Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत इबराहीम (अलै.)

क़ुरआन के क़िस्से 

हज़रत इबराहीम (अलै.) 

और इबराहीम [Abraham] भी उसी (नूह के) रास्ते पर चलने में विश्वास रखता था : (37: 83)
वह अपने रब के पास एक साफ़ व समर्पित हृदय लेकर आया था; (84)
उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किस की पूजा करते हो? (37: 85)
तुम असली अल्लाह को छोड़कर दूसरे झूठे देवताओं को कैसे मान सकते हो? (37: 86)

और जब ऐसा हुआ कि इबराहीम ने कहा था, "ऐ मेरे रब! मुझे दिखा कि तू मुर्दों को कैसे ज़िंदा करेगा?" अल्लाह ने कहा," तो क्या तुझे विश्वास नहीं?" इबराहीम ने कहा, "विश्वास तो है, पर चाहता हूँ कि मेरे दिल को बस ज़रा इत्मिनान हो जाए।" अत: अल्लाह ने कहा, "अच्छा, तो चार चिड़ियों को ले, फिर उन्हें अपने साथ हिला-मिला ले ताकि बुलाने पर वे तुम्हारे पास आ सकें। फिर उन्हें अलग-अलग पहाड़ियों पर रख दे, फिर उनको बुला, और वे उड़ते हुए तेरे पास चले आएँगे : जान लो कि अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (2: 260)

और हम ने इबराहीम [Abraham] को भी भेजा, उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो, और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो : यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम सचमुच समझ पाओ। (29: 16)

तुम अल्लाह को छोड़कर जिसे पूजते हो, वे तो बस मूर्तियाँ हैं; और जो तुम गढते रहते हो, वे झूठी बातों के सिवा कुछ नहीं है। तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, वे तुम्हें रोज़ी देने का कोई अधिकार नहीं रखते, अतः तुम अल्लाह से ही रोज़ी मांगा करो, उसी की बन्दगी करो, और उसका शुक्र अदा करो : तुम सभी को उसके पास लौटकर जाना होगा।  (29: 17

और अगर तुम कहते हो कि यह बातें झूठी हैं (तो सावधान किया जाता है कि) तुमसे पहले भी कितने ही समुदायों ने इसे झूठ ही बताया था। हमारे रसूल पर तो बस यही ज़िम्मेदारी है कि वह साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से (अल्लाह के संदेश द्वारा) सचेत कर दे।" (29: 18)

(देखो!) जब ऐसा हुआ था कि इबराहीम [Abraham] ने अपने बाप, आज़र से कहा था, "तुम पत्थर की मूर्तियों को अपना ख़ुदा कैसे मान सकते हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारी क़ौम के लोगों को पूरी तरह गुमराही में पड़ा देख रहा हूँ।" (6: 74

और इसी तरह हम इबराहीम को आसमानों और ज़मीन में अपनी ताक़तवर हुकूमत के जलवे दिखाते थे, ताकि उसका विश्वास पक्का हो जाए। (6: 75)

फिर जब ऐसा हुआ कि उस पर रात का अंधेरा छा गया, तो उसने एक तारा देखा और कहा, "यह मेरा रब है", फिर जब वह डूब गया, तो उसने कहा, "मैं डूब जानेवाली चीज़ पसंद नहीं करता।" (6: 76)

और जब उसने चाँद को निकलता हुआ देखा, तो कहा, "यह मेरा रब है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "अगर मेरे रब ने मुझे रास्ता न दिखाया होता, तो मैं भी उन लोगों में शामिल हो जाता जो सीधे रास्ते से भटक जाते हैं।" (6: 77)

उसके बाद जब उसने सूरज को उगते हुए देखा, तो पुकार उठा, "यह मेरा रब है! यह तो ज़्यादा बड़ा है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह के साथ जिस किसी को तुम पूजते हो, मैं उन सबसे अपना संबंध तोड़ता हूँ। (6: 78

मैंने (हर तरफ़ से अपना मुँह मोड़कर) एक पक्के ईमानवाले के रूप में, अपना चेहरा उसी की ओर कर लिया है, जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है। मैं उनमें से नहीं हूँ जो (अल्लाह के साथ) दूसरे देवताओं को पूजते हैं।" (6: 79)

इस क़ुरआन में इबराहीम [Abraham] की कहानी को भी बयान करें। निस्संदेह वह सच्चाई की मूर्ति था, अल्लाह का नबी था. (19: 41)
जब उसने अपने बाप से कहा, "ऐ बाबा! आप उस चीज़ को क्यों पूजते हैं, जो न सुन सकती है, न देख सकती है, और न आपके किसी काम आ सकती है? (19: 42)
बाबा! मैं सच कहता हूं, ज्ञान की एक रौशनी जो आपको नहीं मिल पायी थी, वह मुझे मिल गई है, अतः आप मेरे पीछे चलें : मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊँगा। (19: 43)

बाबा! शैतान की बन्दगी न कीजिए----  शैतान तो दयालु रब [रहमान] की आज्ञा को मानने से ही इंकार कर चुका है। (19: 44)

बाबा! मैं डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि आपको रहम करनेवाले [रहमान] की तरफ़ से कोई यातना आ पकड़े, और आप (जहन्नम में) शैतान के साथी होकर रह जाएँ।" (19: 45)

बाप ने (यह बातें सुनकर) कहा, "ऐ इबराहीम! क्या तू मेरे देवताओं को रद्द करता है? याद रख! अगर तू ऐसी बातों से बाज़ न आया तो मैं तुझे पत्थर मरवाउंगा। अगर तू अपनी जान चाहता है, तो मेरे रास्ते से अलग हट जा!" (19: 46)

इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो सलाम है आपको : (आप से अलग हो कर भी) मैं आपके लिए रब से माफ़ी की दुआ करूँगा---- वह तो मुझ पर बहुत मेहरबान है --- (19: 47)

मगर अब, मैं आप सब को छोड़ता हूँ, और उन (मूर्तियों) को भी, जिन्हें अल्लाह को छोड़ कर आप लोग पुकारा करते हैं, और मैं तो अपने रब को पुकारूँगा। मुझे भरोसा है कि अपने रब को पुकारकर  मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।" (19: 48)

यह बात नबी [Prophet] और ईमान रखनेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों [Idolaters] के लिए माफ़ी की दुआ करें ----- चाहे वे उनके नातेदार ही क्यों न हो ---- जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे (जहन्नम की) भड़कती आग में रहनेवाले हैं :  (9: 113)

इबराहीम ने अपने बाबा की माफ़ी के लिए जो दुआ की थी, वह इस कारण से थी कि उसने अपने बाप से एक वादा कर लिया था, मगर एक बार जब उसकी समझ में आ गया कि उसके बाप अल्लाह (की सच्चाई) के दुश्मन हैं, तो फिर वह उनसे अलग हो गया। असल में, इबराहीम बड़ा ही नर्म दिल, और बहुत सहनशील था।  (9: 114)

और [ऐ रसूल] उन्हें इबराहीम [Abraham] की कहानी सुनाएं, (26: 69)
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसे पूजते हो?" (26: 70)
उन्होंने कहा, "हम मूर्तियों की पूजा करते हैं, और हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।" (26: 71)
उसने पूछा, "क्या ये तुम्हारी बात सुनते हैं, जब तुम पुकारते हो, (26: 72)
क्या ये तुम्हारी कुछ मदद या हानि पहुँचाते हैं?" (26: 73)
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है।" (26: 74)
इबराहीम ने कहा, "कभी तुम ने यह सोचा कि तुम किसकी पूजा करते रहे हो, (26: 75)
तुम और तुम्हारे बाप-दादा, (26: 76)
वे सब तो मेरे लिए दुश्मन हैं; मगर सारे संसार के रब की बात अलग है, (26: 77)
जिसने मुझे पैदा किया। फिर वही है जो मुझे सीधा रास्ता दिखाता है; (26: 78)
और वही है जो मुझे खिलाता और पिलाता है; (26: 79)
जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे ठीक कर देता है; (26: 80)
और वही है जो मुझे मौत देगा, और फिर मुझे दोबारा ज़िंदगी देगा; (26: 81)
और वही है जिससे मुझे उम्मीद है कि फ़ैसले के दिन वह मेरी ग़लतियाँ माफ़ कर देगा। (26: 82)

ऐ मेरे रब! मुझे ज्ञान व समझ-बूझ दे; और मुझे नेक लोगों के साथ शामिल कर ले; (26: 83)
और मुझे बाद में आनेवाली नस्लों में भी अच्छे नामों से याद किया जाता रहे; (26: 84)
और मुझे उनमें से बना जिन्हें नेमतों वाली जन्नत [Garden of bliss] दी जाएगी--- (26: 85)
और मेरे बाबा को माफ़ कर दे, कि वह उन लोगों में से हैं जो सही रास्ते से भटक चुके हैं——(26: 86)
और मुझे उस दिन की बेइज़्ज़ती से बचा, जब सब लोग जीवित करके दोबारा उठाए जाएँगे : (26: 87)
उस दिन न माल काम आएगा और न बाल-बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (26: 88)
और उस दिन केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उसके ही सामने झुकनेवाला हो।" (26: 89)

उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किस की पूजा करते हो? (37: 85)
तुम असली अल्लाह को छोड़कर दूसरे झूठे देवताओं को कैसे मान सकते हो? (37: 86)
अच्छा, सारे संसार के पालनेवाले [रब] के बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है?"(37: 87)
फिर उन्होंने एक नज़र ऊपर तारों पर डाली,  (37: 88)
और कहा, "मेरी तबियत ख़राब है।" (सो मैं मेले में नहीं जा सकता!)  (37: 89)
सो (उनकी क़ौम के लोगों ने) पीठ फेरी और वे उन्हें छोड़कर चले गए. (37: 90)

फिर वह [इब्राहीम] उनके देवताओं की तरफ़ गए और कहा, "क्या तुम खाते नहीं? (37: 91)
तुम्हें क्या हुआ कि तुम बोलते भी नहीं?" (37: 92)
फिर वह मुड़े और उन्होंने अपने दाहिने हाथ से (उन देवताओं की मूर्तियों पर) भरपूर वार करके उन्हें तोड़ डाला।  (37: 93)

फिर (पता चलते ही) उनकी क़ौम के लोग उनके पास दौड़े हुए आए,  (37: 94)
(इब्राहीम ने) कहा, "तुम उनको कैसे पूज सकते हो, जिन्हें स्वयं अपने हाथों से तराशते हो, (37: 95)
जबकि वह अल्लाह है जिसने तुम्हें भी पैदा किया है और जो कुछ तुम बनाते हो, उनको भी?" (37: 96)
वे बोले, "उनके लिए एक चिता तैयार करो और उन्हें भड़कती आग में फेंक दो!" (37: 97)
इस तरह, वे लोग उन्हें नुक़सान पहुँचाना चाहते थे, मगर (आग का उन पर कोई असर न हुआ और) हम ने उनलोगों को पूरी तरह से नीचा दिखा दिया।  (37: 98)

बहुत समय पहले हमने इबराहीम [Abraham] को सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ दी थी, और हम उसकी हालत अच्छी तरह से जानते थे। (21: 51)

जब उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "यह क्या मूर्तियाँ हैं, जिनकी तुम इतनी भक्ति करते हो?" (21: 52)

वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते हुए देखा था।" (21: 53)

उस [इबराहीम] ने कहा, "तुम ख़ुद भी भटक चुके हो और तुम्हारे बाप-दादा भी सही मार्ग से बिल्कुल ही भटके हुए थे।" (21: 54)

 इस पर उन्होंने कहा, "क्या तुम हम से सचमुच ऐसा कह रहे हो या यूँ ही हँसी-खेल कर रहे हो?" (21: 55)

 इबराहीम ने कहा, "नहीं! सुनो, वह आसमानों और ज़मीन का मालिक है, वही है जिसने उनको पैदा किया है, और असल में वही तुम्हारा भी रब है, मैं इसपर  गवाही देता हूँ. (21: 56)

और (इबराहीम ने कहा), “क़सम है अल्लाह की! (एक दिन) जैसे ही तुम (लोग) पीठ फेर कर (कहीं) चले जाओगे, मैं ज़रूर तुम्हारी मूर्तियों के साथ एक चाल चलूँगा ! " (21: 57)

(और ऐसा ही किया),  उसने उन सब (मूर्तियों) को तोड़ कर टुकड़े टुकड़े कर दिया, लेकिन सबसे बड़ी मूर्ति को छोड़ दिया ताकि लोग उसके सामने झुक सकें (और हाल पूछ सकें). (21: 58

वे (वापस आकर) कहने लगे, "किसने हमारे देवताओं के साथ यह हरकत की है? निश्चय ही वह बड़ा ही ज़ालिम आदमी होगा!" (21: 59)

 (कुछ लोग) बोले, "हमने एक नौजवान को, जिसे इबराहीम कह कर पुकारते हैं,  उसके बारे में कुछ कहते सुना था।" (21: 60)

 उन्होंने कहा, "तो उसे बुला लाओ लोगों की आँखों के सामने, ताकि वे भी (पूछ-ताछ के) गवाह रहें।" (21: 61)

 उन्होंने इबराहीम से कहा, " हमारे देवताओं के साथ यह हरकत किसने की है, ऐ इबराहीम क्या तुम ने?" (21: 62

इबराहीम ने कहा, "नहीं, बल्कि यह काम उनके इस सबसे बड़े (देव) ने किया होगा, उन्हीं से पूछ लो, अगर वे बोल सकते हों।" (21: 63)

 वे एक दूसरे की तरफ़ (कुछ सोचते हुए) मुड़े और आपस में कहने लगे, "असल में तो हम ही लोग शैतानियाँ करते हैं।" (21: 64)

 उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, फिर उन्होंने बात बनायी और कहने लगे, "तुम्हें तो अच्छी तरह मालूम है कि ये (मूर्तियाँ) बोल नहीं सकतीं।" (21: 65)

इबराहीम ने कहा, "फिर अल्लाह को छोड़कर तुम ऐसी चीज़ों को क्यों पूजते हो, जो न तुम्हें कुछ फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न कोई नुक़सान? (21: 66)

 धिक्कार है तुमपर, और उनपर भी, जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो! क्या तुम दिमाग़ से काम नहीं लेते?" (21: 67)

इस पर उन्होंने (आपस में) कहा, “अगर तुम सचमुच कुछ अच्छा करना चाहते हो, तो आओ इस आदमी को आग में जला दो, और अपने (टूटे हुए) देवताओं की मदद करो।" (21: 68)

मगर हमने कहा, "ऐ आग! तू ठंड़ी हो जा और सलामती बन जा इबराहीम पर!" (21: 69)

उन्होंने उसे नुक़सान पहुँचाने की योजना बनायी थी, मगर हमने उन्हीं को ज़बरदस्त नुक़सान में डाल दिया. (21: 70)

इबराहीम [Abraham] की क़ौम के लोगों ने जवाब में बस इतना ही कहा था,  "मार डालो या जला डालो!” मगर अल्लाह ने इबराहीम को (नमरूद की लगायी हुई) आग से बचा लिया : विश्वास रखनेवालों के लिए सचमुच इस (घटना) में (सीखने के लिए) निशानियाँ हैं। (29: 24

इबराहीम ने उनसे कहा, "अल्लाह को छोड़कर तुमने मूर्तियों को (ख़ुदा) चुना है (ताकि तुम्हारे दोस्त ख़ुश रहें), मगर उनसे यह तुम्हारा मेल-मिलाप केवल इसी सांसारिक जीवन तक ही चल पाएगा : क़यामत के दिन, तुम एक-दूसरे को दोस्त मानने से इंकार करोगे और एक-दूसरे को बुरा भला कहोगे। जहन्नम (की आग) ही तुम्हारा ठिकाना होगा और तुम्हारी मदद करनेवाला कोई न होगा।" (29: 25)

उसकी क़ौम के लोग उससे झगड़ने लगे, और उसने कहा, "तुम मुझ से अल्लाह के बारे में क्यों झगड़ते हो, जबकि उसने मुझे (सीधा) मार्ग दिखा दिया है? मैं ऐसी किसी चीज़ से नहीं डरता, जिन्हें तुम उस (अल्लाह) के साथ (साझेदार के रूप में) जोड़ते हो : जब तक कि मेरा रब न चाहे (कोई नुक़सान नहीं हो सकता)। मेरे रब ने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। फिर क्यों तुम इस पर ध्यान नहीं देते? (6: 80)

"मैं उन हस्तियों से क्यों डरूँ, जिन्हें तुम ने उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहरा लिया है? मगर तुम इस बात से क्यों नहीं डरते कि तुमने उन चीज़ों को अल्लाह के साथ जोड़ रखा है, जिसके लिए उसने तुम पर कोई सनद नहीं उतारी? अब बताओ, अगर तुम्हें जवाब पता हो, कि दोनों में से किस गुट को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? (6: 81)

"असल में जो लोग ईमान रखते हैं, और अपने ईमान के साथ (अल्लाह को छोड़कर) किसी दूसरी हस्तियों की मिलावट नहीं करते, तो वे सुरक्षित होंगे, और यही वे लोग हैं जो सीधे मार्ग पर हैं।" (6: 82)

तो (देखो!) ऐसा था हमारा वह तर्क जो हमने इबराहीम को उसकी क़ौम के मुक़ाबले में दिया था----- हम जिसे चाहते हैं उसका दर्जो ऊँचा कर देते हैं---- तुम्हारा रब हर चीज़ का ज्ञानी है, सब कुछ जानता है। (6: 83)

क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद : वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (60: 3)

तुम लोगों (की सीख) के लिए इबराहीम और उनके साथियों में एक अच्छा उदाहरण है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था,  "हम तुम (लोगों) का और जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, उन (सब) का त्याग करते हैं! हम तुम्हें मानने से साफ़ इंकार करते हैं! हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो चुकी है, और यह उस समय तक रहेगी जब तक कि तुम एक अल्लाह पर विश्वास न कर लो" -----हाँ, मगर इूबराहीम ने अपने बाप से यह ज़रूर कहा था कि "मैं आपके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करूँगा, हालाँकि मैं आपको अल्लाह से बचा नहीं सकता"------[ईमानवालों ने दुआएं की], "ऐ रब! हमने तुझ पर ही भरोसा किया; तौबा के लिए हम तेरी ही सामने झुकते हैं; और तेरी ही पास अन्त में लौट कर हमें जाना है। (60: 4)

[ऐ रसूल], क्या आपने उस आदमी [बादशाह नमरूद] के बारे में विचार किया है जिसने इबराहीम [Abraham] से उसके रब के बारे में झगड़ा किया था, इसलिए कि अल्लाह ने उसको हुकूमत चलाने की शक्ति दे रखी थी? जब इबराहीम ने कहा, "मेरा 'रब' वह है जो ज़िंदगी और मौत देता है।" तो उसने कहा, "मैं भी तो ज़िंदगी और मौत देता हूँ।" अत: इबराहीम ने कहा, "अल्लाह सूरज को पूरब से उगाता है; तो तू उसे पश्चिम से उगाकर दिखा।" (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवाला (बादशाह) इस पर भौंचक्का रह गया : अल्लाह उन्हें सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो शैतानी (और ज़ुल्म) करते हैं।  (2: 258)

और (फिर याद करो) जब इबराहीम के रब ने कुछ बातों में उसकी परीक्षा ली, और वह उसमें खरा उतरा, तो अल्लाह ने कहा, "मैं तुझे सारे इंसानों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" इबराहीम ने पूछा, " और क्या तू मेरी नस्ल में से भी पेशवा बनाएगा?" अल्लाह ने जवाब दिया, "मेरे इस वचन के अन्तर्गत वह लोग नहीं आते जो (आज्ञा नहीं मानते और) ज़ुल्म करते हैं।" (2: 124)

उस [इब्राहीम] ने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ : वह ज़रूर मेरा मार्गदर्शन करेगा (37: 99)

ऐ मेरे रब! मुझे ऐसी संतान दे जो नेक लोगों मे से हो।" (37: 100)

तो हमने उन्हें एक सहनशील बेटे [इस्माईल, Ishmael] के होने की ख़ुशख़बरी सुना दी।  (37: 101)

फिर जब वह लड़का इतना बड़ा हो गया कि बाप के काम में हाथ बँटाने लगा (और उनके साथ दौड़-धूप करने लगा), तब इब्राहीम ने उससे कहा, "ऐ मेरे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब बताओ, कि तुम्हारा क्या विचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! आप वही करें जिसका आपको आदेश दिया जा रहा है, और अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे धैर्य [सब्र] करनेवालों में से पाएँगे।" (37: 102)

फिर जब दोनों ने अपने आपको अल्लाह (की मर्ज़ी) के आगे झुका दिया, और फिर उन्होंने अपने बेटे को माथे के बल लिटा दिया,  (37: 103)

और... फिर हमने उसे पुकारा, "ऐ इब्राहीम! (37: 104)
तू ने सपने को सच कर दिखाया। निस्संदेह जो लोग अच्छा काम करते हैं, हम उनको इसी प्रकार इनाम देते हैं"--- (37: 105)
यह तो असल में एक परीक्षा थी ताकि (उनके असल चरित्र) सामने आ जाएं  ---  (37: 106)

और हमने उसके बेटे (की जान) को एक ज़बरदस्त (जानवर की) क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया,  (37: 107)
और हमने ऐसी परम्परा बनायी कि बाद में आनेवाली पीढियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा : (37: 108)
"सलाम हो इब्राहीम पर! " (37: 109)
हम नेकी करनेवालों को बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं।  (37: 110)

सचमुच ही वह हमारे आज्ञाकारी बंदों में से था। (37: 111)

फिर जब वह उन लोगों से और उन सब से जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे, अलग हो गया, तो हमने (उसकी नस्ल में बरकत दी और) उसे इसहाक़ [Isaac] और (इसहाक़ का बेटा) याक़ूब [Jacob] प्रदान किया और उन दोनों को हमने नबी [Prophet] बनाया था : (19: 49)

हम ने उन पर अपनी ख़ास दया-दृष्टि डाली थी, और उन सब को सच्चाई की आवाज़ें बुलंद करनेवाला बनाकर बड़ी प्रतिष्ठा दी। (19: 50)

उन्हें इबराहीम [Abraham] के मेहमानों का क़िस्सा भी बता दें :  (15: 51)

जब वे इबराहीम के यहाँ आए और कहा, “तुम पर सलाम हो”, इबराहीम ने (अजनबियों को देख कर) कहा, "हमें तो तुमसे डर मालूम होता है।" (15: 52)

"डरो नहीं”, वे बोले, “हम तो तुम्हें एक बेटे के पैदा होने की ख़ुशख़बरी देने आए हैं जो बड़ा ज्ञानी होगा।" (15: 53)

इबराहीम ने कहा, "तुम मुझे किस तरह ऐसी ख़बर सुना सकते हो जबकि पता है कि मुझ पर बुढ़ापा आ चुका है? यह भला कैसी ख़बर हुई?" (15: 54

उन्होंने कहा, "हम ने जो बात बतायी है वह सच है, इसलिए तुम निराश न हो", (15: 55)

इबराहीम ने कहा, "गुमराहों को छोड़कर कौन है जो अपने रब की रहमत [Mercy] से निराश हो सकता है?" (15: 56)

और जब ऐसा हुआ कि अच्छी ख़बर का संदेश ले कर हमारे फ़रिश्ते, इबराहीम [Abraham] के पास आए, और कहा, "सलाम हो!", इबराहीम ने ज़वाब में कहा, "सलाम हो”, और बिना देर किए हुए वह उनके (खाने के) लिए भुना हुआ बछड़े (का गोश्त) ले आया। (11: 69)

जब इबराहीम ने देखा कि उनके हाथ खाने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह बात उसे बड़ी अजीब लगी, और वह (मन ही मन) उनसे डरने लगा। लेकिन वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत [Lot] की क़ौम के ख़िलाफ़ भेजे गए हैं।" (11: 70)

इबराहीम की बीवी पास ही खड़ी थी, वह (ख़बर सुनकर) हँस पड़ी। (असल में) हमने उसको इसहाक़ [Isaac] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी सुनायी थी, और इसकी कि इसहाक़ के बाद याक़ूब [Jacob] होगा। 
 (11: 71)

वह बोली, "अफ़सोस मुझ पर! मैं बच्चे को कैसे जन सकती हूँ, जबकि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, और यह जो मेरे पति हैं, वह भी बूढे आदमी हैं? यह तो बड़ी अज़ीब चीज़ होगी!" (11: 72)

फ़रिश्तों ने कहा, "क्या अल्लाह के फ़ैसले पर तुम आश्चर्य करती हो? तुम पर और इस घर के लोगों पर अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों! कि वह सारी तारीफ़ों के लायक़ है, और उसके लिए हर तरह की बड़ाइयाँ हैं।" (11: 73)

फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे अच्छी ख़बर का पता चल गया, तो उसके बाद, वह (लूत के लोगों की होनेवाली तबाही से चिंतित हो गया) और लूत की क़ौम के पक्ष में हम से वकालत करने लगा, (11: 74)

इसमें शक नहीं कि इबराहीम बड़ा ही सहनशील, नरम दिल, और हमारी भक्ति में पूरी तरह समर्पित था। (11: 75)

(फ़रिश्तों ने कहा), "ऐ इबराहीम! (उनके लिए) वकालत करना बंद कर दो : तुम्हारे रब का फ़ैसला हो चुका है; यातना उन पर बस आ ही पहुँची है, और अब इसे टाला नहीं जा सकता है।" (11: 76)

[ऐ रसूल!] क्या आपने इबराहीम के इज़्ज़तवाले मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (51: 24) 
जब वे [फ़रिश्ते] इबराहीम के पास आए, तो "सलाम” कहा, (जवाब में इबराहीम ने भी) “सलाम” कहा, (और मन में सोचा) "ये तो अजनबी लोग हैं।" (51: 25)

फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए, और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (51: 26) 

और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं खाएंगे?" (51: 27) 
(इबराहीम को) उनसे डर महसूस होने लगा, मगर उनलोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के [इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी, और कहा कि वह बड़े ज्ञानवाला होगा, (51: 28)

इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और वह (चकित हुईं व झेंपते हुए) अपने मुँह पर हाथ मारते हुए कहने लगीं, "एक बूढ़ी बाँझ औरत (बच्चा जनेगी!)!" (51: 29) 

मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने यही कहा है, और वह गहरी समझ-बूझ रखनेवाला [Wise], सब कुछ जाननेवाला है।" (51: 30)

और जब ऐसा हुआ था कि हमने (मक्का के) इस घर [काबा] को लोगों के लिए बराबर आने-जाने का केन्द्र और अमन की जगह ठहरा दिया, और हुक्म दिया, "इबराहीम के खड़े होने की जगह [मुक़ाम ए इबराहीम] को नमाज़ की जगह बना ली जाए!" हम ने इबराहीम [Abraham] और इसमाईल [Ishmael] को हुक्म दिया था : "मेरे इस घर को इसके चारों ओर चक्कर [तवाफ़] लगाने वालोंं, इबादत के लिए ठहरनेवालों, और नमाज़ में (झुक कर) रुकू [bow] व सजदा [prostrate] करनेवालों के लिए पाक-साफ़ रखो।" (2: 125)

इबराहीम ने दुआ में कहा था, "ऐ मेरे रब! इस जगह को अमन-शांति का एक आबाद शहर बना दे और ऐसा कर कि अपने फ़ज़ल से यहाँ के बसनेवालों में जो लोग अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास रखते हों, उनकी रोज़ी के लिए हर तरह की पैदावार उपलब्ध हो जाए।" अल्लाह ने (दुआ क़बूल करते हुए) कहा, "और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, मैं उन्हें भी ज़िंदगी का मज़ा उठाने दूँगा, मगर थोड़े समय के लिए, और फिर (उनके कुकर्मों के चलते) अंत में उन्हें आग की यातना की ओर खींच ले जाउंगा ----- और वह कितना बुरा ठिकाना है!" (2: 126)

और (वह क्या दौर था कि) जब इबराहीम और इसमाईल इस घर [मक्का] की नींव डाल रहे थे, (तो उन्होंने दुआ की), "हमारे रब! हमारी ओर से (इसे) स्वीकार कर ले। निस्संदेह तू (दुआओं का) सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (2: 127)

हमारे रब, हमें पूरी भक्ति से तेरे सामने झुकनेवाला बना दे; हमारी नस्ल में से ऐसा समुदाय बना जो पूरी भक्ति से तेरे आगे झुकनेवाला हो। हमें इबादत करने के तरीक़े बता दे और हमारी तौबा क़बूल कर, कि तू ही गुनाहों को माफ़ करनेवाला, बड़ी दया रखनेवाला है। (2: 128)

हमारे रब, ऐसा कर दे कि इस (शहर के बसनेवालों) में एक ऐसा रसूल पैदा हो  जो उन्हीं में से हो, वह तेरी आयतें पढ़कर उन्हें सुनाए, उनको किताब और सही समझ-बूझ की शिक्षा दे, और उनके दिलों को शुद्ध कर दे : तू सचमुच बड़ी ताक़त का मालिक है, और बेहद समझ-बूझ रखनेवाला है।" (2: 129)

याद करो जब इबराहीम ने (दुआ में) कहा था, "मेरे रब! इस शहर [मक्का]  को अमन की जगह [safe] बना दे! और मुझे और मेरी सन्तान को इस बात से बचाते रहना कि मूर्तियों की पूजा करने लग जाएं,  (14: 35)

मेरे रब! इन (मूर्तियों) नॆ बहुत से लोगों को (सच्चाई के) रास्ते से भटका दिया है! तो जो कोई मेरे पीछे चला तो वह मेरे साथ है, मगर जिस किसी ने मेरे तरीक़े को मानने से इंकार किया---तो (उसका फ़ैसला तेरे हाथ है) बेशक तू बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद  रहम करनेवाला है.  (14: 36)

हमारे रब! (तू देख रहा है कि) मैंने अपनी कुछ संतानों को एक ऐसी घाटी में ला कर बसाया है जहाँ खेती-बाड़ी नहीं होती, वह जगह तेरे पवित्र घर [काबा] से नज़दीक है, हमारे रब! (यह इसलिए किया) ताकि वे वहाँ नमाज़ क़ायम करें। अत: लोगों के दिलों को तू उनकी ओर झुका दे, और उनके लिए ज़मीन की पैदावार से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे तेरा शुक्र अदा करनेवाले बन सकें.  (14: 37)

हमारे रब! जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ हम ज़ाहिर करते हैं, उसे तू अच्छी तरह जानता है : कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो अल्लाह से छिपी हो, न ज़मीन में और न आसमान में. (14: 38)

(इबराहीम ने कहा:) प्रशंसा है उस अल्लाह की, जिसने बुढ़ापे की अवस्था में भी मुझे इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] (जैसे बेटे) प्रदान किए : मेरा रब सारी दुआएं सुनता है ! (14: 39)

मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तानों को पाबंदी से नमाज़ पढ़ने वाला बना दे। ऐ हमारे रब! मेरी दुआओं को क़बूल कर ले. (14: 40)

ऐ हमारे रब! जिस दिन (कर्मों का) हिसाब लिया जाएगा, उस दिन मुझे, मेरे माँ-बाप को और सब ईमान रखनेवालों को माफ़ कर देना।" (14: 41)

(याद करो!) जब हमने इबराहीम को उस (पवित्र) घर [काबा] की जगह दिखायी और कहा था,  "मेरे साथ किसी चीज़ को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराना। मेरे घर को उन लोगों के लिए पाक-साफ़ रखना जो इसके गिर्द फेरा [तवाफ़] लगाते हैं, जो इबादत के लिए खड़े होते हैं, और जो रुकू [bow] और सज्दे [prostrate] में झुकते हैं। 22: (26)
(और हुक्म दिया था कि) लोगों के बीच हज करने की घोषणा कर दो। वे (दूर दूर से) गहरे पहाड़ी दर्रों से होते हुए तेरे पास आया करेंगे, पैदल भी और हर तरह की तेज़ सवारियों पर भी,   (22: 27)
ताकि वे यहाँ आने का फ़ायदा उठा सकें, और निर्धारित दिनों में, जो चौपाए अल्लाह ने उन्हें दे रखे हैं, उनपर अल्लाह का नाम लें (और उनकी क़ुर्बानी कर) सकें ------- फिर उस (क़ुर्बानी के गोश्त) में से ख़ुद भी खाओ और ग़रीब-बदहाल लोगों को भी खिलाओ---- (22: 28)
"ऐ किताबवालो! तुम इबराहीम के बारे में क्यों बहस करते हो (कि वह यहूदी था कि ईसाई)? जबकि तौरात और इंजील तो उसके समय के बहुत बाद तक भी नहीं उतरी थी? क्या तुम (इतनी मोटी सी बात) नहीं समझते? (3: 65)

"जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ जानकारी रखते हो, उन चीज़ों पर तो तुम बहस करते ही हो, मगर जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते, उन पर क्यों झग़ड़ते हो? अल्लाह (सब कुछ) जानता है, तुम कुछ नहीं जानते।" (3: 66)

इबराहीम न तो यहूदी था और न ईसाई। वह तो एक सीधा और सच्चा आदमी था, जिसने अल्लाह की भक्ति में अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, और वह कभी किसी और को अल्लाह के साथ जोड़ने वाला (मुशरिक) न था,   (3: 67)

और इबराहीम से सबसे ज़्यादा नज़दीक तो वे लोग हैं जो उनके बताए हुए रास्ते पर सचमुच चलते हैं, यह नबी हैं, और (सच्चे) ईमानवाले लोग हैं------ अल्लाह (सच्चे) ईमानवालों के नज़दीक होता है। (3: 68)

दीन [धर्म] के मामले में उन लोगों से बेहतर कौन हो सकता है, जो अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के सामने झुका दे, अच्छा कर्म करे, और इबराहीम के दीन (को सही मानकर उस रास्ते) पर चले, जो अपने ईमान में सच्चा था? (यह जान लो कि) अल्लाह ने इबराहीम को अपना दोस्त बनाया था।  (4: 125)

वे (ईमानवालों से) कहते हैं, "यहूदी या ईसाई बन जाओ, तुम सही मार्ग पा लोगे।" [ऐ रसूल], आप कहें,  "नहीं, हमारा दीन तो इबराहीम का दीन है, जो सीधे रास्ता पर था, और उसने एक अल्लाह के सिवा किसी और ख़ुदा की इबादत नहीं की।" (2: 135)

कोई बेवक़ूफ़ ही हो सकता है जो इबराहीम के तरीक़े [दीन] से मुँह मोड़ेगा? हम ने तो उसे इस दुनिया में चुन लिया था और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी उसकी जगह नेक इंसानों में होगी। (2: 130)

उसके रब ने इबराहीम से कहा था, "अपने आपको मुझ पर पूरी तरह समर्पित कर दे [मेरी हर आज्ञा माननेवाला, मुस्लिम बन जा]।" इबराहीम ने जवाब दिया, "मैं अपना सिर सारे संसार के रब के आगे झुकाता हूँ,"  (2: 131)

और इबराहीम ने अपने बेटों को भी ऐसा ही करने का हुक्म दिया था, और याक़ूब [Jacob] ने भी कहा : "ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन (धर्म) पसंद कर लिया है, तो ध्यान रहे कि मरते दम तक, तुम पूरी भक्ति से एक अल्लाह के सामने सिर झुकानेवाले [मुस्लिम] बने रहोगे।" (2: 132)

सचमुच [ऐ ईमानवालो!], तुम्हारे लिए वे अच्छा उदाहरण हैं जिनके रास्ते पर तुम्हें चलना चाहिए, और हर उस आदमी के लिए भी वे अच्छा उदाहरण हैं जो अल्लाह और अंतिम दिन का डर रखता हो। अगर कोई उससे मुँह मोड़ता है, तो (याद रखो) अल्लाह (को किसी की ज़रूरत नहीं, वह) तो आत्मनिर्भर [Self-sufficing], और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (60: 6)






























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