Thematic Quran: क़यामत-II
Thematic Quran
क़यामत-II
और उस दिन कर्मों के वज़न को सही-सही और इंसाफ के साथ तौला जाएगा : जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी निकला, तो वही हैं जो कामयाब हो गए, (7: 8)
और जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा हल्का निकला, तो ये वही लोग होंगे जो हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते रहे, और नतीजे में अपने आपको घाटे में डाल बैठे। (7: 9)
क़यामत के दिन हम इंसाफ़ का तराज़ू लगा देंगे ताकि किसी के साथ थोड़ा भी ज़ुल्म न हो पाए, यहाँ तक कि अगर कोई (कर्म) राई के दाने के (वज़न के) बराबर भी हो, तो हम उसे भी सामने ला खड़ा करेंगे--- और हिसाब रखने के लिए हम काफ़ी हैं. (21: 47)
फिर जिनके पलड़े अच्छे कर्मों से भारी हुए तॊ वही हैं जो कामयाब हो जाएंगे, (23: 102)
मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (23: 103)
तो वह आदमी जिसके (अच्छे कर्मों) के पल्ले भारी होंगे, (101: 6)
उसका जीवन मनपसंद खुशी में होगा, (101: 7)
मगर जिस आदमी के (अच्छे कर्मों) के पल्ले हल्के होंगे, (101: 8)
तो उसका ठिकाना “हाविया” [बिना तल का गहरा गड्ढा/ Bottomless Pit] होगा------ (101: 9)
और आप क्या समझे कि “हाविया” क्या है?---- (101: 10)
(जहन्नम की) एक सख़्त दहकती हुई आग (का बहुत ही गहरा गड्ढा) है! (101: 11)
जब (जन्नत के) बाग़ को सही रास्ते पर चलनेवाले नेक लोगों के नज़दीक लाया जाएगा, (26: 90)
और (जहन्नम की) आग भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी, (26: 91)
उस दिन आदमी अपना सब किया-धरा याद करेगा, (79: 35)
और हर देखने वाले के लिए जहन्नम ज़ाहिर कर दी जाएगी। (79: 36)
और उस दिन जहन्नम (नरक) को सामने लाया जाएगा--- उस दिन इंसान को समझ आएगी, मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा? (89: 23)
और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी (81: 12)
और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी : (81: 13)
(लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा जोखा) वह लेकर आया है. (81: 14)
उस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई (इसमें आनेवाला) नहीं है?" (50: 30)
लेकिन नेक लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी : (50: 31)
और जब (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन लोगों को अलग-अलग (समूह में) बाँट दिया जाएगा : (30: 14)
अतः जिन लोगों ने ईमान रखा था और अच्छे कर्म किए थे, वे बाग़ [जन्नत] में खुशियाँ मनाएंगे, (30: 15)
किन्तु जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया था, और हमारी आयतों [संदेशों] को और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में हमारे सामने होने वाली पेशी को झूठ जाना था, वे सज़ा के लिए वहां पकड़ कर लाए जाएँगे। (30: 16)
[काफ़िरों से कहा जाएगा], "मगर ऐ अपराधियो! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (36: 59)
जिस (क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा. फ़रिश्ते कहेंगे, “तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक [barrier] लगी हुई है।” (25: 22)
और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे। (25: 23)
मगर उस दिन जो लोग जन्नत [बाग़] में होंगे, उनके पास रहने की जगह भी बहुत बेहतर होगी, और आराम करने की जगह भी बहुत अच्छी होगी। (25: 24)
उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि ताँता लग जाएगा, (25: 25)
उस दिन, वास्तव में सारा अधिकार [Authority] तो रहम व दया करनेवाले रब का ही होगा. विश्वास न करनेवालों के लिए वह दिन बड़ा ही कठिन होगा। (25: 26)
उस दिन शैतानी करनेवाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता! (25: 27)
हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (25: 28)
मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस (दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया। शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है।" (25: 29)
अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (54: 7)
वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर. (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (54: 8)
फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी, (74: 8)
सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा। (74: 9)
(सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा। (74: 10)
फिर जब वे (क़यामत) को पास आता देख लेंगे, तो विश्वास न करनेवालों के चेहरे काले पड़ जाएंगे, और (उनसे) कहा जाएगा, “यही है वह चीज़ जिसे (जल्द लाने की) तुम माँग किया करते थे।" (67: 27)
फिर, तुम सब क़यामत के दिन अपने रब के सामने आपस में झगड़ा व विवाद करोगे (39: 31)
उसका (शैतान) साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब! मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था।" (50: 27)
अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें (यातना की) चेतावनी भेजी थी (50: 28)
और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती : मैं अपने किसी बंदे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (50: 29)
वे लोग जो उन (पेशवाओं) के पीछे चलते थे, कहेंगे, "काश! हमें (दुनिया में फिर से जाने का) एक आख़िरी मौक़ा मिल जाए, तो हम भी उन (झूठे पेशवाओं को) पहचानने से इंकार कर दें, जैसा कि उन्होंने अब हमें पहचानने से इंकार कर दिया है." इस तरह, अल्लाह उनके कर्मों को उनके लिए एक दुखद पछतावे का ज़रिया बना देगा : वे अब किसी भी तरह (जहन्नम की) आग से निकल नहीं सकेंगे. (2: 167)
बड़े घाटे में पड़ गए वे लोग, जिन्होंने अल्लाह से होनेवाली मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, यहाँ तक कि जब अचानक (क़यामत की) वह घड़ी आ जाएगी, तो वे कहेंगे, "अफ़सोस हम पर कि हम ने यह बात नहीं मानी! "उनका हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर लादे हुए होंगे। कितना बुरा होगा वह बोझ! (6: 31)
(आनेवाली यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (10: 54)
जब (अल्लाह के) सच्चे वादे के पूरे होने का समय क़रीब आ जाएगा, तब ऐसा होगा कि विश्वास न करनेवालों की आँखें मारे डर के फटी की फटी रह जाएंगी, और वे कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! हम इस चीज़ को जानते ही न थे और पूरी तरह से भुलाए बैठे थे, बल्कि हम ही ग़लती पर थे।"(21: 97)
और उस दिन जहन्नम (नरक) को सामने लाया जाएगा--- उस दिन इंसान को समझ आएगी, मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा? (89: 23)
वह कहेगा “ ऐ काश! मैंने अपने (इस आने वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (89: 24)
सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (89: 25)
और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़ने वाला होगा। (89: 26)
हमने तुम्हें उस यातना से सावधान कर दिया है जो जल्द ही आनेवाली है, उस दिन जब हर आदमी उन (कर्मों) को अपनी आँखों से देख लेगा जो उसके हाथों ने आगे भेज रखे हैं, और जब विश्वास न रखनेवाला कहेगा, "काश! मैं मिट्टी होता! (कि यातनाओं से बच जाता!)" (78: 40)
[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैं, उसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है : वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी की फटी रह जाएँगी, (14: 42)
हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगे, नज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगे, और उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे. (14: 43)
[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएं, जब यातना उनके पास आ पहुंचेगी, उस समय इंकार करने वाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे : हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगे, और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा खा कर कहा करते थे कि ‘हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है’?" (14: 44)
तुम भी दूसरों की तरह उन्हीं बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने ख़ुद अपने ऊपर अत्याचार किया था, और तुम्हें साफ़ तौर से दिखाया गया था कि उनके साथ हमने कैसा सलूक किया----फिर हमने तुम्हें समझाने के लिए तरह तरह की मिसालें बयान कर दीं (फिर भी तुम ने शैतानी नहीं छोड़ी!)।" (14: 45)
उन लोगों ने (अपनी शैतानी चालों से हर तरह का) जाल बिछाया था, मगर उनका जाल चाहे पहाड़ को भी अपनी जगह से क्यों न हटा देता, तब भी अल्लाह के पास तो उनकी हर चाल का जवाब था। (14: 46)
(इंकार करनेवालों का हाल यह होगा कि) जब उनमें से किसी एक की मौत सिर पर आ खड़ी होगी, तब वह पुकारेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे (संसार में) वापस जाने दे (23: 99)
ताकि वहाँ जा कर अच्छे कर्म कर सकूँ जिन्हें मैंने छोड़ रखा था ।" हुक्म होगा: हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक कहने की बात है जो यह कह रहा है, अब ऐसा होनेवाला नहीं : ऐसे लोगों के पीछे एक रोक [barrier] लगी हुई है, जो उस दिन तक रहेगी जब वे दोबारा उठाए जाएँगे. (23: 100)
वे शैतानियाँ करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (26: 99)
और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करनेवाला है, (26: 100)
और न कोई सच्चा दोस्त है। (26: 101)
काश! अगर हम अपनी ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के ईमानवाले [मोमिन] हो जाते!" (26: 102)
[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करनेवालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे) : "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (32: 12)
या, जब वह यातना अपनी आँखों से देख ले, तो कहने लगे, "काश! मुझे एक बार (दुनिया में) वापस जाने का मौक़ा मिल जाए, तो मैं नेक लोगों में शामिल हो जाऊँ!" (39: 58)
[रब कहेगा] "हरगिज़ नहीं! मेरी आयतें तेरे पास आ चुकी थीं, किन्तु तूने उनको मानने से इंकार कर दिया : तू अपनी बड़ाई के घमंड में पड़ गया और इंकार करनेवालों [काफ़िरों] में शामिल हो गया”. (39: 59)
और क़यामत के दिन आप [ऐ रसूल] उन लोगों को देखेंगे जिन्होंने अल्लाह के ख़िलाफ झूठी बातें गढी थीं, कि उनके चेहरे काले पड़ गए हैं। क्या अहंकारियों का ठिकाना जहन्नम में नहीं है?" (39: 60)
उस वक़्त उनका क्या हाल होगा, जब उस (क़यामत के) दिन, जिसके आने में कोई शक नहीं, हम उन्हें अपने सामने इकट्ठा करेंगे और जब हर एक जान ने अपने कर्मों से जो कुछ कमाया होगा, उसका पूरा-पूरा बदला मिल जाएगा, और किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (3: 25)
एक दिन आएगा जिस दिन किसी आदमी ने भलाई का जो भी काम (दुनिया में) किया होगा, (उसका बदला) वह अपने सामने मौजूद पाएगा, और बुराई का भी जो काम किया होगा (उसे भी सामने देखकर) वह कामना करेगा कि काश! उसके और उसके बुरे कर्मों के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता (कि ऐसा दर्दनाक नतीजा उसके सामने न आता!) अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि तुम उससे डर कर (बुराई से बचते) रहो, मगर अल्लाह अपने बंदों के लिए बड़ी मेहरबानी रखनेवाला है। (3: 30)
हर जीव को मौत का मज़ा चखना होगा, और जो कुछ तुम्हारे कर्मों का बदला मिलना है, वह क़यामत के दिन ही पूरा-पूरा मिलेगा। जिस किसी को (जहन्नम की) आग से दूर रखा गया और बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दिया गया, वह कामयाब हो गया। इस दुनिया में तो केवल धोखे की खुशियां हैं : (3: 185)
डरो उस दिन से जिस दिन तुम सब लौटकर अल्लाह के सामने हाज़िर होगे : फिर हर एक आदमी ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया होगा, उसका बदला पूरा-पूरा उसे मिल जाएगा, और किसी के साथ भी कोई अन्याय नहीं होगा। (2: 281)
एक दिन आएगा जब हर एक जान (केवल) अपने अपने बचाव की दलीलें ले कर आएगी, तब हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार पूरा पूरा बदला चुका दिया जाएगा--- किसी के साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (16: 111)
उस दिन, अल्लाह उन्हें उनके कर्मों के मुताबिक जो उचित बदला होगा, पूरा पूरा अदा कर देगा----और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही वह सच्चाई है जो हर चीज़ को स्पष्ट कर देता है। (24: 25)
आज के दिन किसी जान पर रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा, और तुम्हें बदले में कुछ और नहीं, बल्कि वही मिलेगा जो कुछ कर्म तुम किया करते थे। (36: 54)
जिस दिन सब लोग (क़ब्रों से) निकल कर सामने हाज़िर होंगे, उनकी कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, (पूछा जाएगा) "आज किसकी बादशाही है?" (जवाब होगा), "उसी एक अल्लाह की, जो सब पर क़ाबू रखनेवाला है. (40: 16)
आज के दिन हर आदमी को उसके (कर्मों की) कमाई का बदला दिया जाएगा; आज कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है." (40: 17)
(और जो कुछ भी हो) वह एक समुदाय था जो गुज़र चुका : जो कुछ उसने (अपने कर्मों से) कमाया, वह उसके लिए था, और जो कुछ तुम (अपने कर्मों से) कमाओगे, वह तुम्हारे लिए होगा। तुम्हें उनके कर्मों के बारे में कोई जवाब नहीं देना होगा। (2: 141)
[ऐ रसूल, आप यहूदियों और ईसाइयों से] कह दें, "तुम हम से अल्लाह के बारे में कैसे बहस कर सकते हो, जबकि वह हमारा भी रब है और तुम्हारा भी? हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हम तो पूरी भक्ति से उसी के आगे सिर झुकाते हैं।" (2: 139)
नेकी की राह चलनेवालों को किसी भी तरह से, ग़लत काम करनेवालों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा; उनके ज़िम्मे तो बस इतना है कि उन्हें नसीहत [Remind] करते रहें, ताकि वे (बुराइयों से) बच सकें। (6: 69)
(देखो!) अब तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण आ चुका है : अगर कोई उसे देखता है, तो वह उसके ही फ़ायदे के लिए होगा; और अगर कोई इससे अंधा बना रहा, तो उससे नुक़सान भी उसी का होगा-----(कह दें) “मैं तुम्हारी देखरेख करनेवाला नहीं हूँ। (6: 104)
इस तरह हम अपनी आयतें तरह तरह से समझा कर बयान करते हैं-----(कि वे सुने), हालांकि वे यही कहेंगे, "तुम [मुहम्मद] कहीं से पढ़-पढ़ा लेते हो" --- ताकि उनके लिए यह स्पष्ट हो जाए, जो समझ रखते हैं। (6: 105)
कर्मों के अनुसार हर एक का (अलग-अलग) दर्जा ठहरा दिया गया है; और जो कुछ वे करते हैं, तुम्हारा रब उससे अनजान नहीं है। (6: 132)
आप पूछें, "क्या (तुम चाहते हो कि) मैं अल्लाह को छोड़कर कोई दूसरा रब ढूँढ लूँ, जबकि वही हर चीज़ का पालनहार है?" और (देखो!) हर एक आदमी अपने कर्मों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है; कोई आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम सब को अंत में, अपने रब के पास लौटकर जाना है, और तब वह तुम्हें बता देगा कि जिन बातों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (6: 164)
मुझे यह हुक्म हुआ है कि मैं क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ.” तो जो कोई भी सीधे रास्ते पर चलना पसंद करता है, वह ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करता है। और जो कोई भी इस [सीधे रास्ते] से भटकता है, उससे कह दें, "मैं तो बस सावधान ही करनेवाला हूँ।" (27: 92)
अतः [ऐ रसूल] आप उन लोगों को उसी (सच्चे दीन) की ओर बुलाते रहें, और ख़ुद सीधे रास्ते पर चलते रहें, जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है। उनलोगों की इच्छाओं का पालन न करें, और कह दें, "अल्लाह ने जो भी किताब उतारी है, मैं उसमें विश्वास रखता हूं। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह तो हमारा भी रब है और तुम्हारा भी रब है --- हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म--- हमारे और तुम्हारे बीच (अब) कोई झगड़ा-बहस नहीं होना चाहिए ---- अल्लाह हम सबको (एक दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, और अन्ततः उसी के पास सबको लौट कर जाना है।" (42: 15)
कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों) का बोझ नहीं उठाएगा : यहाँ तक कि अगर कोई भारी बोझ से दबा हुआ आदमी भी मदद के लिए पुकारे, तब भी उसका बोझ कोई नहीं उठाएगा, चाहे वह उसका नज़दीकी सम्बन्धी ही क्यों न हो। मगर [ऐ रसूल] आप तो केवल उन्हें सावधान कर सकते हैं जो अपने रब से डरते हों, हालाँकि उसे देख भी नहीं सकते, और नमाज़ को पाबन्दी से पढते हों---- और जिस किसी ने (बुराइयों से) अपने आपकी शुद्धी की, तो यह काम उसने अपने ही भले के लिए किया--- और हर चीज़ को लौटकर अल्लाह ही के पास जाना है। (35: 18)
इसलिए कि ज़मीन में वे (अपने को बड़ा समझते हुए) और भी घमंडी हो गए, और उनकी शैतानी चालों में और भी तेज़ी आ गयी--- मगर जो शैतानी चालें चलते हैं, वह ख़ुद ही अपनी चालों के घेरे में आ जाते हैं। जैसा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के साथ हुआ, क्या वे उससे कुछ अलग बर्ताव की उम्मीद लगाए बैठे हैं? वैसे तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे; और न तुम कभी उसमें कोई फेर-बदल ही पाओगे। (35: 43)
[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया : (53: 33)
उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया. (53: 34)
क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आनेवाली दुनिया को] देख सकता है? (53: 35)
क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (53: 36)
और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया : (53: 37)
कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (53: 38)
कह दें, "जो अपराध (गुनाह) हम से हुआ हो, उसके बारे में तुम से नहीं पूछा जाएगा, और जो कुछ तुम करते हो, उसके बारे में हम से कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।" (34: 25)
फिर उस दिन न किसी इंसान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन्न से। (55: 39)
छोड़ दें ऐसे लोगों को उनके हाल पर, जिन्होंने अपने धर्म को खेल-तमाशा और भटकाव की चीज़ बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है, मगर उन्हें (क़ुरआन द्वारा) नसीहत करते रहें, कि कहीं ऐसा न हो कि कोई इंसान अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में पड़ जाए----- कोई न होगा जो उसे अल्लाह से बचा सके, और न ही कोई सिफ़ारिश करनेवाला होगा; वह अपने छुटकारे के बदले में जो कुछ भी [ransom] देना चाहे, उसे क़बूल नहीं किया जाएगा। ऐसे ही लोग हैं जो अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में छोड़ दिए गए : उनके पीने के लिए खौलता हुआ पानी होगा और दर्दनाक यातना होगी, क्योंकि वे (सच्चाई का) इंकार करते रहे थे। (6: 70)
"आज के दिन तुमसे या उन (काफ़िर) लोगों से जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उनकी जानों के बदले कोई क़ीमत [फ़िदया/ ransom] स्वीकार नहीं की जाएगी : तुम्हारे रहने की जगह (जहन्नम की) आग है----- वही (तुम्हारी रक्षक है, और) तुम्हारे लिए सही जगह है---- किया ही बुरा ठिकाना है वह!" (57: 15)
जब कोई दोस्त अपने किसी दोस्त को पूछेगा तक नहीं, (70: 10)
यहां तक कि वह एक दूसरे की नज़र के सामने दिखायी भी दे जाएंगे। अपराधी आदमी यह इच्छा करेगा कि उस दिन की यातना (से रिहाई) के बदले में अपने बेटे को कुर्बान कर दे, (70: 11)
अपनी पत्नी, अपने भाई (दे डाले), (70: 12)
अपना (पूरा) ख़ानदान (भी दे दे) जो उसे शरण देता था, (70:13)
और जितने लोग भी जमीन में रहते हैं, इन सबको (बदले में दे कर) अपने आपको (यातना से) बचा ले। (70: 14)
लेकिन नहीं! वह (जहन्नम) तो एक भड़कती हुई आग है, (70: 15)
(सिर और बदन के) सभी अंगों की खाल उतार देने वाली है, (70: 16)
वह हर उस आदमी को बुला लेगी जिसने (सच्चाई से) पीठ फेरी और मुँह मोड़ा होगा, (70: 17)
और (जिसने) धन दौलत इकट्ठा की, फिर उसे जमा कर कर के रखा [लोगों को बाँटा नहीं]। (70: 18)
फिर जब कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ (क़यामत) आ जाएगी ---- (80: 33)
उस दिन आदमी भाग खड़ा होगा अपने भाई से, (80: 34)
अपनी माँ और अपने बाप से, (80: 35)
अपनी पत्नी और अपने बच्चों से (भी) : (80: 36)
उस दिन हर एक को अपनी-अपनी ही पड़ी होगी : (80: 37)
ऐ ईमानवालो! जो कुछ (माल व दौलत) हम ने तुम्हें दे रखा है, उसमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न कोई मोल-भाव होगा, न कोई दोस्ती-यारी (काम आएगी), और न कोई सिफ़ारिश हो सकेगी। (सच्चाई से) इंकार करनेवाले ही वे लोग हैं जो भारी ग़लती पर हैं। (2: 254)
मेरे वह बन्दे जो ईमान लाए हैं उनसे कह दें कि इससे पहले कि वह [क़यामत का] दिन आ जाए जिस दिन न तो किसी सामान का लेन-देन हो सकेगा, न किसी से दोस्ती काम आएगी. (अत: इसके लिए तैयारी कर लें) वे नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ा करें, और हमने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से छिप कर और सबके सामने भी ख़र्च किया करें. (14: 31)
[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाए. (40: 18)
सो आज के दिन यहाँ उसका कोई भी असली दोस्त व मददगार नहीं है, (69: 35)
(यह) वह दिन होगा जब कोई भी जान किसी दूसरे के लिए कुछ भी नहीं कर सकेगी; और उस दिन (हर) आदेश, अल्लाह का ही चलेगा। (82: 19)
(ईमानवालो), इस दुनिया में तो तुम इन लोगों की तरफ़ से बहस कर रहे हो, मगर क़यामत के दिन उनकी तरफ़ से अल्लाह के साथ कौन बहस करेगा? उनके बचाव में कौन होगा? (4: 109
फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है; (44: 40)
जिस दिन कोई दोस्त, किसी दूसरे के कुछ काम न आ सकेगा। (44: 41)
उनमें से किसी की कोई मदद नहीं की जाएगी, सिवाए उन लोगों के जिन पर अल्लाह दया कर दे : वह बहुत ताक़तवाला, और बेहद दयावान रब है। (44: 42)
जब कोई दोस्त अपने किसी दोस्त को पूछेगा तक नहीं, (70: 10)
उस दिन सभी दोस्त एक-दूसरे के दुश्मन होंगे, मगर नेक व बुराइयों से बचनेवाले [मुत्तक़ी] लोगों को छोड़ कर ---- (43: 67)
उस दिन न माल काम आएगा और न बाल-बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (26: 88)
और उस दिन केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उसके ही सामने झुकनेवाला हो।" (26: 89)
ऐ लोगों! अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचो, और उस दिन से डरो जब किसी भी तरह से न कोई माँ-बाप (मदद के लिए) अपने बच्चे की जगह ले पायेगा और न ही कोई बच्चा अपने माँ-बाप की जगह ले पायेगा। अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः देखना कि यह सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाल दे, और न ही अल्लाह के बारे में कोई (शैतान) धोखेबाज़ तुम्हें धोखे में डाल सके। (31: 33)
अल्लाह के ख़िलाफ़ न उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी, और न उनके बाल-बच्चे----- वे जहन्नम (की आग) में रहनेवाले हैं, उसी में हमेशा रहेंगे। (58: 17)
क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद : वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (60: 3)
और जिस किसी ने (अपने माल को अल्लाह की राह में ख़र्च करने में) कंजूसी की, और (अल्लाह से) अलग हो कर अपने आप में मगन रहा, (92: 8)
जिसने अच्छाई की बात को मानने से इंकार किया---- (92: 9)
तो हम उसे तकलीफ़ की मंज़िल [जहन्नम] तक पहुँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे, (92: 10)
और जब वह तबाही (के गड्ढे) में गिरेगा तो उसका माल उसके किसी काम नहीं आएगा। (92: 11)
जिस दिन (दिलों में) छुपी बातें सामने आ जाएंगी (और उन्हें परखा जाएगा), (86: 9)
फिर आदमी के पास न (स्वयं) कोई ताक़त होगी, और न कोई (उसको) मदद करने वाला होगा। (86: 10)
यह ऐसा दिन होगा कि वे (कुछ) बोल भी नहीं सकेंगे, (77: 35)
और न ही उन्हें कोई मौक़ा दिया जाएगा कि वे कोई बहाने पेश कर सकें। (77: 36)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए! (77: 37)
एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने (सच्चाई में) विश्वास करने से इंकार किया होगा उन्हें इस बात की कोई अनुमति न होगी कि वे कोई बहाने बना सकें या अपनी भूल-चूक में सुधार कर सकें। (16: 84)
जब वह दिन आ जाएगा, तो किसी की मजाल नहीं होगी कि बिना अल्लाह की अनुमति के कोई मुंह खोल सके, फिर (इंसानों में) कुछ तो ऐसे होंगे जो बड़े दुखी व अभागे होंगे और कुछ बड़े ख़ुश व भाग्यशाली। (11: 105)
(लेकिन क़यामत के दिन उसके रोब व जलाल का हाल यह होगा कि) उन्हें अल्लाह के सामने कुछ बोलने की अनुमति नहीं होगी। (78: 37)
उस दिन जब जिबराईल [रूहुल अमीन] और (सभी) फरिश्ते क़तार में खड़े होंगे, वे कुछ नहीं बोलेंगे सिवाए उनके, जिन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] ने बोलने की इजाज़त दी हो, और जो वही बात कहेगा जो सही हो। (78: 38)
वह (फैसले का) दिन तो सच्चाई का दिन है। अत: जो कोई (कामयाबी) चाहता है, उसे ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जो उसके रब के पास ले जाता हो। (78: 39)
उस दिन शैतानी करनेवालों के कोई भी बहाने उनके किसी काम न आएंगे : उन्हें (अपनी ग़लतियों में) सुधार करने का कोई मौक़ा नहीं दिया जाएगा। (30: 57)
जिस दिन शैतानी करनेवालों के (अपनी सफ़ाई में) किए गए बहाने, उन्हें कुछ भी लाभ न पहुँचाएंगे, बल्कि उनके लिए तो फटकार होगी और रहने के लिए सबसे बुरा घर होगा. (40: 52)
कह दें, "सिफ़ारिश तो सारी की सारी अल्लाह के ही अधिकार में है। उसी के क़ब्ज़े में आसमानों और ज़मीन की बादशाही है। फिर उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।"(39: 44)
ऐ ईमानवालो! जो कुछ (माल व दौलत) हम ने तुम्हें दे रखा है, उसमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न कोई मोल-भाव होगा, न कोई दोस्ती-यारी (काम आएगी), और न कोई सिफ़ारिश हो सकेगी। (सच्चाई से) इंकार करनेवाले ही वे लोग हैं जो भारी ग़लती पर हैं। (2: 254)
अल्लाह के सिवा कोई पूजने के लायक़ (ख़ुदा) नहीं : वह हमेशा ज़िंदा रहनेवाला, पूरी कायनात को सम्भाले रखनेवाला, (और हर चीज़ पर नज़र रखनेवाला है)। उसे न तो झपकी लगती है और न उस पर नींद हावी होती है। आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है जो उसके सामने उसकी इजाज़त के बिना, सिफ़ारिश कर सके? जो कुछ हालात उन (इंसानों) के आगे हैं और जो कुछ उनके पीछे (गुज़र चुके) हैं, वह सब जानता है, मगर वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को नहीं समझ सकते, सिवाए उतने ज्ञान के जितना वह बताना चाहे। उसका तख़्त [साम्राज्य] समूचे आसमान और ज़मीन में फैला हुआ है; इन दोनों पर नज़र रखने और उसकी हिफ़ाज़त करने में उसे कोई थकान नहीं होती। वह सबसे ऊँचा और सबसे महान है। (2: 255)
उस दिन सिफ़ारिश करना-कराना किसी के अधिकार में न होगा, सिवाए उनके जिन्होंने दयालु रब [रहमान] से इसकी अनुमति पा ली हो। (19: 87)
उस दिन किसी की सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाए उसके, जिसको रब [रहमान] ख़ास इजाज़त दे दे, और जिसकी बात को मंज़ूर कर ले ---- (20: 109)
जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, अल्लाह उनके सब (भूत व भविष्य को) जानता है, और वे बिना इजाज़त किसी मामले में दख़ल नहीं दे सकते, सचमुच वे तो ख़ुद ही उसके भय से सहमे रहते हैं. (21: 28)
[ऐ रसूल] आप कह दें, " पुकार कर देखो उनको, जिन्हें तुम ने अल्लाह को छोड़कर अपना ख़ुदा बना रखा है : आसमानों और ज़मीन में कण भर चीज़ भी उनके नियंत्रण में नहीं है, न ही (किसी मामले में अल्लाह के साथ) उनका कोई हिस्सा है और न उनमें से कोई अल्लाह के किसी काम में सहायक है।" (34: 22)
आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब खुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (53: 26)
आप इस क़ुरआन के द्वारा उन लोगों को सावधान कर दें, जो इस बात का डर रखते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने इकट्ठा किया जाएगा-----उस (अल्लाह) के सिवा कोई न होगा जो उन्हें बचा सके और न कोई सिफ़ारिश करनेवाला होगा ---- शायद कि ये बुराइयों से बचनेवाले हो जाएं। (6: 51)
छोड़ दें ऐसे लोगों को उनके हाल पर, जिन्होंने अपने धर्म को खेल-तमाशा और भटकाव की चीज़ बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है, मगर उन्हें (क़ुरआन द्वारा) नसीहत करते रहें, कि कहीं ऐसा न हो कि कोई इंसान अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में पड़ जाए----- कोई न होगा जो उसे अल्लाह से बचा सके, और न ही कोई सिफ़ारिश करनेवाला होगा; वह अपने छुटकारे के बदले में जो कुछ भी [ransom] देना चाहे, उसे क़बूल नहीं किया जाएगा। ऐसे ही लोग हैं जो अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में छोड़ दिए गए : उनके पीने के लिए खौलता हुआ पानी होगा और दर्दनाक यातना होगी, क्योंकि वे (सच्चाई का) इंकार करते रहे थे। (6: 70)
और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करनेवाला है, (6: 100)
और न कोई सच्चा दोस्त है। (6: 101)
उनलोगों ने जिनको (शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझेदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करनेवाला न होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझेदारों को मानने से इंकार कर देंगे। (30: 13)
यह तो अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को और वह सारी चीज़ें जो दोनों के बीच में हैं, छह दिनों में पैदा किया। फिर उसने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया। तुम (लोगों) के पास उस (अल्लाह) के सिवा कोई नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके, और न कोई है जो तुम्हारे लिए सिफ़ारिश कर सके। तो फिर क्यों तुम (नसीहत पर) ध्यान नहीं देते? (32: 4)
मैं उस (अल्लाह) को छोड़ कर दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे बचा ही सकेंगे? (36: 23)
[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाए. (40: 18)
यह लोग उस (अल्लाह) को छोड़कर जिन ख़ुदाओं को पुकारते हैं, उन्हें तो (अल्लाह से) पैरवी करने का भी कोई अधिकार नहीं है, हाँ उन लोगों की बात अलग है (जिन्हें अल्लाह ने ऐसा करने की अनुमति दी हो) जिन्होंने सच्ची बात की गवाही दी, और उस (सच्चाई) को पहचाना। (43: 86)
“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”, (74: 46)
“(और हम यूँ ही रहे) यहां तक कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”, (74: 47)
सो (उस समय) सिफारिश करने वालों की सिफारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (74: 48)
जो कोई अच्छाई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलता है, तो वह उससे होनेवाले फ़ायदे में हिस्सेदार होगा, और जो कोई बुराई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलेगा, तो वह उससे होनेवाली बुराई के बोझ का हिस्सेदार होगा : अल्लाह को हर चीज़ पर नियंत्रण हासिल है। (4: 85)
हर समुदाय [उम्मत] के लिए एक रसूल भेजा गया है, और (क़यामत के दिन) जब उनके रसूल (गवाही देने के लिए) आ जाएंगे, तो उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा; और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (10: 47)
(आनेवाली यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (10: 54)
हमने इसराईल की सन्तानों को (फिलिस्तीन जैसी) अच्छी जगह पर बसा दिया, और उन्हें जीवन चलाने के लिए अच्छी रोज़ी प्रदान की। फिर (सच्चे दीन पर) उनका आपस में मतभेद जब भी हुआ, उनके पास (कई रसूल) ज्ञान के साथ आते रहे थे। (फिर भी) उनके बीच जिन बातों को लेकर मतभेद रहा था, आपका रब क़यामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा। (10: 93)
(क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाय इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आप ही को मलामत करो. (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदर [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी, (22)
(क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाय इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आप ही को मलामत करो. (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदर [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी, (14: 22)
जिस दिन वे हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं! (19: 38)
[ऐ रसूल] आप उन्हें ‘पछतावे के दिन’ [Day of Remorse] से सावधान कर दें, जब इन मामलों का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल यह है कि वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं. (19: 39)
रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के माननेवाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (22: 17)
[ऐ रसूल], आपका रब है जो क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं। (32: 25)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (39: 69)
यक़ीन रखो कि ऐसे लोगों के लिए आसमान के दरवाज़े कभी नहीं खोले जाएंगे, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया और अपनी अकड़ में उन्हें ठुकरा दिया; उनका जन्नत में दाख़िल होना ऐसा ही है जैसे, ऊँट (या मोटी रस्सी) का सूई के नाके में से गुज़र जाना। मुजरिमों को हम इसी तरह उनके जुर्म की सज़ा देते हैं---- (7: 40)
जहन्नम उनके लिए आराम करने की जगह होगी (जहाँ आग का बिस्तर होगा) और उनके ऊपर परत दर परत, आग ही की चादर होगी-----शैतानी करनेवालों को हम ऐसी ही यातना देते हैं। (7: 41)
एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है---- (14: 48)
उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे, (14: 49)
उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (14: 50)
(सबका फ़ैसला कर दिया जाएगा) ताकि अल्लाह हर एक जान को (उसके कर्मों का) बदला दे सके जिसका वह हक़दार है : अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है. (14: 51)
शैतानियाँ करनेवाले लोग उस भड़कती आग को देखेंगे और समझ जाएंगे कि वे उसमें गिरने ही वाले हैं : वे वहाँ से बच निकलने का कोई रास्ता न पाएँगे। (18: 53)
और अपराधियों को जहन्नम की ओर प्यासे जानवरों की तरह हँका के ले जाएँगे। (19: 86)
शैतानियाँ करनेवाले लोग जब अपने रब के पास लौट कर आएंगे, तो (अपने कर्मों के) बदले में जहन्नम पाएंगे : वहीं उन्हें (हमेशा) रहना है, जहाँ वे न मर सकेंगे, न जी सकेंगे। (20: 74)
जिस (क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा. फ़रिश्ते कहेंगे, “तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक [barrier] लगी हुई है।” (25: 22)
और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे। (25: 23)
और जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन गुनाहगार एकदम से निराश हो जाएँगे। (30: 12)
[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करनेवालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे) : "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (32: 12)
उस आदमी से बढकर ग़लत काम [ज़ुल्म] करनेवाला कौन होगा जिसके सामने जब उसके रब की आयतों को पढ़कर सुनाया जाता है, तो वह उनसे मुँह मोड़ कर चला जाए? निश्चय ही हम अपराधियों को कड़ी सज़ा देंगे। (32: 22)
[काफ़िरों से कहा जाएगा], "मगर ऐ अपराधियो! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (36: 59)
क्या मैंने तुम्हें यह आदेश नहीं दिया था, ऐ आदम के बेटो!, कि शैतान की पूजा न करो क्योंकि सचमुच वह तुम्हारा खुला दुश्मन है, (36: 60)
बल्कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है (36: 61)
उसने तुममें से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सही मार्ग से भटका दिया। तो क्या तुम ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया? (36: 62)
यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती थी। (36: 63)
आज इस (आग) में दाख़िल हो जाओ, इस कारण से कि तुम (मेरे आदेशों को) मानने से हमेशा इंकार करते रहे हो।" (36: 64)
मगर शैतानियाँ करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे, (43: 74)
जिससे कभी उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी : वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (43: 75)
हमने उनपर कभी कोई ज़ुल्म नहीं किया; असल में वे ही ज़ुल्म करनेवाले लोग थे। (43: 76)
सचमुच, शैतानी करनेवाले लोग भारी गुमराही और पागलपन में पड़े हुए हैं ----- (54: 47)
जिस दिन उनको मुँह के बल आग में घसीटा जायेगा (उस दिन उन्हें होश आ जायेगा, उनसे कहा जाएगा), "(जहन्नम की) आग को छूकर महसूस करो!" (54: 48)
अपराधी अपने चेहरों (की निशानियों) से पहचान लिए जाएँगे, फिर उन्हें माथे और टाँगों से पकड़ लिया जाएगा। (55: 41)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (55: 42)
यही वह जहन्नम है जिसे अपराधी लोग झूठ ठहराते थे! (55: 43)
वे उस (जहन्नम की) लपटों के और खौलते हुए पानी के बीच चक्कर लगा रहें होंगे। (55: 44)
और तब, तुम लोगों को तीन दर्जों में छाँटा जाएगा. (56: 7)
तो जो दाहिने हाथ वाले [सौभाग्यशाली] हैं---क्या कहना उन दाहिने हाथ वालों का! (56: 8)
और बाएँ हाथ वाले [दुर्भाग्यशाली]--- तो क्या बताना उन बाएँ हाथ वालों (के बुरे हाल) का! (56: 9)
और (तीसरे) जो सामने होंगे, वे तो हैं ही वरीयता में आगे चलनेवाले! (56: 10)
यही वे लोग हैं जो अल्लाह के सबसे नज़दीक रहेंगे ; (56: 11)
नेमत से भरी (परम आनंद वाली) जन्नतों में: (56: 12)
शुरू की पीढियों में से तो बहुत-से होंगे, (56: 13)
किन्तु बाद की पीढियों [later generations] में से कम ही (होंगे). (56: 14)
उस दिन कई चेहरे (ऐसे भी होंगे जो नूर से) चमक रहे होंगे, (80: 38)
(वह) मुस्कुराते हँसते (और) खुशियाँ मनाते होंगे, (80: 39)
मगर कई चेहरे ऐसे होंगे जिन पर उस दिन धूल पड़ी होगी, (80: 40)
(और) उन (चेहरों) पर कालिख छायी होगी : (80: 41)
यही लोग काफ़िर [सच्चाई का इंकार करनेवाले], मनमानी करनेवाले (और) दुराचारी होंगे। (80: 42)
क्या [ऐ रसूल!] आपको (हर चीज पर) छा जाने वाली घटना [क़यामत] की खबर पहुंची है? (88: 1)
उस दिन कितने ही चेहरे अपमानित और उतरे हुए होंगे, (88: 2)
(सांसारिक फ़ायदे के लिए) मुसीबत झेलते हुए, थकान से चूर! (88: 3)
वे (जहन्नम की) दहकती हुई आग में जा गिरेंगे (88: 4)
और उन्हें खौलते हुए सोते [spring] से (पानी) पिलाया जाएगा, (88: 5)
उनके लिए काँटेदार सूखी ज़हरीली झाड़ियों के अलावा कुछ खाना नहीं होगा (88: 6)
जो न बदन को मोटा [nourish] करेगा और न भूख ही मिटायेगा। (88: 7)
(इसके विपरीत) उस दिन बहुत से चेहरे ऐसे भी होंगे जो ख़ुशी से चमकते और खिले-खिले होंगे, (88: 8)
(दुनिया में अच्छे काम के लिए) अपनी की हुई मेहनत के नतीजे में बहुत खुश होंगे, (88: 9)
आलीशान जन्नत में (ठहरे) होंगे, (88: 10)
जहाँ कोई बेकार और व्यर्थ बात न सुनेंगे, (88: 11)
यह न तो तुम्हारी (झूठी) उम्मीदों के मुताबिक़ होगा, और न ही उनकी जो किताबवाले हैं : जो कोई भी बुरे काम करेगा, उसे उसका फल मिलेगा और उसे ऐसा कोई नहीं मिलेगा जो अल्लाह के खिलाफ़ उसको बचा सके या उसकी मदद कर सके; (4: 123)
फिर जो कुछ उन्होंने (अपने कर्मों से) कमाया था, उसकी बुराइयाँ उनपर ही आ पड़ीं. और (इसी तरह) आजकल भी जिन (अरब के) लोगों ने शैतानियाँ कर रखी हैं, उन्हें अपने कर्मों का बुरा प्रभाव भुगतना पड़ेगा : वे (अल्लाह की पकड़ से) बच कर नहीं जा सकते. (39: 51)
अतः हम अवश्य ही विश्वास न रखनेवालों को कठोर यातना का मजा चखाएँगे। हम उनके कर्मों का बदला, उनके द्वारा किए गए सबसे बुरे कर्मों के हिसाब से देंगे--- (41: 27)
अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा, और जिन लोगों ने नेक काम किए, उन्हें ख़ूब अच्छा बदला देगा; (53: 31)
और जिस किसी ने कण भर भी बुराई की होगी, तो वह उसे (भी) देख लेगा। (99: 8)
(याद रखो!) जिस किसी ने एक अच्छा काम किया, तो (क़यामत के दिन, फ़ैसले के वक़्त) उसे उसका दस गुना बदला मिलेगा, लेकिन जिस किसी ने एक बुरा काम किया, तो उसे बदले में उतनी ही सज़ा दी जाएगी जितनी बुराई की होगी---- उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (6: 160)
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए, तो हर एक बुराई का बदला भी ठीक वैसा ही होगा, और बेइज़्ज़ती उन्हें चारों ओर से घेर लेगी-----अल्लाह से उन्हें बचानेवाला कोई न होगा। ऐसा लगेगा मानो उनके चहरों पर अँधेरी रात की पर्तें चढ़ा दी गयी हैं। ये वे लोग हैं जो (जहन्नम की) आग में रहनेवाले हैं, और वहीं वे हमेशा रहेंगे। (10: 27)
जो कोई भी अल्लाह के सामने अच्छे कर्म लेकर आया, तो उसे बदले में उससे कहीं अच्छा इनाम मिलेगा; और जो कोई बुरे कर्मों को लेकर आएगा, तो उस कुकर्मी को वैसी ही सज़ा दी जाएगी जैसा कि उसने कर्म किया होगा। (28: 84)
जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा; किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह में) विश्वास रखता हो, तो वह मर्द हो या औरत, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और वहाँ उसे बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी. (40: 40)
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