Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से: हज़रत यूसुफ़ [Joseph] (अलै.)

क़ुरआन के क़िस्से: 


हज़रत यूसुफ़ [Joseph] (अलै.)

(और देखो!) जब ऐसा हुआ कि यूसुफ़ [Joseph] ने अपने बाप [याक़ूब/Jacob] से कहा, "बाबा! मैंने ख़्वाब में ग्यारह सितारे, सूरज और चाँद को देखा : मैंने उन सबको देखा कि वे मेरे आगे झुके हुए हैं।" (4)

याक़ूब [Jacob] ने जवाब दिया, "ऐ मेरे बेटे! अपने इस ख़्वाब के बारे में अपने भाइयों को मत बताना, वरना हो सकता है कि वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए तुम्हारे  विरुद्ध कोई चाल चलें-----(याद रहे!) शैतान तो आदमी का खुला हुआ दुशमन है।  (5)

(ऐ मेरे बेटे!) यह बात इस बारे में है कि किस तरह तेरा रब तुझे (नबी बनाने के लिए) चुन लेगा, तुझे (बातों और) ख़्वाबों का सही मतलब निकालना सिखाएगा और अपनी नेमतें [blessings] तुझ पर और याकूब के घरवालों पर उसी तरह पूरी करेगा, जिस तरह इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम [Abraham] और इसहाक़ [Isaac] पर पूरी कर चुका है : तेरा रब सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।" (6)

सचमुच यूसुफ़ और उनके भाइयों की कहानी में उन सभी लोगों के लिए बड़ा सबक़ है, जो जानना चाहते हैं, (7)

(ऐसा हुआ कि यूसुफ़ के सौतेले) भाइयों ने (एक दूसरे से) कहा, "हालाँकि हम (लोग) गिनती में काफ़ी बड़े हैं (यानी पूरे दस हैं), फिर भी, यूसुफ़ और उसका (छोटा) भाई हमारे बाप को हमसे कहीं ज़्यादा प्यारा है------सचमुच हमारे बाबा साफ़ तौर से ग़लती पर हैं। (8)

(उनमें से एक ने कहा), “यूसुफ़ को मार डालो या उसे किसी दूसरी जगह फेंक आओताकि तुम्हारे बाप का सारा ध्यान तुम्हारी ही ओर हो जाए। इसके बाद,  तुम फिर से अच्छे व नेक बन जाना।" (9)

(उस पर दूसरा भाई बोला), "नहीं, यूसुफ़ को क़त्ल न करो, बल्कि अगर कुछ करना ही है तो उसे किसी अँधे कुएँ में डाल दो, हो सकता है कि वहाँ से कोई कारवाँ गुज़रे और उसे उठा ले जाए।" (10)

(फिर सब मिलकर अपने बाप के पास गए), उन भाइयों ने कहा, "बाबा! यह आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हम पर भरोसा नहीं करते? हालाँकि हम तो उसका भला ही चाहते हैं,  (11)

हमारे साथ कल उसे जाने दीजिए ताकि वह कुछ मौज-मस्ती कर सके और खेले कूदे -— हम लोग अच्छी तरह उसकी देखभाल करेंगे।" (12)

बाप ने जवाब दिया,  “तुम उसको साथ ले जाना चाहते हो, इस ख़्याल से मुझे चिंता हो रही है : मुझे डर है कि कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका ध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।" (13)

वे बोले, "हम गिनती में इतने सारे हैं, फिर भी अगर उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो हम सचमुच ही सब कुछ गँवा बैठनेवाले (निकम्मे) होंगे!" (14)

(किसी तरह बेटों ने बाप को मना लिया और) फिर वे यूसुफ़ को अपने साथ ले कर चल दिए, जैसा उन सब ने तय कर ही रखा था, उसे एक अँधे कुएँ में फेंक दिया। फिर हमने यूसुफ़ पर यह कहते हुए वही’ [Inspiration] भेजी,  "(एक दिन आएगा) जब तू उन्हें उनके इस कर्म के बारे में बताएगा और वे समझ नहीं पाएंगे (कि तू कौन है)!"---- (15

और कुछ रात गए वे रोते हुए अपने बाप के पास वापस आए। (16

कहने लगे, "बाबा! हम आपस में दौड़ का मुक़ाबला करते हुए दूर निकल गए थे,  यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ वहीं छोड़ दिया था, कि इतने में भेड़िया ने उसे खा लिया। आप तो हम पर विश्वास करेंगे नहीं, हालाँकि हम सच बोल रहे हैं!" (17)

और (सबूत के तौर पर) उन्होंने यूसुफ़ की क़मीज़ दिखायी, जिस पर चकमा देने के लिए (किसी भेड़िए के) ख़ून के धब्बे लगा दिए गए थे। उनके बाप याक़ूब ने (रोते हुए) कहा, "नहीं, (यह सच नहीं!),  बल्कि तुम्हारे जी ने तुम्हें ग़लत काम करने को उकसाया है! अब मेरे लिए सबसे बेहतर यही है कि मैं सब्र करूं : जो बात तुम बता रहे हो, उसे बरदाश्त करने के लिए बस अल्लाह ही की मदद चाहता हूँ।" (18)

(और फिर, उधर से) एक कारवाँ का गुज़र हुआ। उन्होंने किसी को कुएं से पानी निकालने के लिए भेजा। उसने अपना डोल नीचे डाला, (जब खींच कर डोल ऊपर लाया) तो देखकर हैरान रह गया और बोला, "अरे! कितनी ख़ुशी की बात है! यह तो एक लड़का है!" उन्होंने यूसुफ़ को इस तरह छिपा कर रख लिया जैसे वह कोई ख़रीदने बेचने का सामान हो--- किन्तु जो कुछ वे कर रहे थे, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता था--- (19)

 और फिर उन्होंने उसे बड़े सस्ते दाम में, चाँदी के चंद सिक्कों [दरहम] के बदले (मिस्र के बाज़ार में) बेच डाला : उन लोगों ने उसकी बड़ी ही कम क़ीमत लगायी!  (20)

मिस्र के जिस आदमी [अज़ीज़/Governor] ने यूसुफ़ को ख़रीदा, उसने अपनी बीवी [ज़ुलैख़ा] से कहा, "इसकी अच्छी तरह देखभाल करो! यह हमारे काम आ सकता है, या हो सकता है कि हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" इस तरह हमने (मिस्र की) सरज़मीन पर यूसुफ़ के क़दम जमा दिए और बाद में हम ने उसे ख़्वाबों का सही मतलब निकालना सिखा दिया : अल्लाह तो अपना काम करके रहता है, हालाँकि अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (21)

और जब यूसुफ़ पूरी तरह जवान हो गया, तो हमने उसे (सही) फ़ैसला करने की सलाहियत और (भरपूर) ज्ञान प्रदान किया : अच्छा काम करनेवालों को बदले में हम ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (22)

(फिर ऐसा हुआ कि) यूसुफ़ जिस औरत [ज़ुलैख़ा] के घर में रहता था, वह उस पर (रीझ गयी और) डोरे डालने लगी : (एक दिन) उसने दरवाज़े अंदर से बन्द कर लिए, और कहने लगी, "लो, अब आ भी जाओ!" यूसुफ़ ने कहा, "अल्लाह की पनाह! मेरे मालिक ने हमेशा मेरे साथ अच्छा सलूक किया है; ग़लत काम करनेवाले कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (23

वह यूसुफ़ की तरफ़ (बुरी नीयत से) बढ़ी, यूसुफ़ भी वासना का शिकार हो गया होता अगर उसने अपने रब की निशानी न देख ली होती---- हम ने उसे वह (निशानी) इसलिए दिखायी ताकि हम उसे बुराई और अश्लीलता से दूर रख सकें,  कि सचमुच वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था। (24)

(यूसुफ़ और उसके पीछे वह औरत) दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े, (भागते हुए) औरत ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ डाला---- दरवाज़े पर दोनों ने उस औरत के पति को खड़ा पाया। (अचानक अपने पति को देखकर उसने बात बनायी), वह बोली, "जो कोई तुम्हारी घरवाली की इज़्ज़त लूटने की कोशिश करे, उसका बदला इसके सिवा और क्या होगा कि उसे बन्दी बनाया जाए या फिर कोई दर्दनाक सज़ा दी जाए?" (25)

मगर यूसुफ़ ने (अपने बचाव में) कहा, "असल में यही मुझे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहती थीं।" उस औरत के घरवालों में से एक आदमी ने सुझाव दिया, "अगर यूसुफ़ का कुर्ता आगे से फटा है, तो वह झूठा है और औरत सच बोल रही है, (26)

और अगर उसका कुर्ता पीछे से फटा है, तो वह सच्चा है, औरत झूठ बोल रही है।" (27)

फिर जब उसके पति ने देखा कि यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा है, तो उसने कहा, "यह औरतों के छ्ल-कपट की एक और मिसाल है : तुम्हारी मक्कारी सचमुच बड़े ग़ज़ब की है! (28)

यूसुफ़! इस मामले को भूल जाओ, मगर [ऐ बीवी] तू अपने गुनाह की माफ़ी माँग--- ग़लती तेरी ही है।" (29)

 (फिर इस बात के चर्चे होने लगे), शहर की कुछ औरतें आपस में कहने लगीं, "अज़ीज़ [Governor] की बीवी अपने ग़ुलाम को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहती है! उस नौजवान की मुहब्बत उसके दिल में घर कर गयी है! हमें तो लगता है कि वह पूरी तरह से बहक चुकी है।" (30)

फिर जब उस [अज़ीज़ की बीवी] ने अपनी बदनामी की बातें सुनीं, तो उसने (शहर की) उन औरतों को (अपने घर पर) एक शानदार दावत में बुलवाया, और  उनमें से हरेक को (फल काटने के लिए) एक एक चाक़ू दिया गया। फिर उसने (यूसुफ़ से) कहा, "ज़रा बाहर निकलो और इनके सामने आ जाओ!" और जब औरतों ने उसे देखा तो वे उसकी ख़ूबसूरती देख कर दंग रह गयीं! (हैरानी में) उन्होंने अपने हाथ काट लिए और कहने लगीं, "अल्लाह की पनाह! यह कोई आदमी नहीं हो सकता! यह ज़रूर कोई बड़े इज़्ज़तवाला फ़रिश्ता होगा!‍" (31)

अ‍ज़ीज़ की बीवी ने कहा, "यह वही है जिसका नाम लेकर तुम मुझ पर अंगुलियाँ उठा रही थीं। हाँ, मैंने इसे अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की थी, मगर इसने अपनी इज़्ज़त बचाए रखी, लेकिन अब मैं जैसा आदेश दूँगी, अगर इसने वैसा न किया, तो इसे ज़रूर क़ैदख़ाने में डाल दिया जाएगा और वह अपमानित हो कर रहेगा।” (32) 

यूसुफ़ ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे क़ैद हो जाना ज़्यादा अच्छा लगेगा, बजाए उस काम के जिस को करने के लिए ये औरतें मुझे बुला रही हैं अगर तू ने मुझे उनकी मक्कारियों के जाल [Treachery] से न बचाया, तो मुझे डर है कि कहीं मेरा दिल उनकी ओर झुक न जाए और (मजबूर हो कर जाहिलों की तरह) मैं कोई ग़लती न कर बैठूं।" (33

और उसके रब ने उसकी दुआ सुन ली और उसे उन औरतों की गंदी चालों से बचाए रखा---- वही है जो सब कुछ सुनता है, सब कुछ जानता है।  (34)

फिर आख़िर में, अज़ीज़ और उसके घरवालों ने, यूसुफ़ के निर्दोष पाए जाने की सभी निशानियों को देख लेने के बाद भी, यही बेहतर समझा कि कुछ अवधि के लिए उसे क़ैद में डाल दिया जाए। (35)

यूसुफ़ के साथ साथ क़ैदख़ाने में दो जवान लड़कों ने भी प्रवेश किया। उनमें से एक ने (यूसुफ़ से) कहा, "मैंने यह सपना देखा है कि मैं (शराब बनाने के लिए) अंगूरों को निचोड़ रहा हूँ"; दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको चिड़ियाँ खा रही हैं।“ [वे बोले], “हमें इस सपने का मतलब बता दीजिए----हमें तो आप बहुत ही नेक व क़ाबिल आदमी नज़र आते हैं।" (36)

 यूसुफ़ ने कहा, "(चिंता न करो) तुम्हारा भोजन आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका मतलब बता सकता हूँ : यह उस ज्ञान का एक हिस्सा है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाया है। मैं तो उन लोगों के दीन से इंकार करता हूँ, जो अल्लाह में विश्वास नहीं रखते और जो आनेवाली दुनिया [परलोक/आख़िरत] को भी नहीं मानते,  (37)

मैं तो अपने पूर्वज इबराहीम [Abraham], इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब[Jacob] के बताए हुए तरीक़े [दीन] पर चलता हूँ। चूँकि हम पर, और पूरी मानवता पर अल्लाह का फ़ज़ल [grace] है, हम अल्लाह को छोड़कर किसी और चीज़ को कभी नहीं पूज सकते। मगर ज़्यादातर लोग (उसकी नेमतों का) शुक्र अदा नहीं करते। (38)

मेरे क़ैदख़ाने के साथियों! क्या ढेर सारे, अलग-अलग क़िस्म के देवता बेहतर होंगे या एक अकेला अल्लाह, जो तमाम शक्ति का मालिक है? [नहीं, बिल्कुल नहीं]  (39)

उस (अल्लाह) के बजाए तुम जिन जिन की भी पूजा करते हो, वे तो महज़ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने गढ लिए हैं, ऐसे नामों के लिए तो अल्लाह ने कभी अपनी कोई मंज़ूरी नहीं भेजी। सत्ता और अधिकार तो बस अल्लाह का है, और वह आदेश देता है कि किसी की बन्दगी न करो सिवाए उसकी : यही सीधा, सच्चा दीन [faith] है, लेकिन अधिकतर लोग ऐसे हैं जो नहीं समझते। (40

मेरे साथियो! [अब अपने ख़्वाब का मतलब सुनो], तुममें से एक (जो ख़्वाब में अंगूर निचोड़ रहा था) तो (क़ैद से छूटकर) अपने मालिक को शराब पिलाएगा; रहा दूसरा (जिसने देखा था कि उसके सर पर रोटी है) तो उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा और परिंदे उसका सिर (नोच कर) खाएँगे। और अब इस (ख़्वाब) का फ़ैसला हो चुका है, जिसके बारे में तुम ने मेरी राय माँगी थी।" (41

यूसुफ़ ने उस आदमी से कहा जिसके बारे में उसे पता था कि वह बच जाएगा,  "(यहाँ से जाने के बाद) अपने मालिक से मेरे हाल की चर्चा कर देना", मगर शैतान के चलते वह अपने मालिक से उसकी चर्चा करना भूल गया, और इस तरह, यूसुफ़ को कई साल क़ैदख़ाने में रहना पड़ा. (42)

(फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मिस्र का) बादशाह कहने लगा, "मैंने ख़्वाब में देखा कि सात मोटी गायों को सात दुबली गायें खा रही हैं; और अनाज की सात बालें हरी हैं और दूसरी (सात) सूखी। ऐ दरबारियो! अगर तुम ख़्वाबों के मतलब बता सकते हो, तो मुझे मेरे ख़्वाब का मतलब बताओ।" (43)

उन्होंने जवाब में कहा, "ये तो भटके हुए ख़्याल लगते हैं, वैसे भी हम ख़्वाबों का मतलब बताने में माहिर नहीं हैं।" (44)

मगर वह क़ैदी जो रिहा हो गया था, उसे आख़िर में यूसुफ़ की याद आ ही गई, और उसने कहा, "मैं आपको इस ख़्वाब का मतलब समझा दूँगा, बस मुझे (यूसुफ़ के पास) जाने की अनुमति दीजिए।" (45)

(सो वह क़ैदख़ाने में आ कर बोला), "यूसुफ़, ऐ सच्चाई के मूरत! हमें इस (ख़्वाब) का मतलब बता कि सात मोटी गायें है, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं, और अनाज की सात हरी बालें है और दूसरी (सात) सूखी’, ताकि मैं लोगों के पास वापस जा कर उन्हें (इसका मतलब) बता सकूँ।" (46)

यूसुफ़ ने बताया, "सात वर्षों तक लगातार, तुम पहले की तरह खेती करोगे। ऐसा करना कि तुम जब फ़सल काटो तो अपने खाने की ज़रूरत भर अनाज छोड़कर, उसका बड़ा हिस्सा उसकी बालियों में ही रहने देना (ताकि सड़े नहीं) और जमा कर के रखते जाना, (47)

उसके बाद आएगा मुश्किलों भरा सात साल, जिसमें सब खाकर ख़त्म हो जाएगा, सिवाए उस थोड़े-से हिस्से के, जो तुम ने बचा रखा होगा;  (48)

फिर उसके बाद आएगा एक ऐसा साल, जिसमें लोगों के लिए ख़ूब बारिश होगी (और फ़सल अच्छी होगी) और लोग (शराब के लिए) अंगूर के रस निचोड़ेंगे।" (49)

जब बादशाह ने (उस सपने का मतलब सुना, तो) कहा, "यूसुफ़ को मेरे पास ले आओ।" मगर जब दूत (यह संदेश ले कर) क़ैदख़ाने में पहुँचा, तो यूसुफ़ ने उससे कहा, "तुम अपने बादशाह के पास वापस चले जाओ और उनसे पूछो कि उन औरतों का क्या मामला है, जिन्होंने (मुझे देखकर) अपने हाथ काट लिए थे---- मेरा रब उन (औरतों) के सारे छ्ल-कपट को अच्छी तरह जानता है।" (50)

(फिर औरतों को बुलाया गया, और) बादशाह ने उनसे पूछा, "जब तुम लोगों) ने यूसुफ़ को रिझाने की कोशिश की, तो उस समय क्या हुआ था?" उन (औरतों) ने जवाब दिया, "अल्लाह की पनाह! हम उसके बारे में कोई बुरी बात नहीं जानते।" (अंत में) अज़ीज़ [Governor] की बीवी (अपने आपको रोक न सकी और) बोल उठी, "सच्चाई अब सामने आ चुकी है : वह मैं ही थी जिसने यूसुफ़ को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहा था-----वह तो एक सच्चा व ईमानदार आदमी है।" (51)

[यूसुफ़ ने कहा, "ऐसा इसलिए किया] ताकि मेरा मालिक [अज़ीज़] यह बात जान सके कि मैंने पीठ पीछे उसको धोखा नहीं दिया : अल्लाह कपट से भरी शरारत करनेवालों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता।  (52)

मैं यह नहीं कहता कि मुझ में कोई बुराई नहीं है-----अगर मेरा रब दया न करे तो आदमी का जी तो बुराई पर उभारता ही रहता है : वह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (53)

बादशाह ने कहा, "यूसुफ़ को मेरे पास ले आओ : मैं उसे ख़ास अपने काम के लिए साथ में रख लूँगा", और फिर उसके बाद, जब बादशाह ने उससे बातचीत  कर ली, तो उसने कहा, "आज से हमारे यहाँ तुम्हारा ऊँचा स्थान होगा, और तुम पर पूरा विश्वास किया जाएगा।" (54)

यूसुफ़ ने (बादशाह से) कहा, "आप मुझे देश के भंडार-घरों (ख़ज़ानों) का अधिकारी बना दीजिए : मैं इस काम की देखरेख पूरी समझदारी और ध्यान से करूँगा।" (55)

इस तरह, हमने यूसुफ़ के क़दम (मिस्र की) ज़मीन पर जमा दिए, अब वह जहाँ चाहता अपने लिए रहने का ठिकाना बना सकता था : हम जिसे चाहते हैं, उसे अपनी रहमत [mercy] अता करते हैं; और जो अच्छा कर्म करते हैं उनका इनाम हम कभी बेकार नहीं जाने देते। (56)

जो लोग ईमान रखते हैं और जो बुराइयों से बचते रहते हैं, उनके लिए आख़िरत का इनाम सबसे बेहतर है।  (57

फिर (जब अकाल पड़ गया, तब) यूसुफ़ के भाई (मिस्र में अनाज ख़रीदने के लिए) आए और उसके सामने हाज़िर हुए, यूसुफ़ ने तो उन्हें (देखते ही) पहचान लिया---- मगर वे उसे पहचान न सके---- (58)

जब यूसुफ़ ने उनके लिए (अनाज से भरा) सामान तैयार करा दिया, तो जाते समय कहा, "(अब की बार आना तो) अपने उस (सौतेले) भाई को भी लेते आना जिसे तुम अपने बाप के पास छोड़ आए हो! क्या तुम ने नहीं देखा कि मैं दिल खोलकर व पैमाना भर कर देता हूँ और मैं मेहमानों का बहुत ज़्यादा ख़्याल भी रखता हूँ?" (59

लेकिन अगर तुम उस (भाई) को मेरे पास नहीं लाए, तो तुम्हें मेरी तरफ़ से कोई अनाज नहीं दिया जाएगा, और तुम्हें मेरे पास आने की अनुमति तक नहीं दी जाएगी।" (60)

वे बोले, "हम उसके बाप को इस बात के लिए मनाने की पूरी कोशिश करेंगे कि (अगली बार) वह उसे हमारे साथ यहाँ भेजने के लिए राज़ी हो जाएं, और हम यह काम ज़रूर करेंगे।" (61

यूसुफ़ ने अपने सेवकों से कहा, "(अनाज के बदले में) उनका दिया हुआ माल उनके सामान के साथ बोरियों में रख दो, ताकि जब ये अपने घरवालों के पास लौटें और सामान देखें तो इसे पहचान सकें, और फिर लौटकर (अनाज लेने के लिए) जल्दी आएँ।" (62

फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर पहुँचे, तो कहा, "बाबा! हमें अब और अनाज देने से मना कर दिया गया है, लेकिन अगर आप हमारे भाई [बेंयमैन] को हमारे साथ (मिस्र) भेज दें, तो फिर से पैमाना भर के अनाज मिल जाएगा। हम (यक़ीन दिलाते हैं कि) पूरे ध्यान से उसकी हिफ़ाज़त करेंगे।" (63)

उनके (बाप याक़ूब) ने कहा, "क्या मैं उसके बारे में तुम पर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा कि पहले उसके भाई (यूसुफ़) के मामले में तुम पर कर चुका हूँ? अल्लाह ही सबसे बढकर हिफ़ाज़त करनेवाला, और सबसे बढ़कर दयावान है।" (64)

जब उन्होंने अपना सामान खोलातो देखा कि (अनाज के बदले) जो सामान वहाँ दिया था, वह उन्हें वापस दे दिया गया है। वे बोले, "बाबा, हमें अब (अनाज के लिए बदले में) और सामान जुटाने की ज़रूरत नहीं है : यह देखिए, हमारा सामान भी हमें लौटा दिया गया है। (बस हमें बेंयमैन के साथ वापस जाने दीजिए) अब हम अपने घरवालों के लिए और अनाज ले आएंगे; हम अपने भाई को भी सुरक्षित रखेंगे; हम फिर से एक ऊँट भर अनाज के हक़दार होंगे। कितनी आसानी से (अनाज का) एक अतिरिक्त हिस्सा मिल गया!" (65)

 उनके बाप ने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ भेजनेवाला नहीं जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दे दो कि तुम उसे मेरे पास हर हालत में वापस ले कर आओगे, सिवाए इसके कि तुम (सचमुच) घेर लिए जाओ और बेबस हो जाओ।" फिर जब उन्होंने अपने बाप को पक्का वचन दे दिया, तो बाप ने कहा, "हमारे बीच जो बात तय हुई है, उस पर अल्लाह गवाह है।" (66)

(जाने के समय) उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! (जब मिस्र शहर में दाख़िल होना तो) तुम सब एक ही दरवाज़े से अंदर मत चले जाना ----- बल्कि अलग अलग दरवाज़े से प्रवेश करना (कि अपनी तरफ़ से सचेत रहना चाहिए), वैसे कोई चीज़ अगर अल्लाह की मर्ज़ी से होने वाली हो, तो मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता : तमाम शक्ति तो अल्लाह के ही हाथ में है। उसी पर मैंने भरोसा किया है; और हर एक आदमी को उसी पर भरोसा करना चाहिए।" (67

और जब उन भाइयों ने (मिस्र में अलग अलग दरवाज़ों से) प्रवेश किया, जैसा कि उनके बाप ने उन्हें बताया था, तो (देखो!) यह बात अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ तो कोई काम आने वाली न थी, मगर हाँ, याक़ूब के दिल में एक बात आयी थी जो पूरी हो गयी। बेशक वह काफ़ी कुछ जानता था जो कुछ हमने उसे सिखाया थामगर अधिकतर लोग (इसकी हक़ीक़त) नहीं जानते।  (68)

फिर, जब वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो यूसुफ़ अपने (छोटे) भाई को किनारे ले गया और बता दिया कि, "मैं तेरा भाई हूँ, जो कुछ ये (सौतेले भाई) तेरे साथ करते आए हैं, उसपर अब दुखी न हो",  (69)

फिर जब उनका (अनाज से भरा हुआ) सामान तैयार कर दिया गया, तो यूसुफ़ ने अपने (सगे) भाई की बोरी में पीने का एक शाही प्याला रख दिया। (इधर क़ाफ़ला चल पड़ा, और उधर शाही प्याले की खोज शुरू हुई, तब उन्हें उन लोगों पर शक हुआ) फिर एक आदमी ने पुकारकर कहा, "ऐ कारवाँ के लोगो! रुको! हो न हो तुम (लोग) ही चोर हो!" (70)

वे उसकी ओर मुड़ते हुए बोले, "तुम्हारी क्या चीज़ खो गयी है?" (71

पीछा करनेवालों ने जवाब दिया, "पीने का शाही प्याला कहीं दिखायी नहीं दे रहा है”, और, “जो कोई उसे वापस ला दे उसको एक ऊँट भर (अनाज) इनाम में मिलेगा”, और, मैं इसके लिए वचन देता हूँ।" (72

उन भाइयों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! तुम लोग जानते हो कि हम तुम्हारे देश में कोई शरारत करने नहीं आए हैं : हम कोई चोर नहीं हैं।" (73)

उन लोगों ने पूछा, "अगर हम ने पाया कि तुम झूठ बोल रहे हो, तो फिर इसके लिए क्या दंड होना चाहिए?" (74)

उन्होंने जवाब दिया, "उसका दंड तो यही है कि जिसकी बोरी में वह शाही प्याला मिल जाए, उसे (ग़ुलाम बनाकर) रख लिया जाए : जुर्म करनेवालों को हम ऐसा ही दंड देते हैं।" (75)

(फिर यूसुफ़ ने एक एक कर के) उनके सामानों की तलाशी लेना शुरू की, फिर अपने भाई [बेंयमैन] का सामान देखने लगा, और उसकी बोरी में से शाही प्याला बरामद कर लिया।

इस तरह हमने यूसुफ़ के लिए (बेंयमैन को रोकने की) एक योजना बनायी थी ---- अगर अल्लाह ने ऐसा नहीं चाहा होता, तो शाही क़ानून के मुताबिक़ यूसुफ़ अपने भाई को दंड के रूप में वहाँ रोक नहीं सकता था। हम जिसे चाहते हैं, उसका दर्जा ऊँचा कर देते हैं, हर एक आदमी जो कुछ ज्ञान रखता है, उसके ऊपर भी एक हस्ती है [अल्लाह की], जो सबसे बड़ा ज्ञानी है।  (76)

उन भाइयों ने कहा, "अगर यह (बेंयमैन) चोर है तो यह अजीब बात नहीं, चोरी तो इससे पहले इसका अपना भाई (यूसुफ़) भी कर चुका है", किन्तु यूसुफ़ इस बात पर चुपचाप रहा और उसने अपने आपको उनपर प्रकट नहीं किया। उसने कहा, "तुम इस समय बहुत बुरी हालत में हो। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि तुम अपने दावे में कितने सच्चे हो।" (77)
                                               
उन्होंने कहा, "ऐ अज़ीज़! इसका बाप बहुत ही बूढ़ा आदमी है। इसलिए इसके बदले हममें से किसी को रख लीजिए। हमारी नज़र में तो आप बड़े ही उपकार करनेवाले आदमी हैं।" (78)

उसने कहा, "अल्लाह की पनाह! कि जिसके पास हमने अपना माल पाया है, उसे छोड़कर हम किसी दूसरे को पकड़ लें : फिर तो यह हमारी तरफ़ से अन्याय होगा।" (79)

जब वे यूसुफ़ को (मनाने की) उम्मीद छोड़ बैठे, तो आपस में सलाह मशविरा करने के लिए अलग जा बैठे : उनमें जो सबसे बड़ा था, वह कहने लगा, "क्या तुम्हें याद नहीं कि तुम्हारे बाप ने (बेंयमैन के बारे में) अल्लाह के नाम पर तुमसे पक्का वचन ले रखा है और उससे पहले यूसुफ़ के मामले में तुम अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में असफल हो चुके हो? मैं तो इस शहर से जाने वाला नहीं हूं, जब तक कि ख़ुद मेरे बाबा मुझे अनुमति न दें या अल्लाह ही मेरे हक़ में कोई दूसरा फ़ैसला कर दे----बेशक वही सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है। (80)

अत: तुम लोग अपने बाप के पास लौट जाओ और कह देना, "(हम क्या करें) आपके बेटे ने (पराए देश में) चोरी की। हम तो वही कह सकते हैं जो हमने देखा, जिस चीज़ का पहले से अंदाज़ा न हो, उससे कैसे बचा जा सकता था? (81)

(यह भी कह देना कि) हम जहां ठहरे थे, आप उस बस्ती में पता लगा लीजिए,  आप उन लोगों से भी पूछ लीजिए जो कारवाँ में हमारे साथ गए थे : हम सच बोल रहे हैं।" (82)

(सारी बातें सुनने के बाद) उनके बाप ने कहा, "नहीं, बल्कि (यह चोरी वाली बात) ऐसी है कि ख़ुद तुम्हारे दिलों ने एक झूठी बात बना ली है! ख़ैर! अब सबसे बेहतर यही है कि मैं धैर्य से काम लूँ : बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सब (भाइयों) को मेरे पास ले आए----वही तो है जो सब जानता है, सारा ज्ञान रखता है।" (83)

और उनके बाप ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया, (पुराना दर्द फिर से जाग उठा)  और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!” दुःख के मारे (रोते रोते) उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गयीं और वह ग़म में डूबा हुआ था। (84)

बेटों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! अगर आप ने अब भी यूसुफ़ के बारे में सोचना बंद न किया तो आपकी सेहत ख़राब हो जाएगी, या आपकी जान चली जाएगी।" (85)

बाप ने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और दुःख दर्द की फ़रियाद अल्लाह ही से करता हूँ। और अल्लाह की तरफ़ से मैं वह बात जानता हूँ जो तुम (लोगों) को मालूम नहीं। (86)

मेरे बेटो! (फिर से मिस्र) जाओ और जाकर यूसुफ़ और उसके भाई का पता लगाओ और अल्लाह की रहमत से निराश न हो---  अल्लाह की रहमत से तो केवल वही निराश होते हैं, जो विश्वास नहीं रखते।" (87)

(मिस्र पहुँच कर) फिर जब वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो कहा, "ऐ अज़ीज़! बड़ी सख़्ती के दिन हैं, बदक़िस्मती ने हमें और हमारे घरवालों को घेर रखा है। हम अपने साथ बहुत ही थोड़ी पूँजी लेकर आए हैंमगर आप (कृपा कर के) हमें पैमाना भर कर (अनाज) दे दें।  हमें आप दान (समझ कर ही) दे दें : अल्लाह दान करनेवालों को अच्छा इनाम देता है।" (88)

(उनका यह हाल देखकर) यूसुफ़ ने कहा, "क्या तुम्हें इस बात का अब भी कोई एहसास है कि तुम ने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या किया था, जबकि तुम्हें उस समय सूझ-बूझ न थी?" (89)

वे (चौंकते हुए) बोले, "क्या आप यूसुफ़ हैं?" उसने कहा, "हाँ, मैं यूसुफ़ हूँ और यह (बेंयमैन) मेरा भाई है। अल्लाह हम पर बहुत मेहरबान रहा है : जो कोई बुराइयों से बचता है, और कठिन समय में धीरज से काम लेता है, तो अल्लाह भी अच्छा काम करने वालों का बदला कभी बेकार नहीं जाने देता।" (90)

(यह सुन कर भाइयों के सर शर्म से झुक गए) उन्होंने कहा, "क़सम है अल्लाह की! अल्लाह ने हम में से सबसे ज़्यादा आप पर करम किया है और सचमुच (क़सूर हमारा था और) हम ही लोग ग़लती पर थे।" (91)

यूसुफ़ ने कहा, "आज के दिन तुम (मेरी तरफ़ से) कोई बुरी बात नहीं सुनोगे (कि जो होना था, हो गया)। अल्लाह तुम्हें माफ़ करे: वह सब रहम करनेवालों से बढ़कर रहम करनेवाला है। (92)

मेरा यह कुर्ता अपने साथ ले जाओ और इसे मेरे बाप के चेहरे पर डाल दो:  उनकी आँखों की रौशनी लौट आएगी. फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।" (93)

इधर जब (मिस्र से) कारवाँ चल दिया, तो (दूर कनान में) उनके बाप ने कहा, "तुम भले ही ऐसा समझो कि मैं बुढ़ापे में बहकी बहकी बातें करता हूं, मगर मुझे साफ़ यूसुफ़ की महक आ रही है," (94)

लेकिन लोगों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपने उसी पुराने धोखे में पड़े हुए हैं!" (95)

फिर जब (कारवाँ कनान पहुँच गया और) अच्छी ख़बर सुनानेवाला आया तो उसने यूसुफ़ के कुर्ते को उसके बाप [याक़ूब] के मुँह पर डाल दिया, तुरंत ही उनकी आंखों की रौशनी लौट आयी और याक़ूब ने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की तरफ़ से जिस चीज़ की जानकारी मुझे है, वह तुम नहीं जानते।" (96)

फिर (भाइयों ने) कहा, "ऐ हमारे बाबा! आप हमारे गुनाहों की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करें---  सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (97)

उन्होंने जवाब दिया, "मैं अपने रब से तुम लोगों की माफ़ी के लिए (ज़रूर) दुआ करूँगा : वह बहुत क्षमा करनेवाला, बड़ा ही दयावान है।" (98)

फिर जब (यूसुफ़ के माँ-बाप और भाई कनान से मिस्र पहुँचे, और) वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो उसने अपने माँ-बाप को (सम्मान के साथ) अपने पास जगह दी---  औऱ कहा : "आप सबका मिस्र में स्वागत है : अल्लाह ने चाहा तो आप सब यहाँ अमन-चैन से रहेंगे"---  (99)

और वह  अपने माँ-बाप को (अपने) सिंहासन तक ले गया। वहाँ मौजूद (उसके ग्यारह भाई, माँ और बाप) सब (मिस्र के रिवाज के अनुसार) उसके आगे झुक  गए और तब उसने कहा, "बाबा! बरसों पहले मैंने जो ख़्वाब देखा था, वह आज पूरा हो गया। मेरे रब ने इसे सच्चा कर दिखाया और वह मुझ पर बहुत मेहरबान रहा है--- उसने मुझे क़ैदख़ाने से छुटकारा दिलाया और आप लोगों को रेगिस्तान से निकाल कर यहां पहुंचा दिया---जबकि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच झगड़े का बीज बोया था। निस्संदेह मेरा रब जो करना चाहता है उसके लिए बड़ा महीन उपाय करता है; वास्तव में वह सब कुछ जानने वाला, (और अपने सारे कामों में) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (100)

(फिर यूसुफ़ ने दुआ की) : मेरे रब! तूने मुझे शक्ति व अधिकार दिए; तू ने मुझे ख़्वाबों का मतलब समझना सिखाया; तू ही आसमानों और ज़मीन को पैदा करनेवाला है, तू ही मेरी रक्षा करने वाला है-- इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी। जब मेरी मौत हो, तो इस हाल में हो कि मैं पूरी भक्ति से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] रहूँ और तू मुझे नेक व अच्छे बंदों में शामिल कर ले।" (101)

(ऐ रसूल!) ये जो कहानी बतायी गयी, ये उन बातों में से है जो आपके ज्ञान से परे थी। हम ने आप पर (यह बात) ‘वही’ [Revelation] द्वारा उतारी : (वरना) आप तो यूसुफ़ के भाइयों के साथ मौजूद नहीं थे, जब उन्होंने मिलकर ऐसी छल-कपट से भरी योजना बनायी थी। (102)

(याद रहे कि) आप चाहे उनके साथ कितनी ही कोशिश कर लें, अधिकतर लोग ऐसे हैं जो विश्वास करनेवाले नहीं। (103)




नोट: यह सारा क़िस्सा क़ुरआन  की सूरह 12: यूसुफ़ से लिया गया है.

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