Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन : अनदेखी चीज़ें: मौत:
अनदेखी चीज़ें:
मौत:
हर जीव को मौत का मज़ा चखना होगा, और जो कुछ तुम्हारे कर्मों का बदला मिलना है, वह क़यामत के दिन ही पूरा-पूरा मिलेगा। जिस किसी को (जहन्नम की) आग से दूर रखा गया और बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दिया गया, वह कामयाब हो गया। इस दुनिया में तो केवल धोखे की खुशियाँ हैं: (3: 185)
तुम कहीं भी रहो, मौत तो तुम्हें आकर रहेगी, चाहे तुम किसी ऊँचे क़िलों में ही क्यों न (छिपे) हो।" जब उनके साथ कोई अच्छी घटना घटती है, तो कहते हैं, "यह तो अल्लाह की तरफ़ से (हमारी कोशिशों का बदला) है," मगर जब उन्हें कोई नुक़सान पहुँचता है, तो [ऐ रसूल], वे कहते हैं, "यह तुम्हारे कारण हुआ है।" आप कह दें, "जो कुछ भी होता है, सब अल्लाह की ही तरफ़ से होता है।" आख़िर इन लोगों को क्या हो गया कि कोई भी बात कही जाए, लगता है कि ये इसे समझते ही नहीं? (4: 78)
वह अपने बन्दों का सबसे बड़ा मालिक है (जिसे हर चीज़ पर पूरा नियंत्रण है), वह तुम पर निगरानी रखने के लिए लिखनेवाले (फ़रिश्तों) को उस समय तक भेजता है, जब तक कि तुममें से किसी की मौत न आ जाती हो, फिर हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उसकी रूह ले लेते हैं------ वे अपने काम में कभी कोई चूक नहीं करते। (6: 61)
उस आदमी से बढ़कर बदमाश कौन हो सकता है, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, या यह दावा करता हो कि, "मुझ पर 'वही' [Revelations] उतरी है, जबकि असल में उसके पास कोई 'वही' नहीं भेजी गयी हो, या यह कहता हो, "मैं भी अल्लाह की 'वही' के बराबरी में कुछ उसी तरह की 'वही' उतार सकता हूँ। और अगर आप देख पाते, कि मौत की सख़्ती में घिरे हुए अत्याचारियों का क्या हाल होता है, जब फ़रिश्ते उनकी तरफ़ अपने हाथ, यह कहते हुए बढ़ाते हैं, "अपनी रूहों को त्याग दो! अल्लाह के बारे में झूठी बातें बोलने और अपनी अकड़ में उसकी आयतों को ठुकरा देने के नतीजे में आज तुम्हें अपमानित करने वाली यातना दी जाएगी।" (6: 93)
हर जीव को मौत का मज़ा चखना ही है: हम तुम्हें अच्छे और बुरे हालात में डालकर तुम्हारी परीक्षा करते रहते हैं, और अन्ततः तुम्हें लौटकर हमारे ही पास आना है। (21: 35)
(इंकार करनेवालों का हाल यह होगा कि) जब उनमें से किसी एक की मौत सिर पर आ खड़ी होगी, तब वह पुकारेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे (संसार में) वापस जाने दे (23: 99)
ताकि वहाँ जाकर अच्छे कर्म कर सकूँ जिन्हें मैंने छोड़ रखा था।" हुक्म होगा: हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक कहने की बात है जो यह कह रहा है, अब ऐसा होने वाला नहीं: ऐसे लोगों के पीछे एक रोक [barrier] लगी हुई है, जो उस दिन तक रहेगी जब वे दोबारा उठाए जाएँगे। (23: 100)
फिर जब वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी जब नरसिंघे [Trumpet] में फूँक मारी जाएगी, तो उनके बीच के सब रिश्ते-नाते ख़त्म हो जाएंगे और वे एक-दूसरे को नहीं पूछेंगे: (23: 101)
फिर जिनके पलड़े अच्छे कर्मों से भारी हुए तॊ वही हैं जो कामयाब हो जाएंगे, (23: 102)
मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (23: 103)
आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उनके होंठ दर्द से ऐंठ जाएंगे। (23: 104)
(उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम्हें मेरी आयतें बार-बार सुनाई नहीं जाती थीं, तब भी तुम उन्हें मानने से इंकार करते रहते थे?" (23: 105)
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा मनमौजी व अड़ियल रवैय्या हम पर हावी हो गया था, और हम रास्ते से भटक जाने वालों में हो गए। (23: 106)
हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे! अगर हम दोबारा वैसा ही कर्म करें, तब हम ज़रूर ही शैतानियाँ करने वाले होंगे।" (23: 107)
अल्लाह कहेगा, "फिटकार हो! इसी (जहन्नम में) में पड़े रहो! और मुझ से बात न करो। (23: 108)
निस्संदेह उस [क़यामत की] घड़ी का ज्ञान तो बस अल्लाह ही को है; वही पानी बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता कि कल उसके कर्मों का क्या फल मिलेगा, और कोई आदमी नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस हिस्से में होगी; वह तो अल्लाह है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (31: 34)
कह दें, "मौत का फ़रिश्ता जो तुम पर नियुक्त है, वह तुम्हें फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, और फिर तुमको अपने रब के पास लाया जाएगा।" (32: 11)
(दुनिया की) एक मौत के बाद, वहाँ (जन्नत में) वे मौत का मज़ा फिर कभी नहीं चखेंगे। अल्लाह उन्हें (जहन्नम की) आग की यातना से बचाए रखेगा, (44: 56)
उस समय उन्हें कैसा लगेगा जब फ़रिश्ते उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी जान निकालकर ले जाएंगे, (47: 27)
और मौत की बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी: “यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता था।” (50: 19)
और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा: “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।” (50: 20)
और हमने ही तुम्हारे बीच मौत को तय कर रखा है. हमें कोई नहीं रोक सकता (56: 60)
कि हम चाहें तो तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में दोबारा पैदा करें जिसे तुम जानते नहीं (56: 61)
तुम तो जान चुके हो कैसे तुम पहली बार पैदा किए गए थे: फिर तुम इससे कोई सीख क्यों नहीं लेते? (56: 62)
फिर ऐसा क्यों नहीं होता जब (किसी के) प्राण (निकलते हुए) गले तक पहुँच जाते हैं (56: 83)
जबकि उस समय तुम (बेबसी से) देख रहे होते हो ---- (56: 84)
हम तुम से ज़्यादा उसके निकट होते हैं, मगर तुम हमें नहीं देखते -– (56: 85)
अगर तुम्हारा हिसाब-किताब नहीं होना है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता (56: 86)
कि तुम उसके (प्राण को) लौटा दो, अगर तुम्हारी बातें सच्ची हैं। (56: 87)
फिर अगर वह (मरनेवाला) उन लोगों में हुआ, जिन्हें अल्लाह के नज़दीक वाली जगह मिलेगी; (56: 88)
तो (उसके लिए) आराम है, सुकून है, और नेमतोंवाला बाग़ है; (56: 89)
यदि वह उन लोगों में हुआ जो दाहिने हाथवालों [भाग्यशालियों] में से हैं, (56: 90)
तो (उससे कहा जाएगा), "तुम्हारे लिए सलामती ही सलामती है कि तुम दाहिने हाथवालों में से हो।" (56: 91)
और यदि वह उनमें से हुआ जिसने सच्चाई को मानने से इंकार किया और गुमराह हो गया; (56: 92)
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा (56: 93)
फिर उसे (जहन्नम की) आग में जलना है। (56: 94)
सचमुच, जब जान [soul]
(निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी;
(75: 26)
जब यह कहा जाएगा, "कि है कोई जो झाड़-फूंक करके जान बचा सके?"; (75: 27)
जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है; (75: 28)
जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा: (75: 29)
उस दिन उसे अपने रब की तरफ़ हँकाकर ले जाया जाएगा। (75: 30)
उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों पर) विश्वास किया और न नमाज़ पढ़ी, (75: 31)
बल्कि उसने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया और (ईमान से) मुँह मोड़ लिया, (75: 32)
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की तरफ़ शान से चल दिया। (75: 33)
तुम से (क़यामत की घड़ी) नज़दीक से और नज़दीक आती जा रही है। (75: 34)
तुम से और नज़दीक, और ज़्यादा नज़दीक! (75: 35)
जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसमें से ख़र्च कर लो, इससे पहले कि तुममें से किसी की मौत आ जाए और उस समय वह कहने लगे, "ऐ मेरे रब! काश तूने मुझे कुछ थोड़े समय की और मुहलत दी होती, तो मैंने ख़ूब दान-दक्षिणा [ज़कात] दिया होता, और अच्छे व नेक लोगों में शामिल हो जाता!" (63: 10)
मगर अल्लाह, किसी आदमी को उस वक़्त कोई मुहलत नहीं देता, जब उसकी तय की हुई बारी आ जाती है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (63: 11)
वही (अल्लाह) है जो रात के समय (नींद में) तुम्हारी रूह को वापस बुला लेता है, यह जानते हुए कि दिन भर तुमने क्या क्या किया है, फिर वह (एक नये) दिन में तुम्हें दोबारा (ज़िंदा) उठा देता है, ताकि (अपनी उम्र की) निश्चित अवधि पूरी कर सको। उसी के पास अंत में, तुम्हें लौटना होगा, और तब वह तुम्हें बता देगा कि तुम क्या क्या किया करते थे। (6: 60)
अल्लाह ही मरे हुए लोगों की रूहों [प्राणों] को अपने पास ले लेता है और ज़िंदा लोगों की रूहों को भी ले जाता है जबकि वे नींद की हालत में होते हैं--- फिर जिसकी मौत का फ़ैसला उसने कर दिया है उसकी रूह को (वहीं) रोक लेता है और दूसरे (ज़िंदा लोगों की) रूहों को एक नियत समय तक के लिए वापस छोड़ देता है-- निश्चय ही इसमें सोच-विचार करने वालों के लिए कितनी ही निशानियाँ हैं। (39: 42)
काश कि (ऐ रसूल!) आप देख सकते जब फ़रिश्ते इंकार करनेवालों की जान निकालते हैं, किस तरह वे उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं: उनसे कहा जाएगा, "अब (जहन्नम की) आग की सज़ा का मज़ा चखो, (8: 50)
अंत में, क़यामत के दिन, अल्लाह उन्हें यह कहते हुए अपमानित करेगा, "कहाँ गए मेरे वे 'साझेदार [Partners]' (जिनको तुमने ख़ुदा बना रखा था), जिनकी ख़ातिर तुम (मेरा) विरोध करते थे?" जिन्हें ज्ञान दिया गया था, वे (उस दिन) कहेंगे, "निश्चय ही आज इंकार करनेवालों [काफ़िरों] के लिए शर्म और बदहाली से डूब मरने का दिन है!" (16: 27)
ऐसे (काफ़िर) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (इंकार पर अड़े होने के चलते) ख़ुद अपने आप पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं, पर इस मौक़े पर वे आज्ञा माननेवाले बन जाएंगे (और कहेंगे): "हम तो कोई शैतानी के काम नहीं कर रहे थे।" (उनसे कहा जाएगा), "बिल्कुल, तुम कर रहे थे: तुमने जो कुछ किया है, अल्लाह उसे बहुत अच्छी तरह जानता है, (16: 28)
तो बस अब जहन्नम के दरवाज़े में घुस जाओ। तुम्हें हमेशा के लिए इसी में रहना है----सचमुच घमंड करनेवालों का कितना बुरा ठिकाना है!" (16: 29)
लेकिन, जब नेक व सच्चे लोगों से पूछा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है? "वे कहेंगे, "सारी चीज़ें जो अच्छी हैं।" जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनके लिए तो इस दुनिया में भी अच्छा बदला है, मगर आख़िरत [परलोक] में उनका घर कहीं अच्छा है: नेक व सच्चे लोगों का क्या ही अच्छा घर होगा। (16: 30)
वे हमेशा-के-लिए रहने के बाग़ में दाख़िल होंगे, जिनके बीच बहती हुई नहरें होंगी, वे जो कुछ चाहेंगे, वहाँ हर एक चीज़ मौजूद होगी। अल्लाह अपने अच्छे बंदों को इसी तरह इनाम देता है, (16: 31)
ऐसे (परहेज़गार) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (ईमान व मन की शांति के कारण) ख़ुशहाल होते हैं। फ़रिश्ते उन्हें कहते हैं, "तुम पर सलामती हो! जन्नत में दाख़िल हो जाओ, यह उन कामों का इनाम है जो तुम किया करते थे।" (16: 32)
दूसरी तरफ़) जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है", फिर उसकी तरफ़ जाने वाले सीधे रास्ते पर जमे रहे, तो बेशक उन पर फ़रिश्ते (यह कहते हुए) उतरेंगे कि "अब न दिल में कोई डर रखो और न किसी बात पर दुखी हो, बल्कि उस जन्नत (के पाने) की ख़ुशियाँ मनाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था। (41: 30)
उन्हें सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; जिस दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!" (40: 46)
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