Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन : क़ुरआन के क़िस्से: गुफावाले लोग [People of the Cave]:
क़ुरआन के क़िस्से:
गुफावाले लोग [People of the Cave]:
[ऐ रसूल!] क्या हमारी अन्य निशानियों में से आपको गुफा [Cave] और रक़ीम (नामक शहर के) लोगों (की घटना) ज़्यादा ही अजूबा लगी? (18: 9)
(जब ऐसा हुआ था कि) उन नौजवान लड़कों ने गुफा में शरण लेनी चाही थी और कहा था, "ऐ हमारे रब! हम पर रहम कर और इस हालत में हमारे लिए भलाई का कोई रास्ता निकाल दे।" (18: 10)
फिर हमने उन्हें कई वर्षों के लिए गुफा में (इस तरह सुला दिया कि) उनके कान (दुनिया की आवाज़ सुनने से) बंद कर दिए गए, (18: 11)
फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि मालूम कर सकें कि (लड़कों के) उन दो समूहों में से कौन सा समूह है जो अपने वहाँ रहने की अवधि के बारे में ज़्यादा सही गिनती बता सकता है। (18: 12)
[ऐ रसूल] असल में जो घटना हुई थी हम उसकी सही-सही कहानी आपको सुना देते हैं: वे कुछ नौजवान थे जो अपने रब में विश्वास रखते थे, और हमने उनका ज़्यादा से ज़्यादा मार्गदर्शन किया था। (18: 13)
हमने उनके दिलों को (ईमान की ताक़त से) मज़बूत कर दिया था, सो (एक दिन) वे उठ खड़े हुए और कहा, "हमारा रब तो वह है जो आसमानों और ज़मीन का रब है। हम उसे छोड़कर कभी भी किसी दूसरे प्रभु को नहीं पुकारेंगे, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह बिल्कुल बेकार व सच्चाई से हटी हुई बात होगी। (18: 14)
ये हमारी क़ौम के लोग हैं जिन्होंने उस (अल्लाह) को छोड़कर अन्य (देवताओं को) अपना प्रभु बना रखा है। (अगर ये सही हैं तो) आख़िर ये उनके बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं लाते? उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़े? (18: 15)
(साथियो), अब जबकि तुम इन लोगों से अलग हो चुके हो, और उनसे भी जिनको ये अल्लाह के बजाय पूजते हैं, तो अब चलकर (किसी) गुफा में शरण ली जाए। अल्लाह तुम पर ज़रूर अपनी रहमत की बारिश करेगा और तुम्हारे काम में आसानी के साधन जुटा देगा।" (18: 16)
अगर आप उस (गुफा) को देखते जिसके भीतर एक बड़ी सी जगह में वे सोए हुए थे, तो वह ऐसी थी कि जब सूरज निकलता था तो उसकी किरणें गुफा के दाहिनी तरफ़ से बचकर निकल जाती थीं और जब वह डूबने लगता तो उसकी किरणें गुफा के बायीं ओर से निकल जाती थीं। यह अल्लाह की निशानियों में से है: जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही सही मार्ग पाने वाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे, तो कोई बचाने वाला ऐसा नहीं जो उसे सीधे मार्ग पर ले आए। (18: 17)
आप (उन्हें देखकर) यही समझते कि वे जागे हुए हैं, हालाँकि वे सोए हुए थे। हम उन्हें दाएँ और बाएँ करवट दिलाते रहते थे, और उनका कुत्ता चौखट पर अपने (आगे के) दोनों पाँव फैलाए हुए (बैठा) था। अगर आप उन्हें कहीं देख लेते, तो आप में उनका डर समा जाता और वहाँ से उलटे पाँव भाग खड़े होते। (18: 18)
फिर जब समय (पूरा) हो गया तो हमने उन्हें (नींद से) उठा दिया, और वे आपस में पूछताछ करने लगे। उनमें से एक ने पूछा, "तुम कितनी देर यहाँ रहे होगे?" (किसी ने) जवाब दिया, "यही कोई एक दिन या एक दिन का कोई भाग होंगे", मगर फिर (कुछ और लोगों) ने कहा, "तुम्हारा रब ही सही जानता है कि तुम यहाँ असल में कितनी अवधि तक रहे। तुममें से कोई एक चाँदी के सिक्के के साथ शहर चला जाए, और वहाँ पता लगाए कि सबसे अच्छा खाना कहाँ मिलता है, फिर उसमें से कुछ खाने को ले आए। मगर होशियार रहना कि कहीं किसी को तुम्हारे बारे में ख़बर न होने पाए: (18: 19)
अगर उन्हें तुम्हारे बारे में पता चल गया तो वे तुम्हें पत्थरों से मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में लौट आने पर मजबूर करेंगे, और तब तो तुम कभी भी कामयाब न हो पाओगे।" (18: 20)
इस तरह हम उन (गुफावालों) की घटना पर (शहर के) लोगों का ध्यान खींच पाए, ताकि वे जान सकें कि (मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का) अल्लाह का वादा सच्चा है, और यह कि क़यामत की घड़ी के आने में कोई सन्देह नहीं है, (हालाँकि) लोग इसके बारे में आपस में बहस करते रहते हैं।
फिर (कुछ लोगों ने) कहा, "इस गुफा के ऊपर एक भवन बना दो: उनके बारे में उनका रब ही बेहतर जानता है।" उनमें से असरदार लोगों ने कहा, "हम अवश्य इसके ऊपर (यादगार के तौर पर) एक इबादत करने की जगह बनाएँगे।" (18: 21)
(कुछ लोग) कहते हैं, "वे [गुफावाले] तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था", कुछ दूसरे कहते हैं, "वे पाँच थे और छठा उनका कुत्ता था" ----- वे अँधेरे में तीर चलाते हैं---- और कुछ यह भी कहते हैं, "वे सात थे और आठवाँ उनका कुत्ता था।" [ऐ रसूल] आप कह दें, "मेरा रब ही बेहतर जानता है कि असल में वे कितने थे।" बहुत ही कम लोग हैं जिनको उन (गुफावालों) की सही जानकारी है, अत: इस पर बहस न करें, मगर जो बात स्पष्ट है उसपर जमे रहें, और उनके बारे में इन लोगों में किसी से भी कुछ न पूछें; (18: 22)
और ऐसी बात कभी न कहें कि, "मैं कल इसे कर दूँगा", (18: 23)
बल्कि (यह जोड़ दें) कि “अल्लाह ने चाहा तो” (कर दूँगा), और, जब कभी आप भूल जाएं, तो अपने रब को याद कर लें और कहें, "आशा है कि मेरा रब सही चीज़ की तरफ़ ही मेरा मार्गदर्शन कर दे।" (18: 24)
(कुछ लोग कहते हैं), “गुफा में सोने वाले वहाँ तीन सौ साल तक रहे थे”, कुछ इसमें नौ वर्ष और जोड़ देते हैं। (18: 25)
[ऐ रसूल] कह दें, "अल्लाह ही बेहतर जानता है कि असल में वे (गुफा में) कितने दिन रहे।" आसमानों और ज़मीन की हर ढकी छिपी चीज़ उसकी जानकारी में है---- क्या ख़ूब वह देखनेवाला है! क्या ही अच्छा वह सुननेवाला है!---- उस (अल्लाह) के सिवा उन्हें बचानेवाला कोई नहीं है; और वह अपनी हुकूमत (या अपने फ़ैसले) में किसी को हिस्सेदार नहीं बनाता है। (18: 26)
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