Thematic Quran: ज़कात [दान] / Alms [Charity] देना :




ज़कात [दान] / Alms [Charity] देना :


हमने उन सब (रसूलों/ Messengers) को (लोगों का) नायक बनाया जो कि वे हमारे आदेश से लोगों को मार्ग दिखाते थेऔर हमने उन्हें वही[revelation] द्वारा भलाई के काम करनेनमाज़ को पाबन्दी से अदा करने और (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने के लिए प्रेरित किया था : वे हमारे सच्चे व पक्के बंदे थे जो इबादत में लगे रहते थे. (21: 73)

(लोगो)पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, (सही-सही) ज़कात [Alms] दिया करोऔर रसूल की आज्ञा माना करोताकि तुम पर दया की जाए। (24: 56)

मैं अपनी रहमत [mercy] उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैंऔर बराबर ज़कात [charity] देते हैऔर जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं; (7: 156)

(ईमानवाले वे हैं) जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैंऔर (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [alms] देते हैंऔर आनेवाले जीवन [आख़िरत/ परलोक] में पक्का विश्वास रखते हैं.  (27:3)

क्या वे जानते नहीं कि वह अल्लाह है, जो ख़ुद अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और उसके रास्ते में जो कुछ खुले दिल से (दान) दिया जाता हैउसे स्वीकार करता है?.... (9:104)

 अल्लाह उनके कामों के मुताबिक़ ऐसे लोगों को अच्छे से अच्छा इनाम देगाऔर वह अपने फ़ज़ल से उन्हें और ज़्यादा देगा : अल्लाह जिसे देना चाहता हैबेहिसाब देता है। (24: 38)

अगर तुम साफ़ दिल से अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दोतो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें माफ़ कर देगा। अल्लाह हमेशा अच्छाई की क़द्र करनेवालाऔर सहनशील है, (64:17)

दान देने वाले मर्द और दान देने वाली औरतेंजो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैंउसे उनके लिए कई गुना कर दिया जाएगाऔर उनको दिल खोलकर इनाम दिया जाएगा। (57:18)

जहाँ तक तुम से हो सकेअल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहोसुनो और आज्ञा का पालन करोऔर (जरूरतमंदों पर) ख़र्च करो---- यह तुम्हारे ख़ुद के लिए अच्छा होगा। जो अपने मन के लोभ से बचा रहावही कामयाब लोगों में से होगा:  (64:16)

जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा हैउसमें से ख़र्च कर लोइससे पहले कि तुममें से किसी की मौत आ जाए और उस समय वह कहने लगे, "ऐ मेरे रबकाश तूने मुझे कुछ थोड़े समय की और मुहलत दी होतीतो मैंने ख़ूब दान‌‌-दक्षिणा [ज़कात] दिया होताऔर अच्छे व नेक लोगों में शामिल हो जाता!" (63: 10)

जो कुछ क़र्ज़ तुम ब्याज पर देते होताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाएतो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़तीमगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे. (30: 39)

जो (उसकी राह में) जितना कुछ (दान) देते हैं, हमेशा दिल से देते हैंऔर (फिर भी) उनके दिल यह सोच कर काँप जाते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) लौट कर जाना है; (23: 60)

ये (मुनाफ़िक़/पाखंडी) वही लोग हैंजो दिल खोलकर दान [सदक़ा/charity] देनेवाले ईमानवालों को भी बुरा-भला कहते हैंऔर उनको भी जो बड़ी मुश्किल से (अपनी आमदनी से) थोड़ा दान दे पाते हैं : वे ऐसे लोगों की हँसी उड़ाते हैंमगर अल्लाह (की तरफ़ से) उनकी हँसी उड़ायी जाती है ------ उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है.  (9: 70)









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