Thematic Quran: क़र्ज़ पर ब्याज [सूद] लेना : [Usury]





क़र्ज़ पर ब्याज [सूद] लेना : [Usury]


ऐ ईमानवालो! क़र्ज़ के साथ ब्याज [interest] की कमाई से अपना पेट न भरोजो (मूलधन से) दो गुनाचौगुना हो जाता है। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहोताकि तुम (अपने मक़सद में) कामयाब हो सको ----- (3: 130)


मगर जो लोग (क़र्ज़ देकर) ब्याज [usury] लेते हैंवे क़यामत के दिन इस तरह उठेंगे जैसे (मिर्गी का रोगी होया) किसी को शैतान ने छूकर बावला कर दिया होऔर यह इसलिए होगा कि वे कहते हैं, "व्यापार [Trade] और ब्याज [Interest] दोनों एक ही चीज़ है," मगर अल्लाह ने व्यापार को वैध [lawful] और ब्याज लेने को अवैध [forbidden] ठहराया है। अतः अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी मिलने के बादजो कोई ब्याज लेने से रुक गयातो जो कुछ उसने (ब्याज से) पहले कमाया थावह उसे रख सकता है ------अल्लाह ही उसका फ़ैसला करेगा ---- मगर जिस किसी ने फिर से ब्याज लेना शुरू कियातो ऐसे ही लोग (जहन्नम की) आग में पड़नेवाले हैंजहाँ वे हमेशा रहेंगे।  (2: 275)

अल्लाह ब्याज को मिटाता हैमगर दान के कामों को (अपने फ़ज़ल से कई गुना) बढ़ाता है : ऐसे लोग जो (अल्लाह की नेमतों का) शुक्र अदा नहीं करते और गुनाहों में लगे रहते हैंउन्हें अल्लाह पसन्द नहीं करता। (2: 276)

ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरो : अगर तुम सच्चे ईमानवाले होतो जो कुछ ब्याज वसूल करना बाक़ी रह गया हैउसे छोड़ दो।  (2: 278)

अगर तुमने ऐसा न कियातो अल्लाह और उसके रसूल से युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। अगर तुम (ब्याज से) तौबा कर लोतो (ब्याज छोड़कर) अपना मूलधन [Principal] लेने का तुम्हें हक़ हैन तुम्हें कोई घाटा उठाना पड़े और न तुम दूसरों को घाटे में पड़ने पर मजबूर करो।  (2: 279)

अगर क़र्ज़दार तंगी की हालत में हैतो उसकी (आर्थिक) हालत ठीक होने तक उसे मुहलत देनी चाहिएइसके बावजूदअगर तुम समझ रखते होतो तुम्हारे लिए बेहतर तो यह होगा कि दान-पुण्य का काम समझकर, (ऐसी तंगी में डूबे हुए आदमी का) पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दो.  (2: 280)

डरो उस दिन से जिस दिन तुम सब लौटकर अल्लाह के सामने हाज़िर होगे : फिर हर एक आदमी ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया होगाउसका बदला पूरा-पूरा उसे मिल जाएगाऔर किसी के साथ भी कोई अन्याय नहीं होगा।
(2: 281)




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