Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें : दुख/ पछतावा [Regret]

Thematic Quran/ क़ुरआन  का विषयवार अध्ययन 


अनदेखी चीज़ें


दुख/ पछतावा [Regret]


उस दिन शैतानी करने वाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता! (25: 27)


उस वक़्त वे क्या करेंगे जब हम हर समुदाय में से एक गवाह लाएँगे, और (ऐ रसूल) आपको इन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह बनाकर पेश करेंगे? (4: 41)

उस दिन, जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते थे और हमारे रसूल की आज्ञा नहीं मानते थे, वे तमन्ना करेंगे कि काश हमें ज़मीन निगल जाती: वे अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपा नहीं पाएंगे।  (4: 42)

 

विश्वास करने से इंकार करनेवालों को अल्लाह ने ठुकरा दिया है और उनके लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है।  (33: 64)

उसी में वे हमेशा रहेंगे। न कोई वहाँ होगा जिसे वे दोस्त बना सकें, और न कोई उन्हें सहारा देने वाला होगा।  (33: 65)

उस दिन जब (जहन्नम की) आग में उनके चहरे उलट-पलट किए जाएँगे, तो वे कहेंगे, "काश! हमने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानी होती!" (33: 66)

और वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने अपने बड़ों और सरदारों की बात मानी, और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया। (33: 67)

"ऐ हमारे रब! तू उन्हें दोहरी सज़ा दे और उन्हें पूरी तरह से ठुकरा दे !" (33: 68)

 

हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (25: 28)

मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस (दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया। शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है।" (25: 29)

 

और इबलीस [शैतान] के सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे)। (26: 95)

वहाँ वे आपस में तू-तू मैं-मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए) ख़ुदाओं से कहेंगे, (26: 96)

 "अल्लाह की क़सम! हम उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (26: 97)

जब हमने तुम्हें सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था। (26: 98)

वे शैतानियाँ करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (26: 99)

और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करने वाला है, (26: 100)

और न कोई सच्चा दोस्त है।  (26: 101)

काश! अगर हम अपनी ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के ईमानवाले [मोमिन] हो जाते!" (26: 102)

 

जो कोई भी दयालु रब [रहमान] के ज़िक्र या उसकी याद से मुँह मोड़ता हैहम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते हैंजो उसका साथी बन जाता है: (43: 36

औऱ ये शैतानलोगों को सीधे मार्ग से रोकते रहते हैंजबकि (इंकार करनेवाले) यह समझते हैं कि वे ठीक मार्ग पर हैं, (43: 37

यहाँ तक कि जब ऐसा आदमी हमारे पास आएगातो (अपने शैतान साथी से) कहेगा, "ऐ काशमेरे और तेरे बीच इतनी दूरी होती जितनी पूरब और पश्चिम के दोनों किनारों में होती हैतू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!" (43: 38)

 (उन लोगों से कहा जाएगा) “तुम ने ग़लत काम किया हैऔर आज यह बात तुम्हें कुछ भी राहत न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझेदार [Partner] हो।”  (43: 39

 

काश कि तुम देख पाते, जब उन्हें (जहन्नम की) आग के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमें (दुनिया में) वापस भेज दिया जाता, तो (इस बार) हम अपने रब की आयतों को मानने से इंकार नहीं करते, बल्कि विश्वास करनेवालों में शामिल हो जाते।" (6: 27)

नहीं! बल्कि जिस सच्चाई को वे छिपाया करते थे, वह उनके सामने और भी स्पष्ट हो जाएगी। अगर उन्हें (दुनिया में) वापस लाया भी जाता, तो फिर से ये उन्हीं कामों में लग जाते, जिससे उन्हें रोका गया था---- वे कितने बड़े झूठे हैं! (6: 28)

वे कहते हैं, "इस दुनिया की ज़िंदगी के बाद (परलोक की ज़िंदगी) कुछ भी नहीं है: हम लोगों को मरने के बाद दोबारा नहीं उठाया जाएगा।" (6: 29)

काश कि आप देख पाते, जब उन्हें अपने रब के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह अल्लाह कहेगा, "क्या यह हक़ीक़त नहीं है?" वे कहेंगे, "हाँ, सचमुच है, हमारे रब की क़सम!", वह कहेगा, "ठीक है, तो विश्वास न करने के नतीजे में अब हमारी यातना का मज़ा चखो।" (6: 30)


और उस दिन जहन्नम [नरक] को सामने लाया जाएगा‌--- उस दिन इंसान को समझ आएगी,  मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा?  (89: 23)

वह कहेगा ऐ काश! मैंने अपने (इस आने वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!) (89: 24)

 

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