Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: आने वाली दुनिया [आख़िरत] में जाने का रास्ता: नेक लोगों के गुण:

 आने वाली दुनिया [आख़िरत] में जाने का रास्ता:


नेक लोगों के गुण:


अपने रब की तरफ़ (गुनाहों की) माफ़ी के लिए जल्दी से बढ़ो, और उस जन्नत [बाग़] की तरफ़ भी बढ़ो जिसका फैलाव इतना है कि उसमें सारे आसमान और ज़मीन समा जाएं, और वह उन लोगों के लिए तैयार की गयी है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,   (3: 133)

 जो ख़ुशहाली में हों या तंगी में, दोनों हालतों में लोगों को देते रहते हैं, जो अपने ग़ुस्से को क़ाबू में रखते हैं, और लोगों की ग़लतियों को माफ़ कर देते हैं ------  अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद करता है, जो अच्छे काम करते हैं ----- (3: 134)

ये वे लोग हैं जो कभी ग़लती से अगर कोई शर्मनाक गुनाह कर बैठते हैं, या अपनी जानों को मुसीबत में डाल लेते हैं, तो तुरंत ही उन्हें अल्लाह याद जाता है और वे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने लगते हैं ---- और अल्लाह के सिवा कौन है, जो गुनाहों को माफ़ कर सके? ---- और वे कभी भी जानते-बूझते अपनी ग़लती पर अड़े नहीं रहते।  (3: 135)

ऐसे लोगों का इनाम उनके रब की तरफ़ से (उनके) गुनाहों की माफ़ी है, और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उसी में वे हमेशा रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है जो (नेक) कर्म करनेवालों को मिलेगा!  (3: 136)

 

अल्लाह की बन्दगी करो; उसके साथ किसी और को साझेदार [Partner] बनाओ। अच्छा व्यवहार करो अपने माँ-बाप के साथ, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ, नज़दीक और दूर में रहने वाले पड़ोसियों के साथ, पास के बैठेने-उठनेवालों के साथ, ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों के साथ, और अपने ग़ुलामों के साथ। अल्लाह घमंड करनेवालों को और डींगें मारने वालों को पसन्द नहीं करता, (4: 36)


जो कोई अल्लाह और रसूल की आज्ञा मानता है, वह उन लोगों में शामिल होगा जिन पर अल्लाह ने अपनी नेमतें [blessing] उतारी हैं: (उनमें) नबियों की जमाअत, हमेशा सच बोलनेवाले, सच्चाई की गवाही देनेवाले, और नेक अच्छे लोग हैं--- क्या ही अच्छे साथी हैं ये! (4: 69)

 यह अल्लाह का ख़ास करम [favour] है। कोई नहीं है जो अल्लाह से बेहतर (इंसान का हाल) जानता हो।  (4: 70)

 

[ रसूल!] उनसे कहें, "आओ! मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हें क्या क्या करने से मना किया है। किसी भी चीज़ को अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराओ; अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करो; ग़रीबी की डर से अपने बच्चों को मार डालो----  हम तुम्हें भी रोज़ी देंगे और उन्हें भी----- अश्लील कामों [Indecencies] से अपने आपको बिल्कुल दूर रखो, चाहे वे खुल्लम-खुल्ला हों या छिप-छिपकर हों; बे-वजह किसी की जान मार डालो, जिसे अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है सिवाय इसके, कि अपने (क़ानूनी) हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये वह बातें है, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है: शायद कि तुम समझ-बूझ से काम लो। (6: 151)

(इसी तरह) अनाथों के माल से दूर ही रहो, सिवाय (उनको फ़ायदा पहुँचाने की) अच्छी नीयत के, मगर यह भी उसी वक़्त तक जब तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाएं; जब (सामान) दो, तो इंसाफ़ के मुताबिक़, नाप और तौल में पूरा-पूरा दो----- हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना कि वह उठा सकने की ताक़त रखता हो------जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों हो; और अल्लाह के नाम से जो प्रतिज्ञा करो, उसे पूरी करो। ये वह बातें हैं, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है, ताकि तुम ध्यान दे सको"----- (6: 152

यही है मेरा रास्ता, सीधा ले जाने वाला, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे रास्तों पर चलो: वे तुम्हें इस सीधे रास्ते से हटा देंगे----- ये हैं वह बातें जिन्हें करने का अल्लाह ने तुम्हें हुक्म दिया है, ताकि तुम ग़लत कामों से बच सको। (6: 153)

एक बार फिर (बता दें), हमने मूसा को किताब [तौरात] दी, ताकि नेक कर्म करने वालों पर हम अपनी नेमतें पूरी कर दें, और (किताब में) हर चीज़ को स्पष्ट रूप से समझा दें, जो लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] हो, ताकि वे लोग (मरने के बाद) अपने रब से होने वाली मुलाक़ात पर विश्वास कर सकें। (6: 154)


सच्चे ईमानवाले तो वह लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल मारे डरके काँप उठते हैं, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वह उनके ईमान को और बढ़ा देती हैं, और जो हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, (8: 2)

जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (एक हिस्सा) दूसरों को भी देते हैं। (8: 3)

यही वे लोग हैं जो सचमुच ईमानवाले हैं। उनके रब के यहाँ उनका बड़ा ऊँचा दर्जा है, उनके लिए वहाँ (गुनाहों की) माफ़ी है, और दिल खोलकर दी जाने वाली रोज़ी है।” (8: 4)

 

ला वह आदमी जो जानता है कि जो कुछ आप पर आपके रब की तरफ़ से उतरा है वह सच्चाई है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा हो? परन्तु समझते तो वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं; (13: 19

जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए क़रार (Agreement) को पूरा करते हैं, और अपनी की गयी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ते;  (13: 20)

जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिन रिश्ते को जोड़ने का आदेश दिया, उन्हें जोड़े रखते हैं; जो अपनॆ रब से डरते रहते हैं और (होने वाले) हिसाब की कठोरता के ख़्याल से घबराये रहते हैं; (13: 21)

जो लोग अपने रब की ख़ुशी की चाहत में अपनी (ग़लत) इच्छाओं को मारते हुए धीरज से काम लेते हैं; जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं; जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से ढँके-छिपे भी और सबके सामने भी ख़र्च करते हैं; जो भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं। तो यही लोग हैं जिनके लिए (आख़िरत में असली) घर का इनाम मिलेगा: (13: 22)

वे हमेशा रहने के बाग़ [जन्नत] में ख़ुद भी दाख़िल होंगे और साथ में उनके बाप-दादा, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे, वे भी (वहाँ जगह पाएंगे); वहाँ हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास आएंगे, (13: 23)

(और कहेंगे) "चूँकि तुमने (दुनिया में) धीरज सब्र से काम लिया था, इसलिए (आज) तुम पर सलामती हो!" तुम्हारा घर तुम्हारे लिए क्या बेहतरीन इनाम है!  (13: 24)

 

आपके रब ने आदेश दिया है कि तुम उसके सिवा किसी की बन्दगी करो, और यह कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो (अपना धीरज खोते हुए) उन्हें 'उफ़'! तक कहो और उनके साथ कठोरता से पेश आओ, बल्कि उनसे आदर के साथ बात किया करो, (17: 23)

और नर्मी के साथ बर्ताव करते हुए उनके सामने विनम्रता से अपने आपको झुकाओ और कहो, "मेरे रब! जिस तरह उन्होंने बचपन में मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया था, तू भी उन पर दया कर।" (17: 24)

जो कुछ तुम्हारे दिल में है, उसे तुम्हारा रब अच्छी तरह से जानता है। अगर तुम अच्छे नेक हुए, तो वह उन लोगों को (जिनसे अनजाने में छोटे-मोटे गुनाह हो जाते हैं) बहुत माफ़ करनेवाला है जो उसके सामने (गुनाहों से तौबा करते हुए) झुकते हैं। (17: 25)

और (देखो!) अपने रिश्तेदारों को दो, जो उनका हक़ है, ज़रूरतमंदों और (बेसहारा) मुसाफ़िरों को भी दो--- और अपने माल को बेहूदा कामों में उड़ाओ: (17: 26)

जो फ़ु़ज़ूलख़र्ची करते हैं, वह शैतान के भाई हैं, और शैतान अपने रब की नेमतों का कभी भी शुक्र अदा नहीं करता--- (17: 27)

लेकिन अगर कभी ऐसा हो कि तुम ख़ुद अपनी रोज़ी की खोज में अपने रब से उम्मीद लगाए बैठे हो, (तुम्हारे पास कुछ नहीं है) और इस हालत में तुम्हें इन ज़रूरतमंदों से मुँह फेरना पड़े, तो उनसे कम से कम नर्मी से बात कर लिया करो। (17: 28)

और (देखो!) अपना हाथ तो इतना सिकोड़ लो कि गर्दन में बँध जाए (कि किसी को कुछ दो) और उसे बिल्कुल खुला छोड़ दो (कि सब कुछ लुटा बैठो), कि फिर तुम्हारी निंदा हो और तुम दुख में घिर जाओ। (17: 29)

तुम्हारा रब जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को बहुत बढ़ा देता है और जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है: निस्संदेह वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है और उन पर पूरी नज़र रखता है। (17: 30)


और (देखो!) ग़रीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या करो----  हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी---- उनकी हत्या करना बहुत ही बड़ा गुनाह है। (17: 31)

और किसी शादीशुदा मर्द या औरत को (सेक्स के इरादे से) किसी दूसरी औरत या मर्द के नज़दीक तक भी नहीं जाना चाहिए: यह एक अश्लील कर्म और बड़ी बुराई का चलन है। (17: 32)

किसी जीव की हत्या करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है, सिवाय इसके कि जब (क़ानून ने हत्या करने का) अधिकार दिया हो: अगर किसी बेगुनाह की अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, तो उसके वारिस को हमने अधिकार दे दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), मगर उसे जान लेते समय ज़्यादती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि (अल्लाह ने) पहले ही उसकी मदद कर दी है। (17: 33)

और (ख़र्च करने के इरादे से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाय उसकी भलाई के इरादे से, जब तक कि वह अपनी जवानी को पहुँच जाएं (और तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो) और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुमसे अवश्य ही पूछा जाएगा। (17: 34)

जब किसी पैमाने से नापकर दो, तो (कमी करो और) पूरा नापा करो, और तौलते समय सटीक तराज़ू से सही तौलो: यह बेहतर और ईमानदार तरीक़ा है और इसका नतीजा भी अच्छा होगा। (17: 35)

और (देखो!) जिस चीज़ के सच होने की तुम्हें जानकारी हो, आँख बंद करके उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछ्ताछ की जाएगी। (17: 36)

और ज़मीन पर अकड़कर मत चलो: तो तुम ज़मीन को फाड़ सकते हो और लम्बाई में पहाड़ों की बराबरी कर सकते हो। (17: 37)

यह सारे बुरे काम ऐसे हैं जो तुम्हारे रब को बेहद अप्रिय हैं। (17: 38)


[ रसूल] ये कुछ ज्ञान की बातें हैं जो आपके रब की तरफ़ से आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गयी हैं: (लोगो! असल बात यह है कि) अल्लाह के साथ पूजने के लिए कोई दूसरा प्रभु बना लो, वरना निंदा झेलते हुए और ठुकराए हुए, जहन्नम में फेंक दिए जाओगे! (17: 39)

 

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई में) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनको (जन्नत के) बाग़ दिए जाएंगे। (18: 107)

जिनमें वे हमेशा रहेंगे, और कभी वहाँ से हटना पसंद नहीं करेंगे।" (18: 108)

 

बेशक कामयाब हैं वहजो ईमान रखते हैं ! (23: 1)

 जो पूरे दिल से अपनी नमाज़ों में (अल्लाह के सामने) झुकते हैं, (23: 2)

जो बेकार फ़ालतू बातों से दूर रहते हैं, (23: 3)

जो (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [Alms] देते रहते हैं, (23: 4)

और जो अपने आपको (दूसरों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से) रोके रखते हैं (23: 5)

 सिवाय अपने पति/पत्नियों [spouses] और अपने दास/दासियों [slaves] के ----- कि जिनके साथ (शारीरिक संबंध बनाने में) कोई बुराई नहीं है,  (23: 6)

मगर जो कोई इस (बतायी हुई सीमा) के अलावा (किसी और से भी संबंध बनाने) की चाहत रखता होतो ऐसे ही लोग सीमा को तोड़ने वाले हैं---- (23: 7)

 और जो अपने ऊपर किए गए भरोसे को और अपनी प्रतिज्ञा को ईमानदारी से निभाते हैं (23: 8

 और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से सही ढंग से अदा करते हैं, (23: 9)

तो ऐसे ही लोग हैं जिन्हें विरासत में दिया जाएगा---- (23: 10)

जन्नत का सबसे अच्छा बाग़ [फ़िरदौस]जो उनका अपना हो जाएगावे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे। (23: 11)

 

रहम करनेवाले रब [रहमान] के बन्दे वह हैं, जो धरती पर नम्रता से चलते-फिरते हैं, और जब जाहिल बेवक़ूफ़ उनके मुँह लगते हैं, तो वे जवाब में कह देते हैं, "तुम पर सलामती हो!"; (25: 63)

जो अपने रब की इबादत करते हुए रातें गुज़ारते हैं, कभी (सज्दे में) झुके हुए, कभी (नमाज़ में) खड़े होकर; (25: 64)

जो यह कहते हैं, " हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे दूर रख, कि झेलने के लिए सचमुच कितनी दर्दनाक यातना होगी! (25: 65)

सचमुच यह शैतानी घर होगा, रहने की बहुत ही बुरी जगह!”  (25: 66)

(अच्छे लोग) वे हैं जो जब ख़र्च करते हैं, तो फ़ज़ूल-ख़र्ची करते हैं, और ही कंजूसी से काम लेते हैं, बल्कि वे इनके बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं; (25: 67)

जो लोग अल्लाह के अलावा किसी दूसरे देवी-देवता को कभी पूजते हैं; और किसी की जान (बे वजह) लेते हैं जिसे अल्लाह ने हराम [forbidden] क़रार दिया है, सिवाय इसके कि (किसी का क़त्ल) न्यायसंगत हो, और ही वे (किसी के साथ) अवैध शारीरिक संबंध [Adultery] बनाते हैं। (तो जो कोई भी इन बातों को माने) और ऐसे गुनाह करता हो, तो उसे दंड मिलेगा: (25: 68)

क़यामत के दिन उनकी यातना बढ़ाकर दोगुनी कर दी जाएगी, और वे उसी में हमेशा पड़े रहेंगे, अपमानित होकर, (25: 69)

सिवाय उसके जो पछताया अपने गुनाहों पर, विश्वास रखा (अल्लाह पर), और अच्छे कर्म किए: तो ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अल्लाह अच्छे कर्मों में बदल देगा। और अल्लाह सबसे ज़्यादा क्षमा करनेवाला, बेहद दयावान है।  (25: 70)

जो लोग (गुनाहों से) तौबा कर लेते हैं और फिर अच्छे कर्म करते हैं, तो वे (अपनी तौबा से) सचमुच अल्लाह की ओर पूरी तरह से लौट आते हैं।  (25: 71)

 

[रहम करनेवाले रब के असल बंदे वे हैं] जो कोई झूठी गवाही नहीं देते, और वे, जब कहीं कोई बेकार की चीज़ें होते हुए देखते हैं, तो वहाँ से शालीनता से गुज़र जाते हैं; (25: 72)

और जब उन्हें अल्लाह की निशानियाँ [आयतें] याद दिलायी जाती हैं, तो वे उन (आयतों) पर (काफ़िरों की तरह) अपने कानों और आँखों को बंद नहीं कर लेते; (25:73)

बल्कि वे दुआ करते हैं, " हमारे रब! हमें अपने पति/पत्नियों और अपने बाल-बच्चों के बीच ख़ुशी आराम के साथ रख। और हमें ऐसा बना दे कि जो लोग तुझ से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके सामने हमारी मिसालें दी जा सकें।" (25: 74)

यही वे बंदे होंगे जिन्हें (अपने ईमान पर) जमे रहने की वजह से बदले में जन्नत की सबसे ऊँची जगह दी जाएगी। वहाँ दुआओं और सलाम से उनका स्वागत किया जाएगा। (25: 75)

वहीं वे हमेशा रहेंगे--- एक ख़ुशनुमा घर और आराम की बेहतरीन जगह में! (25: 76)

 

तुम्हें जो चीज़ मिली हैवह तो सांसारिक जीवन की (तेज़ी से) समाप्त होने वाली सुख-सामग्री मात्र है। इससे कहीं बेहतर और लम्बे समय तक बाक़ी रहने वाली चीज़ तो अल्लाह अपने उन बंदों को देगाजो अपने रब में विश्वास और भरोसा रखते हैं; (42: 36)

जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों [indecencies] से बचते हैजब उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; (42: 37)

अपने रब का हुक्म मानते हैंनमाज़ क़ायम करते हैंकाम-काज के मामलों में एक दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैंऔर जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (42: 38)

और जब उन पर ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा करते हैं।  (42: 39)

 बुराई (नुक़सान) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई (हानि) की जा सकती हैहालाँकि जो कोई माफ़ कर देता है और (मामले में) सुधार करता हैतो उसका इनाम उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा --- वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता।  (42: 40)

अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के बादअगर कोई आदमी अपनी रक्षा करता हैतो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का कोई कारण नहीं है, (42: 41)

मगर उनके ख़िलाफ़ ज़रूर क़दम उठाना चाहिए जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42: 42)

किन्तु जो आदमी धीरज से काम लेता है और क्षमा कर देता हैतो यह बहुत हिम्मत (और महानता) का काम है। (42: 43)

 

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