Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: क़ुरआन के क़िस्से: क़ारून [Korah] :
क़ुरआन के क़िस्से:
क़ारून [Korah] :
क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था। हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतराओ मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नहीं करता। (28: 76)
और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ न करो। दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है। और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करने वालों को पसन्द नहीं करता", (28: 77)
लेकिन उसने जवाब दिया, "मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)। (28: 78)
फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं: सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (28: 79)
मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं: मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (28: 80)
अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया: उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका। (28: 81)
अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है: अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।"(28: 82)
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