Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: क़ुरआन के क़िस्से: इसमाईल अलै. [Ishmael]:
क़ुरआन के क़िस्से:
इसमाईल अलै. [Ishmael]:
उस [इबराहीम] ने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ: वह ज़रूर मेरा मार्गदर्शन करेगा (37: 99)
ऐ मेरे रब! मुझे ऐसी संतान दे जो नेक लोगों मे से हो।" (37: 100)
तो हमने उन्हें एक सहनशील बेटे [इस्माईल, Ishmael] के होने की ख़ुशख़बरी सुना दी। (37: 101)
फिर जब वह लड़का इतना बड़ा हो गया कि बाप के काम में हाथ बँटाने लगा (और उनके साथ दौड़-धूप करने लगा), तब इबराहीम ने उससे कहा, "ऐ मेरे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब बताओ, कि तुम्हारा क्या विचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाबा! आप वही करें जिसका आपको आदेश दिया जा रहा है, और अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे धैर्य [सब्र] करने वालों में से पाएँगे।" (37: 102)
फिर जब दोनों ने अपने आपको अल्लाह (की मर्ज़ी) के आगे झुका दिया, और फिर उन्होंने अपने बेटे को माथे के बल लिटा दिया, (37: 103)
और... फिर हमने उसे पुकारा, "ऐ इबराहीम! (37: 104)
तूने सपने को सच कर दिखाया। निस्संदेह जो लोग अच्छा काम करते हैं, हम उनको इसी प्रकार इनाम देते हैं"--- (37: 105)
यह तो असल में एक परीक्षा थी ताकि (उनके असल चरित्र) सामने आ जाएं --- (37: 106)
और हमने उसके बेटे (की जान) को एक ज़बरदस्त (जानवर की) क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया, (37: 107)
और हमने ऐसी परम्परा बनायी कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा: (37: 108)
"सलाम हो इबराहीम पर!" (37: 109)
और जब ऐसा हुआ था कि हमने (मक्का के) इस घर [काबा] को लोगों के लिए बराबर आने-जाने का केन्द्र और अमन की जगह ठहरा दिया, और हुक्म दिया, "इबराहीम के खड़े होने की जगह [मुक़ाम ए इबराहीम] को नमाज़ की जगह बना ली जाए!" हमने इबराहीम [Abraham] और इसमाईल [Ishmael] को हुक्म दिया था: "मेरे इस घर को इसके चारों ओर चक्कर [तवाफ़] लगाने वालों, इबादत के लिए ठहरने वालों, और नमाज़ में (झुककर) रुकू [bow] व सज्दा [prostrate] करने वालों के लिए पाक-साफ़ रखो।" (2: 125)
और (वह क्या दौर था कि) जब इबराहीम और इसमाईल इस घर [मक्का] की नींव डाल रहे थे, (तो उन्होंने दुआ की), "हमारे रब! हमारी ओर से (इसे) स्वीकार कर ले। निस्संदेह तू (दुआओं का) सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है। (2: 127)
उसके रब ने इबराहीम से कहा था, "अपने आपको मुझ पर पूरी तरह समर्पित कर दे [मेरी हर आज्ञा माननेवाला, मुस्लिम बन जा]।" इबराहीम ने जवाब दिया, "मैं अपना सिर सारे संसार के रब के आगे झुकाता हूँ," (2: 131)
और इबराहीम ने अपने बेटों को भी ऐसा ही करने का हुक्म दिया था, और याक़ूब [Jacob] ने भी कहा: "ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन [धर्म] पसंद कर लिया है, तो ध्यान रहे कि मरते दम तक, तुम पूरी भक्ति से एक अल्लाह के सामने सिर झुकानेवाले [मुस्लिम] बने रहो।" (2: 132)
[ऐ यहूदियो], क्या तुम उस वक़्त वहाँ मौजूद थे जब याक़ूब [Jacob] की मौत का समय आया था? जब उसने अपने बेटों से पूछा था, "मेरे चले जाने के बाद तुम किसकी इबादत करोगे?" उन्होंने जवाब दिया, "उसी एक अल्लाह की, जिसकी इबादत आपने की है, और आपके बाप-दादा, इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] ने भी की है: हम पूरी भक्ति से उसी (एक अल्लाह के हर हुक्म) के सामने अपना सिर झुकाते [यानी मुस्लिम] हैं।" (2: 133)
अत: [ऐ ईमानवालो], तुम कहो, "हम ईमान रखते हैं अल्लाह पर और उस [क़ुरआन] पर जो हम पर उतारी गयी, और जो कुछ (शिक्षाएं) इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael], इसहाक़ [Isaac], याक़ूब [Jacob] और उसकी औलाद की ओर भेजी गयीं, और साथ में जो कुछ मूसा [Moses] और ईसा [Jesus], और सारे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दी गयीं। हम इनमें से किसी के बीच कोई अन्तर नहीं करते (कि इनमें से किसी को मानें और किसी को न मानें), और हम पूरी भक्ति से केवल उसी (अल्लाह) के आगे अपना सिर झुकाते हैं।" (2: 136)
[ऐ रसूल, आप यहूदियों और ईसाइयों से] कह दें, "तुम हमसे अल्लाह के बारे में कैसे बहस कर सकते हो, जबकि वह हमारा भी रब है और तुम्हारा भी? हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हम तो पूरी भक्ति से उसी के आगे सिर झुकाते हैं।" (2: 139)
"या क्या तुम यह कह रहे हो कि इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़, याक़ूब और उनकी औलाद यहूदी या ईसाई थे?" [ऐ रसूल], आप उनसे पूछें, "कौन ज़्यादा जानता है: तुम या अल्लाह? उससे बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जिसके पास अल्लाह की (ओर से आयी हुई) एक गवाही [Testament] हो और वह उसे छिपाए? (याद रखो), जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।" (2: 140)
और हमने इबराहीम को (इस्माईल के बाद दूसरे बेटे) इसहाक़ की ख़ुशख़बरी दी--- एक नबी और सच्चे व अच्छे आदमी की --- (37: 112)
और हमने उसपर और इसहाक़ [Isaac] पर भी बरकतें [blessings] भेजीं: उनकी संतानों में से कुछ तो बहुत अच्छे थे, मगर कुछ खुलकर अपने आप पर बुराइयाँ करने वाले थे। (37: 113)
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