Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सामाजिक विषय: शादी-ब्याह:

 सामाजिक विषय:


शादी-ब्याह:


अगर तुम्हें इस बात का डर हो कि तुम अनाथ लड़कियों के साथ (शादी करके) न्याय से पेश नहीं सकोगे, तो (दूसरी) औरतों में से जो तुम्हें अच्छी लगे, उनमें से (एक समय में) दो, तीन या चार के साथ शादी कर सकते हो। अगर तुम्हें डर हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार कर सकोगे, तो फिर एक ही से शादी करो, या फिर अपनी दासी (लौंडी) से शादी कर लो जो (युद्ध के क़ैदियों में) तुम्हारे हाथ गयी हो: इसमें तुम्हारे लिए पक्षपात करने से बचने की अधिक सम्भावना है। (4: 3)


चाहे तुम कितनी ही कोशिश कर लो, तुम कभी यह नहीं कर सकते कि अपनी बीवियों के साथ एक-बराबर का व्यवहार कर सको, हाँ मगर ऐसा करो कि किसी एक बीवी पर बिल्कुल ही ध्यान दो, और उसे (शादी और तलाक़ के बीच) लटका कर रख दो। अगर तुम (बीवियों के मामले में) अपने आपको सुधारते रहो, अल्लाह से डरते (हुए अन्याय करने से बचते) रहो, तो अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है,  (4: 129)


यह अल्लाह है जिसने तुम ही में से तुम्हारे लिए जोड़े [पति/पत्नियाँ] बना दिए और फिर इनके द्वारा तुम्हारे लिए बेटे/बेटियाँ और पोते/पोतियाँ पैदा कर दिए और तुम्हें अच्छी-अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी गयी; फिर भी यह कैसे हो सकता है कि वे झूठ में विश्वास करें और अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार करें?   (16: 72)


और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हीं लोगों में से तुम्हारे लिए (मर्द-औरत के रूप में) जोड़े पैदा कर दिए, ताकि तुम उनके साथ शान्ति सुकून से रह सको: और उसने तुम्हारे बीच आपस में प्रेम और दया का भाव पैदा कर दिया। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं।  (30: 21)

 

जिन औरतों से तुम्हारे बाप शादी कर चुके हैं, उन औरतों से तुम शादी करो ---- हां, जो पहले हो चुका सो हो चुका। सचमुच यह एक शर्मनाक, अत्यन्त अप्रिय, और बुराई की तरफ़ ले जाने वाला काम है। (4: 22)

तुम्हारे लिए (बीवी के रूप में) हराम [forbidden] की जाती हैं तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, मौसियाँ, भतीजियाँ, भाँजियाँ, और तुम्हारी वे माएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो और दूध के रिश्ते से तुम्हारी बहनें, तुम्हारी सासें, और तुम्हारी सौतेली बेटियाँ जो तुम्हारी देखरेख में हैं---- जो उन मांओं से पैदा हुई हों जिनसे शादी के बाद तुम्हारा मिलन हो चुका होहां अगर (शादी के बाद) शारीरिक संबंध नहीं बना होतो इसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं ----इसी तरहतुम्हारे (अपने) बेटों की बीवियाँ, और एक साथ दो बहनों (से शादी भी हराम है)---- मगर   पहले जो हो चुका सो हो चुका: अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है---- (4: 23)

विवाहित औरतें  भी हराम हैं, सिवाए उनके जो लौंडी [female slave] (लड़ाई के बाद) तुम्हारे हाथ गयी हो। अल्लाह ने ये सारे आदेश तुम्हारे लिए दिए हैं। (इनको छोड़कर) दूसरी सभी औरतें तुम्हारे लिए वैध हैंशर्त यह है कि तुम अपना माल (मेहर के रूप में) ख़र्च करके उनसे शादी करने की चाहत रखो कि काम वासना पूरी करने के लिए ऐसा करो। अगर तुम शादी करके औरतों के साथ (दाम्पत्य जीवन के) मज़े उठाना चाहते हो, तो उनकी 'मेहर' [bride-wealth] अदा कर दो ---- यह तुम्हारे लिए फ़र्ज़ है ---- हां, इस फ़र्ज़ को अदा करने के बाद भी, अगर तुम दोनों आपसी सहमति से (मेहर में कमी-बेशी के बारे में) कोई समझौता कर लो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगा: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (4: 24)

 

[ रसूल]वे आपसे (औरतों के) मासिक-धर्म [Menstruation] के बारे में पूछते हैंआप कह दें, "मासिक-धर्म (औरतों के लिए) एक तकलीफ़ की हालत हैअतः इस दौरान औरतों से अलग-थलग रहो। जब तक कि वे (इसकी अवधि पूरी करके) पाक-साफ़ हो जाएँउनके नज़दीक (सेक्स के लिए) जाओफिर जब वे पाक-साफ़ हो जाएंतो तुम उनके साथ मिलन कर सकते होजिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए ठहरा दिया है। अल्लाह उन लोगों को पसन्द करता है जो (गुनाहों से तौबा के लिए) उसके आगे झुकते हैंऔर वह उन्हें भी पसन्द करता है जो अपने आपको साफ़-सुथरा रखते हैं।  (2: 222)

 तुम्हारी बीवियाँ तुम्हारे लिए (फ़सल उगानेवाले) खेत की तरह हैंअतः (बीज बोने के लिए आगे से या पीछे से) जिस तरह से चाहोतुम अपने खेतों में जाओऔर अपने लिए (अच्छे कर्म) आगे भेजो। (देखो!) अल्लाह से डरते रहोयाद रखोएक दिन तुम्हें उससे मिलना है।ईमान रखनेवालों को (बेकार के रोक-टोक से बच जाने की) ख़ुशख़बरी दे दो।  (2: 223)

 

(कोई आदमी अपनी बीवी को तलाक़ दे देऔर उसकी गोद में बच्चा हो)और वह अगर बच्चे की माँ से पूरी अवधि तक दूध पिलवाना चाहता हैतो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष तक दूध पिलाएँऔर माँ के खाने-कपड़े की ज़िम्मेदारीउचित रीति से उसके बाप को उठानी चाहिए। किसी पर भी (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ डालना चाहिए जितना बोझ वह (अपनी हैसियत के मुताबिक़) उठा सके: तो माँ को उसके बच्चे के कारण नुक़सान पहुँचाया जाएऔर ही बाप को उसके बच्चे के कारण। (माँ के लिए) ऐसी ही ज़िम्मेदारी (बच्चे के बाप के मरने के बाद) उसके वारिस पर भी आती है। फिर अगर (ऐसा हो कि) माँ-बाप आपसी सहमति और सलाह-मशविरे से (बच्चे का) दूध (समय से पहले) छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई गुनाह नहींऔर ही इस पर कोई गुनाह होगा अगर तुम बच्चे को (माँ के बदले) किसी दूसरी औरत [wet-nurse] से दूध पिलवाना चाहोशर्त यह है कि तुमने जो कुछ बदले में देने का वादा किया होउचित तरीक़े से उसे चुका दो। और (देखो!) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहोऔर यह जान लो कि तुम जो कुछ भी करते होअल्लाह सब देख रहा है।  (2: 233)

 

हमने आदमी को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है: उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, " मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस एहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझ पर और मेरे माँ-बाप पर किया है; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा नेक बना। मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (46: 15)

 अपनी हैसियत के अनुसार, जहाँ तुम स्वयं रहते हो, उन औरतों को भी वहीं रहने की जगह दो जिनको तलाक़ दे रहे हो, और उन्हें इतना परेशान करो कि उनका जीना दूभर हो जाए। अगर वे गर्भवती हों, तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो जब तक कि वे बच्चा जन दें; फिर अगर वे तुम्हारे बच्चे को दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक [compensation] दो। भले तरीक़े से आपस में सलाह कर के (दूध पिलाने की) बात तय कर लो----- अगर तुम एक दूसरे के लिए मुश्किलें पैदा करोगे, तो फिर कोई दूसरी औरत उस [बाप] के लिए (पैसे के बदले) बच्चे को दूध पिला सकती है। (65: 6)

 

अगर कोई पति अपनी बीवी को दूसरे तलाक़ के बाद फिर से [तीसरा] तलाक़ दे देतो फिर इसके बाद वह बीवी उसके लिए वैध होगीजब तक कि वह (औरत) किसी दूसरे पति से निकाह कर लेफिर अगर ऐसा हो कि वह पति भी उस (औरत) को ख़ुद से तलाक़ दे देतो फिर इस बात में कोई गुनाह होगा अगर वह औरत और उसका पहला पति एक-दूसरे की ओर लौट आएंअगर वे समझते हों कि वे अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाओं के भीतर रह सकेंगे। और (देखो!)ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैंजिन्हें वह उन लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है जो ज्ञान रखते हैं।  (2: 230)

 

 तुममें से जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई, और तुम्हारे दास दासियों में भी जो (शादी के) योग्य हों, उनकी शादी करा दो। अगर वे ग़रीब हैं, तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से उनकी रोज़ी की व्यवस्था कर देगा: अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है और वह सब कुछ जाननेवाला है। (24: 32)

 

तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगाचाहे तुम इशारे-इशारे में बताओ कि इन औरतों से शादी करना चाहते होया बात को अपने मन में छिपाए रखो ----- अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें शादी का प्रस्ताव देना चाहते हो। उनके साथ छिपकर कोई क़रार कर लेनाउनके साथ इज़्ज़त से बातचीत करो और जब तक निर्धारित अवधि पूरी हो जाएशादी के बंधन की घोषणा मत करो। याद रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता हैअतः उससे डरते रहो। याद रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और सहनशील है।  (2: 235)

 

 

 

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