Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सामाजिक विषय: तलाक़ [Divorce]:
सामाजिक विषय:
तलाक़ [Divorce]:
(ऐ ईमानवालो) अगर तुम्हें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने का डर हो, तो उनमें सुलह कराने के लिए एक आदमी मर्द के घरवालों में से और एक आदमी औरत के घरवालों में से नियुक्त कर दो। फिर अगर पति-पत्नी आपस के मामले को सुधारना चाहें, तो अल्लाह उनके बीच फिर से मेल-मिलाप पैदा कर देगा: वह सब कुछ जानता है, हर चीज़ की ख़बर रखता है। (4: 35)
अगर किसी औरत को अपने पति की तरफ़ से ज़ोर-ज़बरद्स्ती करने या अलग हो जाने का डर हो, तो इस बात के लिए उन दोनों का कोई दोष नहीं होगा, अगर वे आपस में मेल-मिलाप की कोई राह निकाल लें, कि मेल-मिलाप तो बहुत अच्छी चीज़ है। हालाँकि आदमी के मन में लालच व स्वार्थ की प्रवृत्ति पायी जाती है, फिर भी अगर तुम अच्छा व्यवहार करो और (अल्लाह का) डर रखो, तो जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखनेवाला है। (4: 128)
[जिस तलाक़ में दोबारा मेल-मिलाप की संभावना है, वैसा] तलाक़ दो बार (एक-एक करके) हो सकता है, और (हर एक बार) बीवियों को या तो क़ायदे के अनुसार रोक लिया जाए (और मेल-मिलाप कर लिया जाए) या भले तरीक़े से छोड़ दिया जाए। [तीसरा तलाक़ अंतिम और पक्का हो जाएगा]। तुम्हारे लिए यह वैध नहीं होगा कि जो कुछ तुम (अपनी बीवियों को पहले) दे चुके हो, उसमें से कुछ (तलाक़ देते समय) वापस ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को यह डर हो कि वे (शादी के लिए) अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे: अगर तुम [फ़ैसला करनेवाले] को यह शक हो कि वे [मियां-बीवी] ऐसा नहीं कर सकेंगे, तो फिर इस बात में दोनों में से किसी का भी दोष नहीं होगा, अगर औरत (तलाक़ के बदले अपने दहेज़/मेहर में से) कुछ देकर अपना पीछा छुड़ाना चाहे। (याद रहे), ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं को तोड़ देगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। (2: 229)
अगर कोई पति अपनी बीवी को दूसरे तलाक़ के बाद फिर से [तीसरा] तलाक़ दे दे, तो फिर इसके बाद वह बीवी उसके लिए वैध न होगी, जब तक कि वह (औरत) किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले; फिर अगर ऐसा हो कि वह पति भी उस (औरत) को ख़ुद से तलाक़ दे दे, तो फिर इस बात में कोई गुनाह न होगा अगर वह औरत और उसका पहला पति एक-दूसरे की ओर लौट आएं, अगर वे समझते हों कि वे अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाओं के भीतर रह सकेंगे। और (देखो!), ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, जिन्हें वह उन लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है जो ज्ञान रखते हैं। (2: 230)
जब तुम औरतों को तलाक़ दे दो और उनकी निर्धारित (इद्दत की) अवधि पूरी होने को आए, तो ठीक तरीक़ा अपनाते हुए या (तो मेल-मिलाप करके) उन्हें रोक लो या उन्हें (आख़िरी तलाक़ देकर) विदा कर दो। उन्हें इस इरादे से रोके न रखो कि तुम उन्हें नुक़सान पहुँचाओ और उन पर अत्याचार करो: जो ऐसा करेगा, तो वह ख़ुद अपने हाथों अपना नुक़सान करेगा। और (देखो), अल्लाह के आदेशों को हँसी-खेल न बना लो; याद करो अल्लाह के एहसानों [bounties] को जो उसने तुम पर किया, और उस किताब [क़ुरआन] और गहरी समझ-बूझ [हिकमत] को भी न भूलो, जो तुम्हारी शिक्षा के लिए उसने तुम पर उतारी। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और जान लो कि अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (2: 231)
फिर जब वे (औरतें) अपनी (इद्दत की) निर्धारित अवधि पूरी करने के नज़दीक पहुंच जाएं, तो या तो उन्हें इज़्ज़त के साथ (अपने वैवाहिक जीवन में) वापस ले लो, या (इद्दत पूरी होने के बाद) इज़्ज़त के साथ उनसे अलग हो जाओ। अपने लोगों में से दो न्याय पसंद करने वाले गवाहों को बुला लो और अल्लाह के वास्ते गवाही को पक्का बनाओ। जो कोई अल्लाह पर और अंतिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखता है, उसे इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए: अल्लाह उनके लिए (परेशानी से) निकलने का कोई न कोई रास्ता निकाल देगा, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, (65: 2)
जो लोग अपनी बीवियों के साथ सेक्स न करने की क़सम खा बैठें, उनके लिए चार महीने इंतज़ार का समय होगा: अगर वे इस दौरान (क़सम तोड़कर बीवी से) मिलन कर लें, तो याद रखो कि अल्लाह उन्हें माफ़ कर देगा, और उन पर दया करेगा, (2: 226)
जिन औरतों को तलाक़ दी गयी है, उन्हें चाहिए कि तीन बार मासिक-धर्म [Periods] आने की अवधि तक अपने आपको (दूसरी शादी से) रोके रखें, और, अगर वे सचमुच अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखती हैं, तो उनके लिए यह वैध न होगा कि जो चीज़ अल्लाह ने उनके पेट में पैदा कर दी हो, उसे छिपाएँ: इस अवधि के दौरान, उनके पतियों के लिए बेहतर यह होगा कि वे उन्हें (अपनी बीवी के रूप में) वापस ले लें, शर्त यह है कि वे (आपस के) मामलों को ठीक करने की इच्छा रखते हों। और (देखो), सर्वमान्य तरीक़े के अनुसार, बीवियों के (अपने पतियों पर) जैसे अधिकार हैं, उसी तरह की उनकी ज़िम्मेदारियाँ भी हैं, और पतियों को उन पर एक ख़ास दर्जा (अधिकार) दिया गया है: (दोनों को याद रखना चाहिए कि) अल्लाह बहुत ताक़त रखनेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (2: 228)
जब तुम औरतों को (एक या दूसरी बार) तलाक़ दे दो और वे अपनी निर्धारित (इद्दत की) अवधि को पूरा कर लें, तो उन्हें अपने पतियों से दोबारा शादी करने से न रोको, अगर वे दोनों उचित रीति से ऐसा करने के लिए सहमत हों। जो लोग अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, उन्हें यह हुक्म दिया जाता है कि वे ये बात अपने दिल में बैठा लें: यह तुम्हारे लिए सब तरह से ज़्यादा सही और साफ़-सुथरा तरीक़ा है। अल्लाह जानता है, मगर तुम नहीं जानते। (2: 232)
(कोई आदमी अपनी बीवी को तलाक़ दे दे, और उसकी गोद में बच्चा हो), और वह अगर बच्चे की माँ से पूरी अवधि तक दूध पिलवाना चाहता है, तो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष तक दूध पिलाएँ, और माँ के खाने-कपड़े की ज़िम्मेदारी, उचित रीति से उसके बाप को उठानी चाहिए। किसी पर भी (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ डालना चाहिए जितना बोझ वह (अपनी हैसियत के मुताबिक़) उठा सके: न तो माँ को उसके बच्चे के कारण नुक़सान पहुँचाया जाए, और न ही बाप को उसके बच्चे के कारण। (माँ के लिए) ऐसी ही ज़िम्मेदारी (बच्चे के बाप के मरने के बाद) उसके वारिस पर भी आती है। फिर अगर (ऐसा हो कि) माँ-बाप आपसी सहमति और सलाह-मशविरे से (बच्चे का) दूध (समय से पहले) छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई गुनाह नहीं, और न ही इस पर कोई गुनाह होगा अगर तुम बच्चे को (माँ के बदले) किसी दूसरी औरत [wet-nurse] से दूध पिलवाना चाहो, शर्त यह है कि तुमने जो कुछ बदले में देने का वादा किया हो, उचित तरीक़े से उसे चुका दो। और (देखो!) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, और यह जान लो कि तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह सब देख रहा है। (2: 233)
अगर तुममें से कोई मर जाए और अपने पीछे विधवा छोड़ जाए, तो उन विधवाओं को दोबारा शादी के लिए चार महीने और दस रातों तक इंतज़ार करना चाहिए। जब वे अपनी निर्धारित अवधि [इद्दत] पूरी कर लें, तो वे अपने लिए जो भी ठीक समझें, चुने लें, उसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (2: 234)
तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगा, चाहे तुम इशारे-इशारे में बताओ कि इन औरतों से शादी करना चाहते हो, या बात को अपने मन में छिपाए रखो ----- अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें शादी का प्रस्ताव देना चाहते हो। उनके साथ छिपकर कोई क़रार न कर लेना; उनके साथ इज़्ज़त से बातचीत करो और जब तक निर्धारित अवधि पूरी न हो जाए, शादी के बंधन की घोषणा मत करो। याद रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता है, अतः उससे डरते रहो। याद रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और सहनशील है। (2: 235)
अगर तुमने औरतों को इस हाल में तलाक़ दे दिया, जबकि शादी के बाद अभी तक तुमने उनके साथ सेक्स न किया हो, और न उनके लिए "मेहर" [bride-gift] तय की हो, तो तुम पर कोई गुनाह नहीं होगा। मगर ऐसी हालत में (उस औरत को रिश्ता जोड़ने और फिर तोड़ देने में जो नुक़सान हुआ, उसकी भरपाई के लिए) उन्हें कुछ तोहफ़ा दे दो, अमीर आदमी अपनी हैसियत के अनुसार और ग़रीब आदमी अपनी हैसियत के मुताबिक़ ----- यह उन लोगों पर फ़र्ज़ है जो नेक व अच्छा काम करते हैं। (2: 236)
अगर तुम्हें किसी (दुश्मन का) ख़तरा हो, तो चलते-फिरते या सवारी में ही, जिस तरह बन पड़े, नमाज़ पढ़ लो; जब तुम फिर से सुरक्षित हो जाओ, तो अल्लाह को (नमाज़ों में) याद करो, जिस तरह उसने तुम्हें सिखाया है जिसे तुम जानते न थे। (2: 239)
अगर तुममें से कोई मर जाए और अपने पीछे विधवाओं को छोड़ जाए, तो उन्हें चाहिए कि वे उन (विधवाओं) के लिए यह वसीयत [bequest] कर दिया करें: एक साल तक उन्हें खाने-कपड़े का ख़र्च दिया जाए, और उन्हें (उस अवधि में पति के) घरों से न निकाला जाए। लेकिन अगर वे (इस अवधि से पहले) ख़ुद ही घर छोड़ दें (और दूसरी शादी के लिए क़दम उठाएं), तो जो कुछ वे उचित तरीक़े से अपने लिए करना चाहें, उसके लिए तुम दोषी नहीं होगे: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, (और हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (2: 240)
ऐ ईमानवालो! तुम्हारे लिए यह वैध नहीं कि तुम (विधवा) औरतों (पर क़ब्ज़ा कर) के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न ऐसा करना चाहिए कि जो कुछ (माल व सामान) अपनी बीवियों को दे चुके हो, उसमें से कुछ वापस लेने के चक्कर में उनके साथ सख़्ती करो, और न ही उन्हें (दोबारा शादी करने से) रोक रखो, हाँ, अगर वे खुले-आम कोई बदचलनी के काम [adultery] कर बैठें, तो दूसरी बात है। उनके साथ ज़िंदगी बसर करने में नर्मी और इंसाफ़ से काम लो: अगर तुम उन्हें (किसी कारण से) पसंद नहीं करते, तो सम्भव है कि जो बात तुम पसन्द नहीं करते हो, उसी में अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़्यादा भलाई रख दी हो। (4: 19)
ऐ ईमानवालो! जब तुम ईमान रखने वाली औरतों से शादी के बाद उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुम्हें कोई हक़ नहीं है कि उनके लिए इद्दत की अवधि [waiting
period] गुज़ारने का इंतज़ार करो: उन्हें तोहफ़े में कुछ सामान दे दो और इज़्ज़त से विदा कर दो। (33: 49)
और उन्हें उस जगह से रोज़ी देगा जिसका उन्हें अंदाज़ा तक न होगा; जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है, तो उसके लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है; अल्लाह ने हर चीज़ का एक सही अंदाज़ा तय कर रखा है। (65: 3)
अगर तुम्हें (इद्दत के बारे में) कोई संदेह हो, (तो जान लो) कि उन औरतों के लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, जिनकी माहवारी आनी बंद हो चुकी है, और उनकी भी इतनी ही है जिनकी अभी तक माहवारी शुरू नहीं हुई; जो औरतें गर्भवती हों, उनके लिए इद्दत की अवधि उस समय तक होगी, जब तक कि वे बच्चा जन न लें: जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके काम में आसानी पैदा कर देता है। (65: 4)
यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम पर उतार भेजा है। जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देगा और उसके इनाम को बढ़ा देगा। (65: 5)
अपनी हैसियत के अनुसार, जहाँ तुम स्वयं रहते हो, उन औरतों को भी वहीं रहने की जगह दो जिनको तलाक़ दे रहे हो, और उन्हें इतना परेशान न करो कि उनका जीना दूभर हो जाए। अगर वे गर्भवती हों, तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो जब तक कि वे बच्चा जन न दें; फिर अगर वे तुम्हारे बच्चे को दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक [compensation] दो। भले तरीक़े से आपस में सलाह कर के (दूध पिलाने की) बात तय कर लो----- अगर तुम एक दूसरे के लिए मुश्किलें पैदा करोगे, तो फिर कोई दूसरी औरत उस [बाप] के लिए (पैसे के बदले) बच्चे को दूध पिला सकती है। (65: 6)
और अमीर आदमी को अपनी हैसियत के मुताबिक़ (ऐसी औरतों को) ख़र्चा-पानी देना चाहिए। मगर जिसकी रोज़ी ज़रा कम हो, तो जो कुछ अल्लाह ने उसे दे रखा है, उसी में से वह ख़र्च करे: अल्लाह ने किसी को जितना (माल) दिया है, उससे बढ़कर वह किसी आदमी पर (ज़िम्मेदारी का) बोझ नहीं डालता----- (पैसे की) तंगी के बाद अल्लाह आसानी पैदा कर देगा। (65: 7)
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