होगा, मगर जो कोई अपने आपको इसे चखने से रोक लेगा, वही मेरा आदमी होगा; हाँ अगर कोई अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले ले (तो उसे माफ़ किया जाएगा)।" मगर ऐसा हुआ कि कुछ लोगों को छोड़कर, सभी ने (जमकर) उसका पानी पी लिया। फिर जब तालूत और ईमानवाले जो उसके साथ थे, नदी पार कर गए, तो वे कहने लगे, "आज हममें जालूत [Goliath] और उसके यौद्धाओं का मुक़ाबला करने की ताक़त नहीं है।" मगर, जो लोग जानते थे कि (एक दिन) उन्हें अल्लाह से मिलना है, कहने लगे, "कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि एक छोटी-सी टुकड़ी ने अल्लाह की अनुमति से, एक बड़ी सेना को हरा दिया है! अल्लाह तो उनके साथ होता है जो धीरज से अपना पाँव जमाए रहते हैं।" (2: 249)

और जब उनका मुक़ाबला जालूत और उसके यौद्धाओं के साथ हुआ, तो वे बोले,  ऐ हमारे रब! हम पर धीरज (धरने की ताक़त) उंडेल दे, हमारे क़दम (लड़ाई में मज़बूती से) जमा दे, और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले लोगों के ख़िलाफ़ हमारी मदद कर,"  (2: 250)

और इस तरह, अल्लाह की अनुमति से उन्होंने जालूत की सेना को हरा दिया।  दाऊद [David] ने जालूत [Goliath] को मार डाला, और अल्लाह ने उसे बादशाही और समझ-बूझ [हिकमत] प्रदान की, और जो कुछ सिखाना था, दाऊद को सिखा दिया। अगर अल्लाह एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता, तो धरती पर पूरी तरह से बिगाड़ पैदा हो जाता, मगर, अल्लाह सब के लिए बड़ा फ़ज़ल करनेवाला है।  (2: 251)






















































































































































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