Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें : निराशा की दलीलें [Desperate Pleas]

 Thematic Quran/ क़ुरआन का विषयवार अध्ययन


अनदेखी चीज़ें


निराशा की दलीलें [Desperate Pleas]


वे लोग जो उन (पेशवाओं) के पीछे चलते थेकहेंगे, "काश! हमें (दुनिया में फिर से जाने का) एक आख़िरी मौक़ा मिल जाएतो हम भी उन (झूठे पेशवाओं को) पहचानने से इंकार कर देंजैसा कि उन्होंने अब हमें पहचानने से इंकार कर दिया है।इस तरहअल्लाह उनके कर्मों को उनके लिए एक दुखद पछतावे का ज़रिया बना देगा: वे अब किसी भी तरह (जहन्नम की) आग से निकल नहीं सकेंगे।   (2: 167)


काश कि तुम देख पाते, जब उन्हें (जहन्नम की) आग के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमें (दुनिया में) वापस भेज दिया जाता, तो (इस बार) हम अपने रब की आयतों को मानने से इंकार नहीं करते, बल्कि विश्वास करनेवालों में शामिल हो जाते।" (6: 27)

नहीं! बल्कि जिस सच्चाई को वे छिपाया करते थे, वह उनके सामने और भी स्पष्ट हो जाएगी। अगर उन्हें (दुनिया में) वापस लाया भी जाता, तो फिर से ये उन्हीं कामों में लग जाते, जिससे उन्हें रोका गया था---- वे कितने बड़े झूठे हैं! (6: 28)


[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करने वालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे): "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (32: 12

 अगर हमने ऐसा चाहा होता, तो हमने ज़रूर हर आदमी को (पहले से ही) सच्चे व सही रास्ते पर चलाया होता, मगर मेरी कही हुई बात ही सच हुई है, (जब मैंने कहा था) कि "मैं जहन्नम को अवश्य ही जिन्नों और इंसानोंसब से भर दूँगा।" (32: 13

जिस तरह तुम उस (क़यामत के) दिन हम से होने वाली मुलाक़ात को भुलाए बैठे थे, अब हम भी तुम्हें (उसी तरह) भुला देंगे: जो कुछ भी तुम किया करते थे, उसके बदले में अब चखो मज़ा कभी न ख़त्म होने वाली यातनाओं का!” (32: 14)

 

जिस आदमी को अल्लाह भटकता छोड़ देतो उसके बाद कोई और नहीं होगा जो उसकी मदद कर सके: [ऐ रसूल]आप ज़ालिमों को देखेंगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या अब लौटने का भी कोई रास्ता है?" (42: 44)


मगर जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और न उनसे जहन्नम की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी: और हम ऐसा ही बदला शुक्र न अदा करनेवाले हर काफ़िर को देते हैं।  (35: 36)

 वे जहन्नम में चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—-- (जवाब में कहा जाएगा), "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि अगर तुम समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुनकर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास सावधान करनेवाला [रसूल] भी तो आया था, तो अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!शैतानी करने वालों को मदद करने वाला कोई नहीं होगा! (35: 37)

 

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, उनसे कहा जाएगा, "(जहन्नम में आज) तुम्हें जितनी नफ़रत अपने आपसे हो रही है, उससे ज़्यादा बेज़ारी [disgust] अल्लाह को तुम से उस समय होती थी जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया जाता था और तुम (उस पर विश्वास करने से) इंकार करते थे।" (40: 10)

वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार बेजान [एक पैदा होने से पहले का वजूद और एक मरने के बाद] रखा और दो बार ज़िंदा कर दिया। अब हम अपने गुनाहों को स्वीकार करते हैं, तो क्या अब (जहन्नम से) बच निकलने का भी कोई रास्ता है?" (40: 11)

(उनसे कहा जाएगा, “तुम्हारी यह हालत इसलिए है कि जब अकेले अल्लाह का नाम लिया जाता था तो तुम उसे मानने से इंकार कर देते थे, किन्तु उस (अल्लाह) के साथ जब दूसरों को साझेदार [Partner] ठहराया जाता था, तो तुम (उनमें) विश्वास कर लेते थे।" फ़ैसला तो अल्लाह के ही हाथ में है, जो सबसे बड़ा, सबसे महान है।   (40: 12)


जिन लोगों ने धर्म को बस एक ध्यान भटकाने, व खेल-तमाशे की चीज़ बना दिया था, और इस दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें धोखे में डाल रखा था।आज हम उन पर कोई ध्यान नहीं देंगे, जिस तरह उन्होंने उस (क़यामत के) दिन की होने वाली मुलाक़ात को नज़रअंदाज़ [ignore] कर दिया और हमारी आयतों को मानने से इंकार करते रहे। (7: 51)

 

लोगों के लिए हम एक (आसमानी) किताब लाए हैं---- हमने सच्चे ज्ञान के आधार पर इसमें चीज़ों को विस्तार से बता दिया है----यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है, उन लोगों के लिए जो (सच्चाई में) विश्वास करते हैं। (7: 52

वे किसी और चीज़ के नहीं, बल्कि इसी इंतज़ार में हैं कि कब उस (आख़िरी अंजाम) के बारे में कही हुई बात [Prophecy] पूरी होती है? जिस दिन वह (क़यामत के बारे में) कही हुई बात पूरी हो जाएगी, तो जिन लोगों ने इसे नज़रअंदाज़ किया था, वे बोल उठेंगे, "हमारे रब के रसूल ने सच्ची बात कही थी। तो क्या कोई है जो अब हमारे लिए थोड़ी सिफ़ारिश कर सके? या क्या हमें वापस (उसी दुनिया में) भेजा जा सकता है ताकि जैसा हम पहले व्यवहार करते थे, उससे (इस बार) कुछ अलग व्यवहार कर सकें?" सचमुच वे अपनी जानें गँवा बैठेंगे, और वे सारी [मूर्तियाँ] जो उन्होंने गढ़ रखी थीं, वे उन्हें छोड़कर गुम हो चुकी होंगी।  (7: 53)

 

उस वक़्त वे क्या करेंगे जब हम हर समुदाय में से एक गवाह लाएँगे, और (ऐ रसूल) आपको इन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह बनाकर पेश करेंगे? (4: 41)

उस दिन, जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते थे और हमारे रसूल की आज्ञा नहीं मानते थे, वे तमन्ना करेंगे कि काश हमें ज़मीन निगल जाती: वे अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपा नहीं पाएंगे।  (4: 42)

 

हमने तुम्हें उस यातना से सावधान कर दिया है जो जल्द ही आने वाली है, उस दिन जब हर आदमी उन (कर्मों) को अपनी आँखों से देख लेगा जो उसके हाथों ने आगे भेज रखे हैं, और जब विश्वास न रखनेवाला कहेगा, "काश! मैं  मिट्टी होता! (कि यातनाओं से बच जाता!)" (78: 40)

 

मगर शैतानियाँ करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे,  (43: 74)

जिससे कभी उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी: वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (43: 75)

हमने उनपर कभी कोई ज़ुल्म नहीं कियाअसल में वे ही ज़ुल्म करने वाले लोग थे। (43: 76)

वे (जहन्नम के फ़रिश्ते से) पुकारकर कहेंगे, "ऐ मालिक! अच्छा हो कि तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे", मगर वह जवाब देगा, "नहींतुम्हें तो इसी हाल में रहना है।" (43: 77

हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैंमगर तुममें से अधिकतर लोग सच्चाई से नफ़रत करते हो।  (43: 78)

 

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