Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: आर्थिक विषय: वसीयत [Bequest]:

 आर्थिक विषय:


वसीयत [Bequest]:


जब तुममें से किसी की मौत का समय आ जाएऔर वह कुछ माल छोड़कर जा रहा होतो उसे चाहिए कि अपने माँ-बाप और नज़दीकी नातेदारों के लिए सही तरीक़े से वसीयत [bequest] कर दे ----- यह उन लोगों का कर्त्तव्य होगाजो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (2: 180)


अगर कोई उस वसीयत को सुनने के बाद बदल डालेतो (उसे) बदलने का गुनाह उन्हीं लोगों के सिर पर होगा जो उसे बदलेंगे: अल्लाह सब कुछ सुननेवाला और जाननेवाला है। (2: 181)

 लेकिन अगर कोई जानता होकि वसीयत करनेवाले ने (बँटवारे में) भूल-चूक की हैया उसने पक्षपात किया हैऔर वह दोनों पक्षों के लोगों को समझा-बुझाकर उनमें कोई समझौता करा देतो उस पर कोई गुनाह नहीं: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवालाबेहद दयावान है।  (2: 182)

 

तुम यह नहीं जानते कि तुम्हारे माँ-बाप और बाल-बच्चों में कौन तुम्हारे लिए ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाने वाला है (और किसका हक़ ज़्यादा होना चाहिए, किसका कम): यह (हिस्सा) अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है, और वह सब कुछ जानता है, हर काम की समझ-बूझ रखता है।  (4: 11)

 

तुम्हारी बीवियाँ जो कुछ (संपत्ति) छोड़ जाएं, उसमें तुम्हारा [पति का] हिस्सा आधा है, अगर उनसे औलाद (ज़िंदा) न हो;

अगर उनकी औलाद हो, तो तुम एक चौथाई हिस्से के वारिस होगे।

 [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा।

तुम जो कुछ छोड़कर जाओ, अगर तुम्हारी कोई औलाद नहीं है, तो तुम्हारी बीवियों का हिस्सा चौथाई होगा; और अगर तुम्हारी औलाद है, तो तुम्हारी बीवियाँ आठवें हिस्से की वारिस होंगी।

[इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा।

 अगर कोई मर्द या औरत मर जाए और उसकी न तो कोई औलाद हो और न ही माँ-बाप बचे हों, मगर (माँ की तरफ़ से) उसका एक भाई या बहन हो, तो वह भाई या बहन छठे हिस्से का वारिस होगा;

अगर भाई-बहन एक से ज़्यादा हुए, तो फिर एक तिहाई हिस्से में वे सब बराबर के भागीदार होंगे,

  [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा, शर्त यह है कि  इससे किसी (हक़दार) को कोई नुक़सान न पहुँचे: यह सब कुछ अल्लाह का हुक्म है: और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत नर्म दिल व मेहरबान है। (4: 12)

 

ऐ ईमानवालो! जब तुममें से किसी के मरने का समय आ जाए, तो तुममें से दो न्याय पसंद करनेवाले आदमी को चाहिए कि वसीयत [bequest] बनते समय गवाह के रूप में मौजूद रहें, या अगर तुम कहीं यात्रा पर गए हो और तुम्हारे मरने का समय क़रीब आ पहुँचे, (और मुसलमान गवाह न मिल पाए) तो दूसरे लोगों में से दो आदमी गवाह बन जाएँ। अगर तुम्हें (उनकी सच्चाई पर) कोई सन्देह हो, तो नमाज़ के बाद उन दोनों को रोक लो और उन्हें अल्लाह की क़समें खिलाओ कि (वे कहें), "हम किसी क़ीमत पर भी अपनी गवाही नहीं बेचेंगे, चाहे मामला किसी नज़दीकी रिश्तेदार का ही क्यों न हो। हम अल्लाह के लिए सच्ची गवाही को कभी नहीं छिपायेंगे, क्योंकि अगर हमने ऐसा किया, तो हम गुनाह करने वालों में शामिल हो जाएंगे।" (5: 106)

अगर बाद में पता चल जाए कि उन दोनों ने (झूठी गवाही देकर) गुनाह कर डाला है, तो फिर उनकी जगह, जिन लोगों का हक़ [rights] मारा गया है, उनमें से दो आदमी खड़े हो जाएँ, क्योंकि उन्हें गवाही देने का ज़्यादा हक़ बनता है। फिर वे दोनों अल्लाह की क़सम खाकर कहें, "हमारी गवाही उन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची है। हमने जो कहा, सच के सिवा कुछ न कहा, अगर झूठ कहा हो, तो हम ज़ालिमों में से होंगे": (5: 107

इस तरह (क़समें दिलाने) से इस बात की सम्भावना ज़्यादा है कि वे सच्ची और सही गवाही देंगे, या (कम से कम) डरेंगे कि उनकी क़समों को दूसरे गवाहों द्वारा बाद में झूठा साबित किया जा सकता है। (देखो!) अल्लाह का (हुक्म न मानने के नतीजे से) डरते रहो और सुनो; अल्लाह उन लोगों को सही मार्ग नहीं दिखाता, जो उसका क़ानून तोड़ते हैं। (5: 108)

 

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