Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: सामाजिक विषय: ग़ुलामों को आज़ाद करना और उनकी मदद करना:
सामाजिक विषय:
ग़ुलामों को आज़ाद करना और उनकी मदद करना:
और (देखो!), ऐसा कभी नहीं होना चाहिए कि एक ईमानवाला दूसरे ईमानवाले की हत्या कर डाले, हाँ, अगर भूल-चूक से ऐसा हो जाए तो बात और है। अगर कोई ग़लती से एक ईमानवाले की हत्या कर दे, तो उसे एक मुस्लिम ग़ुलाम [slave] को आज़ाद करना होगा और मारे गए आदमी के घरवालों को भरपाई [compensation] में "ख़ून-बहा" [blood-money] अदा करना होगा, हाँ, अगर घरवाले उदारता से (ख़ून-बहा) माफ़ कर दें तो और बात है; अगर मरनेवाला किसी ऐसी (दुश्मन) क़ौम से हो जिनसे लड़ाई चल रही हो, मगर ख़ुद वह ईमानवाला हो, तो ऐसी हालत में भरपाई में केवल एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा (ख़ून-बहा देने की ज़रूरत नहीं); अगर मरनेवाला उस क़ौम के लोगों में से हो जिसके साथ तुमने कोई शांति-समझौता कर रखा हो, तो भरपाई में उसके घरवालों को 'ख़ून-बहा' भी देना होगा, और साथ में एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद भी करना होगा। अगर किसी के पास ग़ुलाम न हो (और न ही ग़ुलाम को ख़रीदकर आज़ाद करने के लिए माल हो), तो अल्लाह के सामने (अपने गुनाह की) तौबा [repentance] के लिए उसे चाहिए कि वह लगातार दो महीने रोज़े रखे: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (4: 92)
अल्लाह तुम्हारी उन क़समों के लिए तुम से हिसाब नहीं लेगा जो बे सिर-पैर की हों, हाँ जो क़सम सोच समझकर खायी गयी हो, उन पर ज़रूर तुम्हारी पकड़ होगी: अगर क़सम तोड़नी पड़े तो उसकी भरपाई [atonement] इस तरह होगी कि तुम्हें दस ग़रीब लोगों को खाना खिलाना होगा जैसा कि तुम आमतौर से अपने घर के लोगों को खिलाते हो, या उन्हें कपड़े देना होगा या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा ----- अगर कोई आदमी की हैसियत यह सब करने की न हो, तो उसे चाहिए कि वह तीन दिन तक रोज़े रखे। यही तुम्हारी क़समों को तोड़ने की भरपाई है---- (याद रखो) जब क़सम खा लो, तो उसे पूरा किया करो। इस तरह से अल्लाह अपनी आयतों को तुम्हारे सामने स्पष्ट करता है, ताकि तुम उसका शुक्र अदा करनेवाले बनो। (5: 89)
यह माल (सदक़ा) तो बस ग़रीबों, ज़रूरतमंदों, ऐसे लोग जो इसके वसूली के काम में लगे हों, ऐसे लोग जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत है, ग़ुलामों को आज़ाद करने के लिए और ऐसे लोगों की मदद के लिए जो क़र्ज़ में डूबे हों, अल्लाह के रास्ते में ख़र्च के लिए और ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों की मदद के लिए है (जो अपने घर न पहुँच पा रहे हों)। यह अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है; अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (9: 60)
तुममें से जो लोग अपनी बीवियों से ऐसी बात कह देते हैं, फिर कहकर अगर अपनी बात से टल जाते हैं, तो इससे पहले कि दोनों [मियाँ-बीवी] एक-दूसरे को फिर से हाथ लगाएँ, उन्हें एक ग़ुलाम को आज़ाद करना चाहिए---- यह है वह बात जिसका तुम्हें हुक्म दिया जाता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है------ (58: 3)
इसके बावजूद, वह तो (अच्छे कर्मों को करने के लिए) खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं, (90: 11) और आप क्या जानें कि वह खड़ी चढ़ायी वाली घाटी [steep pass] क्या है?
(90: 12)
किसी को ग़ुलामी से आज़ाद करा देना, (90: 13)
या भूखवाले दिनों में (यानी अकाल और ग़रीबी के दौर में) खाना खिला देना, (90: 14)
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