Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें: शैतान-II:
अनदेखी चीज़ें:
शैतान-II:
और इसकी जगह, वे उस (जादू-मंतर) के पीछे चलने लगे जिसे शैतानों ने सुलैमान [Solomon] की बादशाही के ज़माने में गढ़ लिया था। ऐसा नहीं था कि सुलैमान ने ख़ुद (सच्चाई को मानने से) इंकार [कुफ़्र] किया हो; असल में कुफ़्र तो शैतानों ने किया था। वे लोगों को जादू-टोना और जो कुछ बाबिल [Babylon] में दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतरा था, उसे सिखाते थे। हालाँकि इन दोनों ने कभी किसी को बिना पहले सावधान किए हुए कुछ नहीं सिखाया, वे (पहले ही यह बता देते थे कि), "हमें तो केवल बहकाने के लिए भेजा गया है---- तुम (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र] न कर बैठो।" इन्हीं दोनों (फ़रिश्तों) से उन लोगों ने यह सीखा कि कैसे मियाँ-बीवी के बीच झगड़ा पैदा किया जा सकता है, हालाँकि वे इसके द्वारा किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा पाते थे, सिवाय इसके कि जब अल्लाह की यही मर्ज़ी हो। उन्होंने (जादू-टोने की) वह चीज़ें तो सीखीं जिससे उन्हें नुक़सान पहुँचा, मगर (अल्लाह की किताब की) वह चीज़ें नहीं सीखीं जिससे उन्हें फ़ायदा पहुँचता, यह जानते हुए भी कि जिस किसी ने (जादू-टोने का ज्ञान) सीखा, उसके लिए आनेवाली दुनिया (की बरकतों) में कोई हिस्सा नहीं होगा। काश! कि वे जान पाते कि कितने घटिया (दाम पर) उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला! (2: 102)
आप कहें, "क्या हम अल्लाह को छोड़कर उसे पुकारने लग जाएँ जो न तो हमें कोई फ़ायदा पहुँचा सकता हो, और न कोई नुक़सान? जबकि अल्लाह हमें सीधा रास्ता दिखा चुका है, तब भी हम (गुमराही की तरफ़) उलटे पाँव फिर जाएँ, और उस आदमी की तरह हो जाएं जिसे शैतानों ने रेगिस्तानी खड्डों [Desert ravine] में भटका दिया हो, और वह हैरान-परेशान होकर फिरता हो, हालाँकि उसके कुछ साथी उसे सही मार्ग की ओर बुला रहे हों (और कहते हों), 'हमारे पास चला आ!'?" आप कह दें, "अल्लाह का दिखाया हुआ मार्ग ही असल में सच्चा मार्गदर्शन है, और हमें आदेश हुआ है कि हम सारे संसार के रब के आगे पूरी भक्ति से अपना सिर झुका दें, (6: 71)
इसी तरह से, हर एक रसूल के साथ हमने एक दुश्मन लगा दिया था, शैतान आदमियों और शैतान जिन्नों के रूप में। वे धोखा देने के लिए एक दूसरे के मन में चिकनी-चुपड़ी बातें डाला करते थे----- [ऐ रसूल!], अगर आपके रब ने न चाहा होता, तो वे ऐसा नहीं कर पाते: छोड़ दें उन्हें (झूठ) गढ़ने के लिए----(6: 112)
शैतानों का यह काम है कि वे अपने मानने वालों को भड़काते रहते हैं कि वे तुम से बहस करें: अगर तुम उनकी बातें सुनने लग जाओगे, तो तुम भी मूर्तियों को पूजनेवाले हो जाओगे। (6: 121)
ऐ आदम की सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके कपड़े उतरवा दिए थे, ताकि उनकी नग्नता उनके सामने खोल दे: वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते: हमने शैतानी करने वालों को उन लोगों का साथी व मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (7: 27)
(तुममें से) कुछ को उसने (सीधा) मार्ग दिखा दिया और कुछ की क़िस्मत में (इंकार व बुरे कर्मों के चलते) भटकना लिख दिया: उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना रखवाला बना लिया, और यह समझते रहे कि वे सीधे मार्ग पर हैं। (7: 30)
जो फ़ु़ज़ूलख़र्ची करते हैं, वह शैतान के भाई हैं, और शैतान अपने रब की नेमतों का कभी भी शुक्र अदा नहीं करता--- (17: 27)
अतः (ऐ रसूल) आपके रब की क़सम, हम उन सबको और उनके साथ सारे शैतानों को ज़रूर इकट्ठा करेंगे। फिर उन सबको जहन्नम के गिर्द हाज़िर होने का आदेश देंगे, इस दशा में कि वे घुटनों के बल झुके होंगे; (19: 68)
ऐ रसूल) क्या आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को इंकार करने वालों [काफ़िरों] पर छोड़ रखा है, जो उन्हें बराबर (गुनाह करने पर) उकसाते रहते हैं? (19: 83)
इसके बावजूद कुछ ऐसे भी हैंं जो बिना जाने-बूझे अल्लाह के बारे मेंं झगड़ा करते हैं, और हर बाग़ी शैतान के पीछे चल पड़ते हैं, (22: 3)
जबकि शैतान के लिए यह बात लिख दी गयी है कि जो कोई उसका दोस्त हुआ, उसे वह ज़रूर सीधे रास्ते से भटका देगा, और उसे (जहन्नम की) भड़कती आग तक पहुँचा कर रहेगा। (22: 4)
और (दुआ में) कहें, "ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटों [temptations] से तेरी शरण चाहता हूँ; (23:
97)
और ऐ रब! मैं तेरी शरण चाहता हूँ ताकि वे मेरे नज़दीक न आ सकें।"(23: 98)
वह कोई जिन्न [या शैतान] नहीं है जो इस क़ुरआन को लेकर उतरा है: (26: 210)
और उन्हें हर बाग़ी शैतान से सुरक्षा के लिए बनाया है: (37: 7)
वे [शैतान] ऊपर (फ़रिश्तों) की दुनिया की बातें चोरी-छिपे नहीं सुन सकते --- हर ओर से उनपर (अंगारे) फेंके जाते हैं, (37: 8)
और उन्हें निकाल बाहर किया जाता है ---- उनके लिए (परलोक) में कभी न समाप्त होने वाली यातना होगी ---- (37: 9)
हाँ, अगर (शैतानों में से) कोई चोरी-छिपे (फ़रिश्तों की बात का) कोई टुकड़ा किसी तरह उचक (कर सुन) भी ले, तो एक तेज़ दहकता अंगारा उसके पीछे लग जाता है। (37: 10)
और जिन्नों (व शैतानों) को भी (उसके वश में कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करने वाले और ग़ोताख़ोर थे, (38: 37)
और कुछ दूसरे (जिन्नात) भी थे जो ज़ंजीरों में जकड़े हुए रहते थे। (38: 38)
हमने सबसे नज़दीक वाले (निचले) आसमान को (ग्रहों, तारों आदि जैसे) रौशन दीपों से सजा रखा है और उन्हें (मिसाइल के रूप में) शैतानों को मार भगाने का साधन बनाया है, और हमने इन (शैतानों) के लिए (जहन्नम में) दहकती आग की यातना भी तैयार कर रखी है। (67: 5)
इसी तरह से, हर एक रसूल के साथ हमने एक दुश्मन लगा दिया था, शैतान आदमियों और शैतान जिन्नों के रूप में। वे धोखा देने के लिए एक दूसरे के मन में चिकनी-चुपड़ी बातें डाला करते थे----- [ऐ रसूल!], अगर आपके रब ने न चाहा होता, तो वे ऐसा नहीं कर पाते: छोड़ दें उन्हें (झूठ) गढ़ने के लिए----(6: 112)
चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से।” (114: 6)
हमने आसमान में तारों के समूहों (को ख़ास-ख़ास डिज़ाइन का) बनाया है जो देखनेवालों को बहुत ख़ूबसूरत लगता है, (15: 16)
और उसे हर दुत्कारे हुए [मरदूद] शैतान से सुरक्षित रखा है: (15: 17)
अगर कोई (शैतान) चोरी-छिपे कुछ सुनने की ताक में रहता है, तो एक चमकता हुआ शोला उसका पीछा करता है। (15: 18)
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