Thematic quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: राजनीतिक विषय: अपने बचाव में युद्ध करना [जिहाद] :
राजनीतिक विषय:
अपने बचाव में युद्ध करना [जिहाद] :
और (देखो!), जो लोग तुम से लड़ाई लड़ रहे हैं, उन लोगों से तुम्हें भी अल्लाह के रास्ते में लड़ना चाहिए, मगर (लड़ाई में) सीमाएं न लाँघो: अल्लाह (लड़ाई की) मर्यादा तोड़ने वालों को पसन्द नहीं करता। (2: 190)
(मक्कावालों ने तुम्हारे ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी है, तो तुम भी लड़ो) और जहाँ कहीं उनसे सामना हो उन्हें क़त्ल करो, और उन्हें निकाल बाहर करो जिस जगह से उन्होंने तुम्हें निकाला था, इसलिए कि उनका (लगातार) अत्याचार करना क़त्ल और ख़ून-ख़राबे से ज़्यादा गम्भीर है। लेकिन पवित्र मस्जिद [काबा] की सीमा में तुम उनसे न लड़ो जब तक कि वे ख़ुद तुमसे वहाँ युद्ध न करें। अगर वे वहाँ तुमसे युद्ध करने आ ही जाएं, तो उन्हें क़त्ल करो ----- सच्चाई से इंकार करनेवाले ऐसे (अत्याचारियों) की यही सही सज़ा है ---- (2: 191)
लेकिन अगर वे लड़ाई बंद कर दें, तो फिर अल्लाह भी बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (2: 192)
तुम्हें (दुश्मनों से) युद्ध करने का आदेश दिया जाता है, हालाँकि तुम इसे पसंद नहीं करते। ऐसा हो सकता है कि तुम कोई चीज़ नापसंद करो मगर वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और कोई चीज़ जो तुम्हें पसंद हो, वह तुम्हारे लिए बुरी हो: अल्लाह जो जानता है, तुम नहीं जानते।" (2: 216)
ईमान रखनेवालों को अल्लाह (ज़ालिमों से) बचा लेगा; अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता जो न विश्वास करने योग्य हों और न ही (नेमतों के लिए) शुक्र अदा करते हों। (22: 38)
जिन (ईमानवाले) लोगों पर हमला किया गया है, उन्हें हथियार उठाने की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर साफ़ तौर से ज़ुल्म किया गया है ----- अल्लाह उनकी मदद करने की पूरी ताक़त रखता है। (22: 39)
वे लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के, केवल इसलिए भगा दिए गए कि वे कहते थे, "हमारा रब अल्लाह है।" अगर अल्लाह एक-दूसरे के द्वारा कुछ लोगों को हटाता न रहता तो बहुत सारी मठें [Monasteries], गिरजाघर [churches], यहूदियों की इबादतगाहें [Synagogues] और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह के नाम का ज़िक्र बार-बार किया जाता है, सब बर्बाद कर दी जातीं। अल्लाह ऐसे लोगों की मदद ज़रूर करेगा, जो उसकी (सच्चाई के पक्ष में) मदद करते हैं ---- अल्लाह बड़ा मज़बूत, बेहद ताक़तवाला है ---- (22: 40)
अत: ऐ ईमानवालो! जब तुम अल्लाह के रास्ते में लड़ने के लिए निकलो, तो अच्छी तरह पता लगा लो, और अगर कोई तुम्हें सलामती की दुआ के साथ 'सलाम' करे, तो इस लालच से कि तुम्हें कुछ सांसारिक जीवन का माल (लूट में) हासिल हो जाए, उससे यह न कहो कि "तुम ईमान नहीं रखते," (और लड़ने लग जाओ) ----- अल्लाह के पास तुम्हारे लिए बहुत सारी नेमतें हैं। एक समय तुम्हारी हालत भी ऐसी ही थी, इसलिए ठीक से पता लगा लिया करो: तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (4: 94)
[ईमानवालो!] तुम्हें क्या हुआ है कि तुम अल्लाह के रास्ते में नहीं लड़ते? हालाँकि कितने ही सताए हुए मर्द हैं, औरतें हैं, बच्चे हैं, जो (ज़ुल्म से तंग आकर) पुकारते हैं, "हमारे रब! हमें इस (मक्का की) बस्ती से छुटकारा दिला जहाँ के लोग ज़ुल्म करने में लगे हैं! और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा रखवाला बना दे और किसी को हमारी मदद करने के लिए खड़ा कर दे।" (4: 75)
जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हें (सच्चाई क़बूल करने की) ख़ुशख़बरी सुना दो: (22: 37)
जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जाएँ उन्हें मुर्दा न कहो; वे ज़िंदा हैं, हालाँकि तुम्हें (उनकी ज़िंदगी का) एहसास नहीं होता। (2: 154)
ऐ रसूल!], जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गए हैं, आप उन्हें मुर्दा न समझें, वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं, अपनी रोज़ी पा रहे हैं, (3: 169)
अल्लाह ने अपने फ़ज़ल से जो कुछ उन्हें दे रखा है, वे उस पर बहुत ख़ुश हैं; और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे हैं जिन्हें वे (दुनिया में) पीछे छोड़ आए हैं जो अभी उनके साथ (शहीदों में) शामिल नहीं हुए हैं, कि न तो उनके लिए कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे; (3: 170)
वे अल्लाह के फ़ज़ल [Favour] और उसकी नेमतों [Blessings] से भी (ख़ुश हो रहे हैं), और इस बात से कि (उन्होंने देख लिया कि) अल्लाह ईमान रखनेवालों का बदला कभी बेकार नहीं जाने देता। (3: 171)
अल्लाह ने जन्नत [Garden] के बदले में, ईमानवालों से उनकी जान और उनके माल ख़रीद लिए हैं ------ वे अल्लाह के रास्ते में लड़ते हैं: वे जान मारते भी हैं, और मारे भी जाते हैं---- यह अल्लाह का किया हुआ एक पक्का वादा है जो तौरात [Torah],
इंजील [Gospel] और क़ुरआन में मौजूद है। अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला कौन हो सकता है? अतः जो सौदा तुमने उससे किया है, उस पर खु़शियाँ मनाओ: यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9: 111)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, वे सच्चे लोग हैं और वे अपने रब के सामने गवाह होंगे: उनके लिए उनका इनाम होगा और (साथ में) उनकी रौशनी होगी। मगर जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया और हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं। 57: (19)
(ईमानवालो!) उनके साथ (युद्ध के लिए), जितना तुम इकट्ठा कर सको, सैनिकों की टुकड़ियाँ और साथ में लड़ाकू घोड़े तैयार रखो, ताकि इससे अल्लाह के दुश्मनों और अपने दुश्मनों को डरा सको, और उन दूसरे लोगों को भी चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते मगर अल्लाह जानता है। अल्लाह के रास्ते में (संघर्ष के लिए) तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा, और तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (8: 60)
लेकिन अगर वे लड़ाई बंद कर दें, तो फिर अल्लाह भी बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (2:
192)
लेकिन अगर वे शांति व सुलह की ओर झुकें, तो (ऐ रसूल!), आप भी ज़रूर इसकी तरफ़ झुक जाएं, और अल्लाह पर अपना भरोसा रखें: वह सब (की) सुनता है, सब कुछ जानता है। (8: 61)
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