क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें: जहन्नम [Hell]

 क़ुरआन का विषयवार अध्ययन: अनदेखी चीज़ें:

  जहन्नम [Hell] 

 

ये (ईमानवाले और काफ़िर) दो तरह के आदमी हैं जो अपने रब के बारे में मतभेद रखते हैं। जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके पहनने के लिए आग का कपड़ा होगाउनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा, (19)

इससे उनके पेट के अंदर की चीज़ें भी गल उठेंगी और उनके बदन के चमड़े भी; (20)

उन्हें क़ाबू में रखने के लिए लोहे की छड़ियाँ होंगी; (21)

जब कभी वे परेशान होकर उससे निकल भागना चाहेंगे, तो वे उसी में वापस धकिया दिये जाएंगे और कहा जाएगा, "अब आग में जलने का मज़ा चखो!" (22)   [22: 19-22]

मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुएतो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (103)

आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उनके होंठ दर्द से ऐंठ जाएंगे। (104)  [23:103-4]

 

और उनके बाद उस ज़मीन पर बसने के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। यह उन लोगों के लिए इनाम होगा, जो मुझसे (हिसाब-किताब के दिन) मिलने से और मेरी चेतावनियों से डरे रहते हैं।" (14
उन (रसूलों) ने अल्लाह से (ज़ालिमों के ख़िलाफ़) फ़ैसले की माँग की, और (नतीजा यह हुआ कि सच्चाई के मुक़ाबले में) हर ज़िद्दी-अड़ियल और ज़ालिम बुरी तरह असफल हुआ---- (15)
 जहन्नम उनमें से हर एक के इंतज़ार में है; वहाँ उसे पीने के लिए गंदा, पीप-मिला पानी दिया जाएगा, (16)
 जिसे वह घूँट-घूँट पीने की कोशिश करेगा, मगर उसे गले के नीचे उतार न पाएगा; मौत उसे हर तरफ़ से घेर लेगी, मगर वह मरेगा भी नहीं; उसके आगे और अधिक कठोर यातना मौजूद होगी। (17)    [14:14-17]

 

मगर शैतानी करने वालों का आख़िरी ठिकाना बहुत ही बुरा होगा:  (55)

वह जहन्नम जिसमें वे जलेंगे, रहने के लिए क्या ही बुरा ठिकाना है--- यह सब उनके लिए होगा:   (56)

उन्हें इसका मज़ा चखने दो --- खौलता हुआ, गाढ़ा, पीप मिला हुआ पानी, (57)

और इसी तरह की दूसरी और यातनाएं। (58)   [38:55-58]

सो आज के दिन यहाँ उसका कोई भी असली दोस्त व मददगार नहीं है, (35)

और खाने के लिए उसके पास सिवाय पीप के और कुछ नहीं  (36)

जिसे केवल गुनाहगार खाते हैं,” (37)         [69:35-37]


क्या (जन्नत में) मेहमानों की तरह स्वागत अच्छा है या 'ज़क़्क़ूम' का पेड़, (62)

जिस (पेड़) को हमने शैतानी करनेवालों की कड़ी परीक्षा लेने के लिए बनाया है?  (63)

असल में यह ऐसा पेड़ है जो नरक की भड़कती हुई आग की तह से निकलता है (64)

उसके फल ऐसे होते हैं जैसे कि शैतानों के सिर हों। (65)

वे [जहन्नमी लोग] उसी को खाकर अपना पेट भरेंगे;  (66)

फिर उसके ऊपर से (पीप मिला हुआ) खौलता हुआ पानी पिया करेंगे;   (67)

(खाने-पीने के बाद) फिर उन्हें उसी (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में लौटना होगा। (68)

 उन्होंने अपने बाप-दादों को मार्ग से भटका हुआ पाया,  (69)

और वे भी उन्हीं के (ग़लत) रास्ते पर चलने के लिए दौड़ पड़े---   (70)     [37: 62-70]

 

ज़क़्क़ूम [काँटेदार फल] का पेड़  (43)

गुनहगारों का भोजन होगा:  (44)

पिघले हुए धातु जैसा (गर्म)वह लोगों के पेटों में (इस तरह) खौलेगा, (45)

जैसे गर्म पानी खौलता है।  (46)

(आदेश होगा), "पकड़ो उसे! और जहन्नम की गहराइयों के बीच तक घसीटते हुए ले जाओ!  (47)

फिर सज़ा के तौर पर उसके सिर पर खौलते हुए पानी को उंडेल दो!" (48)

"लो चखो मज़ातुम तो बड़े ताक़तवरऔर इज़्ज़तदार आदमी बनते थे! (49)

यही तो है (वह जहन्नम)जिसके बारे में तुम संदेह करते थे।" (50)      [44: 43-50]

 

लेकिन जो लोग बायीं हाथवाले [दुर्भाग्यशाली] हैं, तो क्या बताएं कि कैसे (बुरे लोग) हैं बायीं हाथवाले! (41)

वे होंगे तपती हुई गर्म हवा और खौलते हुए पानी में; (42)

और काले धुएँ की छाँव में, (43)

जो न ठंडी होगी और न लाभप्रद। (44)

वे इससे पहले बड़े सुख-सम्पन्न थे; (45)

और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे, (46)

वे कहा करते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (47)

"और क्या हमसे पहले गुज़रे हुए बाप-दादाओं को भी?" (48)

[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढ़ियों के लोग (49)

एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे,  (50)

"तो तुम (लोग) जो रास्ता भटके हुए हो, और सच्चाई का इंकार करने वाले हो  (51)

ज़क्कूम के कड़ुवे पेड़ में से खाओगे; (52)

"और उसी से पेट भरोगे; (53)

"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीना पड़ेगा; (54)

"और पियोगे भी इस तरह जैसे प्यास की बीमारीवाले ऊँट पीते हैं" (55)

तो बदला दिए जाने [फ़ैसले] के दिन, इसी तरह होगा उनका स्वागत!  (56)   [56: 41-56]

 

मगर जो बेहद बदमाश आदमी [wicked person] होगा, वह इस (नसीहत) पर कोई ध्यान नहीं देगा,  (11)

जो (क़यामत के दिन) सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा,  (12)

जहाँ न तो वह मर सकेगा और न जी सकेगा।  (13)  [87: 11-13]


और (जहन्नम की) आग भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी,  (91)

और तब उनसे पूछा जाएगा, "कहाँ हैं वे जिन्हें तुम पूजते थे, (92)

अल्लाह को छोड़कर? क्या वे अब तुम्हारी सहायता कर सकते हैं या अपना बचाव ही कर सकते हैं?" (93)

और उसके बाद, उन सबको जहन्नम में फेंक दिया जाएगा, साथ में उन लोगों को भी जो उन्हें सीधे रास्ते से भटका देते थे, (94)

और इबलीस [शैतान] के सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे)। (95)

वहाँ वे आपस में तू-तू मैं-मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए) ख़ुदाओं से कहेंगे, (96)

"अल्लाह की क़सम! हम उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (97)

जब हमने तुम्हें सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था। (98)

वे शैतानियाँ करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (99)

और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करने वाला है, (100)

और न कोई सच्चा दोस्त है।  (101)  [26: 91-101]

 

और (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] कहते हैं, "हम न तो इस क़ुरआन पर विश्वास करेंगे और न ही उन (आसमानी किताबों) पर जो इससे पहले आ चुकी हैं।" अगर [ऐ रसूल], आप उस वक़्त का हाल देख पाते जब शैतानी करनेवाले लोग अपने रब के सामने खड़े किए जाएँगे, और कैसे वे एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहे होंगे। जिन लोगों पर कमज़ोर समझकर (दुनिया में) ज़ुल्म किया गया था, वे अपने उन ज़ालिमों से कहेंगे, "यदि तुम न रहे होते, तो हम ज़रूर ही (अल्लाह में) विश्वास रखनेवाले [believers] होते।" (31)

ज़ालिम लोग जवाब में उनसे कहेंगे, "जब सही मार्गदर्शन तुम्हारे पास आ चुका था, तो उन्हें अपना लेने से क्या हमने तुम्हें रोका था? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही गुनाहगार हो।" (32)

कमज़ोर समझे गए लोग ज़ालिमों से कहेंगे, "नहीं! बल्कि यह तुम्हारी रात-दिन की मक्कारी ही तो थी (जिसने हमें रोका था) कि तुम हम पर ज़ोर डालते रहते थे कि हम (एक) अल्लाह में विश्वास न करें और दूसरों को उसके बराबर का साझेदार [Partner] ठहराएँ।" जब वे यातना देख लेंगे तो अपनी शर्म छुपाते हुए मन ही मन पछताएँगे, और हम उन इंकार पर अड़े लोगों की गर्दनों में लोहे का तौक़ [iron collar] डाल देंगे। जो कुछ कर्म उन्होंने किए हैं, किस तरह मुमकिन है कि उसका बदला उन्हें कुछ और दिया जाए? (33)   [34: 31-33]

 

और जब उनके हाथ-पाँव बाँधकर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे। (13)

(उनसे कहा जाएगा,) "आज के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)     [25: 13-14]

 

मगर शैतानियाँ करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे,  (74)

जिससे कभी उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी: वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (75)

हमने उनपर कभी कोई ज़ुल्म नहीं कियाअसल में वे ही ज़ुल्म करने वाले लोग थे। (76)

वे (जहन्नम के फ़रिश्ते से) पुकारकर कहेंगे, "ऐ मालिक! अच्छा हो कि तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे", मगर वह जवाब देगा, "नहींतुम्हें तो इसी हाल में रहना है।" (77

हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैंमगर तुममें से अधिकतर लोग सच्चाई से नफ़रत करते हो।  (78)   [43: 74-78]

 

मगर जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और न उनसे जहन्नम की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी: और हम ऐसा ही बदला शुक्र अदा नहीं करनेवाले हर काफ़िर को देते हैं।  (36)

वे जहन्नम में चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—-- (जवाब में कहा जाएगा), "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि अगर तुम समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुनकर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास सावधान करनेवाला [रसूल] भी तो आया था, तो अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!शैतानी करने वालों को मदद करने वाला कोई नहीं होगा! (37)   [35:36-37]

 

असल में, वे लोग आने वाली (क़यामत की) घड़ी को मानने से इंकार करते हैं: और जो उस घड़ी के आने को नहीं मानता, उसके लिए हमने दहकती हुई आग तैयार कर रखी है। (11)

जब वह (जहन्नम की आग) उनको दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके बिफरने और ग़ुस्से में चिल्लाने की आवाज़ें सुनेंगे, (12)

और जब उनके हाथ-पाँव बाँधकर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे। (13)

(उनसे कहा जाएगा,) "आज के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)   [25: 11-14]

 

जिन लोगों ने अपने रब (के हुक्म) को मानने से इंकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना तैयार है: वह [जहन्नम] बहुत ही बुरा ठिकाना है। (6)

जब वे उस (आग) में झोंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की आवाज़ सुनेंगे, वह (ऐसी) भड़क रही होगी, (7)

जैसे वह बेहद गुस्से से फट पड़ेगी। जब भी (काफ़िरों का) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके दारोग़ा उनसे पूछेंगे, “क्या तुम्हारे पास कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था?" (8)

वे जवाब देंगे, 'हाँ! हमारे पास अल्लाह का डर सुनाने वाला तो ज़रूर आया था, मगर हमने उस पर विश्वास नहीं किया। हमने कहा, 'अल्लाह ने तो ऊपर से कुछ भी नहीं उतारा [reveal]: तुम तो बहुत ज़्यादा भटके हुए हो' (9) 

वे कहेंगे, “काश हमने (सच्चाई को) सुना होता, और समझ से काम लिया होता, तो हम (आज) भड़कती आग के वासियों में (शामिल) न होते,” और (10)

वे अपने गुनाहों को ख़ुद स्वीकार कर लेंगे। सो धिक्कार है (जहन्नम की) भड़कती आग में रहने वालों पर! (11) [67: 6-11]

 

वे लोग जो हमारी आयतों को मानने से इंकार करते हैं, उन्हें हम (जहन्नम की) आग में झोंक  देंगे। जब उनकी खालें पूरी तरह जल भुन जाएँगीतो हम उनकी जगह नयी खालों को चढ़ा देंगे, ताकि उन्हें दर्द का एहसास होता रहे: अल्लाह प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (4: 56)

एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगाऔर सब के सब  लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है----  (48)

उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे,  (49)
उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (50)   [14: 48-50]

[ऐ रसूल!],  अगर कोई चीज़ आपको आश्चर्य में डालती हो, तो आपको इस बात पर ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए जब वे [इंकार करनेवाले] पूछते हैं, "क्या? जब हम मरके (सड़-गलकर) मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम फिर नये सिरे से पैदा किए जाएंगे?" यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब (की शक्ति को मानने से) इंकार किया, जिनकी गर्दनों मे लोहे के तौक़ [collars] पड़े होंगे और वही हैं जो (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है। (13: 5)

जिन लोगों ने सच्चाई से इंकार किया, वे गिरोह के गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो उसके द्वार खोल दिए जाएँगे और उसके प्रहरी उनसे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे लोगों में से रसूल नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें पढ़कर सुनाते हों और तुम्हें इस दिन की मुलाक़ात से सचेत करते हों?" वे कहेंगे, "क्यों नहीं (वे तो आए थे)।" मगर सच्चाई से इंकार करने वालों के जुर्मों की सज़ा पहले ही दी जा चुकी होगी। (39: 71)

 

आग में पड़े हुए लोग जहन्नम के पहरेदारों से कहेंगे कि "अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर से एक दिन की तकलीफ़ में कुछ कमी कर दे!" (49)

मगर वे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल सच्चाई का खुला प्रमाण लेकर नहीं आते रहे थे?" (जहन्नमी) कहेंगे, "बेशक! (आए तो थे)!" और पहरेदार कहेंगे, "फिर तो तुम्हीं फ़रियाद करो, मगर हाँ, इंकार करने वालों [काफ़िरों] की फ़रियाद तो बस (हमेशा) अनसुनी ही रह जाती है (50)   [40: 49-50]

ऐ ईमान रखनेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर होंगे, जिस पर कठोर स्वभाव के मज़बूत फ़रिश्ते नियुक्त होते हैं जो अल्लाह के हुक्म को मानने से कभी इंकार नहीं करते, और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है: (66: 6)

जिन लोगों ने अपने रब (के हुक्म) को मानने से इंकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना तैयार है: वह [जहन्नम] बहुत ही बुरा ठिकाना है। (6)

जब वे उस (आग) में झोंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की आवाज़ सुनेंगे, वह (ऐसी) भड़क रही होगी, (7)

जैसे वह बेहद गुस्से से फट पड़ेगी। जब भी (काफ़िरों का) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके दारोग़ा उनसे पूछेंगे, “क्या तुम्हारे पास कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था?" (8) [67:6-8]

 में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा।  (26)

और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है?  (27)

वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है;  (28)

(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है;  (29)

उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ----  (30)

और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा: न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (ख़ास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"

इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानताऔर यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है।  (31)

[7: 26-31]

हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (96:18)

अगर विश्वास न करने वालों के हाथ में वह सब कुछ (धन-दौलत) आ जाए जो सारी ज़मीन में है और उतना ही और भी (कहीं से) पा लें, फिर वे ये सब कुछ क़यामत के दिन की यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में देने को तैयार हों, तब भी उनकी ये चीज़ें स्वीकार नहीं की जाएँगी---- उन्हें दर्दनाक यातना होगी।  (36)

वे चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से बाहर निकल आएँ, मगर वे उससे निकल नहीं सकेंगे: उनके लिए कभी न ख़त्म होने वाली यातना है। (37)   [5: 36-37]

[क़यामत के दिन अल्लाह कहेगा], "आख़िर तुम लौटकर हमारे पास आ ही गए, वह भी एकदम अकेले, जिस तरह हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था: हमने तुम्हें जो कुछ दे रखा थातुम सब कुछ पीछे छोड़ आए हो, और तुम्हारे वे सिफ़ारिश करने वाले भी कहीं दिखायी नहीं पड़ते हैं जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं।" तुम्हारे बीच के सारे बंधन टूट चुके हैं, और जिन (देवताओं) के बारे में तुम ऐसे दावे किया करते थे, वे सब तुम्हें छोड़ चुके हैं। (6: 94)

उन लोगों ने जिनको (शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझेदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करने वाला न होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझेदारों को मानने से इंकार कर देंगे। (30: 13)

सो (उस समय) सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (74: 48)

 

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