: Thematic Quran: क़ुरआन के क़िस्से : हज़रत हूद (अलै.) और आ'द की क़ौम
क़ुरआन के क़िस्से
हज़रत हूद (अलै.) और आ'द की क़ौम
और (याद करो) आद और समूद की क़ौम को : (उनकी बर्बादी की कहानी) उनके घरों के बचे हुए खंडहरों को देखकर तुम साफ़ तौर से समझ चुके हो। शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए सुहाना बना कर पेश किया, और उन्हें सीधे मार्ग से रोक दिया, हालाँकि वे समझ-बूझ रखनेवाले लोग थे। (29: 38)
[ऐ रसूल] आद के भाई [हूद] की चर्चा करें : जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच बसने वाले आद के लोगों को सावधान किया था, और ऐसा सावधान करने वाले उनसे पहले भी और उनके बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि), "अल्लाह को छोड़ कर किसी की उपासना [इबादत] न करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया जाएगा।" (46: 21)
क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया? (89: 6)
(जो) ऊँचे ऊँचे स्तंभों वाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (89: 7)
उनके जैसे लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए। (89: 8)
आद' की क़ौम के लोगों के पास हम ने उनके भाई 'हूद' को (रसूल बना कर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत [पूजा] करो। उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है; तुम तो केवल झूठी बातें बना रहे हो। (11: 50)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस (नसीहत के लिए) तुमसे कोई मजदूरी नहीं माँगता। मेरा इनाम तो बस उसी के पास है जिसने मुझे पैदा किया। तो फिर तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? (11: 51)
ऐ मेरे लोगो! अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (तौबा करके) उसकी ओर लौट आओ। वह तुम्हारे लिए आसमान से काफ़ी मात्रा में पानी बरसायेगा (और खेत लहलहा उठेंगे), और तुम्हें और अधिक शक्ति देगा। तुम यूँ मुँह न फेरो और अपने गुनाहों में बिल्कुल गुम न हो जाओ।" (11: 52)
आद के लोगों ने भी रसूलों को झूठा बताया। (26: 123)
उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (26: 124)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ : (26: 125)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (26: 126)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (26: 127)
क्या तुम दिखावे के लिए हर ऊँची जगह पर बेकार के स्मारक ही बनाते फिरोगे? (26: 128)
क्या तुम इस आशा में क़िले बनवाते रहते हो कि जैसे तुम्हें यहाँ हमेशा ज़िंदा रहना है? (26: 129)
और जब किसी पर हमला करते हो, तो बिल्कुल निर्दयी ज़ालिम क्यों बन जाते हो? (26: 130)
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो; (26: 131)
उस (अल्लाह) का डर रखो, जिसने तुम तक वह सारी चीज़े पहुँचाई हैं जिन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो--- (26: 132)
उसने तुम्हें चौपाए और बाल-बच्चे दिए हैं, (26: 133)
और बाग़ व पानी के सोते [Springs] भी--- (26: 134)
इस कारण मुझे सचमुच डर है कि एक बड़े दर्दनाक दिन की यातना तुम्हें घेर लेगी।" (26: 135)
जवाब में वे बोले, "चाहे तुम हमें सावधान करो या न करो, हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, (26: 136)
क्योंकि हम तो केवल वही करेंगे, जैसा कि हमारे बाप-दादा किया करते थे: (26: 137)
हमें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी।" (26: 138)
मगर उसकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "हमारा ऐसा मानना है कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी हो" और "हमारी समझ से तुम एक झूठे आदमी भी हो।" (7: 66)
हूद ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझ में बेवक़ूफ़ी की कोई बात नहीं है! उल्टा, मैं सारे संसारों के रब की तरफ़ से भेजा हुआ एक रसूल हूँ : (7: 67)
"मैं तो अपने रब का संदेश तुम तक पहुँचा रहा हूँ। मैं तुम्हारा हित देखते हुए ईमानदारी से सलाह देता हूँ। (7: 68)
"क्या तुम्हें यह बात इतनी अनोखी लगती है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है, वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो, ताकि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे सके? याद करो, किस तरह उसने नूह की क़ौम के बाद तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया, और क़द-काठी में तुम्हें (दूसरों से) लम्बा-चौड़ा बनाया : अल्लाह की नेमतों [bounties] को याद करो, ताकि तुम कामयाबी पा सको।" (7: 69)
उन्होंने जवाब दिया, "ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आए हो। सिर्फ़ तुम्हारे कह देने भर से हम अपने देवी देवताओं को नहीं छोड़ सकते और न ही हम तुम पर विश्वास करनेवाले हैं। (11: 53)
वे कहने लगे, "क्या तुम हमारे पास सचमुच यही बताने के लिए आए हो कि हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें (पूजना) छोड़ दें? ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो जिस यातना (के आने) की धमकी तुम देते रहते हो, उसे हम पर ले आओ।" (7: 70)
हम तो यही कह सकते हैं कि ऐसा लगता है कि हमारे ख़ुदाओं में से किसी की तुम पर मार पड़ गयी है (जो ऐसी बातें करते हो)।" हूद ने कहा, "मैं तो गवाही के लिए अल्लाह को पुकारता हूँ, और तुम भी मेरे गवाह रहो, कि जिन हस्तियों को तुम ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार बना रखा है, उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। (11: 54)
जब उन लोगों के पास रसूलों के संदेश आए, (कभी) उनके आगे से और (कभी) उनके पीछे से [हर दृष्टिकोण से उन्हें समझाया गया] कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो", मगर उन्होंने कहा, "अगर हमारा रब चाहता तो उसने फ़रिश्तों को भेज दिया होता। अतः जिस संदेश के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उस पर विश्वास नहीं करते।" (41: 14)
‘आद की क़ौम के लोग ज़मीन पर हर जगह घमंड में चूर रहे और वह सब किया जिसका उन्हें कोई अधिकार न था, और कहते थे, "कौन है जो हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्हें यह नहीं सूझा कि जिस अल्लाह ने उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में कहीं बढ़कर है? वे हमारी आयतों को मानने से इंकार ही करते रहे, (41: 15)
(हूद ने कहा), अतः तुम सब मिलकर, मेरे ख़िलाफ़ जैसी चालें चल सकते हो, चल लो, और मुझे ज़रा भी मुहलत न दो। (11: 55)
मैं अपना भरोसा अल्लाह पर रखता हूँ, जो मेरा भी रब है, और तुम्हारा भी। ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं, जिसका नियंत्रण उसके हाथ में न हो। निस्संदेह मेरा रब (सच्चाई व इंसाफ़ के) सीधे रास्ते पर है। (11: 56)
लेकिन फिर भी अगर तुम मुँह मोड़ते हो, तो जिस संदेश के साथ मुझे तुम्हारे पास भेजा गया था, वह तो मैं तुम तक पहुँचा ही चुका हूँ, और मेरा रब तुम्हारी ज़गह किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा। तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते : वह मेरा रब है, जो हर चीज़ की निगरानी करता है।" (11: 57)
मगर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो? तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा, जिसकी धमकी तुम हमें देते हो!" (46: 22)
हूद ने कहा, "यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब आएगा : मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है, मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व जाहिल लोग हो।" (46: 23)
हूद ने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की नफ़रत और ग़ुस्से का क़हर टूट पड़ना तय हो चुका है। क्या तुम मुझ से उन (देवताओं के) नामों के लिए झगड़ रहे हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिन नामों लिए अल्लाह ने कोई मन्ज़ूरी नहीं दी? अच्छा, तो बस अब (आनेवाले समय का) इंतजार करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ।" (7: 71)
फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आता हुआ देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसनेवाला है!', (हूद ने कहा), "नहीं!, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी : यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (46: 24)
जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था : अपराधियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (46: 25)
हमने उन लोगों पर, उस तबाही वाले मनहूस दिन, भयानक आवाज़ वाली एक आँधी भेज दी थी; (54: 19)
फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आता हुआ देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसनेवाला है!', (हूद ने कहा), "नहीं!, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी : यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (46: 24)
जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था : अपराधियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (46: 25)
हमने उन लोगों पर, उस तबाही वाले मनहूस दिन, भयानक आवाज़ वाली एक आँधी भेज दी थी; (54: 19)
जो लोगों को (इस तरह) उखाड़ फेंकती थी मानो वे उखड़े हुए खजूर के तने हों। (54: 20)
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर कर के भूंसा बना डाला। (51: 42)
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर कर के भूंसा बना डाला। (51: 42)
आद की क़ौम के लोग एक ऐसी तेज़ और बेक़ाबू आंधी से मार दिए गए (69: 6)
जिसे अल्लाह ने उन पर सात रातों और आठ दिनों तक लगातार चलाए रखा, सो तुम (अगर वहाँ होते तो) उन लोगों को (उस अवधि) में (इस तरह) मरे पड़े देखते जैसे वे खजूर के गिरे हुए पेड़ों की खोखली जड़ें हों. (69: 7)
सो हमने उन लोगों पर कुछ दिनों के लिए (तबाह कर देने वाली) एक अत्यंत तेज़ आँधी छोड़ दी, ताकि उन्हें सांसारिक जीवन में अपमानित करने वाली यातना का मज़ा चखा दें; हालाँकि आने वाले जीवन [आख़िरत/परलोक] की यातना तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित करने वाली होगी, और उनको कोई सहायता भी नहीं दी जाएगी। (41: 16)
ये आद की क़ौम के लोग थे: इन लोगों ने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया, उसके रसूलों की आज्ञा भी नहीं मानी, और हर अड़ियल ज़ालिम की आज्ञा मानते हुए उसके पीछे चलते रहे। (11: 59)
ये आद की क़ौम के लोग थे: इन लोगों ने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया, उसके रसूलों की आज्ञा भी नहीं मानी, और हर अड़ियल ज़ालिम की आज्ञा मानते हुए उसके पीछे चलते रहे। (11: 59)
और इस तरह, जब हमारे फ़ैसले की घड़ी आ गयी, तो हमने हूद और उसके साथ ईमान रखनेवालों को अपने फ़ज़ल [Grace] से बचा लिया। हम ने उन्हें ऐसी यातना से बचा लिया जो बड़ी ही कठोर यातना थी। (11: 58)
फिर हमने अपनी दया दिखाते हुए हूद को, और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया; और उन लोगों को बर्बाद कर दिया जिन्होंने हमारी आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार कर दिया था, और वे विश्वास करनेवाले न थे। (7: 72)
(नतीजा यह हुआ कि) वे इस दुनिया में भी रद्द कर दिए गए, और क़यामत के दिन भी वे (बरकतों से) दूर कर दिए जाएंगे। "हाँ! आद के लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार कर दिया----- तो ऐ हूद की क़ौम, आद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी!" (11: 60)
समूद [Thamud] और आद ['Ad] की क़ौम के लोगों ने इस बात को मानने से इंकार किया था कि (एक दिन तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली) धमाकेदार टक्कर की घटना होगी : (69: 4)
आद की क़ौम के लोगों ने भी (हमारे पैग़म्बर हूद के संदेश की) सच्चाई को ठुकरा दिया, तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (54: 18)
क्या तम इनमें से किसी को भी अब बाक़ी बचा हुआ देखते हो? (69: 8)
Comments
Post a Comment