Thematic Quran: माँ-बाप के साथ सलूक [व्यवहार] :
माँ-बाप के साथ सलूक [व्यवहार] :
तुम्हारे रब ने आदेश दिया है कि तुम उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो, और यह कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो (अपना धीरज खोते हुए) उन्हें 'उफ़'! तक न कहो और न उनके साथ कठोरता से पेश आओ, बल्कि उनसे आदर के साथ बात किया करो (17: 23)
और नर्मी के साथ बर्ताव करते हुए उनके सामने विनम्रता से अपने आपको झुकाओ और कहो, "मेरे रब! जिस तरह उन्होंने बचपन में मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया था, तू भी उन पर दया कर।" (17: 24)
हमने लोगों को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करने पर बहुत ज़ोर दिया है : तकलीफ़ पे तकलीफ़ सह के, उनकी माँ उन्हें अपने पेट में लिए फिरी, और दो वर्ष लगते हैं (बच्चों को) दूध छुड़ाने में. सो तुम मेरा शुक्र अदा करो और साथ में अपने माँ-बाप का भी---- (अंत में) सब को मेरी ही पास लौट कर आना है. (31: 14)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझपर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझीदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना. मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से रहना, और उन लोगों के रास्ते पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं । और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौट कर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता दूँगा जो तुम ने किया होगा। (31: 15)
हमने आदमी को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है : उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस एहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तूने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर किया है; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा व नेक बना। मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (46: 15)
(ऐ रसूल), वे आपसे पूछते हैं, "(अल्लाह के रास्ते में) उन्हें क्या ख़र्च करना चाहिए?" कह दें, "अपने माल में से जो कुछ भी तुम दो, वह तुम्हारे माँ-बाप, नज़दीकी रिश्तेदार, अनाथ, ज़रूरतमंद और (मुसीबत में फँसे हुए) मुसाफ़िरों के लिए होना चाहिए।" तुम जो कुछ भी भलाई के काम करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (2: 215)
अल्लाह की बन्दगी करो; उसके साथ किसी और को साझी [Partner] न बनाओ। अच्छा व्यवहार करो अपने माँ-बाप के साथ, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ, नज़दीक और दूर में रहनेवाले पड़ोसियों के साथ, पास के बैठेने-उठने वालों के साथ, ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों के साथ, और अपने ग़ुलामों के साथ। अल्लाह घमंड करनेवालों को और डींगे मारनेवालों को पसन्द नहीं करता. (4: 36)
Comments
Post a Comment