Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सब्ज़ियाँ और फल
सब्ज़ियाँ और फल:
वही (अल्लाह) है जो आसमान से पानी बरसाता है। फिर उसी के द्वारा हम हर एक पौधे
की कोंपल उगाते हैं, फिर उससे हरी-भरी टहनियाँ निकल आती हैं, फिर उससे दाने निकल आते हैं, एक दाने से दूसरा दाना मिला हुआ।
और (इसी तरह) खजूर के पेड़ों पर खजूरों के गुच्छे लदे होते हैं, जो (उसके बोझ से) झुके पड़ते हैं। और अंगूर, ज़ैतून और अनार के बाग़ पैदा किए, जो देखने में एक जैसे भी लगते हैं, और एक-दूसरे से अलग भी। उनके फलों को बढ़ते और पकते हुए देखो! निस्संदेह ईमान
रखनेवाले लोगों के लिए इनमें बड़ी निशानियाँ हैं। (6: 99)
(और आसपास के इलाक़े को
देखो!), धरती पर एक दूसरे से सटे हुए ज़मीन के टुकड़े हैं, उनमें
अंगूरों के बाग़ हैं, (अनाज की) खेतियाँ हैं, खजूर के
पेड़ हैं जिनमें कुछ तो झुंड में लगे होते हैं, कुछ अकेले
खड़े होते हैं, सबको एक ही पानी से सींचा जाता है, फिर भी हम
उनमें से कुछ फलों का मज़ा दूसरे फलों से बेहतर बना देते हैं: सचमुच इस बात में उन
लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (13:
4)
और इसी पानी से वह तुम्हारे लिए (अनाज
की) फ़सलें, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर तरह के फल उगा देता है। सचमुच सोच-विचार करनेवालों
के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (16: 11)
और
(देखो!) उनके लिए एक निशानी तो वह ज़मीन है जो मुर्दा पड़ी हुई थी: हमने उसे जीवित
किया और उससे अनाज उगा दिए, जिसमें
से वे खाते हैं। (36: 33)
और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बाग़ लगाए हैं, और उसमें से पानी के सोते (springs) प्रवाहित कर दिए हैं, (36: 34)
ताकि वे उसके फल खा सकें --- हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है --- तो क्या फिर भी वे शुक्र नहीं अदा करेंगे? (36: 35)
(वे मज़े करेंगे) बिन काँटों के बेरियों में; (56: 28)
और गुच्छेदार केले से लदे पेड़ों में; (56: 29)
बहुत-सारे फलों व मेवों में (56: 32)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (19: 25)
याद
करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम
एक ही तरह के खाने पर संतोष नहीं कर सकते, अतः अपने रब से दुआ करो कि
हमारे लिए ज़मीन से उगने वाली कुछ चीज़ें पैदा कर दे, इसकी साग-सब्ज़ियाँ और ककड़ियाँ, लहसुन, दालें
और प्याज़।" मूसा ने कहा, "क्या
तुम (खाने की) बढ़िया चीज़ को घटिया चीज़ों से बदलना चाहते हो? (अब
फिर से) तुम मिस्र चले जाओ, जो कुछ तुमने माँगा है, तुम्हें
वहाँ मिल जाएगा।" उन (यहूदियों) पर अपमान और
बदहाली की मार पड़ी, और उन्हें अल्लाह का प्रकोप
झेलना पड़ा क्योंकि वे अल्लाह की आयतों [संदेशों] को मानने से लगातार इंकार करते
रहे और हर सच्चाई का विरोध करते हुए नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह सब इसलिए
हुआ कि उन्होंने आज्ञा मानने से इंकार किया और वे नियमों को तोड़ने में बेलगाम हो
गए थे। (2: 61)
फिर हम इसमें अनाज उगाते हैं,
(80: 27)
और अंगूर और तरकारी, (80: 28)
और ज़ैतून और खजूर, (80: 29)
और घने-घने बाग़, (80: 30)
और (तरह-तरह के) फल-मेवे और (जानवरों का) चारा: (80: 31)
अंजीर [Fig] की क़सम और ज़ैतून [Olive] की क़सम, (95: 1)
फलों से भरे हुए -— खजूर और अनार के पेड़ होंगे। (55: 68)
और हमने उस पर (कद्दू का) बेलदार पेड़ उगा दिया था, (37: 146)
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