Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत सुलैमान (अलै.)/ Solomen (PBUH)
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत सुलैमान (अलै.)/ Solomen (PBUH)
हमने दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को बहुत ज्ञान दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने कहा था, "सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बंदों में हम पर ख़ास तौर से मेहरबानी [favour] की।" (27: 15)
औऱ दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को भी याद करें जब उन्होंने एक ऐसे खेत के झगड़े का फ़ैसला किया था जिस खेत में रात को लोगों की कुछ भेड़- बकरियाँ घुस कर उसे चर गई थीं। हम इस मामले पर होनेवाले फ़ैसले को देख रहे थे (21: 78)
और तब हमने सुलैमान को इस मामले में फ़ैसला करने की बेहतर समझ दे दी, हालाँकि हम ने दोनों को ही सही फ़ैसला करने की गहरी समझ और ज्ञान दिया था। ……….. हम ने ही ये तमाम चीज़ें की थीं--- (21: 79)
दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ. उसने कहा, "ऐ लोगो! हमें चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है : यह सचमुच (अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (27: 16)
और हमने दाऊद को सुलैमान [Solomon] (जैसा बेटा) दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता था। (38: 30)
(ऐसा हुआ कि) जब दिन ढलने के समय उसके सामने अच्छी नस्ल के, तेज़ दौड़नेवाले उम्दा घोड़ों की परेड करायी गयी, (38: 31)
तो वह (देखकर) कहता जाता, " मेरा इन उम्दा चीज़ों के प्रति प्रेम, असल में अपने रब को याद करने का एक ज़रिया है!" यहाँ तक कि वे (घोड़े) नज़रों से ओझल हो गए---- (38: 32)
"उन्हें मेरे पास वापस लाओ!" (सुलैमान ने कहा), फिर वह उनकी टांगों और गर्दनों पर हाथ फेरने लगा। (38: 33)
निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला, और हमने उसे (इतना कमज़ोर कर दिया कि वह) अपने तख़्त पर एक ढाँचा मात्र रह गया था। (38: 34)
फिर वह मेरी ओर (तौबा के लिए) झुका, और उसने दुआ की : "ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे! और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद फिर किसी की ऐसी हुकूमत न हो---- इसमें शक नहीं कि तू सबसे ज़्यादा दिल खोलकर देनेवाला है।" (38: 35)
तब हमने हवा को उसके वश में कर दिया, इस तरह जहाँ कहीं भी वह जाना चाहता, हवा उसकी इच्छा के अनुसार हौले-हौले चला करती थी। (38: 36)
हमने (समुद्र की) तूफ़ानी हवा को सुलैमान के वश में कर दिया था, जो उसके आदेश से (फ़िलिस्तीन व सीरिया जैसे) भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी---- और हम तो हर चीज़ की जानकारी रखते हैं---- (21: 81)
और हम ने कुछ जिन्नों [शैतानों] को उसके अधीन कर दिया था, जो उसके लिए (पानी में) ग़ोते लगाते थे और इसके अलावा कुछ दूसरे काम भी करते थे। और हम उन पर अपनी नज़र रखे हुए थे. (21: 82)
और (देखो!) सुलैमान [Solomon] के लिए हमने हवा को उनके वश में कर दिया था, जिसकी सुबह की यात्रा एक महीने में तय किए गए रास्ते जितनी होती, और (वापसी में) शाम की भी यात्रा एक महीने के रास्ते जितनी थी. और हमने उनके लिए पिघले हुए ताँबे/पीतल का सोता [fountain] बहा दिया, और जिन्नों में से भी कुछ (को उनके वश में कर दिया था, जो अपने रब के हुक्म से उनके अधीन काम करते थे। उन (जिन्नों) में से कोई भी अगर हमारे हुक्म से फिरता, तो हम उसे (जहन्नम की) भड़कती आग का मज़ा चखाते। (34: 12)
और जिन्नों (व शैतानों) को भी (उसके वश में कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करनेवाले और ग़ोताख़ोर थे, (38: 37)
और कुछ दूसरे (जिन्नात) भी थे जो ज़ंजीरों में जकड़े हुए रहते थे। (38: 38)
वे जिन्न सुलैमान के लिए वह सब कुछ बनाते जैसा वे चाहते थे ---- बड़े-बड़े (मेहराब वाले) भवन, प्रतिमाएँ, पानी के बड़े बड़े हौज़ और ज़मीन में जमी हुई देगें [cauldrons]. हम ने कहा, "ऐ दाऊद के ख़ानदानवालो! तुम ऐसे कर्म किया करो जिससे लगे कि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करने वाले हो, क्योंकि मेरे बंदों में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो सचमुच शुक्र अदा करते हैं।" (34: 13)
"यह हमारी तरफ़ से तोहफ़ा है, अब तुम्हारी मर्ज़ी--- चाहो तो इसमें से कुछ दो या अपने पास रखो! इस पर कोई हिसाब-किताब नहीं होगा।" (38: 39)
और इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है। (38: 40)
दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ. उसने कहा, "ऐ लोगो! हमें चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है : यह सचमुच (अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (27: 16)
(एक बार) सुलैमान के सामने जिन्नों, आदमियों और चिड़ियों से तैयार की हुई सेना एक ख़ास वरीयता के अनुसार क़तारों में खड़ी [marshalled] की गई, (27: 17)
और सेना जब चींटियों की घाटी में पहुँची, तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने अपने घरों में घुस जाओ। कहीं सुलैमान और उसकी सेना तुम्हें अंजाने में कुचल ही न डालें।" (27: 18)
सुलैमान उसकी बात सुनकर ज़ोर से मुस्कराए और कहा, "मेरे रब! मुझ में ऐसा गुण दे दे कि जो नेमतें [blessings] तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को दी हैं, मैं उनका शुक्र अदा करता रहूँ, और यह कि अच्छे कर्म करूँ जिसे तू ख़ुश हो जाए ; और अपने करम से मुझे अपने नेक व अच्छे बंदों के दर्जे में शामिल कर ले।" (27: 19)
फिर जब हमने सुलैमान की मौत का फ़ैसला किया तो उन (मज़दूरी करने वाले) जिन्नों को उनकी मौत का पता किसी और से नहीं, बल्कि भूमि के उस कीड़े से चला जो उनकी लाठी को खा रहे थे, (असल में लाठी पर टेका लगाए हुए उनकी मौत हो गयी थी, फिर कीड़ों के खाने से लाठी कमज़ोर पड़ कर टूट गयी) : फिर जब वह गिर पड़े, तब जाकर जिन्नों को उनके (मरने की) बात समझ में आयी---- अगर वे (सुलैमान की मौत की) छुपी हुई अंदेखी बातों को जानते होते, तो (उनके मरने के बाद भी) इस अपमानजनक मज़दूरी में लगे न रहते. (34: 14)
और (इसराईल की संतानें) इस (अल्लाह की किताब) की जगह, उस (जादू-मंतर) के पीछे चलने लगीं जिसे शैतानों ने सुलैमान [Solomon] की बादशाही के ज़माने में गढ़ लिया था। ऐसा नहीं था कि सुलैमान ने ख़ुद (सच्चाई को मानने से) इंकार [कुफ़्र] किया हो; असल में कुफ़्र तो शैतानों ने किया था। वे लोगों को जादू-टोना और जो कुछ बाबिल [Babylon] में दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतरा था, उसे सिखाते थे। हालाँकि इन दोनों ने कभी किसी को बिना पहले सावधान किए हुए कुछ नहीं सिखाया, वे (पहले ही यह बता देते थे कि), "हमें तो केवल बहकाने के लिए भेजा गया है---- तुम (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र] न कर बैठो।" इन्हीं दोनों (फ़रिश्तों) से उन लोगों ने यह सीखा कि कैसे मियाँ-बीवी के बीच झगड़ा पैदा किया जा सकता है, हालाँकि वे इसके द्वारा किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा पाते थे, सिवाए इसके कि जब अल्लाह की यही मर्ज़ी हो। उन्होंने (जादू-टोने की) वह चीज़ें तो सीखीं जिससे उन्हें नुक़सान पहुँचा, मगर (अल्लाह की किताब की) वह चीज़ें नहीं सीखीं जिससे उन्हें फ़ायदा पहुँचता, यह जानते हुए भी कि जिस किसी ने (जादू-टोने का ज्ञान) सीखा, उसके लिए आनेवाली दुनिया (की बरकतों) में कोई हिस्सा नहीं होगा। काश! कि वे जान पाते कि कितने घटिया (दाम पर) उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला! (2: 102)
सुलैमान और सबा की रानी [बिलक़ीस]:
सबा [Sheba] का हाल:
सच्चाई यह है कि (यमन में आबाद) सबा [Sheba] के लोगों के लिए ख़ुद उस जगह एक निशानी मौजूद थी जहाँ वे रहा करते थे ---- दो बाग़ थे, एक दाहिनी तरफ़ और दूसरा बायीं तरफ़ : "खाओ अपने रब की दी हुई रोज़ी में से और उसका शुक्र अदा करो, कि एक तो ज़मीन इतनी अच्छी सी और दूसरे रब इतना माफ़ करनेवाला।" (34: 15)
मगर उन लोगों ने (मार्गदर्शन पर) कोई ध्यान नहीं दिया, तो (नतीजे में) हमने उन लोगों पर (टूटे हुए) बाँध का सैलाब छोड़ दिया और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें ऐसे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल, झाऊ के पेड़ [Tamarisk bushes], और कुछ थोड़ी सी काँटेदार बेरियों के पेड़ [Lote tree] थे. (34: 16)
यह दंड हमने उन्हें इसलिए दिया कि उनलोगों ने नाशुक्री [कृतध्नता] की आदत अपना ली थी --- तो क्या ऐसा दंड हम ने किसी और को दिया सिवाए उनके जो बड़े नाशुक्रे [ungrateful] लोग थे? (34: 17)
और हमने उनके [यमन के] और उन बरकत वाली बस्तियों [सीरिया व फ़िलिस्तीन के इलाक़े] के बीच कुछ दूसरी बस्तियाँ बसा रखी थीं जो दूर से दिखायी देती थीं, और उनकी आसानी के लिए सफ़र को कई पड़ावों में बाँट रखा था --- (और कहा था), "चाहे रात का समय हो या दिन का, इन (बस्तियों) में बिना डरे यात्रा करो"--- (34: 18)
मगर तब भी, उन्होंने शिकायत की, "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रखी है।" (इस तरह) उन्होंने स्वयं अपने आप पर ही ज़ुल्म किया, और अंत में, नतीजा यह हुआ कि हम ने उन्हें (अतीत की) कहानियाँ बना डाला, औऱ उन्हें टुकड़े टुकड़े करके बिल्कुल छिन्न-भिन्न कर डाला। सचमुच, इस घटना में हर एक धीरज रखनेवाले और शुक्र अदा करने वाले आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं. (34: 19)
सचमुच, उन लोगों के बारे में शैतान [इबलीस] का विचार सही साबित हुआ, और सब लोग उसी (शैतान) के रास्ते पर चल पड़े--- केवल ईमानवालों के एक गिरोह को छोड़कर ---- (34: 20)
हालाँकि उस (शैतान) का उन लोगों पर कोई क़ब्ज़ा नहीं था. मगर (शैतान को बहकाने की क्षमता इसलिए दी कि) हम चाहते थे कि जो लोग आनेवाली ज़िंदगी [आख़िरत] पर विश्वास रखते हैं और जो लोग इसके बारे में सन्देह में पड़े हुए हैं --- उन दोनों के बीच का अंतर साफ़ साफ़ पता चल जाए : [ऐ रसूल] आपका रब हर चीज़ पर निगरानी रखता है. (34: 21)
सुलैमान और सबा की रानी
(एक बार) सुलैमान ने चिड़ियों की उपस्थिति की जाँच की और कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद [Hoopoe] को नहीं देख रहा हूँ? क्या वह यहाँ हाज़िर नहीं? (27: 20)
अगर उसने अपने यहाँ मौजूद न होने का कोई सही कारण न बताया, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे मार ही डालूँगा।" (27: 21)
लेकिन हुदहुद ने बाहर में ज़्यादा देर नहीं लगायी : उसने (आकर) कहा, "मुझे कुछ ऐसी बात पता चली है जो आपको मालूम नहीं है : मैं सबा [Sheba] से आपके पास एक पक्की ख़बर लेकर आया हूँ। (27: 22)
मैंने वहाँ एक औरत को उन लोगों पर शासन करते हुए पाया, जिसे हर चीज़ का एक हिस्सा दिया गया है---- उसका एक ज़बरदस्त सिंहासन है--- (27: 23)
(मगर) मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह के बजाए सूरज की पूजा करते हुए पाया। शैतान ने उन पर कुछ ऐसा (जादू) किया है कि उन लोगों को अपने (बुरे) कर्म बहुत भले मालूम होते हैं, और उन्हें सही मार्ग से भटका रखा है : वे सही मार्ग पर नहीं चल सकते। (27: 24)
क्या उन्हें उस अल्लाह की इबादत नहीं करनी चाहिए, जो आसमानों और ज़मीन में कहीं भी दबी-छिपी चीज़ें बाहर निकाल लाता है, और वह जानता है —-- उसे भी जो कुछ तुम छिपाते हो और उसे भी जो कुछ तुम सामने बता देते हो? (27: 25)
वह अल्लाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं, ज़बरदस्त सिंहासन का मालिक है।" (27: 26)
सुलैमान ने कहा, "हम देखेंगे कि तू सच कह रहा है या झूठ बोल रहा है। (27: 27)
मेरा यह ख़त लेकर जा, और इसे उन लोगों तक पहुँचा दे, फिर उनके पास से अलग हट जाना, और देखना कि वे क्या जवाब भेजते हैं।" (27: 28)
सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! एक बड़ा ही शानदार ख़त मेरे पास भेजा गया है। (27: 29)
वह सुलैमान की तरफ़ से है और उसमें यूँ लिखा है, “अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा मेहरबान, अत्यन्त दयावान है, (27: 30)
अपने आपको मुझ से ऊपर न समझो, और मेरे पास चली आओ (अल्लाह के सामने) झुकते हुए।" (27: 31)
सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! मेरे सामने जो मामला आया है, इस पर आप मुझे सही सलाह दें : (आप तो जानते हैं कि) मैं सारे मामलों का फ़ैसला हमेशा आप लोगों की मौजूदगी में ही करती हूँ।" (27: 32)
उन्होंने जवाब दिया, "हमारी सेना बहुत तगड़ी है और हम पूरी ताक़त से युद्ध लड़ते हैं, मगर कमान तो आपके हाथ में है, अतः आप सोच लें कि आपको क्या आदेश देना है।" (27: 33)
सबा की रानी ने कहा, "जब भी कभी राजा किसी शहर में (सेना के साथ) घुसते हैं, तो उसे खंडहर बना देते हैं और वहाँ के सरदारों को अपमानित करते हैं ---- वे भी ऐसा ही करेंगे। (27: 34)
मगर मैं उनके पास एक तोहफ़ा भेजने जा रही हूँ; फिर देखती हूँ कि मेरे दूत क्या उत्तर लेकर लौटते हैं।" (27: 35)
फिर जब वह दूत सुलैमान के पास पहुँचा, तो सुलैमान ने उससे कहा, "क्या! तुम क्या मुझे धन-दौलत देना चाहते हो? जो कुछ अल्लाह ने मुझे दे रखा है, वह उससे कहीं उत्तम है जो उसने तुम्हें दिया है, मगर तब भी तुम लोग अपने इस तोहफ़े से बड़े ख़ुश मालूम होते हो! (27: 36)
अपने लोगों के पास वापस चले जाओ : अब हम उन पर ज़रूर अपनी सेना के साथ चढ़ायी करेंगे जिसे रोक पाना उनके बस का नहीं, उन्हें अपमानित करके व नीचा दिखाते हुए हम उन्हें उस ज़मीन से खदेड़ देंगे।" (27: 37)
फिर सुलैमान ने कहा, "ऐ सरदारो! इससे पहले कि वे लोग हमारे पास झुके हुए आएँ, तुममें से कौन है जो उस (रानी) का सिंहासन लेकर मेरे पास आ सकता है?" (27: 38)
एक ताक़तवर और चालाक जिन्न ने जवाब दिया, "इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठें, मैं उस (सिंहासन) को आपके पास ले आऊँगा। मैं मज़बूत भी हूँ, और भरोसे के लायक़ भी।" (27: 39)
मगर उनमें से एक आदमी जिसे आसमानी किताब का ज्ञान था, कहने लगा, "मैं पलक झपकते ही उसे आपके पास ले आऊँगा।"
फिर जब सुलैमान ने उस सिंहासन को अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का मुझ पर एहसान है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं उसका शुक्र अदा करता हूँ या नहीं : अगर कोई शुक्र अदा करता है तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और अगर कोई उसका शुक्र अदा नहीं करता, तो मेरा रब किसी पर निर्भर तो नहीं, बल्कि देने में वह बड़ा उदार [generous] है।" (27: 40)
फिर उसने कहा, "उसके सिंहासन का रूप बदल दो, फिर देखेंगे कि वह उसे पहचान पाती है या नहीं।" (27: 41)
जब सबा की रानी वहाँ पहुँचीं तो उनसे पूछा गया, "क्या यह सिंहासन आपका है?" उसने कहा, "हाँ, देखकर लगता तो है”, (सुलैमान ने कहा), “हमें तो इस रानी से पहले ही (सही) ज्ञान दे दिया गया था, और हम अल्लाह के सामने भक्ति-भाव से अपने आपको झुकाते थे"; (27: 42)
मगर चूँकि अल्लाह के बजाए वह किसी और को [सूरज को] पूजती थी, इसलिए (अल्लाह में) विश्वास कर लेने [ईमान] से रानी अब तक रुकी रही थी, असल में वह एक इंकार करनेवाली [काफ़िर] क़ौम में से थी। (27: 43)
फिर सबा की रानी से कहा गया, "महल में दाख़िल हों।" मगर जब उसने वहाँ देखा, तो उसे ऐसा लगा कि पानी का एक गहरा हौज़ है और इसीलिए वह (अपने पाँव का कपड़ा उठाते हुए) नंगे पैर हो गयी। सुलैमान ने समझाया, "यह तो बस शीशे से बना हुआ महल है।" रानी बोली, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने (अब तक ग़लती करके) अपने आप पर ज़ुल्म किया : अब मैं, सुलैमान के साथ पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकती हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (27: 44)
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