Thematic Quran: अनाथ [यतीम] / Orphan :





अनाथ [यतीम] / Orphan :


क्या उस [रब] ने आपको (ऐ रसूल) यतीम [अनाथ] नहीं पाया था और फिर (आपको अच्छा) ठिकाना [shelter] दिया?  (93: 6)


अत: [ऐ रसूल], आप भी किसी अनाथ पर सख़्ती न करें,  (93: 9)

[ऐ रसूल]वे आपसे पूछते हैं, "(अल्लाह के रास्ते में) उन्हें क्या ख़र्च करना चाहिए?" कह दें, "अपने माल में से जो कुछ भी तुम दोवह तुम्हारे माँ-बाप, नज़दीकी रिश्तेदारअनाथज़रूरतमंद और (मुसीबत में फँसे हुए) मुसाफ़िरों के लिए होना चाहिए।तुम जो कुछ भी भलाई के काम करते होअल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।  (2: 215)

वे लोग अगर मर जातेतो जिस तरह अपने बेसहारा बच्चों के भविष्य के लिए डरे रहतेउसी तरह उन्हें अनाथों की भी चिंता करनी चाहिएउन्हें अल्लाह से डरना चाहिए और सही और इंसाफ़ की बात कहनी चाहिए।  (4: 9)

जो लोग अनाथों का माल अन्याय से खा लेते हैंअसल में वे अपने पेट में आग के अंगारे भर रहे हैं : वे भड़कती हुई आग में झोंके जाएंगे।  (4: 10)


[ऐ रसूल]वे आपसे अनाथों (की संपत्ति) के बारे में पूछते हैंउनसे कह दें : "यह अच्छा होगा कि उनके मामलों में सुधार किया जाए। अगर तुम उनके मामलों को अपने साथ मिला लो (और उन्हें अपने परिवार के साथ जोड़ लो)तो याद रखो कि वे तुम्हारे भाई-बहन ही हैं : अल्लाह जानता है कि कौन है जो चीज़ों को बिगाड़ने वाला हैऔर कौन उनमें सुधार लाने वाला है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम्हें भी भारी मुश्किल में डाल सकता था : वह बहुत ताक़तवाला और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है।" (2: 220)

और (देखो!) अनाथों को उनका माल (ईमानदारी से वापसदे दो उनकी अच्छी चीज़ों को बदल कर बुरी चीज़ें  दे दोऔर उनके माल को अपने माल के साथ मिलाकर  खा जाओ---  यह बड़ा भारी गुनाह है। (4: 2)

किसी नासमझ (अनाथको अपनी (या उसकीसंपत्ति मत सौंप दो। अल्लाह ने इसे तुम्हारे लिए जीने का सहारा बनाया है : उसमें से उन्हें खिलाओ-पिलाओकपड़े पहनाओ और उनसे प्यार से बात किया करो।  (4: 5)

(अनाथों के अभिभावकों को चाहिए किअनाथों की (समझदारी कीजाँच-परख करते रहेंजब तक कि वे शादी करने की अवस्था को  पहुँच जाएँ फिर अगर तुम्हें लगे कि अब उनमें सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ  गई हैतब उनकी संपत्ति उनके हवाले कर दो। और (देखोयह सोच कर कि कहीं वे बड़े होकर अपना हक़ माँगने  लग जाएँतुम उनके माल जल्दी जल्दी खा कर उड़ा  डालो : अगर (अनाथों केअभिभावक अच्छे पैसेवाले होंतो उन्हें अनाथों की संपत्ति से दूर ही रहना चाहिएहाँअगर वह ग़रीब हैतो अपनी ज़रूरत के हिसाब से उतना ले सकता है जितना उचित हो। फिर जब तुम उनके माल उन्हें सौंपने लगोतो लोगों को गवाह बना लो मगर (याद रखोतुम जो कुछ भी करते होअल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखने के लिए काफ़ी है।  (4: 6)


 [ऐ रसूल!]लोग आपसे औरतों के क़ानून के बारे में पूछते हैंआप कह दें, "अल्लाह ख़ुद ही तुम्हें उनसे जुड़े क़ानून बताता है. तुम्हारे सामने पहले ही हमारी किताब [क़ुरआन] की वह आयतें पढ़ कर सुनायी जा चुकी हैंजो उन अनाथ लड़्कियों के बारे में हैं [जो तुम्हारी देख-रेख में हैं]जिनकी (विरासत का) निर्धारित हिस्सा तुम अदा नहीं करते और (इसीलिए) उनके साथ शादी कर लेना चाहते होऔर (इसी तरह) बेसहारा बच्चों के बारे में भी आदेश है ------ अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अनाथों के साथ इंसाफ़ से पेश आओ : जो कुछ भलाई का काम तुम करते होअल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (4: 127)

(इसी तरह) अनाथों के माल से दूर ही रहोसिवाए (उनको फ़ायदा पहुँचाने की) अच्छी नीयत केमगर यह भी उसी वक़्त तक जब तक कि वह अपनी युवावस्था को न पहुँच जाएं......  (6: 152

और (ख़र्च करने के इरादे से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाए उसकी भलाई के इरादे सेजब तक कि वह अपनी जवानी को न पहुँच जाएं (और तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो). और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुम से अवश्य ही पूछा जाएगा. (17: 34)

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते,      (89: 17)

(संपत्ति का) हिस्सा बाँटते समयअगर दूर के रिश्तेदार, (ख़ानदान केअनाथ और ज़रूरतमंद लोग भी  जाएंतो उन्हें भी उसमें से थोड़ा बहुत दे दो और उनसे प्यार  नर्मी से बात करो। (4: 8)

और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेट कर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और गरीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते),  (89: 19)






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