Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत लूत /Lot (अलै.)


क़ुरआन के क़िस्से 


हज़रत लूत /Lot (अलै.)

और निश्चय ही लूत [Lot] भी हमारे रसूलों में से एक था (37: 133)
हमने लूत [Lot] को भी उनकी क़ौम के लोगों के पास (पैग़म्बर बना कर) भेजा, उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "खुली आँखों देखते हुए भी तुम कैसे ऐसे अश्लील [indecent] कर्म करते हो? (27: 54)
कैसे तुम (सेक्स के लिए) औरतों को छोड़कर मर्दों के पीछे जाते हो? कैसे जाहिल लोग हो तुम!" (27: 55)
हमने लूत [Lot] को भेजा और उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ने क्यों इस अश्लील काम को अपना लिया है? दुनिया में कोई नहीं है जो इस गंदे काम में तुमसे आगे हो। (7: 80)
सेक्स के लिए तुम औरतों के बजाए मर्दों के पीछे जाते हो! तुम ने (अपनी हवस में) मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ डाली हैं!" (7: 81)

लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी रसूलों को झुठा बताया। (26: 160)
उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (26: 161)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (26: 162)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (26: 163)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (26: 164)
क्या दूसरे लोगों से तुम अलग-थलग हो कि (सेक्स के लिए) मर्दों के पास जाते हो, (26: 165)
और अपनी पत्नियों को तुमने छोड़ रखा है, जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा किया है? तुम तो सारी सीमाएं तोड़ रहे हो।" (26: 166)

मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "ऐ लतू! अगर तुम ने सचमुच अपनी बातें बंद नहीं कीं, तो तुम्हें अवश्य ही निकाल बाहर किया जाएगा।" (26: 167)

और (याद करें) लूत [Lot] को : जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ऐसे बेशर्मी के [अश्लील] काम में लगे रहते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले कभी किसी ने नहीं किया। (29: 28

किस तरह तुम (मर्द लोग) मर्दों के पास (सेक्स की इच्छा से) जाते हो, यात्रियों का रास्ता रोक कर ज़ोर-ज़बरद्स्ती करते हो और अपने समारोहों में भद्दी हरकतें करते हो?" इस बात पर उसकी क़ौम के लोगों का जवाब बस यही था, "तुम जो कहते हो वह अगर सच है, तो ले आओ हम पर अल्लाह की यातना!" (29: 29)
उनके लोगों ने इस बात का एक ही जवाब दिया, और कहा, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो लूत के माननेवालों को! ये लोग (सेक्स के मामले में) बहुत पवित्र बनते हैं!" (27: 56)
सो लूत ने कहा, "जो हरकत तुम करते हो, उससे मुझे नफ़रत है : (26: 168)
ऐ मेरे रब! जो कुछ ये करते हैं, उससे मुझे और मेरे परिवार के लोगों को बचा ले।" (26: 169)

तो लूत ने दुआ की, "ऐ मेरे रब! (समाज में) बिगाड़ पैदा करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में मेरी मदद कर।" (29: 30)
(इधर) हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) जब इबराहीम के पास (उसके यहाँ बेटा होने की) ख़ुशख़बरी लेकर गए थे, तब उन्होंने (इबराहीम को) बताया, "हम उस (लूत के लोगों की) बस्ती [सुदोम] को बर्बाद करनेवाले हैं। निस्संदेह उस बस्ती के लोग शैतानी करनेवाले हैं।" (29: 31

इबराहीम ने कहा, "मगर वहाँ तो लूत मौजूद हैं।" फ़रिश्तों ने जवाब दिया, "वहाँ कौन रहता है, यह बात हम आप से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं। हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाए उसकी पत्नी के : वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं।" (29: 32

इबराहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आप लोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (51: 31) 
उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों [लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है जो गुनाहों में डूबे हुए हैं; (51: 32)
(फ़रिश्तों ने कहा), "ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (51: 33)
जिनपर (गुनाहों की) सीमा पार कर जानेवालों के लिए आपके रब की तरफ से ख़ास निशान भी लगा होगा।" (51: 34) 

फिर जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह उनके वहाँ आने के मक़सद को सुनकर परेशान और दुखी हो गया। फ़रिश्तों ने कहा, "आप डरें नहीं और न दुखी हों : हम आपको और आपके घरवालों को ज़रूर बचा लेंगे, सिवाए आपकी पत्नी के----- वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं ---- (29: 33
हम इस बस्ती के लोगों पर आसमान से एक भयानक यातना उतारनेवाले हैं, इस कारण कि वे गंदे [अश्लील] कर्मों में लगे हुए हैं।" (29: 34)

फिर जब वे भेजे हुए दूत [फ़रिश्ते] लूत के घरवालों के पास पहुँचे, (15: 61)
तो लूत ने कहा, "तुम (लोग) तो अजनबी मालूम होते हो।" (15: 62)
उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारे पास वह (यातना) लेकर आ गए हैं, जिसके बारे में ये लोग कहा करते थे कि ऐसा कभी होनेवाला नहीं है। (15: 63
और हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैं, और हम बिलकुल सच कहते हैं,  (15: 64)
तुम अपने घरवालों को लेकर रात के पिछ्ले पहर निकल जाना, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलना। और (ध्यान रहे!) तुम में से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे। बस चुप-चाप चलते जाना, जहाँ जाने का तुम्हें आदेश हुआ है।" (15: 65)

हमने इस फ़ैसले की जानकारी लूत को दे दी : सुबह होते ही उस शहर के लोगों के आख़िरी अवशेष [remnants] तक पूरी तरह से मिटा दिए जाएंगे। (15: 66)

और फिर जब ऐसा हुआ कि हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह (उनकी इज़्ज़त की ख़ातिर) परेशान हो उठा, उनकी (इज़्ज़त) बचाने में अपने आपको असहाय महसूस करने लगा, और कहने लगा, "सचमुच यह बड़ी मुसीबत का दिन है!" (11: 77)

उसकी क़ौम के लोग (मेहमानों के आने की ख़बर सुनकर) दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे; वहाँ (के मर्दों को सेक्स के लिए मर्द ही पसंद थे), वे पहले से ही इस बुरे कर्म में लगे हुए थे। लूत ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक भरी पूरी व पवित्र हैं (इनके साथ प्रेम करो), और अल्लाह का कुछ तो डर रखो, और मेरे मेहमानों के साथ मुझे बेइज़्ज़त मत करो। क्या तुम में से एक आदमी भी ऐसा नहीं जो सही समझ रखता हो?" (11: 78)

इतने में शहर के लोग नाच-गाना करते हुए (लूत के पास) आ पहुँचे,  (15: 67)
उसने लोगों से कहा, "ये लोग मेरे मेहमान हैं, (इनके सामने) मेरा अपमान न करो।  (15: 68)
अल्लाह से डरो और मुझे शर्मिंदा न करो।" (15: 69
उन लोगों ने जवाब दिया, "क्या हमने तुम्हें किसी दूसरे आदमी (की इज़्ज़त) को बचाने से या ऐसे लोगों को अपने यहाँ ठहराने से रोका नहीं था?" (15: 70)

लूत ने कहा, "तुम को अगर (सेक्स) करना ही है, तो (छोड़ो मेहमान मर्दों को), इसके लिए ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं।" (15: 71)

उन लोगों ने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं। और तू अच्छी तरह जानता है कि हमें क्या चाहिए।" (11: 79)

यहाँ तक कि उन लोगों ने लूत के मेहमानों को भी उनके हवाले कर देने की माँग की ---- जिस पर हमने उनकी आँखों को अंधा कर दिया कि, "लो, अब चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी चेतावनियों (के पूरा होने) का!"--- (54: 37)

[तब फ़रिश्तों ने लूत से कहा], आपकी ज़िंदगी की क़सम! वे अपनी मौज-मस्ती के नशे में धुत हैं।” (आपकी बात सुननेवाले नहीं!) (15: 72)

लूत ने कहा, "काश कि मुझमें इतनी ताक़त होती कि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों से) रोक पाता, या कोई मज़बूत सहारे का ही आसरा होता!" (11: 80)

फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के संदेश के साथ आए हैं। (चिंता न करो) वे तुम तक नहीं पहुँच सकेंगे। अतः तुम सोयी रात में अपने घरवालों को लेकर निकल पड़ो, और (ख़बरदार!) तुममें से कोई पीछे मुड़कर न देखे। केवल  तुम्हारी बीवी (पीछे रह जाएगी, और) उसको, दूसरे लोगों की तरह, बुरा अंजाम भुगतना होगा। उनकी (तबाही के लिए) सुबह सवेरे का समय तय हो चुका है : क्या सुबह के आने में देर लगेगी?" (11: 81)

फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (51: 35)
किन्तु हमने वहाँ केवल एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहनेवाले अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले थे ----  (51: 36)
इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए  जो दर्दनाक यातना से डरते हों। (51: 37)

और इस तरह, जब हमारे तय किए हुए फ़ैसले की घड़ी आ पहुँची, तो हमने उनकी बस्ती को ऊपर से नीचे पटक कर रख दिया (ऊँचे-ऊँचे भवन ज़मीन में आ रहे), और हर तह में उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर लगातार बरसाए, (11: 82)

जिन पर तुम्हारे रब की तरफ़ से (इसी काम के लिए) निशान लगे हुए थे। और यह (जगह मक्का के) शैतानियाँ करनेवालों से ज्यादा दूर नहीं है। (11: 83)

और सुबह का सूरज निकलते ही एक भयानक धमाके ने उन्हें धर दबोचा :  (15: 73)
हमने उस शहर को ऐसा उलट दिया कि सब ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर हो गया, और उनपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए। (15: 74)

और हमने उनपर एक तबाहीवाली बारिश बरसाई--- और कितनी भयानक बारिश थी वह, उन लोगों के लिए, जिन्हें पहले सावधान किया जा चुका था! (26: 173)

लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी चेतावनियों को मानने से इंकार कर दिया था।  (54: 33)
सो हमने उन पर पत्थर बरसानेवाली तेज़ हवा छोड़ दी, (मगर) लूत के घरवालों को छोड़्कर. उन्हें हमने भोर होने से पहले बचा लिया था, (54: 34)

यह हमारी तरफ से ख़ास करम था : हम शुक्र अदा करनेवालों को ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (54: 35)

अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का उदाहरण पेश किया है : नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके : (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (66: 10)

सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (26: 174)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है।  (26: 175)

तो (ऐ मक्का के लोगो!)  तुम (लोग कारवाँ के साथ सीरिया) आते-जाते उन बस्तियों (के खंडहरों) के पास से गुज़रते हो, कभी सुबह में,  (37: 137)
और रात में भी : तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (37: 138)

सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो इससे सीख लेना चाहते हैं----(15: 75)
यह (खंडहर बनी) जगह अब भी मुख्य रास्ते पर मौजूद है----(15: 76)

हमने उस (सुदोम नामक) बस्ती के कुछ हिस्से [खंडहर] को उन लोगों के लिए एक स्पष्ट निशानी के रूप में छोड़ दिया, जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (29: 35)

लूत [Lot] ने उन [इबराहीम] पर विश्वास किया, औऱ कहा, "(सुदोम की तबाही के बाद) जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए, मैं यहाँ से उसी जगह जा रहा हूँ : अल्लाह सबसे प्रभुत्वशाली और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (29: 26)

हम ने उन्हें [इबराहीम] और (उनके भतीजे) लूत [Lot] को बचा लिया और उन्हें उस ज़मीन [कुनआन] पर भेज दिया, जिसमें हमने दुनियावालों के लिए बरकतें [blessings] रखी थीं, (21: 71)

और बेशक लूत [Lot] को भी हमने सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ और ज्ञान दिया था, और हम ने उन्हें उस बस्ती (के लोगों) से बचा लिया जो (समलैंगिकता जैसे) कुकर्मों में लगे हुए थे----- सचमुच वे बड़े शैतान व बेशर्म लोग थे जिन्होंने अल्लाह के (ठहराए हुए) नियमों को तोड़ा था! (21: 74)

और हम ने लूत को अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लिया; निस्संदेह वह अच्छे व नेक लोगों में से था. (21: 75)

























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