Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें: शैतान [इबलीस]:

 अनदेखी चीज़ें:


शैतान [इबलीस] 1: 


फिर जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम के आगे (झुकते हुए) सज्दा करोतोवे सब (आदम के सामने) झुक गएमगर इबलीस [शैतान] ने अपनी गर्दन नहीं झुकायी। उसने (हुक्म मानने से) इंकार कर दिया और वह था भी बड़ा घमंडी: वह विश्वास करनेवालों में शामिल हो गया।  (2: 34)


[ इंसानो!], हमने तुम्हें पैदा किया; तुम्हारी शक्ल-सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान) आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए। मगर इबलीस झुका: वह झुकने वालों में शामिल था। (7: 11)

अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ: तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (7: 12)

अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड करने की जगह नहीं है। निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (7: 13)

मगर इबलीस ने कहा, "मुझे उस दिन तक (ज़िंदा रहने की) छूट दे दे, जिस दिन मरे हुए लोगों को ज़िंदा करके दोबारा उठाया जाएगा।" (7: 14

और अल्लाह ने जवाब दिया, "तुझे छूट दी गयी।" (7: 15)

और फिर इबलीस ने कहा, "चूँकि तूने मुझे ग़लत राह पर लगा दिया है, इसलिए अब मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उन सब लोगों की ताक में बैठूँगा:  (7: 16)

मैं उन पर (चारों तरफ से) हमले करूँगा---- "उनके सामने से और उनके पीछे से भी, उनके दाएँ से और उनके बाएँ से भी----- और तू उनमें से अधिकतर को शुक्र अदा करने वाला पाएगा।" (7: 17)

अल्लाह ने कहा, "निकल जा यहाँ से! बेइज़्ज़त और ठुकराया हुआ! मुझे क़सम है, कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेंगे।" (7: 18

मगर " आदम! तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों (जन्नत के) बागों में रहो, और जहाँ से जो चीज़ चाहो, खाओ-पियो, लेकिन इस पेड़ के नज़दीक मत जाना, नहीं तो (याद रखो!) तुम भी ग़लती करने वालों में से हो जाओगे।" (7: 19)

 

फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए: उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी हासिल हो जाए।" (7: 20)

और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (7: 21)

उसने झूठी बातें बोलकर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (7: 22)

उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं: अगर तूने हमें माफ़ किया और हम पर दया की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (7: 23)

अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और जीवन-यापन के सामान होंगे----  मगर एक ख़ास अवधि तक।" (7: 24)

और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा निकाला जाएगा।" (7: 25)

 

आदम की सन्तान! हमने तुम्हें कपड़ा दिया है ताकि तुम अपने नंगेपन को छिपा सको और यह तुम्हारे सजने-संवरने का साधन भी है; (मगर अपने भीतर की बुराई छिपाने के लिए) परहेज़ का कपड़ा सब कपड़ों में बेहतर है: यह अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वे ध्यान दे सकें। (7: 26)

आदम की सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके कपड़े उतरवा दिए थे, ताकि उनकी नग्नता उनके सामने खोल दे: वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते: हमने शैतानी करने वालों को उन लोगों का साथी मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (7: 27)

 

हमने इंसान को सड़ी हुई मिट्टी के गारे से बनाया है जो सूखकर बजने लगता है---- (15: 26

और जिन्न को इससे पहले, हम जलती हुई हवा की गर्मी से पैदा कर चुके थे। (15: 27

[ रसूल] जब ऐसा हुआ कि आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा था, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ। (15: 28)

तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे झुक जाना," (15: 29)

और सब के सब फ़रिश्तों ने ऐसा ही किया।  (15: 30)

मगर इबलीस माना: उसने दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) झुकने से इंकार कर दिया। (15: 31)

अल्लाह ने कहा, " इबलीस! तुम दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) क्यों नहीं झुके?" (15: 32)

और उसने जवाब दिया, "मैं ऐसे मामूली आदमी के आगे नहीं झुक सकता जिसको तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया है।" (15: 33)

अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तुझे ज़ात-बाहर [Outcast] किया जाता है,  (15: 34)

और फ़ैसले के दिन तक तुझ पर फिटकार रहेगी।" (15: 35)

इबलीस ने कहा, "मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (ज़िंदा रहने की) मुहलत दे दे, जब मरे हुए लोग दोबारा (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे।" (15: 36)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तुझे मुहलत दी जाती है, (15: 37)

मगर (यह मुहलत) एक तय किए हुए समय के दिन तक (ही होगी)" (15: 38

इबलीस ने फिर अल्लाह से कहा, "चूँकि तूने मेरे लिए सीधे मार्ग से भटकना तय कर दिया है, अतः मैं भी धरती पर इंसानों को इस तरह बहकाऊंगा (कि उन्हें बुरी चीज़ें बहुत भली लगने लगेंगी) और उन सबको (सीधे मार्ग से) भटका कर रहूँगा, (15: 39)

सिवाय उनके, जो सचमुच तेरे नेक भक्ति में डूबे हुए बन्दे होंगे (जो मेरे बहकावे में आने वाले नहीं)" (15: 40)

अल्लाह ने कहा, "बस यही सीधा रास्ता है जो मुझ तक पहुँचने वाला है: (15: 41

मेरे (असल) बन्दों पर तो तेरा कोई ज़ोर चलने वाला नहीं है, तेरा ज़ोर तो केवल उन पर चलेगा जो राह से भटक गए हों और तेरे पीछे-पीछे चलते हों। (15: 42)

जहन्नम उनका ठिकाना होगा, इस बात का उन सबसे वादा है, (15: 43

 

और जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ, तो वे सब सज्दे में झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका।" उसने कहा, "क्या मैं उसके सामने झुकूँ, जिसे तूने मिट्टी से बनाया है?" (17: 61)

और (फिर) कहने लगा, "ज़रा इस तुच्छ (इंसान) को देखो, कि तूने इस हस्ती को मुझ पर बड़ाई दी है! अगर तू मुझे क़यामत के दिन तक मुहलत दे दे, तो मैं बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर उसकी सारी सन्तानों को बहकाकर मार्ग से भटका दूँगा।" (17: 62)

अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तेरा बदला [reward] तो जहन्नम होगा, और जो कोई भी तेरे पीछे चलेगा उन लोगों की सज़ा भी जहन्नम ही होगी ---- पूरी पूरी सज़ा! (17: 63)

जिस किसी पर तेरा बस चले, जा उसे अपनी आवाज़ से बहका ले, उनपर हमला करने के लिए अपने सवार और अपने प्यादे तैयार कर ले, उनके माल और औलाद में भी उनके साथ हिस्सेदार बन जा, और उनसे (झूठे) वादे कर---मगर शैतान के वादे धोखे के सिवा कुछ नहीं होते---- (17: 64)

मगर तुम्हारा कोई ज़ोर हमारे (असल) बंदों पर नहीं चल सकता: तेरा रब उनकी अच्छी तरह से देखभाल के लिए काफ़ी है।" (17: 65)

 

तो सभी फ़रिश्तों ने एक साथ झुककर सज्दा किया, (38: 73)

 मगर इबलीस ने (सज्दा) नहीं किया, जो कुछ ज़्यादा ही घमंडी था। वह इंकार करके बाग़ी हो गया।  (38: 74)

 अल्लाह ने कहा, " इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उस आदमी के सामने झुकने से रोक दिया जिसे मैंने ख़ुद अपने हाथों से बनाया है? क्या तू अपने आपको महान या कोई ऊँची हस्ती समझता है?" (38: 75)

इबलीस ने कहा, "मैं उस (आदमी) से अच्छा हूँ: तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (38: 76)

 (अल्लाह ने कहा), "निकल जा यहाँ से! तू (फ़रिश्तों के दल से) दुत्कार दिया गया है:  (38: 77)

 और फ़ैसले के दिन [क़यामत] तक तुझ पर मेरी लानत बनी रहेगी!" (38: 78)

मगर इबलीस ने कहा, " मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (जीने की) मुहलत दे, जबकि लोग (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे," (38: 79)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, जा तुझे मुहलत दी, (38: 80)

एक तय दिन ज्ञात समय तक (कि तू ज़िंदा भी रहेगा और तुझे दंड भी नहीं दिया जाएगा)" (38: 81)

इबलीस ने कहा, "तेरी इज़्ज़त की क़सम! मैं उन सबको बहकाता रहूँगा, (38: 82)

 बस तेरे उन सच्चे अच्छे बन्दों को छोड़कर।" (38: 83)

 कहा अल्लाह ने, "यह सच्चाई है --- और मैं तो सच ही बोलता हूँ--- (38: 84)

कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा, जो तेरे बताए हुए रास्ते पर चलेंगे।" (38: 85)


और जब (ऐसा हुआ था कि) हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब (फरिश्ते सज्दे में) झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका: वह जिन्नों में से था और उसने अपने रब के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। तो क्या तुम (लोग) मुझे छोड़कर उस [इबलीस] को और उसकी संतानों को अपना स्वामी बनाना चाहते हो, बावजूद इसके कि वे तुम्हारे दुश्मन हैं? शैतानियाँ करने वालों के पास कितना बुरा विकल्प है! (18: 50)

 मैंने आसमानों और ज़मीन को बनाते समय इन [शैतानों] को नहीं बुलाया था कि वे उस (प्रक्रिया) को देख पाते, और वे ख़ुद अपनी सृष्टि के समय वहाँ हाज़िर थे; मैं ऐसे लोगों को अपना मददगार नहीं बनाता जो दूसरों को राह से भटका देते हैं। (18: 51)

 

फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए: उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी हासिल हो जाए।" (7: 20)

और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (7: 21)

उसने झूठी बातें बोलकर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (7: 22)

उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं: अगर तूने हमें माफ़ किया और हम पर दया की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (7: 23)

 

जब हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब झुक गए थे, मगर इबलीस ने (झुकने से) इंकार किया, (20: 116)

 इस पर हमने कहा, " आदम! (देख लो), इबलीस तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और तुम्हारी बीवी का दुश्मन: कहीं ऐसा हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। (20: 117)

 तुम्हारे लिए अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम कभी भूखे रहोगे, और ही नंगापन महसूस करोगे,  (20: 118)

  प्यासे रहोगे और धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (20: 119)

 लेकिन फिर शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, " आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए, और ऐसी शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं?" (20: 120)

और (फिर आदम और उसकी पत्नी) दोनों ने उस (पेड़) में से कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे। आदम अपने रब के कहने पर चला और वह (जन्नत की ज़िंदगी से) भटक गया----- (20: 121)

 

अतः [ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़ा करें, तो दुत्कारे हुए [Outcast] शैतान (के बहकावे) से अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह से दुआ माँग लिया करें। (16: 98)

 उस [शैतान] का उन लोगों पर कोई ज़ोर नहीं चलता जो ईमानवाले हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं; (16: 99)

 उसका ज़ोर तो बस उन्हीं लोगों पर चलता है जो उसे अपना साथी बनाते हैं और जो उसी (शैतान) के चलते, अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं। (16: 100)

 

शैतान तुम्हारा दुश्मन है---- अतः तुम उसके साथ दुश्मनों जैसा ही बर्ताव करो---- वह तो अपने माननेवालों को केवल इसीलिए बुलाता है कि उन्हें (जहन्नम की) दहकती आग में जाने वालों का साथी बना सके।  (35: 6)

 वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, उनको कठोर दंड दिया जाएगा; किन्तु जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए--- उनके (गुनाहों को) माफ़ कर दिया जाएगा, और उन्हें बड़ा इनाम दिया जाएगा।  (35: 7)

उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जिनके लिए उनके बुरे कर्मों को आकर्षक बना कर पेश किया गया हो, ताकि वे उन कर्मों को (बुरा समझने के बजाए) अच्छा समझें? (तो क्या वे बुराई को छोड़ेंगे)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है, मार्ग से भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। अतः [ रसूल] आपको इन लोगों के दुख में घुलकर अपनी जान गँवाने की कोई ज़रूरत नहीं: अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे करते हैं। (35: 8)

 

याक़ूब [Jacob] ने जवाब दिया, " मेरे बेटे! अपने इस ख़्वाब के बारे में अपने भाइयों को मत बताना, वरना हो सकता है कि वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए तुम्हारे विरुद्ध कोई चाल चलें-----(याद रहे!) शैतान तो आदमी का खुला हुआ दुश्मन है।  (12: 5)


[ रसूल!] मेरे बन्दों से कह दें कि "(धर्म पर होने वाली बहस में) जो बात कहो, ऐसी कहो जो बहुत अच्छी हो। शैतान उनके बीच झगड़े का बीज बोता है: सचमुच शैतान तो आदमी का खुला दुश्मन है।" (17: 53)

 

ईमानवालो! शराब और जुआ, मूर्तिपूजा से जुड़ी (बलि चढ़ाने की) रीतियाँ, जुए की तीरें --- ये सब बहुत बुरे और शैतानी काम हैं। तो इनसे बचकर रहो, ताकि तुम कामयाब हो सको।  (5: 90)

शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफ़रत का भाव पैदा कर दे, और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे। तो क्या तुम (ऐसी बुरी आदतों को) नहीं छोड़ोगे? (5: 91

 

शैतान तुम्हें ग़रीबी से डराता है और बुरे ( गंदे) काम करने पर उभारता हैजबकि अल्लाह तुम्हें ऐसे रास्ते की तरफ़ बुलाता है जिसमें उसकी माफ़ी और उसके फ़ज़ल [bounty] करने का वादा है: (देने में) अल्लाह की कोई सीमा नहीं हैऔर वह सब कुछ जाननेवाला है,  (2: 268)


अगर शैतान तुम्हें कुछ (ग़लत) करने पर उकसाए, तो अल्लाह की शरण माँगो---- वह सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है---- (7: 200)

जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उन्हें जब शैतान कुछ (ग़लत) करने पर उकसाता है, तो उन्हें तुरंत अल्लाह का ध्यान हो आता है, और उनकी आँखें खुल जाती हैं; (7: 201)

शैतानों के पीछे चलने वाले लोगों को, शैतान और अधिक गुमराही में लगातार घसीटता हुआ लिए जाता है, और फिर वे रुक नहीं सकते।  (7: 202


ईमानवालों का लड़ना तो अल्लाह के ही रास्ते में होता है, जबकि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले अन्याय शैतान के रास्ते में लड़ते हैं। अतः तुम शैतान के सहयोगियों से लड़ो: शैतान की चालें (सच्चाई के मुक़ाबले में) सचमुच कमज़ोर होती हैं। (4: 76)

 

फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन (काफ़िरों) के कुकर्मों को उनके लिए बड़ा सुहावना बनाकर दिखाया, और कहने लगा, "आज कोई नहीं है जो तुमको हरा सकता हो, क्योंकि मैं तुम्हारे बिल्कुल साथ खड़ा रहूँगा," मगर जब सेनाएं आमने-सामने दिखायी देने लगीं, तो वह उलटे पाँव वापस हुआ, और कहने लगा, "मैं अब तुम्हारा साथ छोड़े जाता हूँ: मैं वह चीज़ देख रहा हूँ, जो तुम नहीं देख सकते, और मुझे अल्लाह से डर लग रहा है ----- अल्लाह (बुरे कर्मों की) बड़ी कठोर यातना देने वाला है।" (8: 48

 

(क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा, तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त थी, सिवाय इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आपको ही मलामत करो। (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदार [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी,  (14: 22)

 

 

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