Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सामाजिक विषय: भलाई को बढ़ावा देना और बुराई को रोकना:
सामाजिक विषय:
भलाई को बढ़ावा देना और बुराई को रोकना:
(देखो!) तुम एक ऐसे समुदाय का हिस्सा बनो जो (लोगों को) अच्छाई की तरफ़ बुलाए, जो चीज़ सही है उसे करने का हुक्म दे, और जो ग़लत है उसे करने से रोके: जो लोग ऐसा करते हैं, वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं। (3:
104)
[ईमानवालो], तुम एक बेहतरीन उम्मत [समुदाय] हो, जिसे लोगों (की भलाई) के लिए चुन लिया गया है: तुम उस काम का हुक्म देते हो जो सही है, और उस काम से रोकते हो जो ग़लत है, और अल्लाह पर (सच्चा) ईमान रखते हो। अगर किताबवाले लोगों ने भी विश्वास किया होता, तो यह उनके लिए बहुत बेहतर होता। हालाँकि उनमें से कुछ लोग तो (सच्चाई पर) ईमान रखते हैं, मगर ज़्यादातर लोग (अल्लाह का) क़ानून तोड़ने वाले हैं ------- (3: 110)
और उस रसूल [Messenger] के पीछे चलते हैं, जो ऐसा नबी [Prophet] है कि (न तो यहूदी नस्ल का है, और) न पढ़ा-लिखा है, जिसका ज़िक्र वे अपने यहाँ तौरात [Torah] में लिखा पाते हैं, और इंजील [Bible] में भी---- जो उन्हें अच्छा व सही काम करने का हुक्म देता है और बुराई व ग़लत काम करने से रोकता है, जो उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल [वैध/ Lawful] और बुरी चीज़ों को हराम [अवैध/ Unlawful] ठहराता है, और उन्हें उनके बोझ से और गले में पड़े हुए उन लोहे के बन्धनों से मुक्ति देता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः ऐसे ही लोग हैं जो उस पर ईमान रखते हैं, उसकी इज़्ज़त करते हैं और उसकी मदद करते हैं, और वह उस रौशनी के पीछे चलते हैं, जो उसके साथ भेजी गयी है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।" (7: 157)
ईमान रखनेवाले, मर्द और औरत दोनों ही एक दूसरे की मदद करते हैं; वे भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे कामों से रोकते हैं; वे पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और निर्धारित ज़कात अदा करते हैं; और वे अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा को मानते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी रहमत से माफ़ कर देगा: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बेहद समझ-बूझवाला है। (9: 71)
ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों, दोनों से अल्लाह ने (जन्नत के) ऐसे बाग़ों का वादा कर रखा है जिनके नीचे नहरें बहती हैं और जहाँ उन्हें हमेशा के लिए रहना है, सदाबहार आनंद के बाग़ों के बीच अच्छे, सुकून के घरों में; और --- सबसे बढ़कर बात--- अल्लाह की ख़ुशी और रज़ामन्दी के साथ रहेंगे; यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9: 72)
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो; लोगों को अच्छाई की तरफ़ प्रेरित करो; बुराई से रोको; जो मुसीबत भी तुम पर पड़े उस पर धीरज से काम लो: यही वे काम हैं जिन्हें करने का पक्का इरादा करना चाहिए। (31: 17)
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