Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सामाजिक विषय: शिष्टाचार [Etiquette]:
सामाजिक विषय:
शिष्टाचार [Etiquette]:
जब कभी उनके पास किसी मामले की ख़बर पहुँचती है, चाहे वह शांति से जुड़ी बात हो या युद्ध से, तो वे उसे (तुरंत) लोगों में फैलाने लगते हैं; हालाँकि अगर वे उस (ख़बर) को अल्लाह के रसूल और उनमें जो लोग अधिकार रखते हैं, उनके पास ले जाते, तो उन लोगों ने
मामले की जाँच-पड़ताल से सच्चाई जान ली होती। अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी
रहमत [mercy] न होती, तो थोड़े लोगों के सिवा तुम सब शैतान के पीछे चलने लग जाते। (4: 83)
ऐ ईमान रखनेवालो!, अगर (सही रास्ते से भटका
हुआ) कोई बदमाश, तुम्हारे पास कोई ख़बर
लेकर आए, तो पहले उसकी छानबीन कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम दूसरों को अनजाने में नुक़सान पहुँचा
बैठो, और फिर अपने किए पर पछताते रहो, (49: 6)
ऐ ईमान रखनेवालो!, मर्दों के एक
गिरोह को दूसरे (गिरोह के) मर्दों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ा रहे हैं), वे उनसे बेहतर हों, और औरतों के
गिरोह को भी दूसरे (गिरोह की) औरतों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ायी जा रही हो) वे उनसे बेहतर हों; एक दूसरे को बुरी बातें न कहो; और न आपस में एक-दूसरे को चिढ़ाने वाले पुकारू नामों [nicknames] से बुलाओ। यह कितनी बुरी बात है कि कोई ईमान लाने के बाद भी "बदमाश"
के नाम से जाना जाए! जो लोग अपने इस आचरण पर नहीं पछताते हैं, ऐसे लोग बहुत बुरा काम करते हैं। (49: 11)
ऐ ईमानवालो! किसी चीज़ के बारे में पहले से ही बहुत सारी धारणाएं [assumptions] बनाने से बचा करो----- कुछ पूर्व-धारणाएं गुनाह होती हैं---- और एक दूसरे की जासूसी मत किया करो या लोगों की पीठ-पीछे बुराई न किया करो: क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? नहीं, बल्कि तुम उससे नफ़रत करोगे। अत: अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: अल्लाह हमेशा (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है। (49: 12)
ऐ ईमानवालो! मजलिसों में अगर तुमसे कहा जाए कि एक दूसरे (के बैठने) के लिए
थोड़ी जगह बनाओ, तो जगह बना दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बना देगा, और अगर तुम (बैठे हो, और तुम) से कहा जाए कि उठ जाओ,
तो उठ जाया करो: अल्लाह उन लोगों के दर्जों को ऊँचा उठा देगा, जो लोग तुममें से ईमान रखते हैं, और जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है: (याद रखो!) जो कुछ तुम
करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (58: 11)
उनकी
अधिकतर गोपनीय बातों में कोई भलाई की बात नहीं होती। हाँ, जो आदमी दान देने या भलाई करने या लोगों के बीच मेल-जोल बढ़ाने
के लिए कोई आदेश दे, तो उसकी बात और है। तो जो कोई इन कामों को अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए करेगा, उसे हम ज़बरदस्त इनाम देंगे; (4:
114)
ऐ ईमानवालो! जब तुम आपस में चुपके-चुपके बातें करो, तो वह (गुप्त बातें) ऐसी न की जाएं जिसमें गुनाह, ज़्यादती और रसूल की आज्ञा न मानने की बातें शामिल हों, बल्कि बातें इस तरीक़े से की जाएं जो नेकी और (अल्लाह का डर
रखते हुए) बुराइयों से बचने की बातें हों। अल्लाह से डरो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा किया जाएगा। (58: 9)
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