Thematic Quran: क़यामत-I
Thematic Quran:
क़यामत-I
जिस चीज़ [क़यामत] का तुमसे वादा किया जाता है, उसे तो आना ही है, और तुम उसे टाल नहीं सकते। (6: 134)
[ऐ रसूल!] कह दें, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह (अपने तरीक़े से) काम करते रहो, मैं अपना काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़िरत [परलोक] में किस का अंजाम अच्छा रहा।" शैतानियाँ करनेवाले कभी फलते-फूलते नहीं। (6: 135)
हमने आसमानों और ज़मीन को और वे सारी चीज़ें जो उनके बीच में हैं, उन्हें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं बना दिया है : और (क़यामत की) वह घड़ी तो अवश्य आ कर रहेगी, अतः [ऐ रसूल!] आप (उनके विरोध के बावजूद) उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उन्हें झेल लें। (15: 85)
अतः [ऐ रसूल] आप एक सच्चे व सही दीन की भक्ति में मज़बूती से जमे रहें, इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसे टाला न जा सके। उस दिन, मानव-जाति को अलग-अलग बाँट दिया जाएगा : (30: 43)
तब भी, सच्चाई से इंकार करने पर अड़े हुए लोग [काफ़िर] यह कहते हैं कि "हम पर क़यामत की घड़ी कभी नहीं आएगी।" कह दें, "क्यों नहीं? मेरे रब की क़सम, (वह ज़रूर आकर रहेगी!) क़सम है उसकी, जो हर अनदेखी चीज़ को जानता है! यहाँ तक कि आसमानों और ज़मीन में कण भर भी कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी नज़रों से ओझल हो सके, चाहे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी। हर एक चीज़ एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई है (34: 3)
“क्या! जब हम मर जाएंगे और मर कर मिट्टी और हड्डियों में बदल जाएंगे, तो क्या सचमुच हम दोबारा उठाए जाएँगे?, (37: 16)
अपने बाप-दादों के साथ?" (37: 17)
कह दें, "हाँ, बिल्कुल! और तुम्हें वहाँ बे-इज़्ज़त किया जाएगा।" (37: 18)
[ऐ लोगो!] अपने रब की बात उस दिन के आने से पहले पहले मान लो जिसे अल्लाह की ओर से टाला नहीं जा सकता--- उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण लेने की जगह होगी और न तुम्हारे लिए (अपने गुनाहों से) इंकार करना संभव होगा। (47: 47)
फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है; (44: 40)
वह (नियत) घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना चाहता हूँ ---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके। (20: 15)
देखो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें इससे बहका दे, और तुम्हारी बर्बादी का कारण बन जाए।” (20: 16)
(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (53: 57)
और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे. (53: 58)
अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (53: 59)
और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए! (53: 60)
तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते? (53: 61)
जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिलकुल सच्चा है : (51: 5)
(कर्मों का) फ़ैसला ज़रूर होगा--- (51: 6)
[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढियों के लोग (56: 49)
एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे, (56: 50)
इस बात में कोई शक नहीं कि (क़यामत की) अंतिम घड़ी ज़रूर आकर रहेगी, मगर अधिकतर लोग इस पर विश्वास नहीं करते! (40: 59)
वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (73: 18)
[ऐ रसूल!] वे आप से पूछते हैं, "क्या यह सच है?", कह दें, "हाँ, मेरे रब की क़सम! यह बिल्कुल सच है, और तुम उससे बच कर निकल नहीं सकते।" (10: 53)
वह (फैसले का) दिन तो सच्चाई का दिन है। अत: जो कोई (कामयाबी) चाहता है, उसे ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जो उसके रब के पास ले जाता हो। (78: 39)
क़सम है उन (हवाओं) की, जो दूर दूर तक फैल जाती हैं, (51: 1)
और उनकी, जो बारिश की बूंदों से लदी होती हैं, (51: 2)
जो आसानी से तेज गति के साथ चलती रहती है, (51: 3)
जो उन (बारिशों) को बाँट देती हैं जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो! (51: 4)
जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिलकुल सच्चा है : (51: 5)
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आ जाएगी, (56: 1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा, (56: 2)
उन (हवाओं) की क़सम जो एक के बाद एक भेजी जाती हैं, (77: 1)
फिर जो आँधी बनकर ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैं, (77: 2)
और जो (बादलों को) लाकर दूर-दूर तक फैला देती हैं, (77: 3)
फिर जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं, (77: 4)
*या उन (फरिश्तों) की क़सम जो सच और झूठ को अलग अलग कर देते हैं।
जो (दिलों में अल्लाह की) याद दिलाती हैं, (77: 5)
* या फिर नसीहत की बातें (अल्लाह की ओर से फ़रिश्ते) ले कर आते हैं।
(अच्छाई और बुराई को) सबूत के तौर पर बताने के लिए, या (सच्चाई से इंकार करने के नतीजों से) सावधान करने के लिए : (77: 6)
जिस (क़यामत का) तुम से वादा किया जा रहा है, वह घटना जरूर हो कर रहेगी। (77: 7)
उस वक़्त उनका क्या हाल होगा, जब उस (क़यामत के) दिन, जिसके आने में कोई शक नहीं, हम उन्हें अपने सामने इकट्ठा करेंगे और जब हर एक जान ने अपने कर्मों से जो कुछ कमाया होगा, उसका पूरा-पूरा बदला मिल जाएगा, और किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (3: 25)
आप पूछें, "आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, वह किसका है?", आप बता दें, "अल्लाह का ही है। उसने अपने ऊपर यह बात ज़रूरी ठहरा ली है कि वह दया [रहम] का भाव रखेगा। इस बात में कोई शक नहीं है कि वह तुम्हें क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा। जिन लोगों ने अपने-आपको धोखे में डाल रखा है, वे विश्वास नहीं करेंगे। (6: 12)
क्या वे नहीं समझते कि जिस अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, वह उस जैसी चीज़ दोबारा भी पैदा कर सकता है? उसने उनके लिए एक समय तय कर रखा है--- इस बात में कोई सन्देह नहीं है--- मगर इस पर भी शैतानी करनेवाले लोग हर चीज़ का इंकार करते हैं, सिवाए अविश्वास करने के। (17: 99)
इस तरह हम उन (गुफ़ावालों) की घटना पर (शहर के) लोगों का ध्यान खींच पाए, ताकि वे जान सकें कि (मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का) अल्लाह का वादा सच्चा है, और यह कि क़यामत की घड़ी के आने में कोई सन्देह नहीं है, (हालाँकि) लोग इसके बारे में आपस में बहस करते रहते हैं।...... (18: 21)
इस बात में कोई संदेह नहीं कि क़यामत की घड़ी आकर रहेगी, और न इसमें कोई शक है कि अल्लाह मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा खड़ा करेगा, (22: 7)
इस बात में कोई शक नहीं कि (क़यामत की) अंतिम घड़ी ज़रूर आकर रहेगी, मगर अधिकतर लोग इस पर विश्वास नहीं करते! (40: 59)
अत: हमने आपकी ओर अरबी में यह क़ुरआन उतार भेजी है, ताकि आप केंद्रीय शहर [मक्का], और उसके आसपास रहनेवाले लोगों को (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें। और उनको उस दिन की (ख़ास करके) चेतावनी दे दें, जिस (क़यामत के) दिन सबको इकट्ठा किया जाएगा, जिसके आने में कोई सन्देह नहीं, जब एक गिरोह बाग़ [जन्नत] में जाएगा और एक गिरोह (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में। (42: 7)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता है, फिर वहीं तुम्हें मौत देता है, फिर वही तुम सब को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसमें कोई संदेह नहीं, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझतेI” (45: 26)
क़सम है आसमान की और उससे बार-बार होनेवाली (मौसमी) बारिश की, (86: 11)
और ज़मीन की क़सम है जो फट जाती है (और उसमें से पौधे निकल आते हैं, उसी तरह क़यामत के दिन, आदमी ज़मीन फाड़ कर बाहर निकल आएगा)। (86: 12)
यह सचमुच एक निर्णायक [decisive] फरमान है (जो हो कर रहेगा); (86: 13)
यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे (हंसी मज़ाक़ के तौर पर) हल्के में लिया जाए। (86: 14)
फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है; (44: 40)
फ़ैसले के दिन [क़यामत] के लिए एक समय तय किया हुआ है : (78: 17)
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है : केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (7: 187)
वे यह भी कहते हैं, "क्या? जब हम (मरकर) गल-सड़ जाएंगे व हड्डियाँ और धूल होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा कर के फिर से उठाया जाएगा?" (17: 49)
कह दें, "(हाँ), यहाँ तक कि तुम (मरने के बाद) पत्थर या लोहे (जैसे ठोस) हो जाओ, (17: 50)
या कोई और पदार्थ जिसे तुम समझते हो कि उसे जीवित करना बहुत मुश्किल होगा।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें (ज़िंदा कर के) वापस लाएगा?" कह दें, "वही, जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया था।" तब वे आपके सामने अपने सिर मटकाने लगेंगे और कहेंगे, "अच्छा तो वह कब होगा?" कह दें, "हो सकता है कि बहुत जल्द ही हो: (17: 51)
कहें, "अल्लाह को छोड़कर, आसमानों और ज़मीन में कोई नहीं जिसे (सामान्य बुद्धि से परे) अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों की जानकारी हो.” वे नहीं जानते कि मुर्दा पड़े हुए लोग कब दोबारा उठाए जाएँगे : (27: 65)
वे अपने ज्ञान से आख़िरत [परलोक] के बारे में नहीं समझ सकते; वे इसके बारे में संदेह में पड़े हैं, बल्कि वे (शक में) अंधे हो चुके हैं। (27: 66)
वे यह भी कहते हैं, "अगर तुम्हारी बात सच है, तो यह बताओ कि यह वादा कब पूरा होगा?" (27: 71)
कह दें, "जिस चीज़ के आने की तुम जल्दी मचा रहे हो, बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे बिल्कुल पास आ लगा हो।" (27: 72)
निस्संदेह उस [क़यामत की] घड़ी का ज्ञान तो बस अल्लाह ही को है; वही पानी बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता कि कल उसके कर्मों का क्या फल मिलेगा, और कोई आदमी नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस हिस्से में होगी; वह तो अल्लाह है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (31: 34)
[ऐ रसूल], लोग आपसे (क़यामत की) घड़ी के बारे में पूछते हैं। कह दें, "इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह के ही पास है।" आप कैसे जान सकते हैं? शायद वह घड़ी नज़दीक ही हो। (33: 63)
और वे (आपसे) कहते हैं, "तुम जो भी कहते हो अगर वह सच है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (34: 29)
कह दें, "तुम्हारे लिए (वादे के मुताबिक़) एक ख़ास दिन में मिलने का समय तय किया हुआ है, जिसे एक घड़ी भर के लिए भी तुम न तो आगे बढा सकते हो और न पीछे हटा सकते हो।" (34: 30)
और वे कहते हैं कि "अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (36: 48)
असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे, (36: 49)
फिर न तो उन्हें कोई वसीयत करने का समय मिल पाएगा और न अपने घरवालों की ओर लौट कर जा सकेंगे। (36: 50)
(क़यामत की आनेवाली) घड़ी की जानकारी केवल अल्लाह को ही है, और बिना उसकी जानकारी के न तो कोई फल अपने शगूफ़े [कोष, sheath] से निकलता है, न कोई मादा गर्भवती होती है, और न ही बच्चा जनती है। जिस दिन वह उन (काफ़िरों) से पूछेगा, "कहाँ हैं मेरी (ख़ुदायी के) साझेदार [Partner]?" वे जवाब देंगे, "हम तेरे सामने इस बात को स्वीकार करते हैं कि हममें से कोई भी उन [गढे हुए साझेदारों] को देख नहीं पा रहा है": (41: 47)
बड़ी ऊँची शान है उस [अल्लाह] की, जिसके क़ब्ज़े में हर वह चीज़ है जो आसमानों में है, जो ज़मीन पर है और जो कुछ उन दोनों के बीच में है; उसी के पास (आने वाली क़यामत की) घड़ी की जानकारी है; और उसी के पास तुम सब को लौटकर जाना होगा। (43: 85)
वे (व्यंग्य से) पूछते है, "वह फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (51: 12)
(कह दें), उस दिन आएगा, जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (51: 13)
वे कहते हैं, “जो कुछ तुम कहते हो, अगर वह सच है तो बताओ कि यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (67: 25)
आप कह दें, “इसके (आने के समय की) सही जानकारी तो केवल अल्लाह को है : मेरी ज़िम्मेदारी तो बस साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से चेतावनी [warning] देना है।” (67: 26)
इसके बावजूद, आदमी उस (जीवन) से इंकार करना चाहता है, जो उसके आगे (आख़िरत/ Hereafter में) आनेवाला है : (75: 5)
वह (व्यंग से) पूछता है, “तो वह क़यामत का दिन कब होगा?” (75: 6)
ये (काफ़िर) लोग आपस में किस (चीज़) के बारे में सवाल कर रहे हैं? (78: 1)
उस सबसे महत्वपूर्ण घोषणा [क़यामत] की (78: 2)
जिसके बारे में वे मतभेद रखते हैं। (78: 3)
(विश्वास न करनेवाले लोग) आप [पैग़म्बर] से क़यामत के बारे में पूछते हैं कि, “वह घड़ी कब आएगी?”, (79: 42)
मगर आप उन्हें यह कैसे बता सकते हैं? (79: 43)
उस (क़यामत) के आने का ठीक समय तो केवल आपके रब को ही मालूम है; (79: 44)
या कोई और पदार्थ जिसे तुम समझते हो कि उसे जीवित करना बहुत मुश्किल होगा।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें (ज़िंदा कर के) वापस लाएगा?" कह दें, "वही, जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया था।" तब वे आपके सामने अपने सिर मटकाने लगेंगे और कहेंगे, "अच्छा तो वह कब होगा?" कह दें, "हो सकता है कि बहुत जल्द ही हो: (17: 51)
[ऐ रसूल], लोग आपसे (क़यामत की) घड़ी के बारे में पूछते हैं। कह दें, "इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह के ही पास है।" आप कैसे जान सकते हैं? शायद वह घड़ी नज़दीक ही हो। (33: 63)
वह अल्लाह ही है जिसने सच्चाई पर आधारित किताब उतारी और (प्रकृति के नियमों का और इंसाफ़ का) संतुलन स्थापित किया। तुम्हें क्या मालूम? शायद क़यामत की घड़ी जल्दी ही आ जाए : (42: 17)
क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है; और चाँद दो टुकड़े हो गया। (54: 1)
विश्वास न करनेवाले (तो) उस (क़यामत के दिन) को दूर समझते हैं, (70: 6)
मगर हम जानते हैं कि वह (दिन) नज़दीक ही है. (70: 7)
आसमानों और ज़मीन की वे सारी चीज़ें जो नज़रों से ओझल हैं, उनके (रहस्यों की) जानकारी अल्लाह ही के पास है। और उस फ़ैसले की घड़ी का (अचानक) आना ऐसा होगा जैसे आँखों का झपकना या इससे भी जल्दी: हर एक चीज़ अल्लाह के क़ाबू में है। (16: 77)
जब हम किसी चीज़ के होने का आदेश देते हैं, तो वह बस पलक झपकते ही (पूरा) हो जाता है; (54: 50)
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है : केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (7: 187)
बल्कि वह (आग) अचानक उनपर आ धमकेगी और उन्हें बदहवास कर देगी ; उनमें इतना दम न होगा कि वे उसे पीछे हटा सकें ; उन्हें (कुछ समय की) मोहलत भी नहीं दी जाएगी. (21: 40)
ये लोग किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या उस (क़यामत की) घड़ी का, जो अचानक उन पर आ पड़ेगी और उन्हें उसकी ख़बर तक न होगी? (43: 66)
विश्वास न करनेवाले लोग अब और किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं, सिवाए (क़यामत की) घड़ी का, जो उनपर इस तरह (अचानक) आ जाएगी कि उन्हें पता तक न होगा? उस (क़यामत) की निशानियाँ तो आ चुकी हैं, मगर जब वह घड़ी सचमुच आ जाएगी, उस वक़्त नसीहत मान लेने का भला क्या फ़ायदा होगा? (47: 18)
असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे, (36: 49)
फिर न तो उन्हें कोई वसीयत करने का समय मिल पाएगा और न अपने घरवालों की ओर लौट कर जा सकेंगे। (36: 50)
बस एक ज़ोर का धमाका होगा ---- और अचानक! --- वे देखेंगे (37: 19)
और कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हम पर! यह तो (कर्मों के) हिसाब-किताब [फ़ैसले] का दिन है।" (37: 20)
[उनसे कहा जाएगा], “यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम मानने से इंकार किया करते थे. (37: 21)
और यह (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [ काफ़िर] लोग भी बस एक धमाके के इंतज़ार में हैं, (समय आ जाने पर) जिसे टाला नहीं जा सकता है। (38: 15)
वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (50: 42)
मगर (यह कोई मुश्किल नहीं), बस एक ही धमाका काफ़ी होगा, (79: 13)
और वे सब खुले मैदान में (अपनी पुरानी हालत में) लौटकर इकट्ठा हो जाएंगे। (79: 14)
और (देखो!) आदमी अपने फ़ायदे की चीज़ें हासिल करने के लिए जिस तरह जल्दी मचाता है, उसी तरह, अगर अल्लाह (उसके बुरे कर्मों के चलते) उसे नुक़सान पहुँचाने में जल्दबाज़ी करता, तो उसका समय कबका पूरा हो गया होता!, मगर जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, हम उन (सीमा तोड़नेवालों) को उनकी सरकशी [Excesses] में अंधों की तरह भटकता छोड़ देते हैं। (10: 11)
तब भी, इंसान जिस तरह (अपने लिए) भलाई की दुआ माँगता है, (कभी-कभी अनजाने में) वह बुराई की भी दुआ माँगने लगता है : सचमुच इंसान बड़ा ही उतावला है! (17: 11)
जो लोग उस [क़यामत] में विश्वास नहीं रखते, वे चाहते हैं कि यह घड़ी जल्दी आ जाए, किन्तु जो इसमें विश्वास रखते हैं, वे तो उससे डरे-सहमे रहते हैं। वे जानते हैं कि यह सत्य है; जो लोग उस घड़ी के बारे में (सन्देह डालनेवाली) बहसें करते रहते हैं, वे सही रास्ते से बहुत ज़्यादा भटके हुए हैं। (42: 18)
"चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (51: 14)
वह घड़ी [Inevitable Hour] जो ज़रूर आ कर रहेगी (जिसकी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता)! (69: 1)
यह कौन सी घड़ी है जो ज़रूर आ कर रहेगी? (69: 2)
और [ऐ रसूल], आप क्या जानें कि वह ज़रूर आनेवाली घड़ी क्या है? (69: 3)
और आपने क्या समझा कि वह फैसले का दिन क्या है? (82: 17)
हाँ! आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है? (82: 18)
(यह) वह दिन होगा जब कोई भी जान किसी दूसरे के लिए कुछ भी नहीं कर सकेगी; और उस दिन (हर) आदेश, अल्लाह का ही चलेगा। (82: 19)
(ज़मीन और आसमान की सारी कायनात को) "तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली धमाकेदार टक्कर!" (101: 1)
वह (हर चीज़ को) तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली धमाकेदार टक्कर (की घटना) क्या है? (101: 2)
और आपको क्या मालूम कि उस "धमाकेदार टक्कर" का मतलब क्या है? (101: 3)
मगर उनसे असल वादा उस (क़यामत की) नियत घड़ी का है ---- और वह घड़ी कहीं अधिक सख़्त और बेहद कड़वी होगी : (54: 46)
फिर जब हर चीज़ पर छा जानेवाली आफ़त [क़यामत] आ जाएगी, (79: 34)
(वह यातना) अल्लाह की तरफ से आएगी जो चढने वाले तमाम आसमानी रास्तों का मालिक है, (70: 3)
(जिससे हो कर) फरिश्ते और रूह [जिबरील], उस (अल्लाह) तक एक दिन में चढकर जाते हैं, जिस दिन की लम्बाई (इस दुनिया के हिसाब से) पचास हजार साल की है। (70: 4)
[ऐ रसूल] आप उन्हें ‘पछतावे के दिन’ [Day of Remorse] से सावधान कर दें, जब इन मामलों का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल यह है कि वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं. (19: 39)
(एक दिन) जब वह तुम (सब) को जमा करेगा, उस ‘इकट्ठा किए जानेवाले दिन' [क़यामत] पर, जो "एक-दूसरे के मुक़ाबले में हार-जीत का दिन (या एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन)" [तग़ाबुन] होगा, तो जिसने अल्लाह पर ईमान रखा होगा, और अच्छे कर्म किए होंगे, उनके गुनाहों को वह मिटा देगा : वह उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (64: 9)
क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह (मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे, (83: 4)
एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन में, (83: 5)
जिस दिन सब लोग तमाम जहाँनों के रब के सामने (हिसाब देने के लिए) खड़े होंगे? (83: 6)
ऐ लोगो! अपने रब की यातना से डरो, क्योंकि (क़यामत की) अंतिम घड़ी में जो भूंचाल होगा वह बड़ी ज़बरदस्त घटना होगी : (22: 1)
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आ जाएगी, (56: 1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा, (56: 2)
किसी को नीचे ले जाएगी, किसी को ऊँचा उठा देगी. (56: 3)
अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (73: 17)
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है : केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (7: 187)
(जिस दिन वह घड़ी आ जाएगी) उस दिन तुम देखोगे : हर एक दूध पिलानेवाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर एक गर्भवती औरत अपना गर्भ (समय से पहले) गिरा देगी। लोगों को देखकर तुम्हें लगेगा कि वे नशे में मदहोश हैं जबकि वे नशे में न होंगे, अल्लाह की यातना इतनी दिल दहला देनेवाली होगी। (22: 2)
उस दिन सब लोग पुकारनेवाले के पीछे पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने हर एक आवाज़ दब कर रह जाएगी; बस केवल फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी। (20: 108)
जिस दिन ‘पिंडली खोल दी जायेगी’[यानी क़यामत की ज़बरदस्त मुसीबत और हलचल आ जाएगी] और वे [इंकार करनेवाले] लोग अल्लाह के सामने (सजदे में) झुकने के लिए बुलाए जाएंगे, तो वे (सजदा) नहीं कर सकेंगे। (68: 42)
उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी : वे (दुनिया में) सजदे के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सजदा करने से इंकार करते थे)। (68: 43)
रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के माननेवाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (22: 17)
उस दिन सारा नियंत्रण व बादशाही अल्लाह ही की होगी : वह उन सब के बीच फ़ैसला कर देगा। जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, वे ख़ुशियों भरे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल किए जाएंगे, (22: 56)
तुम जिन बातों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा करते रहते हो, क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच फ़ैसला कर के हक़ीक़त साफ़ कर देगा। (22: 69)
और कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हम पर! यह तो (कर्मों के) हिसाब-किताब [फ़ैसले] का दिन है।" (37: 20)
[उनसे कहा जाएगा], “यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम मानने से इंकार किया करते थे. (37: 21)
फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है; (44: 40)
जब सभी पैगम्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (77: 11)
(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय की गयी है? (77: 12)
फैसले के दिन के लिए, (77: 13)
और आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है? (77: 14)
(लोगों से कहा जाएगा), "यह फैसले का दिन है : हमने तुम्हें और पहले गुज़री हुई सभी पीढियों [Generations] को इकट्ठा किया है। (77: 38)
फ़ैसले के दिन [क़यामत] के लिए एक समय तय किया हुआ है : (78: 17)
(आनेवाली यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (10: 54)
हमने इसराईल की सन्तानों को (फिलिस्तीन जैसी) अच्छी जगह पर बसा दिया, और उन्हें जीवन चलाने के लिए अच्छी रोज़ी प्रदान की। फिर (सच्चे दीन पर) उनका आपस में मतभेद जब भी हुआ, उनके पास (कई रसूल) ज्ञान के साथ आते रहे थे। (फिर भी) उनके बीच जिन बातों को लेकर मतभेद रहा था, आपका रब क़यामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा। (10: 93)
तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो----(प्रतिज्ञा करके अपने ही हाथों मत तोड़ दो, और) उस औरत की तरह न हो जाओ जो अपना सूत मेहनत से कातने के बाद उसे उधेड़ कर धागा धागा अलग कर देती है---केवल इसलिए कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से गिनती व ताक़त में बढ़ गया। बात केवल यह है कि अल्लाह इस प्रतिज्ञा के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेता है और जिस बात पर तुम आपस में मतभेद रखते हो, उसकी सच्चाई तो वह क़यामत के दिन अवश्य ही तुम पर खोल देगा। (16: 92)
'सब्त' [Sabbath] मनाने का दिन तो केवल उन लोगों पर अनिवार्य कर दिया गया था जिन्हें उसके बारे में आपस में मतभेद था। क़यामत के दिन तुम्हारा रब उनके बीच फ़ैसला कर देगा, जिन बातों में उन्हें आपस में मतभेद था। (16: 124)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (39: 69)
और आप [ऐ रसूल], फ़रिश्तों को देखेंगे कि वे सिंहासन के गिर्द घेरा बाँधे हुए, अपने रब का गुणगान कर रहे हैं। और लोगों के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा और कहा जाएगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (39: 75)
क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद : वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (60: 3)
क़यामत की निशानियाँ:
और जब याजूज [Gog] और माजूज [Magog] के लोगों को खुला छोड़ दिया जाएगा और वे हर ऊँची जगह से दौड़ते हुए नीचे को उतर आएंगे, (21: 96)
जब उनलोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो जाएगा, तब हम धरती में से एक जानवर सामने लाएँगे जो उन्हें बता देगा कि वे लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे। (27: 82)
वह [क़ुरआन या ईसा का दोबारा आना] क़यामत की घड़ी की जानकारी देता है : अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो। मेरी बात मानो कि यही सीधा रास्ता है; (43: 61)
सो, [ऐ रसूल] आप उस दिन का इंतज़ार करें, जब आसमान से धुएं के बादल आते दिखायी देंगे। (44: 10)
जो लोगों को पूरी तरह से ढँक लेंगे । (वे चिल्ला कर कहेंगे) “यह तो एक दर्दनाक सज़ा है! (44: 11)
ऐ हमारे रब! हम पर से यह यातना हटा दे! अब हम (एक अल्लाह में) विश्वास करते हैं!" (44: 12)
(मगर) उनके (अचानक) विश्वास कर लेने का तब क्या फ़ायदा होगा? जब उनके पास एक रसूल आया था जिसने साफ़ शब्दों में चेतावनियाँ दी थीं, (44: 13)
फिर भी उन्होंने यह कहते हुए उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया कि, "यह तो सिखाया-पढ़ाया हुआ है!, दीवाना है!" (44: 14)
"(अच्छा) हम इस यातना को थोड़ी देर के लिए रोक देते हैं--- तुम्हें लौटकर (हमारे पास) आना ही होगा ----- (44: 15)
और जिस दिन हम (उन लोगों) को अपनी मज़बूत पकड़ में ले लेंगे, तो उस दिन हम पूरा बदला लेकर ही रहेंगे। (44: 16)
विश्वास न करनेवाले लोग अब और किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं, सिवाए (क़यामत की) घड़ी का, जो उनपर इस तरह (अचानक) आ जाएगी कि उन्हें पता तक न होगा? उस (क़यामत) की निशानियाँ तो आ चुकी हैं, मगर जब वह घड़ी सचमुच आ जाएगी, उस वक़्त नसीहत मान लेने का भला क्या फ़ायदा होगा? (47: 18)
क़यामत के दिन से पहले ऐसा अवश्य होगा कि (शैतानियाँ करनेवालों की) जितनी बस्तियाँ होंगी, हम उन्हें तबाह कर देंगे या उसे कठोर दंड देंगे--- यह बात (अल्लाह की) किताब में लिखी जा चुकी है। (17: 58)
क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है; और चाँद दो टुकड़े हो गया। (54: 1)
वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया। और उस दिन जब वह कहेगा, 'हो जा', तो बस वह हो जाएगा : उसकी कही बात बिल्कुल सच है. जिस (क़यामत के) दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा, उस दिन सारा नियंत्रण [Control] उसी का होगा। वह हर चीज़ जो दिखायी न देती हो और जो दिखायी देती हो, सब का जाननेवाला है : वह बड़ा ज्ञानी, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (6: 73)
जब नरसिंघे [trumpet] में एक बार फूंक मार कर बजा दिया जाएगा, (69: 13)
जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर चूर कर दिया जाएगा, (69: 14)
और जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसनेवाला हर एक बुरी तरह डर जाएगा---- सिवाए उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन झुकाए हुए उसके सामने हाज़िर होंगे। (27: 87)
और जब सूर [नरसिंघा] फूँका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन में जितने हैं, वे सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाए उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे। (39: 68)
जब धरती भूँचाल से बुरी तरह डोलने लगेगी (56: 4)
और पहाड़ टूटकर चूर्-चूर हो जाएँगे (56: 5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (56: 6)
उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे, (73: 14)
उन (फरिश्तों) की क़सम, जो (काफ़िरों की आत्मा) सख्ती से खींच लेते हैं, (79: 1)
और उन (फरिशतों) की क़सम, जो (ईमानवालों की रूह) आसानी से निकाल ले जाते हैं, (79: 2)
जो (ज़मीन और आसमान के बीच) तेजी से तैरते हुए जाते हैं, (79: 3)
और जो (आदेश को पूरा करने के लिए) दौड़ते हुए (दूसरों से) आगे बढ़ जाते हैं, (79: 4)
ताकि उन कामों को पूरा कर दें, (जो उन्हें सौंपा जाता है), (79: 5)
उस दिन जब (अचानक एक ज़ोरदार धमाके के साथ) भूँचाल आ जाएगा, (79: 6)
उसके बाद एक और ज़ोर का झटका आएगा (और क़यामत आ जाएगी), (79: 7)
जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ (आख़िरी) भूकंप से झिंझोड़ दी जाएगी, (99: 1)
जब धरती अपने अन्दर के (सब) बोझ [मुर्दे] निकाल बाहर कर डालेगी, (99: 2)
जब आदमी पुकार उठेगा, “इस [धरती] को आख़िर क्या हो गया है”? (कि इतनी ज़ोर से काँप रही है); (99: 3)
और जब सूर [नरसिंघा] फूँका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन में जितने हैं, वे सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाए उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे। (39: 68)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (39: 69)
मगर हम (धरती की) इन सारी चीज़ों को (समाप्त कर के) एक दिन चटियल मैदान बना डालेंगे। (18: 8)
जब ज़मीन (खींच करके) फैला दी जाएगी, (84: 3)
तो जो कुछ उसके अंदर है उसे बाहर फेंक देगी, और ख़ाली हो जाएगी, (84: 4)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (ज़मीन) के लिए ज़रूरी होगा, (84: 5)
उस दिन, वह [धरती] अपने सब हालात ख़ुद बता देगी, (99: 4)
क्योंकि तुम्हारा रब उसको (ऐसा ही करने का) हुक्म देगा। (99:5)
उस दिन, लोग अलग अलग टोली में (अपनी क़ब्रों से) निकल कर आएंगे, ताकि उन्हें उनके किये गये कर्मों को दिखाया जाए : (99: 6)
जिस किसी ने कण भर भी अच्छाई की होगी, वह इसे देख लेगा, (99: 7)
और जिस किसी ने कण भर भी बुराई की होगी, तो वह उसे (भी) देख लेगा। (99: 8)
जब नरसिंघे [trumpet] में एक बार फूंक मार कर बजा दिया जाएगा, (69: 13)
जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर चूर कर दिया जाएगा, (69: 14)
सो उस दिन (क़यामत की) वह महान घटना सामने आ खड़ी होगी। (69: 15)
हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट कूट कर चूर चूर कर दी जाएगी, (89: 21)
एक दिन आएगा जब हम पहाड़ों को चला देंगे, और तुम धरती को खुले हुए चटियल मैदान की तरह देखोगे। हम सभी लोगों को एक साथ इकट्ठा करेंगे, कोई भी पीछे छूट नहीं पाएगा। (18: 47)
तुम पहाड़ों को देखोगे, तो तुम्हें लगेगा कि वे मज़बूती से जमे हुए हैं, मगर वे (उस समय) बादलों की तरह उड़ते फिरेंगे: यह सब अल्लाह की कारीगरी है, जिसने सारी चीज़ों को एकदम सही व सटीक बनाया है। तुम जो भी करते हो, वह उसकी पूरी ख़बर रखता है : (27: 88)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़ कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़ते फिरेंगे. (52: 10)
और जब पहाड़ (धुआँ बनकर उड़ा दिए जाएंगे, तो वे) मिरीचिका की तरह (नज़र का धोखा मात्र होकर) ग़ायब हो जाएंगे। (78: 20)
जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (81: 3)
उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे, (73: 14)
और पहाड़ (धुनी हुई) रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे, (9)
और पहाड़ रंग बिरंग की धुनी हुई ऊन [tufts of wool] की तरह हो जाएँगे, (101: 5)
[ऐ रसूल] वे आपसे पहाड़ों के बारे में पूछते हैं : कह दें, "(क़यामत के दिन) मेरा रब उन पहाड़ों को (चूर-चूर कर के) धूल की तरह उड़ा देगा (20: 105)
और धरती को एक समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा, (20: 106)
जिसमें न तो कोई ऊँचाई दिखेगी और न ही पस्ती।" (20: 107)
और पहाड़ टूटकर चूर्-चूर हो जाएँगे (56: 5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (56: 6)
जब पहाड़ (चूर चूर कर के) उड़ा दिए जाएंगे, (77: 10)
जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे), (81: 6)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (82: 3)
जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा), (81: 4)
क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है; और चाँद दो टुकड़े हो गया। (54: 1)
जब आँखें चौंधिया जाएंगी (75: 7)
और चांद (अपनी) रौशनी खो देगा, (75: 8)
जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे, (75: 9)
जब सूरज लपेट कर अँधेरा कर दिया जाएगा, (81: 1)
जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूट कर गिर पड़ेंगे), (81: 2)
जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी (77: 8)
और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा, (77: 9)
जब आसमान चीर कर अलग कर दिया जाएगा, (82: 1)
जब तारे (और ग्रह) गिर कर बिखर जाएंगे, (82: 2)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (82: 3)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) : (82: 4)
जिस दिन आसमान थरथराहट के साथ बुरी तरह डगमगा उठेगा (52: 9)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़ कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़ते फिरेंगे. (52: 10)
उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि ताँता लग जाएगा, (25: 25)
फिर जब आसमान फट पड़ेगा और लाल चमड़े की तरह एकदम लाल सुर्ख़ हो जाएगा। (55: 37)
जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर चूर कर दिया जाएगा, (69: 14)
सो उस दिन (क़यामत की) वह महान घटना सामने आ खड़ी होगी। (69: 15)
उस दिन आसमान (सारे पिंडों के साथ) फट जाएगा, और वह बहुत कमज़ोर पड़ जाएगा। (69: 16)
वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा. अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (73: 18)
जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी (77: 8)
और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा, (77: 9)
जब पहाड़ (चूर चूर कर के) उड़ा दिए जाएंगे, (77: 10)
जिस दिन नरसिंघा [Trumpet] फूँक कर बजा दिया जाएगा, तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे, (78: 18)
और जब आसमान (की पर्तें को) फाड़ दिया जाएगा, तो (फटने से जैसे) वह चौड़े-चौड़े दरवाजों की तरह खुल जाएगा, (78: 19)
और जब पहाड़ (धुआँ बनकर उड़ा दिए जाएंगे, तो वे) मिरीचिका की तरह (नज़र का धोखा मात्र होकर) ग़ायब हो जाएंगे। (78: 20)
जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा, (81: 11)
जब आसमान चीर कर अलग कर दिया जाएगा, (82: 1)
जब तारे (और ग्रह) गिर कर बिखर जाएंगे, (82: 2)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (82: 3)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) : (82: 4)
जब आसमान फट पड़ेगा, (84: 1)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (आसमान) के लिए ज़रूरी होगा, (84: 2)
जब ज़मीन (खींच करके) फैला दी जाएगी, (84: 3)
तो जो कुछ उसके अंदर है उसे बाहर फेंक देगी, और ख़ाली हो जाएगी, (84: 4)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (ज़मीन) के लिए ज़रूरी होगा, (84: 5)
(वह यातना उस दिन आएगी) जिस दिन आसमान पिघले हुए ताम्बे (या तेल की तलछट) की तरह हो जाएगा, (70: 8)
और पहाड़ (धुनी हुई) रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे, (70: 9)
उस दिन हम आसमानों को इस तरह लपेट [roll up] देंगे जैसे कोई लिखनेवाला (अपने) दस्तावेज़ लिख कर लपेट देता है. फिर, हम दोबारा सृष्टि की रचना करेंगे, ठीक वैसे ही जैसा पहली बार की थी : यह एक अटूट वादा है, हम यह सारी चीज़ें कर के रहेंगे. (21: 104)
इन लोगों ने न अल्लाह की सही हक़ीक़त समझी और न उसकी क़द्र जानी, जैसी क़द्र के वह लायक़ था। हालाँकि क़यामत के दिन पूरी की पूरी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी. आसमानों को लपेट कर वह अपने दाएँ हाथ में रख लेगा--- महान है वह! और वह हर उस ज़ात से कहीं ऊँचा और बड़ा है जिसे वे (प्रभुत्व में अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं (39: 67)
एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है---- (14: 48)
और आप [ऐ रसूल], फ़रिश्तों को देखेंगे कि वे सिंहासन के गिर्द घेरा बाँधे हुए, अपने रब का गुणगान कर रहे हैं। और लोगों के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा और कहा जाएगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (39: 75)
(वह यातना) अल्लाह की तरफ से आएगी जो चढने वाले तमाम आसमानी रास्तों का मालिक है, (70: 3)
(जिससे हो कर) फरिश्ते और रूह [जिबरील], उस (अल्लाह) तक एक दिन में चढकर जाएंगे, जिस दिन की लम्बाई (इस दुनिया के हिसाब से) पचास हजार साल की है। (70: 4)
जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार दर क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे, (89: 22)
(लेकिन क़यामत के दिन उसके रोब व जलाल का हाल यह होगा कि) उन्हें अल्लाह के सामने कुछ बोलने की अनुमति नहीं होगी। (78: 37)
उस दिन जब जिबराईल [रूहुल अमीन] और (सभी) फरिश्ते क़तार में खड़े होंगे, वे कुछ नहीं बोलेंगे सिवाए उनके, जिन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] ने बोलने की इजाज़त दी हो, और जो वही बात कहेगा जो सही हो। (78: 38)
और फरिश्ते उसके सभी किनारों पर खड़े होंगे और, उनमें से आठ फ़रिश्ते आपके रब के सिंहासन को उस दिन, अपने ऊपर उठाए हुए होंगे। (69: 17)
नरसिंघे (सूर) में दोबारा फूँक मारना :
और एक दिन आएगा जब हम उनकी ऐसी हालत कर देंगे कि एक क़ौम के लोग दूसरी क़ौम के लोगों से लहरों की तरह टकरा रहे होंगे, और फिर, नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा और हम उन सबको एक साथ इकट्ठा कर देंगे। (18: 99)
जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, और हम मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (20: 102)
और जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसनेवाला हर एक बुरी तरह डर जाएगा---- सिवाए उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन झुकाए हुए उसके सामने हाज़िर होंगे। (27: 87)
(जब) नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा और --– देखोगे कि अचानक ---- वे अपनी क़ब्रों से निकलकर अपने रब की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे, (36: 51)
(क़यामत देख कर) कहेंगे, "अफ़सोस हम पर! किसने हमें आराम करने की जगहों से उठा खड़ा किया है?” (उनसे कहा जाएगा) यह वही चीज़ है जिसका वादा रहम करनेवाले रब ने किया था, और रसूलों ने सच कहा था।" (36: 52)
और जब सूर [नरसिंघा] फूँका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन में जितने हैं, वे सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाए उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे। (39: 68)
और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा : “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।” (50: 20)
अतः [ए रसूल!] आप उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें). जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा, (54: 6)
अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (54: 7)
वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर. (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (54: 8)
उस दिन वह अपनी क़ब्रों से इस तरह हड़बड़ाते हुए बाहर निकल आएंगे, जैसे वे किसी झंडे के पीछे दौड़े जा रहे हों, (70: 43)
उनकी आँखें (शर्म से) झुकी होंगी और ज़िल्लत उन पर छायी होगी : यही वह दिन होगा जिसके बारे में उन्हें चेतावनी दी जाती थी। (70: 44)
और किस तरह अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन से पौधे की तरह उगाया है (71: 17)
किस तरह वह तुम्हें उसी (भूमि) में लौटा देगा और फिर तुमको (वहीं से दोबारा) बाहर ला खड़ा करेगा, (71: 18)
जिस दिन नरसिंघा [Trumpet] फूँक कर बजा दिया जाएगा, तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे, (78: 18)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) : (82: 4)
तो क्या उसे पता नहीं, जब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे पड़े लोग] हैं, उन्हें फाड़ कर बाहर निकाल दिया जाएगा, (100: 9)
और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगे, वह सामने आ जाएंगे, (100: 10)
जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा, और हम मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (20: 102)
वे आपस में चुपके-चुपके पूछेंगे कि "हम (क़ब्रों में) दस दिन से ज़्यादा क्या रहे होंगे?"---- (20: 103)
जो कुछ वे कह रहे होंगे, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं---- मगर उनमें से सबसे समझदार आदमी कहेगा, "हम बहुत रहे होंगे तो बस एक दिन रहे होंगे।" (20: 104)
उनसे कहा जाएगाः “तुम धरती पर कितने वर्ष रहे”? (23: 112)
वॆ जवाब में कहेंगेः , "हम बस एक दिन या एक दिन का कुछ भाग रहे होंगे (हमें समय का ठीक अंदाज़ा नहीं), मगर उन लोगों से पूछें जो हिसाब रखते हैं।“ (23: 113)
अल्लाह कहेगा, "तुम ज़मीन पर बहुत ही थोड़ा ठहरे, क्या अच्छा होता कि तुम जानते होते! (23: 114)
जिस दिन वे उसको देख लेंगे, तो उन्हें ऐसा लगेगा मानो वे (दुनिया में) एक शाम या उसकी सुबह से अधिक ठहरे ही नहीं थे। (79: 46)
उस (क़यामत के) दिन जब वह उन सबको (हश्र के मैदान में) इकट्ठा करेगा, तो ऐसा लगेगा जैसे वे (इस दुनिया में) एक घड़ी से ज़्यादा नहीं ठहरे थे, और वे एक-दूसरे को पहचान लेंगे। वे लोग बड़े घाटे में रहेंगे, जिन्होंने (आख़िरत में) अल्लाह से होनेवाली मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, क्योंकि वे सही मार्ग पर नहीं चलते थे। (10: 45)
जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, गुनाहगार लोग क़समें खाएँगे कि वे (क़ब्रों में) घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरे----(सचमुच) वे दुनिया में हमेशा से ही धोखे में पड़े रहे थे ---- (30: 55)
किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान दिया गया था, वे कहेंगे, "अल्लाह के लिखे हुए रिकार्ड के मुताबिक़ तो तुम असल में ‘दोबारा उठाए जाने के दिन’ तक (दुनिया में) ठहरे रहे थे : यही तो है ‘ज़िंदा उठाए जाने का दिन’ [Day of Resurrection], मगर तुम तो समझते ही न थे।" (30: 56)
अत: [ऐ मुहम्मद] आप धीरज रखते हुए अपने काम पर जमे रहें! जिस तरह (आप से पहले) पक्के इरादों वाले रसूलों [नूह, इबराहीम,मूसा,ईसा] ने धीरज से काम लिया था। आप उन [इंकार पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें : जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी भरा) संदेश है। अब कौन है जो बर्बाद होगा सिवाए हर बात का विरोध करनेवाले और आदेश न माननेवालों के? (46: 35)
और ध्यान से सुनो उस दिन की बात, जिस दिन एक पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (50: 41)
वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (50: 42)
अतः [ए रसूल!] आप उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें). जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा, (54: 6)
अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (54: 7)
वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर. (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (54: 8)
उस दिन सब लोग पुकारनेवाले के पीछे पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने हर एक आवाज़ दब कर रह जाएगी; बस केवल फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी। (20: 108)
(इसका मतलब क़यामत का) वह दिन है, जिस दिन (सारे) लोग (हश्र के मैदान में) फतिंगों [moth] की तरह इधर-उधर बिखरे हुए होंगे (101: 4)
जो लोग इस दुनिया में (बुद्धि से काम न लेते हुए) अंधे होकर रहे, वे आख़िरत [परलोक] में भी अंधे ही रहेंगे, बल्कि वे मार्ग से और भी अधिक भटके हुए होंगे। (17: 72)
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए तो असल में वही सही रास्ता पानेवाला होता है, और वह जिसे भटकता छोड़ दे, तो उस (अल्लाह) के सिवा ऐसे लोगों को बचानेवाला कोई नहीं पाओगे। और क़यामत के दिन हम ऐसे लोगों को इकट्ठा करेंगे, औंधे मुँह पड़े हुए, इस हाल में कि वे अंधे, गूँगे और बहरे होंगे। जहन्नम उनके रहने का ठिकाना होगा। जब कभी (वहाँ की) आग धीमी पड़ने लगेगी, तो हम उसे और भी भड़का देंगे। (17: 97)
जब सारे लोग (क़यामत के दिन) अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे, तो (समाज में) अपनी ताक़त की धाक जमानेवालों से कमज़ोर लोग कहेंगे, "हम तो (दुनिया में) तुम्हारे पीछे चलते थे, तो क्या अब तुम अल्लाह की किसी भी यातना से हमें बचा सकते हो!?” वे जवाब में कहेंगे, "अगर अल्लाह ने हमें बच निकलने का कोई रास्ता दिखाया होता, तो हम भी तुम्हें वह रास्ता दिखा देते। अब चाहे हम चिल्ला-चिल्ली करें या धैर्य से बर्दाश्त कर लें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला : बच निकलने का अब कोई उपाय नहीं है।" (14: 21)
एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है---- (14: 48)
उस दिन तुम (अपने कर्मों के) फ़ैसले के लिए अल्लाह के सामने पेश किए जाओगे, और तुम्हारी कोई भी राज़ की बात, छुपी नहीं रहेगी। (69: 18)
क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह (मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे, (83: 4)
एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन में, (83: 5)
जिस दिन सब लोग तमाम जहाँनों के रब के सामने (हिसाब देने के लिए) खड़े होंगे? (83: 6)
वे तुम्हारे रब के सामने लाइनों में खड़े किए जाएँगे: "जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था, उसी तरह आज तुम्हें हमारे सामने आना पड़ा, हालाँकि तुम तो यह दावा करते थे कि तुम से दोबारा मिलने का कोई समय हम ने तय नहीं कर रखा है।" (18: 48)
[क़यामत के दिन अल्लाह कहेगा], "आख़िर तुम लौट कर हमारे पास आ ही गए, वह भी एकदम अकेले, जिस तरह हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था : हमने तुम्हें जो कुछ दे रखा था, तुम सब कुछ पीछे छोड़ आए हो, और तुम्हारे वे सिफ़ारिश करनेवाले भी कहीं दिखायी नहीं पड़ते हैं जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं।" तुम्हारे बीच के सारे बंधन टूट चुके हैं, और जिन (देवताओं) के बारे में तुम ऐसे दावे किया करते थे, वे सब तुम्हें छोड़ चुके हैं। (6: 94)
यह जिस माल व औलाद का दावा करता है (अगर वह उसे मिल भी जाए तो अंत में) वह सब हमारे ही कब्ज़े में आएगा, औऱ उसे तो हमारे सामने एकदम अकेले ही हाज़िर होना है! (19: 80)
और क़यामत के दिन हर एक, उस ख़ुदा (रहमान) के सामने बिल्कुल अकेले आ खड़ा होगा। (19: 95)
[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाए. (40: 18)
सचमुच, जब जान [soul] (निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी; (75: 26)
जब यह कहा जाएगा, " कि है कोई जो झाड़-फूंक कर के जान बचा सके?"; (75: 27)
जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है; (75: 28)
जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा : (75: 29)
उस दिन उसे अपने रब की तरफ हँका कर ले जाया जाएगा। (75: 30)
ऐसे लोग जिनका मन (अल्लाह से) कभी नहीं भटकता---- न सामान की ख़रीद बिक्री से, न मुनाफ़े से, न अल्लाह की याद से, और न पाबंदी से नमाज पढ़ने से, और न ही तयशुदा ज़कात देने से। वे (आने वाले) उस दिन से डरते रहते हैं जिस दिन (लोगों के) दिल (डर से) उलट जाएंगे और आँखें पत्थरा जाएँगी! (24: 37)
लोगों के दिल (मारे डर और घबराहट के) बुरी तरह धड़क रहे होंगे (79: 8)
और उनकी आँखें झुकी होंगी। (79: 9)
[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैं, उसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है : वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी की फटी रह जाएँगी, (14: 42)
हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगे, नज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगे, और उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे. (14: 43)
[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएं, जब यातना उनके पास आ पहुंचेगी, उस समय इंकार करने वाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे : हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगे, और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा खा कर कहा करते थे कि ‘हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है’?" (14: 44)
और जब याजूज [Gog] और माजूज [Magog] के लोगों को खुला छोड़ दिया जाएगा और वे हर ऊँची जगह से दौड़ते हुए नीचे को उतर आएंगे, (21: 96)
जब (अल्लाह के) सच्चे वादे के पूरे होने का समय क़रीब आ जाएगा, तब ऐसा होगा कि विश्वास न करनेवालों की आँखें मारे डर के फटी की फटी रह जाएंगी, और वे कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! हम इस चीज़ को जानते ही न थे और पूरी तरह से भुलाए बैठे थे, बल्कि हम ही ग़लती पर थे।"(21: 97)
अतः [ए रसूल!] आप उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें). जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा, (54: 6)
अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (54: 7)
वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर. (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (54: 8)
उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी : वे (दुनिया में) सज्दे के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सज्दा करने से इंकार करते थे)। (68: 43)
लोगों के दिल (मारे डर और घबराहट के) बुरी तरह धड़क रहे होंगे (79: 8)
और उनकी आँखें झुकी होंगी। (79: 9)
जब आँखें चौंधिया जाएंगी (75: 7)
और चांद (अपनी) रौशनी खो देगा, (75: 8)
जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे, (75: 9)
उस दिन आदमी पुकार उठेगा, “भाग कर जाएं तो कहाँ जाएं?” (75: 10)
नहीं! सचमुच, छिपने की कोई जगह नहीं होगी : (75: 11)
उस दिन तुम्हारे रब के पास ही ठिकाना होगा जहाँ लौट कर सबको जाना होगा। (75: 12)
(इसका मतलब क़यामत का) वह दिन है, जिस दिन (सारे) लोग (हश्र के मैदान में) फतिंगों [moth] की तरह इधर-उधर बिखरे हुए होंगे (101: 4)
(सच्चाई से) इंकार करनेवाले अगर जान पाते (तो यातना की जल्दी न मचाते), कि जब वह समय आ जाएगा तो फिर उस आग से न तो वे अपने चेहरों को और न अपनी पीठों को (झुलसने से) बचा पाएंगे, और न उन्हें किसी की सहायता ही मिलेगी! (21: 39)
बल्कि वह (आग) अचानक उनपर आ धमकेगी और उन्हें बदहवास कर देगी; उनमें इतना दम न होगा कि वे उसे पीछे हटा सकें; उन्हें (कुछ समय की) मुहलत भी नहीं दी जाएगी. (21: 40)
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दें, यहाँ तक कि वे उस दिन का सामना करें जिस दिन उनके होश जाते रहेंगे, (52: 45)
हर आदमी इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँका कर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही देनेवाला : (50: 21)
उस वक़्त वे क्या करेंगे जब हम हर समुदाय में से एक गवाह लाएँगे, और (ऐ रसूल) आपको इन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह बनाकर पेश करेंगे? (4: 41)
उस दिन, जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते थे और हमारे रसूल की आज्ञा नहीं मानते थे, वे तमन्ना करेंगे कि काश हमें ज़मीन निगल जाती : वे अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपा नहीं पाएंगे। (4: 42)
एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने (सच्चाई में) विश्वास करने से इंकार किया होगा उन्हें इस बात की कोई अनुमति न होगी कि वे कोई बहाने बना सकें या अपनी भूल-चूक में सुधार कर सकें। (16: 84)
एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से उन लोगों के ख़िलाफ़ एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, और हम [ऐ रसूल] आपको इन (मक्का के) लोगों के ख़िलाफ़ गवाह के रूप में लाएंगे, क्योंकि हमने आप पर किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है जिसमें हर चीज़ को खोलकर खोलकर बता दिया गया है, यह उनलोगों के लिए एक मार्गदर्शन [Guidance] है, रहमत [Mercy] है, और अच्छी ख़बर सुनानेवाली है जो लोग पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकते हैं। (16: 89)
और हम हर एक समुदाय में से एक गवाह को बुलाएंगे और कहेंगे, "पेश करो अपना सबूत।" और तब वे जान लेंगे कि सच्चाई तो केवल अल्लाह के पास है; और उनके द्वारा गढ़े हुए ख़ुदा उन्हें छोड़ देंगे। (28: 75)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (39: 69)
उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम करनेवाला कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें बनाये? ऐसे लोगों को उनके रब के सामने लाया जाएगा, और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठी बातें बनायी थीं।" अल्लाह की फिटकार [Rejection] है उन लोगों पर, जो ऐसे बुरे काम करते हैं, (11: 18)
हम अपने रसूलों की और उन लोगों की जो ईमान रखते हैं, अवश्य सहायता करते हैं, सांसारिक जीवन में भी और उस दिन (भी करेंगे) जबकि गवाही देने वाले खड़े होंगे. (40: 51)
और उस [क़यामत के] दिन की क़सम जिसका वादा किया गया है, (85: 2)
क़सम है "गवाह" [अल्लाह] की और (लोगों के) उन (कर्मों) की, जिनके बारे में गवाही दी जाए, (85: 3)
हमने हर आदमी की क़िस्मत उसकी गर्दन से बाँध दी है। क़यामत के दिन, उनमें हर एक लिए, हम उनके (कर्मों का) लेखा-जोखा निकाल लाएंगे, जिसको वे अपने सामने खुला हुआ देख लेंगे, (17: 13)
(उनसे कहा जाएगा), "अपने (कर्मों का) लेखा-जोखा पढ़ ले! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।" (17: 14)
उस दिन जब हम लोगों के हर एक गिरोह को उनके लीडरों के साथ बुलाएँगे, फिर जिन्हें उनके कर्मो का लेखा-जोखा उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, वे इसे (ख़ुशी-ख़ुशी) पढ़ेंगे। और किसी के साथ तनिक भी अन्याय न होगा : (17: 71)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (39: 69)
और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है। हर गिरोह को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाया जाएगा : "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे। (45: 28)
"यह हमारा (तैयार किया हुआ) बही-खाता है, जो तुम्हारे बारे में सच सच बता रहा है : तुम जो कुछ भी करते थे, हम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं।" (45: 29)
उसके साथ रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेखा-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (50: 23)
फिर जिस किसी को उसके कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह (खुशी से) कहेगा, “लोगो, यह मेरे कर्मों का हिसाब है, आओ इसे पढ़ लो। (69: 19)
मैं तो पहले से जानता था कि मुझे (अपने कर्मों के) हिसाब का सामना करना होगा,” (69: 20)
और इस तरह वह सुखी व मनपसंद ज़िंदगी गुज़ारेगा (69: 21)
रहा वह आदमी जिसके कर्मों का हिसाब उसके बाएं हाथ में दिया जाएगा, तो वह कहेगा, “काश! मुझे मेरे कर्मों का हिसाब दिया ही न जाता (69: 25)
और मैं अपने हिसाब-किताब के बारे में कुछ नहीं जानता। (69: 26)
जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे, (81: 10)
तो जिस आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, (84: 7)
तो उससे आसान सा हिसाब लिया जाएगा (84: 8)
और वह अपने घरवालों के पास खुशी-खुशी लौटेगा। (84: 9)
मगर जिस किसी को उसका लेखा-जोखा उसकी पीठ के पीछे से (बायें हाथ में) दिया जाएगा, (84: 10)
तो वह अपनी बर्बादी को पुकार उठेगा ------ (84: 11)
वह जहन्न्म की भड़कती हुई आग में जलेगा। (84: 12)
जिस दिन वे हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं! (19: 38)
“तुम ने इस (दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है।” (50: 22)
जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सब अल्लाह का है और, चाहे तुम अपने मन की बातें सबके सामने ज़ाहिर करो या छिपाकर रखो, अल्लाह तुमसे उनका हिसाब ज़रूर लेगा। फिर वह जिसे चाहे माफ़ कर देगा और जिसे चाहे सज़ा देगा : अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (2: 284)
एक दिन आएगा जब अल्लाह उन सब (जिन्नों) को घेरकर इकट्ठा करेगा, (और कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो इंसानों की बहुत बड़ी संख्या को बहका डाला।" और इंसानों में से जो उनके माननेवाले साथी होंगे, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने एक-दूसरे से बहुत फ़ायदा उठाया है, मगर अब हमारे लिए तय किया हुआ समय पूरा हो गया है, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" अल्लाह कहेगा, "अब तुम्हारा ठिकाना आग [नरक/जहन्नम] है, और उसी में तुम्हें रहना होगा"----सिवाए इसके, कि अल्लाह अगर कुछ और चाहे : [ऐ रसूल!] आपका रब बहुत ज्ञानी, और हर चीज़ की जानकारी रखता है। (6: 128)
इस तरीक़े से, हम कुछ शैतानियाँ करनेवालों को उनके कुकर्मों के कारण, एक दूसरे पर ताक़त व अधिकार दे देते हैं। (6: 129)
"ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो तुम्हें मेरी आयतें पढ़कर सुनाते थे, और तुम्हें इसी दिन का सामना करने से सावधान करते थे?" वे कहेंगे, "(हाँ! रसूल तो आए थे) आज हम स्वयं अपने ख़िलाफ़ गवाही देते हैं।" इस दुनिया की ज़िंदगी ने उन्हें धोखे में रखा, मगर वे ख़ुद अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि उन्होंने सच्चाई को मानने से इंकार किया था : (6: 130)
हम उन लोगों से अवश्य पूछताछ करेंगे जिनके पास रसूलों को भेजा गया था (कि उन्होंने रसूलों की बात मानी या नहीं)------ और हम उन रसूलों से भी ज़रूर पूछताछ करेंगे (कि उन्होंने हमारे संदेशों को ठीक-ठीक पहुँचाया या नहीं)- ----- (7: 6)
फिर जो कुछ भी उन लोगों ने किया होगा, वे सारी बातें हम उनके सामने बता देंगे, क्योंकि हमें तो इनकी पूरी जानकारी है, और (इन घटनाओं के समय) हम कहीं ग़ायब तो न थे। (7: 7)
हमने (विश्वास न करनेवालों को) जिस (बुरे) नतीजे की धमकी दे रखी है, हो सकता है कि उसमें से कुछ हिस्सा, [ऐ रसूल] आपको (आपकी ज़िंदगी में ही) दिखा दें, या (उससे पहले ही) आपको दुनिया से उठा लें, मगर आपका कर्तव्य तो बस (सच्चाई का) सन्देश पहुँचा देना है : हिसाब लेने का काम तो हमारा है। (13: 40)
आपके रब की क़सम! हम अवश्य ही उन सबसे पूछताछ करेंगे, (15: 92)
अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो तुम सबको एक ही (दीन माननेवालों का) समुदाय बना देता, मगर वह जिसको चाहता है (उसकी हठधर्मी के कारण) उसको भटकता छोड़ देता है और जिसको चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। तुम जो कुछ भी करते हो उसके बारे तुमसे अवश्य पूछताछ होगी। (16: 93)
फिर (देखो!) जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसमें से कुछ हिस्सा वे (मूर्तियों के लिए) अलग कर लेते हैं, जिनकी हक़ीक़त उन्हें मालूम तक नहीं। क़सम है अल्लाह की! जो झूठ तुम ने गढ़े हैं उसके बारे में तुमसे ज़रूर पूछताछ की जाएगी। (16: 56)
और (देखो!) जिस चीज़ के सच होने की तुम्हें जानकारी न हो, आँख बंद कर के उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछ्ताछ की जाएगी। (17: 36)
क़यामत के दिन हम इंसाफ़ का तराज़ू लगा देंगे ताकि किसी के साथ थोड़ा भी ज़ुल्म न हो पाए, यहाँ तक कि अगर कोई (कर्म) राई के दाने के (वज़न के) बराबर भी हो, तो हम उसे भी सामने ला खड़ा करेंगे--- और हिसाब रखने के लिए हम काफ़ी हैं. (21: 47)
एक दिन आएगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से ऐसे लोगों का एक गिरोह जमा करेंगे, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झूठ जानकर विश्वास नहीं किया, फिर उन्हें अलग अलग समूहों में ले जाया जाएगा, (27: 83)
यहाँ तक कि वे (अल्लाह के) सामने पहुँच जाएँगे, तो फिर अल्लाह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों [संदेशों] को बिना ठीक से समझे-बूझे ही मानने से इंकार कर दिया? या फिर तुम कर क्या रहे थे?" (27: 84)
फिर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला कर दिया जाएगा, क्योंकि उनलोगों ने सख़्त ग़लतियाँ की थीं: वे कुछ बोल नहीं पाएंगे। (27: 85)
फ़रिश्तों को, जो रहम करनेवाले रब के बन्दे होते हैं, वे महिला मानते हैं। क्या वे उनकी रचना के समय मौजूद थे? उनके दावों को लिख लिया जाएगा, और उनसे इस बारे में (क़यामत के दिन) पूछताछ होगी। (43: 19)
क्योंकि यह (क़ुरआन), आपके लिए और आपकी क़ौम के लिए भी सचमुच एक याद दिलाने वाली [reminder] चीज़ है : तुम सबसे (इस पर अमल करने के बारे में) पूछा जाएगा। (43: 44)
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण व क़ाबू में है। जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन असत्य पर जमे रहनेवाले भारी घाटा उठाएंगे। (45: 27)
और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है। हर गिरोह को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाया जाएगा : "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे। (45: 28)
"यह हमारा (तैयार किया हुआ) बही-खाता है, जो तुम्हारे बारे में सच सच बता रहा है : तुम जो कुछ भी करते थे, हम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं।" (45: 29)
उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (58: 6)
[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच। क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा : सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (58: 7)
विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा : अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (64: 7)
जब सभी पैगम्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (77: 11)
(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय की गयी है? (77: 12)
फैसले के दिन के लिए, (77: 13)
हमारे ही पास उन सबको लौट कर आना है, (88: 25)
और फिर (उनके कर्मों का) हिसाब लेने की जिम्मेदारी हमारी है। (88: 26)
तो क्या उसे पता नहीं, जब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे पड़े लोग] हैं, उन्हें फाड़ कर बाहर निकाल दिया जाएगा, (100: 9)
और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगे, वह सामने आ जाएंगे, (100: 10)
फिर उस दिन तुमसे (अल्लाह की दी हुई) नेमतों [Pleasures] के बारे में ज़रूर पूछ्ताछ की जाएगी (कि तुमने उन्हें कहाँ कहाँ और कैसे कैसे खर्च किया था)। (102: 8)
हम ने उन लोगों से भी वचन लिया था, जो कहते हैं, " हम ईसाई [Christians] हैं", मगर वे भी उनमें से कुछ चीज़ों को भुला बैठे जिसे उन्हें याद रखने के लिए बोला गया था, अत: हम ने उनके बीच क़यामत तक के लिए दुश्मनी और नफ़रत की आग भड़का दी, जब अल्लाह उन्हें बता देगा, जो कुछ उन्होंने किया होगा। (5: 14)
[ऐ मुहम्मद] हम ने आपके पास यह किताब [क़ुरआन] सच्चाई के साथ भेजी है, जो इससे पहले आयी हुई सारी आसमानी किताबों की पुष्टि करती है, और जो उन सब पर निर्णायक [final authority] की हैसियत रखती है : अतः जो हुक्म अल्लाह ने उतारा है, आप उसी के मुताबिक़ लोगों के बीच फ़ैसला करें। जो सच्चाई आपके पास आ चुकी है उससे हटकर उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें। तुम में से हर एक गिरोह के लिए हम ने अलग-अलग 'एक क़ानून' [शरीअत] और 'एक रास्ता'[तरीक़ा] निश्चित कर दिया है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता, मगर वह चाहता था कि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके द्वारा वह तुम्हारी परीक्षा ले, अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करो: तुम सबको अल्लाह के पास लौटकर जाना है, फिर वह तुम्हें बता देगा कि जिन मामलों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (5: 48)
वही (अल्लाह) है जो रात के समय (नींद में) तुम्हारी रूह को वापस बुला लेता है, यह जानते हुए कि दिन भर तुमने क्या क्या किया है, फिर वह (एक नये) दिन में तुम्हें दोबारा (ज़िंदा) उठा देता है, ताकि (अपनी उम्र की) निश्चित अवधि पूरी कर सको। उसी के पास अंत में, तुम्हें लौटना होगा, और तब वह तुम्हें बता देगा कि तुम क्या क्या किया करते थे। (6: 60)
(ईमानवालो!) भले ही वे अपनी दुश्मनी और जिहालत में अल्लाह को बुरा-भला कहें, वे जिन्हें अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, तुम उन्हें बुरा भला न कहो। इसी प्रकार हमने हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है, मगर अंत में उन्हें अपने रब के पास ही लौटना है और फिर वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे करते रहे होंगे। (6: 108)
[ऐ रसूल!] जिन लोगों ने अपने धर्म में मतभेद फैलाया और अलग-अलग गिरोहों में बँट गए, तो उनसे आपका कोई लेना-देना नहीं है। उनका मामला अल्लाह के हवाले है : समय आने पर वह उन्हें बता देगा कि जो कुछ वे करते रहे हैं, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (6: 159)
आप पूछें, "क्या (तुम चाहते हो कि) मैं अल्लाह को छोड़कर कोई दूसरा रब ढूँढ लूँ, जबकि वही हर चीज़ का पालनहार है?" और (देखो!) हर एक आदमी अपने कर्मों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है; कोई आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम सब को अंत में, अपने रब के पास लौटकर जाना है, और तब वह तुम्हें बता देगा कि जिन बातों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (6: 164)
जब तुम (युद्ध कर के) अपने अभियान से वापस आओगे, तो [ऐ ईमानवालो], वे तुम्हारे पास बार बार अपने बहानों के साथ आएंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म पर विश्वास नहीं करते: अल्लाह ने हमें तुम्हारे बारे में बता दिया है। अल्लाह और उसके रसूल अब तुम्हारे काम पर नज़र रखेंगे, और अंत में तुम्हें उस हस्ती के पास लौटना होगा, जो हर दिखायी देनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम ने किया होगा।" (9: 94)
[ऐ रसूल!] कह दें, "कर्म किए जाओ! अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखेगा ------ उसका रसूल और ईमानवाले भी तुम्हारे कर्मों को देखेंगे------ फिर तुम लौट कर उसके पास जाओगे, जो हर दिखनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है, और वह सब बता देगा जो कुछ तम करते रहे हो।" (9: 105)
मगर जैसे ही वह उनको बचा लेता है, वैसे ही क्या देखते हैं कि ज़मीन पर (सुरक्षित) वापस आते ही, वे मर्यादा तोड़ने और हर सही चीज़ के ख़िलाफ़ फ़साद मचाने लग जाते हैं। ऐ लोगो! एक सीमा से अधिक जो तुम्हारा उपद्रवी आचरण है, वह ख़ुद तुम्हारे ही विरुद्ध पड़नेवाला है। इस दुनिया की ज़िंदगी के थोड़े मज़े ले लो; अंत में तो तुम्हें हमारे पास लौटकर आना ही होगा और तब हम तुम्हें बताएंगे जो कुछ तुम ने (दुनिया में) किया होगा। (10: 23)
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है : वह अच्छी तरह जानता है तुम जिस हालत [state] में भी हो----- उस दिन जब सब लोग लौट कर उसके पास लाए जाएंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें हर चीज़ बता देगा----- अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (24: 64)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझ पर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना. मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से रहना, और उनलोगों के रास्ते पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं। और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौट कर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता दूँगा जो तुम ने किया होगा। (31: 15)
और जो कोई ऐसा करने से इंकार कर दे, तो [ऐ रसूल] उसका (आपकी बातों को मानने से) इंकार कर देना कहीं आपको बहुत दुखी न कर दे---- वे सब हमारे ही पास लौट कर आएंगे और फिर जो कुछ वे किया करते थे, हम उन्हें सब बता देंगे---- निस्संदेह अल्लाह दिलों के अंदर की बात तक जानता है----- (31: 23)
यदि तुम विश्वास नहीं करते (और शुक्र अदा नहीं करते), तो याद रखो अल्लाह को तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है, तब भी वह अपने बन्दों में (इंकार और) नाशुक्री को पसन्द नहीं करता; हाँ अगर तुम शुक्र अदा करते हो, तो वह [अल्लाह] उसे तुम्हारे अंदर देख कर ख़ुश होता है। कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों का) बोझ नहीं उठाएगा। फिर अंत में तुम सब को लौट कर (हिसाब-किताब के लिए) अपने रब के पास ही जाना है और (उस वक़्त) वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम (दुनिया में) किया करते थे : वह दिलों (के अंदर छुपी) हुई बातें (तक) अच्छी तरह जानता है. (39: 7)
उसकी तकलीफ़ व परेशानी के बाद, जब कभी हम उसे अपनी थोड़ी सी रहमत [दयालुता] का मज़ा उठाने देते हैं, तो वह यह बात ज़रूर कहता है, "यह सब तो मेरी ही कोशिशों का नतीजा है : मैं नहीं समझता कि क़यामत की घड़ी कभी आने वाली है, लेकिन अगर मुझे अपने रब की ओर वापस ले जाया भी गया, तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए सबसे अच्छा इनाम होगा।" मगर हम उन काफ़िरों को ज़रूर बताएंगे जो कुछ कर्म उन्होंने किए होंगे, और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे। (41:50)
और यह कि आदमी को (बदले में) बस वही कुछ मिलेगा जिसके लिए उसने कोशिश की होगी; (53: 39)
और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी (53: 40)
फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (53: 41)
और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (53: 42)
उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (58: 6)
[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच। क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा : सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (58: 7)
अत: आप कह दें, “जिस मौत से तुम भागते हो, वह तो तुम से मिलने ज़रूर आएगी, फिर तुम्हें उसकी ओर लौट कर जाना होगा, जो हर छिपी चीज़ भी जानता है और खुली चीज़ भी : वह तुम्हें हर चीज़ बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे।" (62: 8)
विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा : अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (64: 7)
उस दिन आदमी को बता दिया जाएगा, जो कुछ (दुनिया में कर्म कर के) उसने आगे भेजा था और जो कुछ (कर्मों का असर मरने के बाद) उसने पीछे छोड़ा था। (75: 13)
जब आसमान चीर कर अलग कर दिया जाएगा, (82: 1)
जब तारे (और ग्रह) गिर कर बिखर जाएंगे, (82: 2)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (82: 3)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) : (82: 4)
तो हर आदमी जान लेगा कि क्या (अच्छा/बुरा कर्म) उसने (दुनिया में) किया है, और क्या (कर्म) छोड़ आया है जो वह नहीं कर सका। (82: 5)
उस दिन, लोग अलग अलग टोली में (अपनी क़ब्रों से) निकल कर आएंगे ताकि उन्हें उनके किये गये कर्मों को दिखाया जाए : (99: 6)
जिस किसी ने कण भर भी अच्छाई की होगी, वह इसे देख लेगा, (99: 7)
और जिस किसी ने कण भर भी बुराई की होगी, तो वह उसे (भी) देख लेगा। (99: 8)
एक दिन आएगा जिस दिन किसी आदमी ने भलाई का जो भी काम (दुनिया में) किया होगा, (उसका बदला) वह अपने सामने मौजूद पाएगा, और बुराई का भी जो काम किया होगा (उसे भी सामने देखकर) वह कामना करेगा कि काश! उसके और उसके बुरे कर्मों के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता (कि ऐसा दर्दनाक नतीजा उसके सामने न आता!) अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि तुम उससे डर कर (बुराई से बचते) रहो, मगर अल्लाह अपने बंदों के लिए बड़ी मेहरबानी रखनेवाला है। (3: 30)
उन उसके कर्मों की बुराइयाँ उनपर प्रकट हो जाएँगी, और वही चीज़ें उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी जिनकी वे हँसी उड़ाया करते थे. (39: 48)
और (देखो!), पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और निर्धारित ज़कात [alms] दो। जो कुछ नेकियां तुम अपने लिए जमा करते हो, उसे अल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे : जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (2: 110)
………….. जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा, ….. (73: 20)
जो लोग इज़्ज़तदार और भोली-भाली ईमानवाली औरतों पर लांछन लगाते हैं, तो (याद रखो!) वे लोग इस दुनिया और आनेवाली दुनिया में अल्लाह के द्वारा ठुकरा दिए जाएंगें। एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में होगी, (24: 23)
जो कुछ वे करते रहे थे, उसके बारे में उस दिन ख़ुद उनकी ज़बानें, उनके हाथ और उनके पाँव उनके ही विरुद्ध गवाही देंगे---- (24: 24)
उस दिन, अल्लाह उन्हें उनके कर्मों के मुताबिक जो उचित बदला होगा, पूरा पूरा अदा कर देगा---- और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही वह सच्चाई है जो हर चीज़ को स्पष्ट कर देती है। (24: 25)
और उस दिन हम उनके मुँह को बंद करके सील कर देंगे, मगर उनके हाथ हमसे बातें करेंगे, और उनके पाँव उन कर्मों की गवाही देंगे, जो कुछ भी उन्होंने किया है। (36: 65)
एक दिन आएगा, जब अल्लाह के शत्रुओं को इकट्ठा करके (जहन्नम की) आग की ओर हँकाया जाएगा, फिर उन्हें श्रेणियों में बाँट कर खड़ा किया जाएगा, (41: 19)
यहाँ तक कि जब वे उस (आग) के पास पहुँच जाएँगे, तो उनके कान, उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगी, जो कुछ (बुरे कर्म) वे करते रहे थे। (41: 20)
वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति दी है, जिसने हर चीज़ को बोलने की ताक़त दी है-- उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी के पास तुम्हें वापस लाया गया है-- (41: 21)
तब भी, तुमने अपने आपको अपने कानों से, अपनी आँखों से और अपनी खालों से छुपाने की कोशिश नहीं की, ताकि तुम अपने कानों, आँखों और खालों को अपने ही विरुद्ध गवाही देने से रोक पाते. तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं है जो कुछ तुम करते रहे थे, (41: 22)
और (देखो!) जिस चीज़ के सच होने की तुम्हें जानकारी न हो, आँख बंद कर के उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछ्ताछ की जाएगी। (17: 36)
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