Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत ईसा [Jesus] अलै.
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत ईसा [Jesus] अलै.
(और फिर) जब ऐसा हुआ कि फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह तुझे अपने 'कलाम'[Word] के द्वारा (एक लड़के की) ख़ुशख़बरी देता है, जिसका नाम मसीह [Messiah], ईसा [Jesus] होगा और वह 'मरयम का बेटा' कहलायेगा, जिसकी इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी बड़ी इज़्ज़त होगी, और वह अल्लाह के यहाँ बड़ा पहुँचा हुआ और उसके नज़दीकी बंदों में से होगा। (3: 45)
(मरयम यह सुनकर) कहने लगी, "ऐ मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है, जबकि मुझे किसी मर्द ने छुआ तक नहीं?" (फ़रिश्ते ने) कहा, "अल्लाह जो चाहता है, इसी तरह पैदा कर देता है : वह जब किसी काम को करने का फ़ैसला कर लेता है, तो बस इतना ही कहता है, 'हो जा', और वह हो जाता है।” (3: 47)
[ऐ रसूल] इस क़ुरआन में मरयम [Mary] की कहानी को बयान करें. ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब की तरफ़ थी (19: 16)
और वहाँ वह एकांत में सबसे अलग थलग हो गयीं; तब हमने उसके पास अपनी रूह [फ़रिश्ते] को भेजा जो उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ. (19: 17)
(मरयम उसे देख कर घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब [रहमान] के नाम से तुझ से अपनी हिफ़ाज़त माँगती हूँ : अगर तुझे (अल्लाह का) कुछ भी डर है (तो मुझ से दूर हट जा)!" (19: 18)
मगर फ़रिश्ते ने कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ, ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे सकूँ।" (19: 19)
मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं बदचलन हूँ", (19: 20)
फरिश्ते ने कहा, "मगर होगा ऐसा ही! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से एक रहमत [blessing] होगी।" और यह ऐसी बात थी जिसका होना पहले से ही तय हो चुका था : (19: 21)
फिर उसे उस (होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया. वह लोगों से अलग हटकर एक दूर के स्थान पर चली गई (19: 22)
और, फिर प्रसव के दर्द [Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़ के नीचे ले आई. (जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) और वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (19: 23)
उस समय (पहाड़ी के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी, "चिंता न करो : तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी का एक सोता [Stream] बहा दिया है (19: 24)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (19: 25)
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना, “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के) रोज़े [मौन व्रत] की मन्नत मान रखी है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर सकती।" (19: 26)
(और इसी तरह) हम ने मरयम के बेटे [ईसा] और उसकी माँ को (अपनी सच्चाई की) एक निशानी बनाया; और हमने उन्हें एक ज़रा ऊँची शांत जगह पर, बहते हुए पानी के बीच, शरण दी (जहाँ उनके बेटे का जन्म हुआ). (23: 50)
फिर (ऐसा हुआ कि) वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई। (लड़के को गोद में देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या कर डाला! (19: 27)
ऐ हारून की बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (19: 28)
इस पर मरयम ने लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा). वे कहने लगे, "भला हम एक बच्चे से कैसे बात कर सकते हैं?" (19: 29)
(मगर लड़का) बोल उठा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब [Scripture] प्रदान की; मुझे नबी [Prophet] बनाया; (19: 30)
मुझे बरकतवाला [blessed] बनाया, चाहे मैं जहाँ भी रहूँ. और जब तक मैं ज़िंदा रहूँ, मुझे हुक्म दिया नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने का, (19: (31)
और अपनी माँ की (प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया. (19: 32)
(अल्लाह की ओर से) सलामती थी मुझ पर, जिस दिन मैं पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस दिन मैं मरूँगा, और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाऊँगा!" (19: 33)
ऐसा था मरयम का बेटा, ईसा [Jesus]!
यह है असल में सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं : (19: 34)
वह लोगों से उस वक़्त भी बात करेगा जब वह छोटा बच्चा होगा, और तब भी जब जवान होगा। वह नेक व अच्छे लोगों में से होगा। (3: 46)
और अल्लाह उस (होनेवाले बच्चे) को किताब और समझ-बूझ की शिक्षा देगा, और तौरात [Torah] और इंजील Gospel] का भी ज्ञान देगा, (3: 48)
"वह उसे रसूल बनाकर इसराईल की संतान की ओर भेजेगा : (वह कहेगा), "मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक निशानी लेकर आया हूँ : मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से चिड़िये जैसी आकृति बनाउंंगा, फिर उसमें फूँक मारुंगा और, अल्लाह के हुक्म से वह सचमुच की चिड़िया बन जाएगी; मैं अंधे और कोढ़ी को भला-चंगा कर दूँगा, और मुर्दे को अल्लाह की इजाज़त से फिर से ज़िंदा कर दूँगा; और मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में इकट्ठा करके रखते हो। अगर तुम सचमुच ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है। (3: 49)
उसके बाद अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा [Jesus]! याद करो मेरे उस ख़ास करम [favour] को, जो मैंने तुम पर और तुम्हारी माँ पर किया : किस तरह मैंने पवित्र आत्मा [holy spirit] से तुम्हें ताक़त दी थी, कि जब तुम (छोटे बच्चे थे, तो) पालने में भी लोगों से बात करते थे और बड़े उम्र के आदमी के रूप में भी; फिर किस तरह मैंने तुम्हें किताब और समझ-बूझ, तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] सिखा दी थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मिट्टी से चिड़िये की शक्ल जैसी चीज़ बनाते, फिर उसमें फूँक मारते थे, तो वह मेरे आदेश से (सचमुच की) चिड़िया बन जाती थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, अंधे और कोढ़ी [leper] मरीज़ को बिल्कुल चंगा कर देते थे; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मरे हुए आदमी को फिर से ज़िंदा खड़ा कर देते थे; और याद करो किस तरह, मैंने इसराईल की संतानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने से रोके रखा जब तुम उनके पास साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर पहुँचे थे, उनमें से जो विश्वास नहीं करनेवाले थे, वे कहने लगे, यह तो कुछ और नहीं, साफ़ जादूगरी है"; (5: 110)
और फिर (उन नबियों के बाद) उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर हमने मरयम के बेटे, ईसा (Jesus) को भेजा, ताकि उससे पहले उतरी हुई किताब 'तौरात' [Torah] की सच्चाई की पुष्टि हो जाए : हम ने उसे इंजील [Gospel] दी, रास्ता दिखानेवाली, रौशनी फैलानेवाली, और अपने से पहली उतरी किताब तौरात की पुष्टि करनेवाली ------ जो अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए (अच्छाई का) रास्ता दिखानेवाली और नसीहत बनकर आयी थी। (5: 46)
अतः इंजील के माननेवालों को चाहिए कि उसी के विधान के अनुसार फ़ैसला करें, जो अल्लाह ने उसमें उतारा है। (याद रखो!) जो कोई अल्लाह की उतारी हुई किताब के अनुसार फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नियमों को तोड़नेवाले हैं। (5: 47)
वह [क़ुरआन या ईसा का दोबारा आना] क़यामत की घड़ी की जानकारी देता है : अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो। मेरी बात मानो कि यही सीधा रास्ता है; (43: 61)
और (देखो!) ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें कहीं उस रास्ते से रोक दे, क्योंकि वह तुम्हारा पक्का दुश्मन है। (43: 62)
जब ईसा स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो उन्होंने (लोगों से) कहा, "मैं तुम्हारे पास ज्ञान व समझदारी की बातें लेकर आया हूँ; मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ मतभेदों को भी दूर करने आया हूँ। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और मेरी बात मान लो : (43: 63)
अल्लाह ही मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, तो उसी की बन्दगी करो : यही सीधा मार्ग है।" (43: 64)
इसके बावजूद उनमें से कई गुट आपस में एक दूसरे से सहमत न हुए -– तबाही है शैतानी करनेवालों की : वे एक दर्दनाक दिन की यातना को झेलेंगे! (43: 65)
"मैं तौरात, जो मुझ से पहले आयी है, की सच्चाई की पुष्टि करता हूँ और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए (आसानी पैदा करते हुए खाने की) कुछ उन चीज़ों को हलाल [lawful] कर दूँ जो हराम [forbidden] हुआ करती थीं। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक निशानी लेकर आया हूँ। तो अल्लाह से डरो, और मेरी आज्ञा मानो : (3: 50)
"अल्लाह मेरी भी रब है और तुम्हारा भी रब है, अतः तुम उसी की बन्दगी करो ----- यही सीधा मार्ग है।" (3: 51)
जब ईसा स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो उन्होंने (लोगों से) कहा, "मैं तुम्हारे पास ज्ञान व समझदारी की बातें लेकर आया हूँ; मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ मतभेदों को भी दूर करने आया हूँ। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और मेरी बात मान लो : (43: 63)
और (देखो!), किस तरह मैंने (ईसा के) शिष्यों [disciples] के दिल में यह बात डाली कि मुझ पर और मेरे रसूल पर विश्वास करो ----- तो उन्होंने कहा था, "हम विश्वास करते हैं, और (ऐ ख़ुदा) तू गवाह रहना कि हम अपने आपको (अल्लाह की भक्ति में) समर्पित करते हैं।" (5: 111)
फिर जब ईसा ने महसूस किया कि (उनकी बातों पर अभी तक) वे विश्वास नहीं करते, तो उसने कहा, "कौन है जो अल्लाह के रास्ते में मेरी मदद करेगा?" इस पर उनके शिष्यों [हवारियों] ने कहा, "हम अल्लाह के (काम में) मददगार होंगे; हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं ----- और आप गवाह रहें कि उसकी भक्ति में हमारा सिर झुक गया है। (3: 52)
ऐ रब! तूने जो कुछ उतारा है, हम उसपर विश्वास करते हैं और तेरे रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं : अत: हमारी भी गिनती उन लोगों में हो जो (सच्चाई की) गवाही देनेवाले हैं।" (3: 53)
और (देखो!) जब (ईसा के) शिष्यों ने कहा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तुम्हारा रब हमलोगों के लिए आसमान से खाने से भरा थाल उतार सकता है?" ईसा ने कहा, "अल्लाह से डरो, (और ऐसी फरमाइश न करो) अगर तुम पक्का ईमान रखते हो।" (5: 112)
वे बोले, "हम चाहते हैं कि उसमें से खाएँ; ताकि हमारे दिलों को संतोष मिल जाए; हम जान लें कि तूने जो कुछ बताया, वह सच था, और इस पर हम गवाह रहें।" (5: 113)
मरयम के बेटे, ईसा ने दुआ की, "ऐ अल्लाह, हमारे रब! हम पर आसमान से खाने से भरा थाल उतार दे, जो ख़ुशी का एक त्योहार बन जाए ----हम में से पहले और हम में से आख़िरी (आदमी) के लिए----- और तेरी तरफ़ से एक निशानी हो। हमें रोज़ी दो, कि तू सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (5: 114)
अल्लाह ने कहा, "मैं तुम्हारे लिए (खाने का थाल) भेज दूँगा, मगर इसके बाद भी अगर किसी ने विश्वास नहीं किया, तो उसे सज़ा दी जाएगी, ऐसी सज़ा जो पूरी दुनिया में किसी और को नहीं दूँगा।" (5: 115)
और (देखो) जब मरयम [Mary] के बेटे ईसा [Jesus] ने कहा, "ऐ इसराईल की संतानों! मैं अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे पास (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ, ताकि मैं तौरात [Torah] की (सच्चाई की) पुष्टि कर दूं, जो मुझसे पहले आयी थी, और मेरे बाद एक रसूल के आने की ख़ुशख़बरी भी दे दूं, जिसका नाम 'अहमद' होगा।" इसके बावजूद, जब वह [ईसा] उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो वे लोग कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादूगरी है।" (61: 6)
फिर हम ने (उन पैग़म्बरों के बाद) उनके क़दमों के निशान पर चलने के लिए दूसरे रसूलों को भेजा। उनके बाद हमने मरयम के बेटे ईसा को भेजा : हम ने उन्हें इंजील [Gospel] प्रदान की, और उनके मानने वालों के दिलों में करुणा [kindness] और दया रख दी। लेकिन (बाद में) जीवन से संन्यास लेकर अलग-थलग रहने की परम्परा [Monasticism] एक ऐसी चीज़ थी जो इन्होंने ख़ुद से शुरू कर दी------ हम ने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया था-----(ऐसा कर के) वे केवल अल्लाह की ख़ुशी चाहते थे, और अगर ऐसा था तब भी, वे उसको ठीक ढंग से निभा न सके। अतः उनमें से जिन लोगों ने विश्वास कर लिया था, हम ने उन्हें उसका इनाम दिया, मगर उनमें से ढेर सारे लोग नियमों को तोड़नेवाले थे। (57: 27)
फिर ऐसा हुआ कि उन यहूदियों ने (मसीह के ख़िलाफ़) अपनी चालें चलीं, तो अल्लाह ने भी अपनी चालों से उसका तोड़ किया, और अल्लाह (अगर चाल चलने पर आए, तो उस) से अच्छी चाल कोई नहीं चल सकता। (3: 54)
और कहा, “हमने मरयम के बेटे ईसा,मसीह [Jesus, the Messiah], अल्लाह के रसूल, को (सूली पर चढ़ाकर) क़त्ल कर डाला है,” (मगर सच्चाई यह थी कि) उन लोगों ने न तो उन्हें क़त्ल किया और न ही उन्हें सूली पर चढाया था, हालांकि उन लोगों को देखने में ऐसा ही लगा था (क्योंकि उनके जैसी शक्ल के एक आदमी को सूली चढ़ाया गया था); जो (ईसाई) लोग उसके (सूली दिए जाने और दोबारा ज़िंदा होने के) बारे में मतभेद रखते थे, वे संदेह से भरे हुए थे, अटकल पर चलने के अलावा उनके पास कोई जानकारी न थी : निश्चय ही उन (यहूदी) लोगों ने उसे [ईसा को] क़त्ल नहीं किया ---- (4: 157)
अल्लाह ने उन्हें [ईसा को] अपनी तरफ़ उठा लिया था। अल्लाह बड़े प्रभुत्ववाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (4: 158)
(और फिर) जब अल्लाह ने कहा, "ऐ ईसा! मैं तुझे (दुनिया से) वापस ले लूँगा और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा : मैं विश्वास न करनेवालों (द्वारा दिए जाने वाले दर्द) से तुझे पाक-साफ़ कर दूँगा। तेरे मानने वालों को क़यामत के दिन तक उन लोगों से ऊंचा रखूँगा, जिन्होंने विश्वास नहीं किया। फिर तुम सबको लौटकर मेरे ही पास आना है और फिर मैं तुम्हारे बीच उन बातों का फ़ैसला कर दूँगा, जिनके बारे में तुम मतभेद रखते हो। (3: 55)
"तो जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया, उन्हें इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी कड़ी यातना झेलनी पड़ेगी; (इस यातना से बचाने में) उनकी मदद कोई नहीं करेगा।" (3: 56)
जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह उनके कर्मों का उन्हें पूरा-पूरा बदला देगा ; अल्लाह अत्याचार करनेवालों को पसन्द नहीं करता। (3: 57)
अल्लाह की नज़रों में ईसा [Jesus] की मिसाल ठीक आदम [Adam] जैसी है : अल्लाह ने आदम को मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", और वह हो गया। (3: 59)
यह तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई है, अत: तुम उनमें से न हो जाना जो संदेह में पड़े रहते हैं। (3: 60)
इन रसूलों में से हम ने कुछ पर दूसरों से ज़्यादा फ़ज़ल [favour] किया था। इनमें कुछ तो ऐसे थे जिनसे अल्लाह ने बातचीत की; कुछ के दर्जे बुलंद कर दिए; हम ने मरयम के बेटे, ईसा [Jesus] को खुली निशानियाँ दीं, और पवित्र आत्मा [Holy Spirit] से उन्हें मज़बूती दी। अगर अल्लाह चाहता, तो जो लोग इन रसूलों के बाद पैदा हुए, वे स्पष्ट निशानियाँ पा लेने के बाद भी एक-दूसरे से न लड़ते। मगर (रसूलों के बाद) उनमें मतभेद हो गया : कुछ ने विश्वास कर लिया और कुछ (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़ गए। (यहाँ सबको सोचने और फ़ैसला करने की आज़ादी दी गयी है, वरना) अगर अल्लाह चाहता, तो वे एक-दूसरे से न लड़ते, मगर अल्लाह जो चाहता है, करता है। (2: 253)
ऐ किताबवालो! अपने दीन में हद से आगे न बढ़ जाओ, और अल्लाह के बारे में सच के सिवा कोई बात न कहो : मरयम [Mary] का बेटा, ईसा मसीह [Jesus, the Messiah] इससे ज़्यादा कुछ न था कि अल्लाह का रसूल था, उसकी एक 'वाणी' था, जिसे उसने मरयम तक पहुँचाया था, और एक 'रूह' थी जो अल्लाह की ओर से भेजी गयी थी। अत: अल्लाह पर और उसके रसूलों पर ईमान रखो, और यह बात न कहो कि (अल्लाह) "तीन" [Trinity] है ------ बंद करो! (यह कहना!), यही तुम्हारे लिए अच्छा होगा ---- पूजने के लायक़ तो बस एक ही अल्लाह है, वह इस बात से कहीं ऊपर है कि उसके लिए कोई बेटा हो, आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें उसी की हैं, और सबकी देखभाल के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। (4: 171)
जो लोग यह कहते हैं कि, "अल्लाह तीन [ख़ुदाओं-- यानी बाप, बेटा, और पवित्र रूह] में से तीसरा है", वे सचमुच सच्चाई से इंकार करते हैं : अल्लाह तो केवल एक ही है। जो कुछ वे कह रहे हैं, अगर ऐसा ही कहने पर अड़े रहे, तो उनमें से जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने पर तुले हुए हैं, उन्हें दर्दनाक यातना धर दबोचेगी। (5: 73)
तो फिर क्यों इन लोगों का झुकाव अल्लाह की तरफ़ नहीं होता कि उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें, जबकि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है? (5: 74)
जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम का बेटा, मसीह है", उन्होंने (सच्चाई से इंकार करते हुए) अल्लाह के आदेश को चुनौती दी है। वैसे ख़ुद मसीह ने कहा था, "ऐ इसराईल की सन्तानों! अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जिस किसी ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार (Partner) ठहराया, तो अल्लाह ने उसके जन्नत में जाने पर रोक लगा दी, और उसका ठिकाना जहन्नम होगा। कोई न होगा जो ऐसे बुरे काम करनेवालों की मदद करेगा।" (5: 72)
मसीह कभी भी इस बात को बुरा नहीं समझ सकता कि उसे अल्लाह का बन्दा समझा जाए, और न ही फ़रिश्तों ने कभी इसे बुरा समझा, जो कि अल्लाह के बड़े नज़दीकी हैं. (क़यामत के दिन) अल्लाह अपने सामने उन सारे लोगों को इकट्ठा करेगा जो उसकी बन्दगी करने को बुरा समझते हैं और घमंड करते हैं : (4: 172)
मरयम का बेटा, मसीह तो केवल एक रसूल था; उससे पहले भी बहुत-से रसूल आए और चले गए; उसकी माँ सच्ची व बड़ी नैतिकता वाली औरत थी; दोनों ही (मर-खप जानेवाले लोगों की तरह) खाते-पीते थे। देखो, किस तरह से हम इन निशानियों को उनके लिए स्पष्ट कर देते हैं; फिर भी देखो, ये कैसे धोखे में पड़े हुए है! (5: 75)
वह [ईसा मसीह] तो बस एक बंदे हैं, जिन पर हमने अपना ख़ास करम [favour] किया था और हमने उनको इसराईल की सन्तानों के लिए एक नमूना बनाया था : (43: 59)
अगर हमारी ऐसी इच्छा रही होती, तो (ठीक वैसे ही जैसे ईसा को बिना बाप के पैदा किया था), हम तुम में से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती पर एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते। (43: 60)
अल्लाह की नज़रों में ईसा [Jesus] की मिसाल ठीक आदम [Adam] जैसी है : अल्लाह ने आदम को मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", और वह हो गया। (3: 59)
जब अल्लाह कहेगा, 'ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तू ने लोगों से यह कहा था कि "अल्लाह के साथ मुझे और मेरी माँ को ख़ुदा बना लो?" ईसा कहेगा, "महिमावान है तू! मैं वह बात कभी नहीं कह सकता, जिसको कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है ------ अगर मैंने ऐसा कहा होगा, तो ज़रूर तुझे मालूम होगा : तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है, हालाँकि मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन के भीतर है, केवल तू ही है जो छिपी हुई सारी बातों को जाननेवाला है ----- (5: 116)
मैंने उन लोगों को केवल वही बताया था, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था : "अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जब तक मैं उनके बीच रहा, मैं उनके हाल पर नज़र रखता था. फिर जब से तूने मुझे उठा लिया, उस समय से तू ही अकेला उनकी निगरानी करता रहा है : तू तो सारी चीज़ों का गवाह है, (5: 117)
और अगर तू उन्हें यातना देना चाहे, तो ये तो तेरे ही बन्दे हैं; अगर तू उन्हें माफ़ कर दे, तो तू सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (5: 118)
अल्लाह के लिए यह बात कभी भी उपयुक्त नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। वह इन चीज़ों से बहुत ऊँचा है: उसकी शान तो यह है कि जब वह कोई काम करने का फ़ैसला करता है तो बस हुक्म देता है, "हो जा!" तो बस वह हो जाता है। (19: 35)
और (ईसा यही तो कहते थे), "निस्संदेह अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो: यही (सच्चाई का) सीधा मार्ग है।" (19: 36)
[ऐ रसूल], अब जबकि आपको (ईसा के इंसान होने की) बात की जानकारी दे दी गई, अगर इस बात पर (कि वह ख़ुदा थे) कोई आप से बहस करता है, तो कह दें, "आओ, हम अपने बेटों को बुला लें और तुम भी अपने बेटों को बुला लो, हम अपनी औरतों को बुला लें और तुम भी अपनी औरतों को बुला लो, हम अपने लोगों को और तुम अपने लोगों को ले आओ, फिर (सब मिलकर) सच्चे मन से दुआ करें और हम में से जो झूठ बोल रहा हो, उस पर अल्लाह की फिटकार [rejection] हो!" (3: 61)
(ऊपर जो बताया गया) यही है इस मामले की सच्चाई : अल्लाह के अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं; अल्लाह महान, और फ़ैसला करनवाला है। (3: 62)
अगर वे (सबको जमा करने के तरीक़े से) मुँह मोड़ते हैं, तो (जान रखो) कि जो कोई भी बिगाड़ पैदा करता है, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (3: 63)
आप कहें, "ऐ किताबवालो [यहूदी और ईसाई] आओ हम मिलकर एक ऐसी विचारधारा बनाएं, जो हम सबके लिए एक समान और मान्य हो : हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें, हम अल्लाह के साथ किसी को साझेदार [Partner] न ठहराएँ और हम में से कोई भी अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना रब न बनाएं।" फिर अगर वे (इस बात से) मुँह मोड़ें, तो कह दें, "गवाह रहना, हम तो अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकनेवाले हैं।" (3: 64)
और जब मरयम के बेटे [ईसा/Jesus] की मिसाल दी जाती है, तो उसपर [ऐ रसूल] आपकी क़ौम के लोग हँसते हैं, चिल्ला कर व्यंग्य करते हैं, (43: 57)
और कहते हैं, "हम जिन (फ़रिश्तों) को (अल्लाह की बेटी मानते हुए) पूजा करते हैं, वे बेहतर हैं या वह (ईसा, जिन्हें ईसाई अल्लाह का बेटा मानते हैं)?"--- वे केवल आपको चुनौती देने के लिए उनका उदाहरण देते हैं : वे बड़े ही झगड़ालू लोग हैं ---- (43: 58)
वह [ईसा मसीह] तो बस एक बंदे हैं, जिन पर हमने अपना ख़ास करम [favour] किया था और हमने उनको इसराईल की सन्तानों के लिए एक नमूना बनाया था : (43: 59)
अगर हमारी ऐसी इच्छा रही होती, तो (ठीक वैसे ही जैसे ईसा को बिना बाप के पैदा किया था), हम तुम में से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती पर एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते। (43: 60)
किताबवालों में से एक आदमी भी ऐसा न होगा, जो मरने से पहले (ईसा) पर विश्वास न कर ले, और क़यामत के दिन वह उन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह होंगे। (4: 159)
क़िस्सा अंताकिया [Antioch] शहर वालों का:
जब शायद ईसा अलै. के तीन साथी [Apostles] सीरिया के शहर अंताकिया में अल्लाह का संदेश पहुँचाने गए......
[ऐ रसूल] आप उनके सामने उन लोगों का उदाहरण बताएं जिनकी बस्ती में (अल्लाह का संदेश लेकर) रसूल आए थे। (36: 13)
हमने (शुरू में) दो रसूल [messengers] भेजे, मगर उन लोगों ने दोनों को मानने से इंकार कर दिया। फिर हमने तीसरे (रसूल) के द्वारा उनकी ताक़त बढायी, तब उन (रसूलों) ने कहा, "यक़ीन करो, हम तुम्हारे पास (अल्लाह का संदेश) लेकर आए हैं।" (36: 14)
उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो। रहम करनेवाले रब ने कोई भी चीज़ नहीं भेजी है; तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।" (36: 15)
उन (रसूलों) ने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए हैं (36: 16)
औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो बस तुम तक संदेश पहुँचा देने की है।" (36: 17)
वे जवाब में बोले, "हम तो तुम्हें अप-शगुन [evil omen] समझते हैं, यदि तुम नहीं माने तो हम तुम्हें पत्थर से मारेंगे, और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक यातना पहुँचेगी।" (36: 18)
रसूलों ने कहा, "तुम्हारा अप-शगुन तो तुम्हारे अपने अंदर है। तुमलोग इस चीज़ को अप-शगुन क्यों मानते हो, जबकि तुम्हें (सच्चाई की याद दिला कर) चेताया जा रहा है? असल में तुम लोग (गुनाहों में) बहुत दूर जा चुके हो!" (36: 19)
फिर शहर के दूसरे छोर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों का कहना मान लो। (36: 20)
इनके बताए हुए रास्ते पर चलो : वे तुम से कोई मज़दूरी तो नहीं मांग रहे हैं, और वे सीधे मार्ग पर हैं, (36: 21)
"और मैं उसकी बंदगी क्यों न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया? और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है। (36: 22)
मैं उस (अल्लाह) को छोड़ कर दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे बचा ही सकेंगे? (36: 23)
तब तो मैं साफ़ तौर से ग़लत रास्ते में पड़ जाऊँगा। (36: 24)
मैं तो आपके रब में विश्वास करता हूं, अतः मेरी बात सुनो!" (36: 25)
(अंतत: बस्तीवालों ने शायद उसे शहीद कर दिया, तब अल्लाह की तरफ से) कहा गया, “दाख़िल हो जाओ जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग यह बात जान पाते (36: 26)
कि किस तरह मेरे रब ने मुझे माफ़ कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में शामिल कर लिया!" (36: 27)
उसके बाद उसकी क़ौम पर हमने आसमान से कोई सेना नहीं उतारी और न हमें उतारने की कोई ज़रूरत थी : (36: 28)
वह तो केवल एक ज़ोरदार आवाज़ थी जिससे वे बेजान होकर गिर गए! (36: 29)
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